फ्रैक्चर के बाद टूटे हुए पैर में क्यों लटकाते हैं ईंट? 99% लोग नहीं जानते सही जवाब

फ्रैक्चर के बाद टूटे हुए पैर में क्यों लटकाते हैं ईंट? 99% लोग नहीं जानते सही जवाब


Why Doctors Hang Weights After Fracture: स्केलेटल ट्रैक्शन टूटी हुई हड्डियों के इलाज की एक खास तकनीक है. इसमें पिन, पुली और वज़न की मदद से टूटी हड्डियों को सही स्थिति में लाया जाता है, ताकि वे ठीक से जुड़ सकें. आमतौर पर इस पद्धति का इस्तेमाल शरीर के निचले हिस्से, जैसे पैर या कूल्हे की हड्डियों के फ्रैक्चर में किया जाता है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर ऐसा क्यों किया जाता है और इसका इस्तेमाल कब से होता आ रहा है, जिसके बारे में 99 प्रतिशत लोगों को नहीं पता है. 

क्या होता है इस प्रक्रिया में?

इस प्रक्रिया में डॉक्टर हड्डी के अंदर एक पिन डालते हैं. यही पिन पुली सिस्टम का आधार बनता है, जिस पर वज़न लगाया जाता है. धीरे-धीरे खिंचाव देकर टूटी हुई हड्डियों को सीधा किया जाता है, जिससे वे अपनी सही जगह पर आ सकें और भरने की प्रक्रिया बेहतर हो. ट्रैक्शन के दो आम प्रकार होते हैं स्किन ट्रैक्शन और स्केलेटल ट्रैक्शन. स्किन ट्रैक्शन में त्वचा पर पट्टी या स्प्लिंट लगाकर खिंचाव दिया जाता है, जबकि स्केलेटल ट्रैक्शन में पिन सीधे हड्डी में डाला जाता है. दोनों में फर्क इस बात का होता है कि खिंचाव का आधार कहां बनाया गया है.

स्केलेटल ट्रैक्शन का इस्तेमाल सदियों से होता आ रहा है, लेकिन आज के समय में इसे ज़्यादातर इमरजेंसी ट्रॉमा केस में अस्थायी इलाज के तौर पर अपनाया जाता है. इसका मकसद सर्जरी से पहले हड्डियों को स्थिर करना होता है. कई बार मरीज की हालत ऐसी होती है कि तुरंत ऑपरेशन संभव नहीं होता, ऐसे में ट्रैक्शन समय देने का काम करता है.
यह तकनीक आमतौर पर फीमर, टिबिया, ह्यूमरस, हिप, पेल्विस और कभी-कभी गर्दन की रीढ़ के फ्रैक्चर में इस्तेमाल की जाती है. कुछ मामलों में उंगली के जोड़ के पास की हड्डी में भी इसका प्रयोग किया जाता है.

डॉक्टर रखते हैं निगरानी 

webmd की रिपोर्ट के अनुसार, इलाज के दौरान ऑर्थोपेडिक सर्जन स्थानीय एनेस्थीसिया देकर हड्डी में पिन डालते हैं. इसके बाद पुली से जुड़ा वज़न लगाया जाता है, जो हड्डी को धीरे-धीरे सही स्थिति में लाता है. अस्पताल में रहते हुए नर्स और डॉक्टर पिन वाली जगह पर इंफेक्शन के लक्षण, जैसे सूजन, लालिमा या दर्द, पर नजर रखते हैं और समय-समय पर एक्स-रे से हड्डी की स्थिति जांचते हैं. 

क्या यह प्रक्रिया दर्दनाक होती है?

कई लोगों को लगता है कि यह प्रक्रिया बहुत दर्दनाक होगी, लेकिन पिन लगाने के समय एनेस्थीसिया दिया जाता है. जब हड्डियां सही स्थिति में आने लगती हैं, तो दर्द अक्सर कम हो जाता है. सर्जरी के बाद पिन को भी एनेस्थीसिया देकर ही निकाला जाता है. हालांकि इसके फायदे हैं जैसे हड्डी को स्थिर करना, मांसपेशियों के खिंचाव को कम करना और दर्द में राहत. लेकिन लंबे समय तक ट्रैक्शन में रहने से कुछ जोखिम भी होते हैं. इनमें पिन वाली जगह पर इंफेक्शन, लंबे समय तक एक ही पोज़िशन में रहने से बेडसोर्स, नसों को नुकसान और मांसपेशियों की कमजोरी शामिल है. इसी वजह से आजकल डॉक्टर स्केलेटल ट्रैक्शन को अस्थायी उपाय के तौर पर ही इस्तेमाल करते हैं और जल्द से जल्द ऐसे इलाज की ओर बढ़ते हैं, जिससे मरीज जल्दी चल-फिर सके और अस्पताल में कम समय बिताना पड़े.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पलाश के पेड़ से निकलने वाला लाल गोंद कितना मददगार, शरीर को कैसे देता है पोषण?

पलाश के पेड़ से निकलने वाला लाल गोंद कितना मददगार, शरीर को कैसे देता है पोषण?


पलाश के पेड़ से निकलने वाला लाल गोंद को ढाक गोंद या कमरकस भी कहते हैं. ये सिर्फ देखने में ही खूबसूरत लाल नहीं है, बल्कि हमारी सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है, खासकर महिलाओं के लिए ये किसी वरदान से कम नहीं है. आइए आपको इसके फायदों के बारे में बताते हैं.

शरीर के लिए कितना जरूरी यह गोंद?

इस गोंद को खाने से शरीर अंदर से मजबूत बनता है, पीठ और कमर के दर्द में आराम मिलता है और कमजोरी दूर होती है. सर्दियों में कई लोग इसे घी, आटे और थोड़ी चीनी के साथ मिलाकर लड्डू या पंजीरी की तरह बनाकर खाते हैं. यह शरीर को गर्मी और एनर्जी दोनों देता है.

स्किन और बालों के लिए कितना फायदेमंद?

ढाक गोंद सिर्फ ताकत ही नहीं देता, बल्कि त्वचा और बालों के लिए भी फायदेमंद है. इसे खाने से त्वचा चमकदार और जवां रहती है और बाल मजबूत और हेल्दी बनते हैं. इसमें प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं, जो शरीर को अंदर से पोषण देते हैं और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने में मदद करते हैं.

पाचन के लिए भी लाभदायक

इसके अलावा यह पाचन के लिए भी अच्छा है और हल्की दस्त या पेट की तकलीफ में आराम दिला सकता है. इसलिए पुरानी पीढ़ी इसे ‘कमरकस’ भी कहती थी. यह न सिर्फ पीठ और कमर की मांसपेशियों को मजबूत करता है बल्कि जोड़ों और घुटनों के दर्द में भी राहत देता है. आजकल लोग इसके लड्डू खाने के साथ-साथ इसे हेल्थ टॉनिक की तरह भी इस्तेमाल करते हैं. इसकी मिठास और पौष्टिकता दोनों मिलकर इसे हर उम्र के लिए उपयुक्त बनाते हैं.

इन दिक्कतों में भी करता है मदद

अगर आप शरीर को अंदर से ताकतवर बनाना चाहते हैं, कमजोरी और थकान दूर करना चाहते हैं और साथ ही त्वचा और बालों की देखभाल भी करना चाहते हैं, तो ढाक गोंद आपके लिए एक बेहतरीन नेचुरल ऑप्शन है. ये सिर्फ एक साधारण गोंद नहीं, बल्कि प्रकृति का दिया हुआ टोटका है, जो कई तरह के फायदे देता है. सर्दियों में इसे अपनी डाइट में शामिल करना सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पानी कम पीते हैं तो हो जाएगी ये बीमारी, इसमें अचानक उठता है पेट में तेज दर्द और…

पानी कम पीते हैं तो हो जाएगी ये बीमारी, इसमें अचानक उठता है पेट में तेज दर्द और…


आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अपने खाने-पीने का ठीक से ध्यान नहीं रख पाते हैं. काम, मोबाइल और तनाव के बीच सबसे जरूरी चीज पानी पीना हम अक्सर भूल जाते हैं. कई लोग दिन भर में सिर्फ 2 से 3 गिलास पानी पीकर ही काम चला लेते हैं. क्या आप जानते हैं कि पानी की कमी आपके शरीर में एक गंभीर बीमारी को जन्म दे सकती है, जिसे गुर्दे की पथरी (Kidney Stone) कहते हैं.

किडनी स्टोन एक ऐसी समस्या है जिसमें अचानक पेट, कमर या पीठ में बहुत तेज और असहनीय दर्द उठता है. यह दर्द इतना ज्यादा हो सकता है कि व्यक्ति को अस्पताल तक जाना पड़ जाए. कई मामलों में पेशाब में खून आना, उल्टी, बुखार और जलन जैसी परेशानियां भी होने लगती हैं. इस बीमारी की सबसे बड़ी वजह कम पानी पीना और शरीर में पानी की कमी यानी निर्जलीकरण (Dehydration) है. 

पानी की कमी से किडनी स्टोन कैसे बनता है?

जब हम पर्याप्त पानी नहीं पीते, तो शरीर में तरल पदार्थों की मात्रा कम हो जाती है. इसका सीधा असर हमारे पेशाब पर पड़ता है. कम पानी पीने से पेशाब गाढ़ा हो जाता है. गाढ़े मूत्र में कैल्शियम, ऑक्सालेट और यूरिक एसिड जैसे तत्व ज्यादा मात्रा में जमा हो जाते हैं. ये तत्व आपस में मिलकर छोटे-छोटे क्रिस्टल बना लेते हैं. यही क्रिस्टल धीरे-धीरे गुर्दे की पथरी में बदल जाते हैं. अगर लंबे समय तक पानी की कमी बनी रहे, तो शरीर इन क्रिस्टलों को न तो घोल पाता है और न ही बाहर निकाल पाता है. 

किडनी स्टोन क्या होता है?

किडनी स्टोन ठोस कण या पत्थर जैसी संरचना होती है, जो गुर्दे के अंदर बनती है. यह रेत के दाने जितनी छोटी या कभी-कभी गोल्फ बॉल जितनी बड़ी भी हो सकती है. छोटी पथरी कई बार बिना किसी लक्षण के पेशाब के साथ निकल जाती है, लेकिन बड़ी पथरी मूत्र नली में फंस जाती है, जिससे भयानक दर्द होता है. 

किडनी स्टोन के मुख्य लक्षण

किडनी स्टोन होने पर कई लक्षण दिखाई दे सकते हैं. जैसे अचानक कमर, पीठ या पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द, दर्द का जांघ या कमर तक फैलना, पेशाब में जलन या दर्द, पेशाब में खून आना, बार-बार पेशाब आने की इच्छा, मतली और उल्टी, बुखार और ठंड लगना, बदबूदार या धुंधला पेशाब. कई बार छोटी पथरी बिना दर्द के भी हो सकती है. 

पानी पीने से किडनी स्टोन कैसे रोका जा सकती है?

पर्याप्त पानी पीना किडनी स्टोन से बचाव का सबसे आसान और असरदार तरीका है. पानी पीने से पेशाब पतला रहता है. खनिज और लवण घुलकर आसानी से बाहर निकल जाते हैं. क्रिस्टल बनने की संभावना बहुत कम हो जाती है. डॉक्टर आमतौर पर सलाह देते हैं कि व्यक्ति को इतना पानी पीना चाहिए जिससे पेशाब का रंग हल्का पीला रहे. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या व्रत रखने से आप चुराते हैं दिल? पाचन तंत्र से लेकर नई कोशिकाएं बनाने की दवा होता है उपवास

क्या व्रत रखने से आप चुराते हैं दिल? पाचन तंत्र से लेकर नई कोशिकाएं बनाने की दवा होता है उपवास


पेट शरीर का अहम और जरूरी हिस्सा होता है. माना जाता है कि अगर पेट सही है तो आधी से ज्यादा बीमारियां अपने आप ठीक हो जाती हैं, लेकिन आज की आरामदायक लाइफस्टाइल की वजह से पेट से जुड़ी बीमारियां हर उम्र के लोगों की परेशानी बन चुके हैं. भूख न लगना, गैस बनना, एसिडिटी, अपच और पेट में भारीपन की समस्या साधारण बन गई है. क्या आप जानते हैं कि एक तरीके से सारी बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है? आइए इसके बारे में जानते हैं.

कितना फायदेमंद होता है उपवास करना?

हम बात कर रहे हैं व्रत यानी उपवास की. भले ही उपवास में खुद को भूखा रखना होता है, लेकिन यह सजा नहीं, बल्कि एक दवा है. पेट से जुड़ी बीमारियों रोगों को एक सीमित समय तक दवा के सहारे चलाया जा सकता है, लेकिन एक समय के बाद दवाओं का असर भी कम हो जाता है. ऐसे में उपवास सजा नहीं, बल्कि शरीर को अंदर से साफ करने का तरीका है, जो कोई दवा भी नहीं कर सकती. उपवास पेट को गहराई से सफाई करता है. इसके अलावा पाचन तंत्र को ठीक करने में मदद करता है और खुद को रिपेयर करने का मौका देने की प्रक्रिया है.

कैसे करना चाहिए व्रत?

अब सवाल है कि उपवास को कैसे किया जा सकता है. सबसे पहले 15 दिन में एक बार उपवास करने से शुरू कर सकते हैं. इसके लिए एकादशी उपयुक्त रहेगी, क्योंकि ये महीने में दो बार पड़ती है. उपवास की शुरुआत में फलाहार लें और उतने ही फल खाएं, जिससे शरीर को एनर्जी मिल सके. पेट भरने के लिए फलों का सेवन न करें. इसके अलावा जितना हो सके, शहद वाला पानी, नारियल पानी, और सादे पानी का सेवन करें. पानी शरीर की सारी गंदगी को बाहर निकालने में मदद करेगा.

क्या व्रत रखने से आती है कमजोरी?

कुछ लोगों को लगता है कि व्रत रखने से कमजोरी महसूस होगी, लेकिन ऐसा नहीं है. यह सिर्फ हमारे मन का वहम होता है, क्योंकि भोजन से शरीर को 30-40 फीसदी ही एनर्जी मिलती है, बाकी एनर्जी पानी, हवा, और आराम करने से मिलती है. ऐसे में यह सोचना गलत है कि उपवास करने से कमजोरी महसूस होगी. जापान के वैज्ञानिक उपवास पर रिसर्च भी कर चुके हैं. साल 2018 में हुए शोध के मुताबिक, व्रत रखने से शरीर खराब कोशिकाओं को हटाकर नई और हेल्दी कोशिकाएं बनाता है. इस प्रक्रिया को ऑटोफैगी कहा जाता है.

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दिल की सेहत के लिए एंजियोग्राफी कितनी जरूरी, जानें इसे कराते वक्त क्या सावधानियां जरूरी?

दिल की सेहत के लिए एंजियोग्राफी कितनी जरूरी, जानें इसे कराते वक्त क्या सावधानियां जरूरी?


हमारा दिल लगातार काम करता रहता है. यह हमारे पूरे शरीर में खून पंप करता है और हमें जिंदा रखता है. जब दिल ठीक से काम करता है तो हम हेल्दी महसूस करते हैं. अगर इसमें कोई परेशानी आ जाए तो यह सीधे हमारे पूरे शरीर को प्रभावित कर सकती है, इसलिए दिल की बीमारियों का समय पर पता लगाना बेहद जरूरी है. आजकल डॉक्टर एंजियोग्राफी की सलाह देते हैं, लेकिन कई लोग इस टेस्ट के बारे में नहीं जानते कि यह क्या है, कैसे होता है और इसके बाद क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

क्या होता है एंजियोग्राफी टेस्ट?

एंजियोग्राफी एक टेस्ट है जो हमें बताता है कि हमारे शरीर की नसें और धमनियां कितनी ठीक हैं. अगर दिल, दिमाग या हाथ-पैर की नसों में कोई ब्लॉकेज हो रही हो तो यह टेस्ट उसे पकड़ने में मदद करता है. जब किसी को सीने में दर्द, सांस लेने में दिक्कत या बेचैनी महसूस होती है. डॉक्टर अक्सर यही टेस्ट कराने की सलाह देते हैं. एंजियोग्राफी यह देखने का सरल तरीका है कि खून शरीर में सही तरीके से बह रहा है या नहीं.

एंजियोप्लास्टी से कितनी अलग है एंजियोग्राफी?

एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी अक्सर एक साथ सुने जाते हैं, लेकिन दोनों अलग चीजें हैं. एंजियोग्राफी सिर्फ एक जांच है, जो यह बताती है कि नसों या आर्टरी में कोई रुकावट है या नहीं, जबकि एंजियोप्लास्टी उस रुकावट को दूर करने का तरीका है. इसका मतलब यह है कि एंजियोग्राफी से पता लगाया जाता है कि समस्या कहां है? वहीं, जरूरत पड़ने पर एंजियोप्लास्टी से उसका इलाज किया जाता है.

कैसे होता है एंजियोग्राफी टेस्ट?

इस टेस्ट में सबसे पहले डॉक्टर जिस हिस्से की नसों की जांच करना चाहते हैं, वहां कैथेटर नाम की छोटी ट्यूब घुसाई जाती है. यह ट्यूब पैर या हाथ में डाली जाती है. इसके जरिए एक खास तरह का रंगीन द्रव्य (डाई) नसों में भेजा जाता है. जब यह लिक्विड नसों में चलता है तो एक्स-रे मशीन उसके रास्ते को कैप्चर कर लेती है. इससे डॉक्टर साफ देख सकते हैं कि खून सही तरह से बह रहा है या कहीं कोई ब्लॉकेज है. यह प्रक्रिया लगभग एक घंटे की होती है और इसके बाद मरीज को आराम करना पड़ता है. टेस्ट खत्म होने के बाद कैथेटर हटा दिया जाता है और जिस जगह से उसे डाला गया था, वह पॉइंट बंद कर दिया जाता है.

ब्लॉकेज मिलने पर क्या होता है?

अगर एंजियोग्राफी में ब्लॉकेज पाया जाता है तो अक्सर एंजियोप्लास्टी या स्टेंट लगाना पड़ता है. इसके बाद मरीज को कुछ खास सावधानियां बरतनी होती हैं, जैसे कि भारी वजन उठाने से बचना, शराब और धूम्रपान से दूर रहना, दवाइयां नियमित लेना, और अपने खान-पान में सुधार करना. हल्की एक्सरसाइज करना, फल-सब्जियों और हेल्दी तेल का सेवन करना, और नमक और चीनी कम करना भी जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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