अल्जाइमर का महिलाओं पर ज्यादा असर का नई रिसर्च में खुलासा, क्या ओमेगा-3 घटा सकता है यह खतरा?

अल्जाइमर का महिलाओं पर ज्यादा असर का नई रिसर्च में खुलासा, क्या ओमेगा-3 घटा सकता है यह खतरा?


अल्जाइमर सिर्फ एक बीमारी नहीं है, यह धीरे-धीरे किसी इंसान की यादें, पहचान और आत्मनिर्भरता छीन लेने वाली स्थिति है. सबसे चिंता की बात यह है कि इसका असर महिलाओं पर पुरुषों की तुलना में कहीं ज्यादा देखा जा रहा है. कई शोध बताते हैं कि महिलाएं न सिर्फ अल्जाइमर का ज्यादा शिकार होती हैं, बल्कि उनमें इसके लक्षण अक्सर जल्दी दिखाई देने लगते हैं. इसके बावजूद महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर इतनी गंभीर चर्चा नहीं होती, जितनी होनी चाहिए.

अक्सर याददाश्त में हल्की कमी, बार-बार चीजें भूलना, बेचैनी या भ्रम को उम्र का असर, तनाव या थकान कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है. परिवार और समाज की यही अनदेखी आगे चलकर बड़ी समस्या बन जाती है. आज जब दुनिया भर में अल्जाइमर तेजी से बढ़ रहा है, तब यह समझना बेहद जरूरी है कि महिलाएं इससे ज्यादा प्रभावित क्यों होती हैं और क्या इसे रोका या धीमा किया जा सकता है. इसी बीच अब ओमेगा-3 फैटी एसिड को लेकर नई रिसर्च उम्मीद सामने आई है. 

अल्जाइमर रोग क्या है?

अल्जाइमर एक न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है, यानी यह धीरे-धीरे दिमाग की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है. यह ज्यादातर 65 साल से अधिक उम्र के लोगों में देखने को मिलती है, लेकिन इसके लक्षण अचानक नहीं आते. इसके शुरुआती लक्षण हाल की बातें या घटनाएं भूल जाना, बार-बार एक ही सवाल पूछना, हाल ही में क्या खाया या किससे बात की, याद न रहना, आगे बढ़ने पर फैसले लेने में परेशानी, एक साथ कई काम न कर पाना, रास्ता या लोगों को पहचानने में दिक्कत, व्यवहार और भाषा में बदलाव हैं. यह बीमारी महीनों या सालों में धीरे-धीरे बढ़ती है, इसलिए इसे समय रहते पहचानना बहुत जरूरी होता है. 

महिलाओं में अल्जाइमर का खतरा ज्यादा क्यों?

1. डॉक्टरों और शोधकर्ताओं के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं. जैसे महिलाएं ज्यादा उम्र तक जिंदा रहती हैं. क्योंकि अल्जाइमर उम्र से जुड़ी बीमारी है, इसलिए महिलाओं में इसका जोखिम अपने आप बढ़ जाता है. 

2. मेनोपॉज के बाद हार्मोनल बदलाव, मेनोपॉज के दौरान एस्ट्रोजन हार्मोन कम हो जाता है, जो दिमाग की कोशिकाओं की रक्षा करता है. इसके कम होने से मस्तिष्क ज्यादा संवेदनशील हो जाता है. 

3. कई महिलाओं को पहले शिक्षा और मानसिक विकास के उतने अवसर नहीं मिले, जिससे उनका ब्रेन रिजर्व कमजोर रह सकता है. 

4. जेनेटिक कारण जैसे APOE4 नामक जीन महिलाओं में ज्यादा पाया जाता है, जो अल्जाइमर के खतरे को बढ़ाता है. 

ओमेगा-3 क्या है और यह दिमाग के लिए क्यों जरूरी है?

ओमेगा-3 फैटी एसिड, खासकर DHA और EPA, दिमाग की हेल्थ के लिए बेहद अहम माने जाते हैं.दिमाग का लगभग 50–60 प्रतिशत हिस्सा फैट से बना होता है. इसमें से बड़ा हिस्सा ओमेगा-3 फैटी एसिड का होता है. DHA दिमाग की कोशिकाओं की झिल्ली को मजबूत करता है. यह न्यूरोट्रांसमीटर के काम को बेहतर बनाता है, जिससे सोचने-समझने की क्षमता बनी रहती है. ओमेगा-3 की कमी से याददाश्त कमजोर हो सकती है. डिप्रेशन, मनोभ्रंश और अन्य मानसिक समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है. 

क्या ओमेगा-3 अल्जाइमर से बचाव में मदद कर सकता है?

रिसर्च बताती है कि ओमेगा-3 कोई चमत्कारी इलाज नहीं है, लेकिन यह अल्जाइमर की रोकथाम में मदद कर सकता है. हल्की याददाश्त की समस्या (MCI) के दौर में इसका असर ज्यादा देखा गया है. यह दिमाग के साथ-साथ दिल की सेहत भी सुधारता है, जिससे मनोभ्रंश का खतरा कम होता है. विशेषज्ञों के अनुसार, जिन लोगों के शरीर में ओमेगा-3 का स्तर अच्छा होता है, उनमें मानसिक गिरावट अपेक्षाकृत धीमी होती है. 

विकासशील देशों की महिलाओं के लिए यह क्यों जरूरी है?

कम आय वाले देशों में बुजुर्ग महिलाओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है. जैसे आर्थिक निर्भरता, डॉक्टरों और विशेषज्ञों तक सीमित पहुंच, मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से न लेना, ऐसे में ओमेगा-3 से भरपूर आहार, सही परामर्श और कम लागत वाले सप्लीमेंट एक प्रभावी उपाय हो सकते हैं. मछली, अलसी के बीज, अखरोट जैसे खाद्य पदार्थ इसमें मददगार हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ सप्लीमेंट काफी नहीं हैं,  समय पर स्क्रीनिंग, महिलाओं के लिए विशेष मानसिक स्वास्थ्य योजनाएं, देखभाल करने वालों को समर्थन, स्थानीय स्तर पर और शोध की भी जरूरत है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें 

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हार्ट अटैक या दिल की गंभीर स्थिति में घर पर अकेले होने पर क्या करना चाहिए? जानिए 25 साल के एक्स

हार्ट अटैक या दिल की गंभीर स्थिति में घर पर अकेले होने पर क्या करना चाहिए? जानिए 25 साल के एक्स


हार्ट अटैक किसी के लिए भी बहुत डरावना और खतरनाक अनुभव हो सकता है. यह डर तब और बढ़ जाता है जब आप घर पर अकेले हों और पास में कोई मदद न हो. इस स्थिति में आदमी अक्सर घबराता है, डर जाता है और सोचने में असमर्थ हो जाता है कि अब क्या किया जाए. लेकिन ऐसे समय में अगर आप कुछ जरूरी कदम जान लें और तुरंत सही तरीके से कदम उठाएं, तो आपकी जान बचाई जा सकती है. 

25 साल के एक्सपीरियंस वाले बोर्ड-सर्टिफाइड कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. जेरेमी लंदन ने हाल ही में एक वीडियो में साफ रूप से बताया कि घर पर अकेले रहते हुए हार्ट अटैक पड़ने पर क्या करना चाहिए. उन्होंने कहा कि ऐसे समय में दिमाग शांत रखना मुश्किल होता है, लेकिन कुछ आसान लेकिन जरूरी कदम याद रखने से आप अपनी स्थिति को नियंत्रित कर सकते हैं और गंभीर स्थिति से बच सकते हैं. डॉ. लंदन की सलाहों को अगर आप अपनाते हैं, तो यह दिल के दौरे के दौरान मददगार साबित हो सकती हैं.

दिल की गंभीर स्थिति में घर पर अकेले होने पर क्या करना चाहिए?

1. तुरंत आपातकालीन सेवाओं को कॉल करें – हार्ट अटैक पड़ने पर सबसे पहला और सबसे जरूरी काम यह है कि आप तुरंत आपातकालीन सेवाओं (EMS/108/112) को कॉल करें. डॉ. लंदन कहते हैं कि चाहे आपके पास कुछ हल्की सी तकलीफ महसूस हो रही हो या ज्यादा गंभीर लक्षण हों, जल्दी से जल्दी मदद बुलाना जीवन रक्षक हो सकता है. 

2. एस्पिरिन चबाएं – अगर आपको हार्ट डिजीज विशेषज्ञ ने पहले एस्पिरिन लेने की सलाह दी है और आपको इससे एलर्जी नहीं है, तो दौरे के दौरान एक एस्पिरिन को निगलने के बजाय चबाएं. ऐसा करने से दिल पर पड़ने वाला दबाव कम हो सकता है और दिल के दौरे की गंभीरता कुछ हद तक घट सकती है. ध्यान दें, यह हार्ट अटैक को पूरी तरह से रोक नहीं सकता, लेकिन इससे मदद मिलती है. 

3. अपने घर को आपातकालीन सेवाओं के लिए आसान बनाएं – डॉ. लंदन कहते हैं कि घर को ऐसी स्थिति में तैयार रखें कि आपातकालीन सेवाएं आसानी से पहुंच सकें.  इसका मतलब है कि रात में लाइटें जलाएं, दरवाजा खुला रखें।, अगर संभव हो तो दरवाजे का ताला पहले से खोल दें. इस तरह, जब मदद आने वाली हो, तो टीम को आपके घर तक पहुंचने में किसी तरह की परेशानी नहीं होगी.

4. बैठ जाएं या लेट जाएं – हार्ट अटैक पड़ने पर अचानक बेहोशी का खतरा होता है. इसलिए डॉ. लंदन की सलाह है कि आप तुरंत बैठ जाएं या लेट जाएं. ऐसा करने से गिरने और सिर या शरीर को चोट लगने का खतरा कम होता है. यह कदम आपके लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करता है जब तक कि मदद न पहुंच जाए. 

5. किसी भरोसेमंद व्यक्ति को फोन करें – घर पर अकेले होने पर किसी दोस्त, परिवार के सदस्य या करीबी व्यक्ति को तुरंत कॉल करें. उन्हें बताएं कि आपको हार्ट अटैक पड़ रहा है और आप मदद का इंतजार कर रहे हैं. इससे आप मानसिक रूप से भी अकेले नहीं रहेंगे और आपके पास तुरंत कोई होगा जो स्थिति को समझे और मदद के लिए जरूरी कदम उठाए. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें 

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मोबाइल स्क्रीन का साइलेंट स्ट्रेस, जानिए कैसे 24*7 डिजिटल लाइफ दिल की सेहत पर डाल रही है खतरा 

मोबाइल स्क्रीन का साइलेंट स्ट्रेस, जानिए कैसे 24*7 डिजिटल लाइफ दिल की सेहत पर डाल रही है खतरा 


आज की जिंदगी में स्क्रीन इतनी आम हो चुकी है कि हम यह तक नहीं नोटिस करते हैं कि दिन का कितना वक्त मोबाइल, लैपटॉप और टीवी  के सामने निकल जाता है. काम, मैसेज, खबरें, सोशल मीडिया रील्स और नोटिफिकेशन सब कुछ एक ही स्क्रीन में सिमट गया है. धीरे-धीरे पूरे दिन एक लंबी भी डिजिटल रोशनी में घुल जाता है और इसके साथ जुड़ा तनाव भी नॉर्मल लगने लगता है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि मोबाइल स्क्रीन का साइलेंट स्ट्रेस क्या है और 24*7 डिजिटल लाइफ दिल की सेहत पर कैसे असर डाल रही है. 

स्क्रीन स्ट्रेस कब बन जाता है लाइफस्टाइल?

मोबाइल देखते हुए खाना खाना, परिवार के साथ बैठकर भी नोटिफिकेशन चेक करना और देर रात स्क्रीन पर कुछ आखिरी देखने की आदत अब आम हो चुकी है. यही आदतें धीरे-धीरे शरीर पर असर डालने लगती है. स्क्रीन से जुड़ा तनाव सिर्फ दिमाग तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि शरीर में उतर जाता है, ब्लड प्रेशर बढ़ना, दिल की धड़कन का अनियमित होना, एंग्जायटी अटैक, लगातार थकान, सिरदर्द और नींद से जुड़ी समस्याएं इसके संकेत है. कुछ मामलों में लंबे समय तक डिजिटल तनाव को दिल की गंभीर बीमारियों और अचानक मेडिकल इमरजेंसी से भी जोड़ा गया है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

एक्सपर्ट्स के अनुसार लंबे समय तक बैठकर स्क्रीन देखने से शरीर की मूवमेंट कम हो जाती है. इससे ब्लड सर्कुलेशन धीमा पड़ता है और मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और खराब कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ता है, जो दिल की बीमारी की बड़ी वजह है. डॉक्टर बताते हैं कि स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट मेलाटोनिन हार्मोन को प्रभावित करती है, जिससे नींद खराब होती है. खराब नींद खुद हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज का बड़ा रिस्क फैक्टर है.

नोटिफिकेशन भी बढ़ा रहे हैं दिल पर दबाव 

लगातार नोटिफिकेशन और सोशल मीडिया का इस्तेमाल शरीर में स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टिसोल का बढ़ाता है. समय के साथ यह ब्लड प्रेशर को ऊपर ले जाता है और दिल पर एक्स्ट्रा दबाव डालता है. कुछ रिसर्च में यह भी सामने आया है कि ज्यादा स्क्रीन टाइम खासतौर पर टीवी देखने की आदत आगे चलकर हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकती है. इसके अलावा जब कोई चीज लगभग हर किसी की जिंदगी का हिस्सा बन जाए, तो वह खतरनाक लगनी बंद हो जाती है. वहीं थकान और तनाव को आजकल लोग मजाक या बिजी लाइफ का हिस्सा मान लेते हैं. एक्सपर्ट्स के अनुसार यह डिजिटल स्ट्रेस अचानक नजर नहीं आता है. इसमें न कोई चोट होती है और न एक पल में गिरावट होती है. डिजिटल स्ट्रेस सालों तक  तक चुपचाप बढ़ता रहता है और जब समस्या गंभीर होती है, तब फोन जैसी आम चीज को वजह मानना मुश्किल लगता है.

शरीर देता है संकेत जिस नजरअंदाज कर देते हैं लोग 

एक्सपर्ट्स के अनुसार अगर स्क्रीन टाइम से सेहत प्रभावित हो रही है तो इसके संकेत लगातार थकान, खराब नींद, बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर, वजन बढ़ना, फोन या कंप्यूटर से जुड़ी बेचैनी और फिजिकल एक्टिविटी में कमी शामिल होते हैं. वहीं डिजिटल स्ट्रेस इसलिए खतरनाक है क्योंकि यह दिखने में नॉर्मल लगता है, लेकिन शरीर इसे लगातार दबाव की तरह लेता है. इससे दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर पूरी तरह नॉर्मल मोड में वापस नहीं आ पाते हैं. 

दिल को सुरक्षित रखने के लिए क्या करें?

एक्सपर्ट्स के अनुसार हर 30 से 40 मिनट में खड़े होकर थोड़ा चलना या स्ट्रेच करना मददगार हो सकता है. सोने से 1 से 2 घंटे पहले स्क्रीन से दूरी, हफ्ते में कम से कम 150 मिनट की फिजिकल एक्टिविटी और सोशल मीडिया से ब्रेक दिल की सेहत के लिए जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें

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हाई यूरिक एसिड में कौन-सी दाल सुरक्षित और कौन-सी खतरनाक? डाइटीशियन ने बताई दालों की पूरी लिस्ट

हाई यूरिक एसिड में कौन-सी दाल सुरक्षित और कौन-सी खतरनाक? डाइटीशियन ने बताई दालों की पूरी लिस्ट


अगर आपका यूरिक एसिड बढ़ा हुआ है और आप दाल खाना पूरी तरह छोड़ चुके हैं तो यह खबर आपके लिए जरूरी है. अक्सर हाई यूरिक एसिड वाले लोग यह मान लेते हैं कि सभी दालें नुकसानदायक होती हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स ऐसा नहीं मानते. डाइटीशियन का कहना है कि सही दाल और सही मात्रा चुन ली जाए तो दाल पूरी तरह छोड़े बिना भी डाइट को मैनेज किया जा सकता है. यूरिक एसिड शरीर में बनने वाला एक वेस्ट प्रोडक्ट है, जो किडनी के जरिए बाहर निकलता है. जब शरीर में यूरिक एसिड ज्यादा बनने लगता है या किडनी इसे ठीक से बाहर नहीं निकाल पाती, तो इसकी मात्रा बढ़ जाती है. इसे हाइपरयूरिसीमिया कहा जाता है, जिससे जोड़ों में दर्द, गाउट और किडनी स्टोन जैसी दिक्कतें हो सकती हैं.

क्या सभी तरह की दालें हैं खतरनाक?

डाइटीशियन के अनुसार, हाई यूरिक एसिड में सभी दालों से परहेज करना जरूरी नहीं है. जरूरी यह है कि दाल में मौजूद प्यूरीन की मात्रा कितनी है. प्यूरीन टूटकर यूरिक एसिड बनाता है, इसलिए ज्यादा प्यूरीन वाली चीजें नुकसान पहुंचा सकती है. वहीं डाइटीशियन यह भी बताते हैं कि अगर किसी व्यक्ति का यूरिक एसिड लेवल बहुत ज्यादा यानी 8 मिलीग्राम/डीएल से ऊपर है, तो उसे ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए और सिर्फ लो-प्यूरिन फूड्स ही लेने चाहिए.

सबसे हेल्दी दाल कौन-सी?

पीली मूंग दाल में प्यूरीन की मात्रा सबसे कम होती है. इसमें 25 से 35 मिलीग्राम प्यूरीन पाया जाता है. इसे सीमित मात्रा में रोजाना भी खाया जा सकता है, इसलिए हाई यूरिक एसिड वालों के लिए यह सबसे सुरक्षित मानी जाती है.

किन दालों को सीमित मात्रा में खाना चाहिए?

मसूर दाल, अरहर दाल और हरे छिलके वाली मूंग दाल में प्यूरीन की मात्रा 35 से 50 मिलीग्राम होती है. इन्हें हफ्ते में तीन से चार बार खाया जा सकता है. लेकिन इन्हें 6 से 8 घंटे भिगोकर पकाना चाहिए. वहीं  लोबिया, साबुत मूंग, कुलथ दाल और साबुत दालों में प्यूरिन 60 से 75 मिलीग्राम तक होता है. इनका सेवन हफ्ते में दो से तीन बार किया जा सकता है. 

किन दालों से बनाएं दूरी?

चना, राजमा और काला चना में प्यूरीन की मात्रा 75 से 90 मिलीग्राम तक होती है. इनका सेवन 10 से 15 दिन में एक बार ही करने की सलाह दी जाती है. वहीं सोयाबीन और सोया चंक्स में प्यूरीन की मात्रा सबसे ज्यादा करीब 120 से 140 मिलीग्राम होती है. हाई यूरिक एसिड वालों को इनसे पूरी तरह परहेज करना चाहिए.

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वजन घटाने वाला इंजेक्शन बन सकता है गॉलब्लैडर निकलवाने की वजह, चौंकाने वाला खुलासा

वजन घटाने वाला इंजेक्शन बन सकता है गॉलब्लैडर निकलवाने की वजह, चौंकाने वाला खुलासा


आज के समय में मोटापा सिर्फ एक सौंदर्य से जुड़ी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह कई बीमारियों की जड़ बन चुका है. इसी वजह से लोग तेजी से वजन कम करने के आसान और जल्दी असर दिखाने वाले तरीकों की तलाश में रहते हैं. जिम, डाइट प्लान और योग के साथ-साथ अब वजन घटाने वाले इंजेक्शन लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. वेगोवी (Wegovy) और मौनजारो (Mounjaro) जैसे इंजेक्शन को कई लोग मैजिक सॉल्यूशन मानने लगे हैं, क्योंकि इनसे बिना ज्यादा मेहनत के वजन तेजी से घटने लगता है.

सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर इनके चमत्कारी नतीजों की खूब चर्चा हो रही है. इसी बीच ब्रिटेन के डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने एक चौंकाने वाली चेतावनी दी है. उनका कहना है कि तेजी से वजन घटाने वाले इन इंजेक्शनों का इस्तेमाल करने वाले लोगों में गॉलब्लैडर की समस्या और गॉलब्लैडर निकालने की सर्जरी के मामले बढ़ते दिख रहे हैं. हालांकि अभी पूरी तरह यह साबित नहीं हुआ है कि इसकी वजह सिर्फ इंजेक्शन हैं, लेकिन शुरुआती संकेत चिंता बढ़ाने वाले जरूर हैं. तो आइए जानते हैं कि वजन घटाने वाला इंजेक्शन कैसे गॉलब्लैडर निकलवाने की वजह बन सकता है. 

आखिर वजन घटाने वाले इंजेक्शन होते क्या हैं?

वजन घटाने वाले ये इंजेक्शन दरअसल GLP-1 एगोनिस्ट नाम की दवाएं होती हैं. इनमें वेगोवी और मौनजारो जैसी दवाएं शामिल हैं. ये दवाएं शरीर में भूख को कम करती हैं, पेट को ज्यादा देर तक भरा हुआ महसूस कराती हैं और खाने की मात्रा अपने आप घट जाती है. इसी कारण वजन तेजी से कम होने लगता है. शुरुआत में इन दवाओं को डायबिटीज और मेटाबॉलिक बीमारियों के इलाज के लिए बनाया गया था, लेकिन बाद में इनके वजन घटाने वाले प्रभाव के कारण इन्हें मोटापे के इलाज में भी यूज किया जाने लगा. 

ब्रिटेन में गॉलब्लैडर की सर्जरी क्यों बढ़ रही है?

ब्रिटेन के अस्पतालों में डॉक्टरों ने देखा है कि पिछले कुछ सालों में गॉलब्लैडर की पथरी और गॉलब्लैडर निकालने की सर्जरी के मरीज बढ़े हैं. इनमें से कई मरीज ऐसे हैं जिन्होंने हाल ही में तेजी से वजन घटाया था. खासकर वजन घटाने वाले इंजेक्शनों की मदद से, डॉक्टरों का कहना है कि भले ही अभी कोई सीधा वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, लेकिन एक स्पष्ट पैटर्न जरूर दिख रहा है, जिस पर और रिसर्च की जरूरत है. 

तेजी से वजन घटने से गॉलब्लैडर पर क्या असर पड़ता है?

जब शरीर का वजन बहुत तेजी से कम होता है, तो शरीर में कई अंदरूनी बदलाव होते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, तेजी से वजन घटने पर लीवर पित्त (bile) में ज्यादा कोलेस्ट्रॉल छोड़ने लगता है. इससे पित्त गाढ़ा हो सकता है. गाढ़े पित्त से पित्त की पथरी बनने का खतरा बढ़ जाता है.पित्त की पथरी ही गॉलब्लैडर निकालने की सर्जरी की सबसे आम वजह होती है. 

गॉलब्लैडर की बीमारी कितनी गंभीर हो सकती है?

गॉलब्लैडर की समस्या कोई छोटी बात नहीं है. इसके लक्षणों में  पेट के दाहिने ऊपरी हिस्से में तेज दर्द, उल्टी और मतली, खाना पचाने में दिक्कत, बार-बार पेट खराब होना शामिल हैं कई मामलों में दवाइयों से आराम नहीं मिलता और गॉलब्लैडर निकालने की सर्जरी ही आखिरी विकल्प बचता है. हालांकि लोग बिना गॉलब्लैडर के भी सामान्य जीवन जी सकते हैं, लेकिन यह एक बड़ी सर्जरी होती है, जिसमें रिकवरी में समय लगता है, खर्च होता है और कुछ लोगों को लंबे समय तक पाचन की दिक्कत रहती है. 

ब्रिटेन की नियामक एजेंसी क्या कहती है?

ब्रिटेन की मेडिसिन्स एंड हेल्थ केयर प्रोडक्ट्स रेगुलेटरी एजेंसी (MHRA) इन वजन घटाने वाले इंजेक्शनों की सुरक्षा पर नजर बनाए हुए है. एजेंसी ने चेतावनी दी है कि इन इंजेक्शनों से पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं, गॉलब्लैडर से जुड़ी दिक्कतें भी सामने आ सकती हैं, कुछ मामलों में डॉक्टर की मदद जरूरी हो सकती है. हालांकि एजेंसी यह भी मानती है कि कई लोग बिना किसी गंभीर साइड इफेक्ट के इन इंजेक्शनों का यूज कर रहे हैं, लेकिन लंबे समय के असर को समझने के लिए और शोध जरूरी है. 

वजन घटाने वाला इंजेक्शन लेने से पहले क्या ध्यान रखें?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह है कि इंजेक्शन शुरू करने से पहले डॉक्टर से पूरी सलाह जरूर लें. इसके संभावित दुष्प्रभावों, खासकर गॉलब्लैडर से जुड़े जोखिमों को समझें. अगर संभव हो तो धीरे-धीरे वजन घटाने पर ध्यान दें.वजन घटाने के दौरान नियमित जांच करवाते रहें.किसी भी तरह के दर्द या परेशानी को नजरअंदाज न करें. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें 

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सुबह उठते ही आने लगती है छींक तो हो जाएं अलर्ट, इस बीमारी के हो सकते हैं लक्षण

सुबह उठते ही आने लगती है छींक तो हो जाएं अलर्ट, इस बीमारी के हो सकते हैं लक्षण


सुबह की शुरुआत आमतौर पर ताजगी, चाय की खुशबू और नए दिन की उम्मीद से होती है. लेकिन कुछ लोगों के लिए सुबह का मतलब होता है, लगातार छींकें, बहती नाक और रुमाल की तलाश. आंख खुलते ही छीं-छीं की आवाजें आने लगती हैं और समझ नहीं आता कि आखिर हुआ क्या. अक्सर हम सोचते हैं कि शायद रात में ठंड लग गई होगी या हल्का सा जुकाम हो गया है. लेकिन जब यही समस्या रोज होने लगे और दिन चढ़ते-चढ़ते अपने आप ठीक भी हो जाए, तो सवाल उठता है क्या ये सिर्फ ठंड है या शरीर किसी बड़ी समस्या की ओर इशारा कर रहा है. 

सुबह उठते ही बार-बार छींक आना एक आम लेकिन नजरअंदाज की जाने वाली समस्या है. बहुत से लोग इसे हल्के में लेते हैं, जबकि यह एलर्जी, साइनस या नाक से जुड़ी किसी बीमारी का संकेत हो सकता है. अच्छी बात यह है कि समय रहते इसके कारण समझ लिए जाएं, तो इससे आसानी से राहत पाई जा सकती है. आइए जानते हैं कि सुबह छींक क्यों आती है, इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं, किन बीमारियों के लक्षण हो सकते हैं और इससे बचाव कैसे किया जाए. 

सुबह उठते ही छींक क्यों आती है?

1. प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र – छींक आना हमारे शरीर का एक प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र है. जब नाक के अंदर कोई चीज जैसे धूल, गंदगी, तेज गंध या ठंडी हवा जाती है, तो शरीर छींक के जरिए उसे बाहर निकालने की कोशिश करता है. 

2. आपका बिस्तर ही बन सकता है समस्या की जड़ – जिस बिस्तर पर आप सुकून की नींद लेते हैं, वही कभी-कभी छींक की वजह बन जाता है. गद्दे, तकिये और चादरों में बहुत बारीक धूल के कण (डस्ट माइट्स) होते हैं, जो हमें दिखाई नहीं देते, ये कण रात भर बिस्तर में जमा रहते हैं. सुबह जैसे ही आप करवट बदलते हैं या उठते हैं, ये धूल हवा में उड़ जाती है और आपकी नाक में चली जाती है. नाक इसे खतरा समझकर तुरंत प्रतिक्रिया देती है और छींकें शुरू हो जाती हैं. 

3. कमरे में जमा एलर्जी फैलाने वाली चीजें – अगर आपके घर में पालतू जानवर हैं, तो उनके बाल भी बिस्तर और कमरे में जमा हो सकते हैं. खुली खिड़की से परागकण (पोलन), धूल और बाहर की गंदगी रात भर कमरे में आ जाती है. सुबह उठते ही जब आपकी नाक इन सबके संपर्क में आती है, तो वह जरूरत से ज्यादा रिएक्शन कर बैठती है. 

4. तापमान में अचानक बदलाव – रात में आप रजाई या कंबल के अंदर गर्म माहौल में होते हैं. सुबह उठते ही पंखा, एसी या ठंडी हवा से सामना होता है. यह अचानक तापमान बदलना नाक की संवेदनशील त्वचा को परेशान करता है और छींक आने लगती है. इसे एलर्जी नहीं बल्कि नाक की संवेदनशील प्रतिक्रिया भी कहा जा सकता है. 

5. तेज खुशबू और केमिकल्स – कुछ लोग रात में तेज परफ्यूम लगाते हैं, मच्छर भगाने वाली मशीन चलती रहती है या नया डिटर्जेंट इस्तेमाल किया जाता है. बंद कमरे में ये गंध रात भर जमा हो जाती है और सुबह नाक में जलन पैदा करती है. 

6. पेट की गड़बड़ी भी हो सकती है कारण – कई बार रात में एसिडिटी या एसिड रिफ्लक्स की समस्या होती है. इससे पेट का एसिड गले और नाक के पीछे के हिस्से को परेशान करता है. इसके कारण सुबह छींक और हल्की खांसी होने लगती है. 

सुबह छींक आना किन बीमारियों का संकेत हो सकता है?

1. एलर्जिक राइनाइटिस – यह सबसे आम कारण है. इसमें शरीर धूल, पराग या जानवरों के बालों को दुश्मन समझ कर प्रतिक्रिया करता है. इसके लक्षण सुबह लगातार छींक आना, नाक बहना या बंद होना, आंखों में खुजली या पानी, गले में खराश होना. 

2. साइनसाइटिस – अगर छींक के साथ सिरदर्द, चेहरे पर दबाव या नाक भारी लगे, तो यह साइनस की समस्या हो सकती है. 

3. फीवर – मौसमी एलर्जी जिसमें नाक, आंख और गले में जलन होती है. 

रोज सुबह छींक आए तो क्या करें

1. बिस्तर और कमरे की सफाई करें. चादर और तकिए के कवर हर हफ्ते गर्म पानी में धोएं. भारी पर्दे और कालीन हटाएं. सूखे झाड़ू के बजाय गीले कपड़े से सफाई करें.

2. जल्दी-जल्दी न उठें, पहले कुछ मिनट बैठें, उठते ही गुनगुने पानी से चेहरा धोएं और एक गिलास सादा पानी पिएं. 

3. नमक मिले गुनगुने पानी से नाक साफ करना फायदेमंद है. 

4. कमरे में धूल कम रखें, पालतू जानवरों को बिस्तर से दूर रखें, जरूरत हो तो एयर प्यूरीफायर का यूज करें. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें 

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