क्या सिगरेट पीने से सच में भारी होती है आवाज? जानिए इसके पीछे की सच्चाई

क्या सिगरेट पीने से सच में भारी होती है आवाज? जानिए इसके पीछे की सच्चाई


Does Smoking Really Make Your Voice Deeper: बहुत से लोग मानते हैं कि लगातार सिगरेट पीने से आवाज भारी और अलग तरह की हो जाती है. फिल्मों और आम जिंदगी में भी अक्सर धूम्रपान करने वालों की आवाज को भारीपन से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन क्या सच में धूम्रपान का असर आवाज पर पड़ता है? एक्सपर्ट के मुताबिक इसका जवाब हां है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था  clevelandclinic के अनुसार,  कान, नाक और गले से जुड़ी बीमारियों की एक्सपर्ट डॉक्टर कैंडेस ह्रेलैक बताती हैं कि धूम्रपान सीधे तौर पर आवाज की क्वालिटी, सुर और भारीपन को प्रभावित कर सकता है. दरअसल, सिगरेट या दूसरे तंबाकू उत्पादों के धुएं में सैकड़ों तरह के रसायन मौजूद होते हैं. जब कोई व्यक्ति धुआं अंदर खींचता है, तो यह सबसे पहले गले और स्वर पैदा करने वाली नलियों से होकर लंग्स तक पहुंचता है. यही वजह है कि इन हिस्सों में जलन और सूजन शुरू हो सकती है.

लगातार धूम्रपान से क्या होता है असर?

लगातार धूम्रपान करने से गले में खराश, बलगम और खांसी की समस्या बढ़ सकती है. बार-बार खांसने से आवाज बनाने वाली नलियां आपस में जोर से टकराती हैं, जिससे उनमें सूजन और ज्यादा बढ़ जाती है. यही सूजन धीरे-धीरे आवाज को भारी और बैठा हुआ बना सकती है. एक्सपर्ट के मुताबिक गाने वाले लोगों में इसका असर जल्दी दिखाई दे सकता है. ऊंचे सुर लगाने के दौरान स्वर पैदा करने वाली नलियों पर ज्यादा दबाव पड़ता है. अगर उनमें पहले से सूजन हो, तो आवाज में बदलाव साफ महसूस होने लगता है. 

क्या होता है इसका असर?

धूम्रपान का असर सिर्फ आवाज भारी होने तक सीमित नहीं रहता. लंबे समय तक तंबाकू का सेवन गले में लगातार सूजन की स्थिति पैदा कर सकता है. कुछ मामलों में आवाज बैठने लगती है या कई दिनों तक ठीक से निकलती ही नहीं. इसके अलावा गले के अंदर मांस बढ़ने जैसी समस्या भी हो सकती है, जिससे सांस लेने में दिक्कत तक होने लगती है. गंभीर स्थिति में ऑपरेशन की जरूरत पड़ सकती है. 

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कैंसर का भी खतरा

एक्सपर्ट यह भी चेतावनी देते हैं कि लगातार धूम्रपान करने से गले के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. शुरुआती दौर में इसके संकेत आवाज में बदलाव के रूप में दिखाई दे सकते हैं. अगर किसी व्यक्ति की आवाज तीन हफ्तों से ज्यादा समय तक भारी या बदली हुई रहे, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए. जहां तक दूसरे नशे वाले धुएं या भाप वाले उत्पादों की बात है, एक्सपर्ट मानते हैं कि अभी इस पर पर्याप्त रिसर्च नहीं हुआ है. हालांकि यह जरूर माना जा रहा है कि किसी भी तरह का धुआं या रसायन गले और स्वर तंत्र पर असर डाल सकता है.

अच्छी बात यह है कि धूम्रपान छोड़ने के कुछ ही हफ्तों बाद आवाज में सुधार दिखने लगता है. पर्याप्त पानी पीना, गले का ध्यान रखना और धूम्रपान से दूरी बनाना आवाज को फिर से सामान्य बनाने में मदद कर सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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8 घंटे सोकर भी नहीं मिट रही थकान, इस गंभीर बीमारी की ओर इशारा कर रहा शरीर

8 घंटे सोकर भी नहीं मिट रही थकान, इस गंभीर बीमारी की ओर इशारा कर रहा शरीर


Why Body Feels Exhausted Even After Good Sleep: रात को समय पर सोना, देर रात तक मोबाइल न चलाना और पूरे आठ घंटे की नींद लेना, इसके बावजूद अगर सुबह उठते ही शरीर टूटा हुआ महसूस हो, आंखों में भारीपन रहे और दिनभर थकान पीछा न छोड़े, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कई बार शरीर इस तरह किसी गंभीर समस्या का संकेत देता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

Hartford HealthCare Medical Group के स्लीप स्पेशलिस्ट Dr. Steven Thau के मुताबिक, सिर्फ नींद के घंटे पूरे होना काफी नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि नींद कितनी गहरी और आरामदायक रहे. कई लोग बिस्तर पर तो आठ घंटे बिताते हैं, लेकिन उनका शरीर असली आराम तक पहुंच ही नहीं पाता.

किस वजह से सुबह रहती है थकान?

नींद के दौरान शरीर अलग-अलग चरणों से गुजरता है. इनमें हल्की नींद, गहरी नींद और आरईएम स्लीप शामिल होती है. अगर किसी वजह से बार-बार नींद टूटती रहे, तो शरीर गहरी नींद तक नहीं पहुंच पाता. यही कारण है कि सुबह उठने पर थकान बनी रहती है. तनाव, कमरे में शोर, देर रात तक स्क्रीन देखने की आदत और ज्यादा कैफीन लेने जैसी चीजें गहरी नींद को प्रभावित कर सकती हैं. 

लगातार थकान बीमारी का संकेत

इस लगातार बनी रहने वाली थकान के पीछे एक गंभीर बीमारी भी हो सकती है, जिसे स्लीप एपनिया कहा जाता है. यह ऐसी स्थिति है जिसमें सोते समय व्यक्ति की सांस कुछ सेकंड के लिए रुक जाती है.  डॉ  बताते हैं कि कई लोगों को इसका पता तक नहीं चलता, लेकिन दिमाग बार-बार शरीर को सांस लेने के लिए जगाता रहता है. इससे नींद पूरी होने के बावजूद शरीर को आराम नहीं मिल पाता. जोर से खर्राटे आना, नींद में घुटन महसूस होना या दिनभर अत्यधिक सुस्ती रहना इसके संकेत हो सकते हैं.

इसके अलावा, रोज अलग-अलग समय पर सोना और उठना भी शरीर कीसर्कैडियन रिदम को बिगाड़ देता है. यही वजह है कि छुट्टियों में ज्यादा देर तक सोने के बाद भी कई लोग और ज्यादा थका हुआ महसूस करते हैं.

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लाइफस्टाइल का भी प्रभाव

खानपान की आदतें भी नींद की क्वालिटी पर असर डालती हैं. देर रात भारी खाना, मसालेदार भोजन या शराब लेने से नींद बार-बार टूट सकती है. वहीं शरीर में पानी की कमी होने पर भी बेचैनी और थकान महसूस होती है. मेंटल तनाव और चिंता भी बड़ी वजह बनते हैं. जब दिमाग लगातार सक्रिय रहता है, तो शरीर आराम की स्थिति में नहीं पहुंच पाता. ऐसे में ध्यान, गहरी सांस लेने की आदत और सोने से पहले शांत माहौल बनाने से फायदा मिल सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या सिर्फ पानी से हाथ धोना है काफी? डॉक्टर से जानें बीमारियों का बड़ा सच

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Why Handwashing Is Important For Health: हाथ धोना एक बहुत साधारण सी आदत लगती है. इसमें न ज्यादा समय लगता है, न किसी खास साधन की जरूरत होती है. फिर भी यही छोटी-सी आदत हमें कई तरह के इंफेक्शन से बचा सकती है. यही वजह है कि आधुनिक चिकित्सा के इस दौर में भी डॉक्टर बार-बार हाथ धोने की सलाह देते हैं. यह सिर्फ व्यक्तिगत सफाई का मामला नहीं है, बल्कि पूरे समाज के स्वास्थ्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कदम है. 

टीकों और एंटीबायोटिक्स के आने से बहुत पहले भी हाथों की सफाई ने लोगों की जान बचाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. कोविड-19 महामारी के दौरान भी यही बात फिर से सामने आई कि साफ हाथ इंफेक्शन की चेन को तोड़ने का सबसे आसान तरीका हैं. 

क्यों हाथ धोना जरूरी

हम रोजमर्रा की जिंदगी में कई चीजों को छूते हैं, जैसे दरवाजे के हैंडल, मोबाइल फोन, पैसे, रेलिंग या फिर किसी से हाथ मिलाना. इन सब पर सूक्ष्म जीव मौजूद हो सकते हैं. डॉ. प्रतीक गोपानी  ने TOI को बताया कि बहुत से लोग हाथ धोने को गंभीरता से नहीं लेते, जबकि यह आदत कई गंभीर इंफेक्शन से बचाती है और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है. जब गंदे हाथ चेहरे, आंख, नाक या मुंह तक पहुंचते हैं, तो यही जीव शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और बीमारियों की शुरुआत होती है. 

इससे कौन सी बीमारियां फैलती हैं

इसी तरह हैजा, टाइफाइड, डायरिया और इन्फ्लुएंजा जैसी बीमारियां फैलती हैं. खास बात यह है कि इंफेक्शन सिर्फ गंदे माहौल में ही नहीं, बल्कि साफ दिखने वाली जगहों पर भी हो सकता है. इसलिए सतर्क रहना जरूरी है. 

रिसर्च में क्या निकला

साइंटिस्ट रिसर्च भी इस बात की पुष्टि करते हैं. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, सही तरीके से हाथ धोने से इंफेक्शन का खतरा करीब 20 प्रतिशत तक कम हो सकता है. जिन देशों में साफ पानी और स्वच्छता की बेहतर सुविधा होती है, वहां इंफेक्शन के मामलों में स्पष्ट गिरावट देखी गई है. 

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इन चीजों को नहीं करना चाहिए इग्नोर

अक्सर लोग रोजमर्रा के छोटे-छोटे मौकों को नजरअंदाज कर देते हैं, जहां हाथ धोना जरूरी होता है. जैसे कि शौचालय इस्तेमाल करने के बाद, खाना बनाने या खाने से पहले, कच्चे भोजन को छूने के बाद, खांसने या छींकने के बाद, पालतू जानवरों या कचरे को छूने के बाद, और बाहर से घर आने पर. बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह आदत और भी ज्यादा जरूरी है, क्योंकि उनकी रोग इम्यून सिस्टम अपेक्षाकृत कमजोर होती है.

हाथ धोने का सही तरीका

हाथ धोने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि उसे करना. लगभग 20 सेकंड तक साबुन और पानी से हाथ धोना चाहिए. हथेलियों, हाथों के पीछे, उंगलियों के बीच और नाखूनों के नीचे अच्छी तरह सफाई करनी चाहिए. साबुन गंदगी और कीटाणुओं को हटाने में मदद करता है, जबकि केवल पानी से धोना पर्याप्त नहीं होता. अगर साबुन उपलब्ध न हो, तो अल्कोहल-आधारित सैनिटाइजर इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन यह पूरी तरह विकल्प नहीं है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या गर्मी से बिगड़ रहे हैं पीरियड्स? डॉक्टर से जानें क्या है इसका सच

क्या गर्मी से बिगड़ रहे हैं पीरियड्स? डॉक्टर से जानें क्या है इसका सच


Impact Of High Temperature On Hormones In Women: गर्मियों का मौसम सिर्फ पसीना और थकान ही नहीं लाता, बल्कि कई महिलाओं के लिए शरीर की अंदरूनी लय को भी बदल देता है. आमतौर पर मासिक धर्म को एक नियमित और तय चक्र माना जाता है, लेकिन तेज गर्मी के दौरान यह संतुलन बिगड़ सकता है. कभी पीरियड्स जल्दी आ जाते हैं, कभी देर से, तो कभी फ्लो सामान्य से अलग महसूस होता है. यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि शरीर की नेचुरल प्रतिक्रिया है, जो तापमान, पानी की कमी और तनाव के असर से जुड़ी होती है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

डॉ. श्रुति कोटांगले, कंसल्टेंट गायनेकोलॉजिस्ट ने TOI को बताया कि गर्मी का असर सिर्फ सांस या यूरिन से जुड़ी समस्याओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पीरियड को भी प्रभावित कर सकता है. शरीर में पानी की कमी और बढ़ता तापमान हार्मोनल बदलाव ला सकता है. दरअसल, जब तापमान बढ़ता है तो शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए ज्यादा मेहनत करता है. इस प्रक्रिया में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन प्रभावित हो सकते हैं, जो पीरियड्स को नियंत्रित करते हैं. 

फ्लो में भी बदलाव

गर्मी के दिनों में कई महिलाओं को फ्लो में बदलाव महसूस होता है. किसी महीने ब्लीडिंग ज्यादा हो सकती है, तो कभी बहुत हल्की. इसका कारण शरीर में पानी की कमी और ब्लड सर्कुलेशन में बदलाव होता है. डिहाइड्रेशन के कारण खून गाढ़ा हो सकता है, जबकि हीट स्ट्रेस गर्भाशय के संकुचन को प्रभावित करता है. डॉ. कोटांगले कहती हैं कि हर महिला में इसका असर अलग होता है, इसलिए फ्लो में बदलाव सामान्य है. 

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पानी की कमी और डिप्रेशन

पानी की कमी और तनाव भी इस पूरी प्रक्रिया में बड़ी भूमिका निभाते हैं. गर्मियों में शरीर जल्दी डिहाइड्रेट होता है, जिससे क्रैम्प्स बढ़ सकती है.ल  इसके साथ ही, गर्मी के कारण कॉर्टिसोल यानी स्ट्रेस हार्मोन भी बढ़ जाता है, जो मूड स्विंग्स, थकान और चिड़चिड़ापन बढ़ा सकता है. यही वजह है कि इस मौसम में कई महिलाओं को पीरियड्स के दौरान ज्यादा थकावट और भावनात्मक उतार-चढ़ाव महसूस होता है.

नींद का भी असर

गर्मी का असर नींद पर भी पड़ता है. नींद ठीक न हो तो हार्मोनल संतुलन और बिगड़ जाता है. यह एक चक्र की तरह काम करता है कि गर्मी नींद को प्रभावित करती है, नींद हार्मोन को और हार्मोन पीरियड्स को. अत्यधिक गर्मी पीएमएस के लक्षणों को भी बढ़ा सकती है, जैसे सिरदर्द, उल्टी, शरीर दर्द और बेचैनी. हालांकि, यह जरूरी नहीं कि हर महिला को ये बदलाव महसूस हों. 

किन बातों का ध्यान रखना चाहिए

इस दौरान सबसे जरूरी है सही दिनचर्या अपनाना। पर्याप्त पानी पीना बेहद जरूरी है कि दिनभर में कम से कम 3-4 लीटर. तरबूज, खीरा जैसे फल और नारियल पानी, छाछ जैसे पारंपरिक पेय शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं. हल्का भोजन, कम कैफीन और नियमित नींद भी शरीर को संतुलित रखते हैं. हल्की एक्सरसाइज या योग से भी आराम मिल सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या हर तरह का फैट होता है बुरा? जानें मोटापा और बीमारियों का असली कनेक्शन

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Difference Between White Fat And Brown Fat: जब भी हम शरीर में जमा फैट की बात करते हैं, तो अक्सर उसे सिर्फ अच्छा या बुरा मान लेते हैं. लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा जटिल है. फैट सिर्फ वजन बढ़ाने वाला तत्व नहीं, बल्कि शरीर के अंदर एक एक्टिव सिस्टम की तरह काम करता है, जो हमारी सेहत को गहराई से प्रभावित करता है. हाल के वर्षों में हुई रिसर्च ने यह साफ कर दिया है कि सिर्फ फैट की मात्रा नहीं, बल्कि यह शरीर में कहां जमा हो रहा है, यही असली फर्क पैदा करता है.

क्या निकला रिसर्च में?

यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो की एक स्टडी में यह सामने आया कि एक ही तरह की डाइट लेने के बावजूद अलग-अलग लोगों में फैट अलग तरीके से जमा होता है. यूरोपियन लोगों में यह फैट ज्यादा तर त्वचा के नीचे जमा होता है, जबकि दक्षिण एशियाई लोगों खासकर भारतीयों में यह फैट शरीर के अंदर अंगों के आसपास जमा होता है, जिसे विसरल फैट कहा जाता है. यही वजह है कि भारतीयों में डायबिटीज और दिल की बीमारियां जल्दी देखने को मिलती हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

 न्यूट्रिशनिस्ट रयान फर्नांडो ने बताया कि फैट एक एंडोक्राइन ऑर्गन की तरह काम करता है, जो हार्मोन बनाता है और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है. इसलिए एक जैसे वजन वाले दो लोगों की सेहत एक जैसी नहीं होती. वहीं, डॉ. वी मोहन के अनुसार, भारतीयों में त्वचा के नीचे फैट स्टोर करने की क्षमता कम होती है, जिससे अतिरिक्त फैट सीधे शरीर के अंदर जमा होने लगता है. 

व्हाइट और ब्राउन फैट में अंतर

फैट के भी अलग-अलग प्रकार होते हैं व्हाइट फैट और ब्राउन फैट. व्हाइट फैट वही होता है, जो शरीर में जमा होकर मोटापा बढ़ाता है और बीमारियों का कारण बनता है. दूसरी तरफ ब्राउन फैट शरीर के लिए फायदेमंद होता है. यह कैलोरी जलाने में मदद करता है, ब्लड शुगर कंट्रोल करता है और दिल की सेहत को बेहतर बनाता है. डॉ. मोहन बताते हैं कि ज्यादा व्हाइट फैट शरीर में सूजन बढ़ाता है और इससे डायबिटीज, हार्ट डिजीज और कुछ कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. वहीं ब्राउन फैट शरीर में अच्छे हार्मोन जैसे एडिपोनेक्टिन को बढ़ाता है, जो मेटाबॉलिज्म के लिए फायदेमंद होता है. 

साइंटिस्ट इसपर कर रहे हैं काम

वैज्ञानिक अब इस बात पर भी काम कर रहे हैं कि कैसे व्हाइट फैट को ब्राउन फैट में बदला जा सके. हालांकि, यह प्रक्रिया अभी पूरी तरह इंसानों में साबित नहीं हुई है, लेकिन इस दिशा में रिसर्च जारी है. कीट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर नरेश बाल बताते हैं कि कुछ नेचुरल तत्व जैसे काली मिर्च और मिर्च में पाए जाने वाले कंपाउंड ब्राउन फैट को सक्रिय करने में मदद कर सकते हैं.

डॉ. नटराजन गणेशन के अनुसार शरीर फैट को यूं ही नहीं जलाता, बल्कि फैट की क्वालिटी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी मात्रा.  यानी हेल्दी फैट जैसे नट्स और ऑलिव ऑयल शरीर के लिए ज्यादा फायदेमंद होते हैं.

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लाइफस्टाइल की अहम भूमिका

इसके अलावा, हमारी लाइफस्टाइल भी बड़ी भूमिका निभाती है. ज्यादा प्रोसेस्ड फूड, चीनी और कम एक्टिव लाइफस्टाइल शरीर में व्हाइट फैट बढ़ाते हैं. वहीं पारंपरिक भारतीय आहार, जिसमें हल्दी, अदरक, हरी चाय और मसाले शामिल होते हैं ब्राउन फैट को सक्रिय करने में मदद कर सकते हैं.

भारत में क्या है इसका असर

भारत में इसके असर अब साफ दिखाई देने लगे हैं. यूनिसेफ की चाइल्ड न्यूट्रिशन रिपोर्ट 2025 के अनुसार, 2030 तक भारत में 2.7 करोड़ से अधिक बच्चे और किशोर मोटापे का शिकार हो सकते हैं, जो वैश्विक बोझ का लगभग 11 प्रतिशत होगा. वहीं, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ दशकों में एडल्ट में मोटापा तेजी से बढ़ा है, महिलाओं में करीब 91 प्रतिशत और पुरुषों में 146 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है.

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क्या आप भी गलत तरीके से खा रहे तरबूज? रात में भूलकर भी न करें ये काम, जानें इसे खाने का सही समय

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