क्या मीठा खाने से सच में होती है डायबिटीज? जानिए वह सच, जो आपसे छिपाया गया
Diabetes Causes And Symptoms: क्या मीठा खाने से सच में होती है डायबिटीज? जानिए वह सच, जो आपसे छिपाया गया
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Diabetes Causes And Symptoms: क्या मीठा खाने से सच में होती है डायबिटीज? जानिए वह सच, जो आपसे छिपाया गया
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Egg Freezing Process: आज की तेज रफ्तार जिंदगी में महिलाओं की प्राथमिकता तेजी से बदल रही है. पढ़ाई, करियर और आर्थिक स्थिरता के बीच मां बनने का फैसला अक्सर टलता जा रहा है, लेकिन शरीर की अपनी एक जैविक घड़ी होती है जो समय के साथ बदलती रहती है. ऐसे में आधुनिक मेडिकल तकनीक ने महिलाओं को एग फ्रीजिंग का एक नया ऑप्शन दिया है. पिछले कुछ सालों में भारत के बड़े शहरों में एग फ्रीजिंग की तकनीक को लेकर रुचि तेजी से बढ़ी है और अब ज्यादा महिलाएं इसे अपने लगी है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि एग फ्रीजिंग का क्रेज तेजी से कैसे बढ़ रहा है और यह तरीका कितना दर्दनाक होता है.
क्या है एग फ्रीजिंग?
एग फ्रीजिंग, जिसे मेडिकल भाषा में ओओसाइट क्रायोप्रिजर्वेशन कहा जाता है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें महिला के अंडों को निकालकर बहुत कम तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है. बाद में जब महिला मां बनने के लिए तैयार होती है तो इन्हीं अंडों का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसका मकसद अंडों की मौजूदा गुणवत्ता को सुरक्षित रखना होता है, ताकि बढ़ती उम्र का असर उन पर न पड़े.
कैसे होती है एग फ्रीजिंग की पूरी प्रक्रिया?
एग फ्रीजिंग की प्रक्रिया की शुरुआत फर्टिलिटी एक्सपर्ट से सलाह लेने से होती है. इसके बाद महिलाओं को कुछ समय तक हार्मोनल दवाएं दी जाती है, जिससे अंडों का उत्पादन बढ़ाया जा सके. जब अंडे तैयार हो जाते हैं तो एक छोटी मेडिकल प्रक्रिया के जरिए उन्हें शरीर से निकाला जाता है. इसके बाद इन अंडों को विशेष तकनीक से फ्रिज करके सुरक्षित स्टोर कर लिया जाता है.
कितना दर्दनाक होता है एग फ्रीजिंग का तरीका?
एग फ्रीजिंग को आमतौर पर सुरक्षित प्रक्रिया माना जाता है और यह बहुत दर्दनाक नहीं होती है. हालांकि हार्मोनल दवाओं के कारण कुछ महिलाओं को सूजन, मूड स्विंग, सिर दर्द या थकान जैसी समस्या हो सकती है. अंडे निकालने के बाद अगला हल्का दर्द या असहजता महसूस हो सकती है. लेकिन यह लक्षण आमतौर पर कुछ समय में ठीक हो जाते हैं. हालांकि गंभीर समस्याएं बहुत कम मामलों में देखने को मिलती है. वहीं एक्सपर्ट्स के अनुसार एग फ्रीजिंग के लिए 30 से 34 साल की उम्र सबसे उपयुक्त मानी जाती है. इस समय अंडों की गुणवत्ता और संख्या बेहतर होती है. 35 साल के बाद फर्टिलिटी में गिरावट शुरू हो जाती है, जिससे सफलता की संभावना कब हो सकती है.
क्यों बढ़ रहा एग फ्रीजिंग का ट्रेंड?
आजकल कई महिलाएं करियर या पर्सनल कारणों से देर से शादी या मां बनने का फैसला करती है. इसके अलावा कुछ मेडिकल स्थितियों जैसे कैंसर या हार्मोनल समस्याओं के कारण भी एग फ्रीजिंग एक ऑप्शन बन जाता है. यही वजह है कि बड़े शहरों में इस तकनीक को लेकर जागरूकता और मांग दोनों बढ़ रही है. वहीं आपको बता दे की एग फ्रीजिंग का खर्च अलग-अलग क्लीनिक और शहरों के हिसाब से बदल सकता है. आमतौर पर एक साइकिल का खर्च करीब 1 लाख से 2.5 लख रुपये के बीच होता है. इसके अलावा अंडों को स्टोर करने का सालाना खर्च भी अलग से देना पड़ता है.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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kidney Disease Early Symptoms : हमारे शरीर में किडनी दो बहुत ही जरूरी अंग होते हैं, जो लगातार बिना रुके काम करते रहते हैं. इनका मुख्य काम खून को साफ करना, शरीर से टॉक्सिन्स को बाहर निकालना, पानी और मिनरल्स का संतुलन बनाए रखना और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करना होता है, लेकिन समस्या यह है कि किडनी की बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है और शुरुआत में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं या बिल्कुल समझ नहीं आते हैं. अक्सर लोग इन संकेतों को सामान्य कमजोरी या दूसरी छोटी समस्याएं समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक किडनी काफी हद तक प्रभावित हो चुकी होती है. इसलिए जरूरी है कि शरीर में दिखने वाले शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए. तो आइए जानते हैं कि शरीर में कौन से लक्षण दिखें तो सावधान हो जाएं.
किडनी बीमारी क्या होती है?
क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) एक ऐसी स्थिति है जिसमें किडनी धीरे-धीरे अपनी काम करने की क्षमता खोने लगती है. यह अचानक नहीं होती, बल्कि महीनों या सालों में धीरे-धीरे बढ़ती है. जब किडनी सही से काम नहीं करती, तो शरीर में गंदगी और टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं, जिससे कई तरह की समस्याएं पैदा होती हैं.
शरीर में कौन से लक्षण दिखें तो सावधान हो जाएं?
1. लगातार थकान और कमजोरी – अगर आपको बिना ज्यादा काम किए भी लगातार थकान महसूस होती है, तो यह किडनी की समस्या का संकेत हो सकता है. किडनी जब सही से काम नहीं करती, तो शरीर में खून की कमी (एनीमिया) हो जाती है. इससे शरीर में ऑक्सीजन कम पहुंचती है और व्यक्ति हमेशा थका-थका महसूस करता है.
2. नींद न आना या नींद में परेशानी – किडनी खराब होने पर शरीर में टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं, जिससे नींद प्रभावित होती है. कई लोगों को रात में बार-बार नींद टूटने या बेचैनी की समस्या होती है.
3. स्किन का रूखा और खुजलीदार होना – जब किडनी शरीर से गंदगी को सही से बाहर नहीं निकाल पाती, तो खून में मिनरल्स का संतुलन बिगड़ जाता है. इससे स्किन ड्राई हो जाती है और लगातार खुजली होती है.
4.बार-बार पेशाब आना या पेशाब में बदलाव – अगर आपको बार-बार पेशाब आने लगे, खासकर रात में, तो यह किडनी की खराबी का संकेत हो सकता है. इसके अलावा झागदार पेशाब, बहुत कम या ज्यादा पेशाब, रंग में बदलाव भी हो सकते हैं
5. पेशाब में खून आना – अगर पेशाब में खून दिखे या उसका रंग गुलाबी/भूरा हो जाए, तो यह गंभीर संकेत हो सकता है. यह किडनी की फिल्टरिंग सिस्टम के खराब होने का संकेत है.
6. झागदार पेशाब (Foamy Urine) – अगर पेशाब में बहुत ज्यादा झाग बने, तो इसका मतलब हो सकता है कि पेशाब में प्रोटीन जा रहा है, जो किडनी डैमेज का संकेत है.
7.आंखों के आसपास सूजन – किडनी जब प्रोटीन को रोक नहीं पाती, तो शरीर से प्रोटीन बाहर निकलने लगता है, जिससे आंखों के नीचे सूजन आ जाती है.
8. पैरों और टखनों में सूजन – अगर पैरों, टखनों या शरीर के निचले हिस्से में सूजन रहती है, तो इसका कारण शरीर में पानी और नमक का जमा होना हो सकता है, जो किडनी की खराबी से जुड़ा होता है.
9. भूख कम लगना – किडनी ठीक से काम न करे तो शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ जाते हैं, जिससे भूख कम लगती है और व्यक्ति भूख खो देता है.
10 मांसपेशियों में दर्द और ऐंठन – किडनी शरीर में कैल्शियम और फास्फोरस का संतुलन बनाए रखती है. जब यह बिगड़ता है, तो मांसपेशियों में दर्द और ऐंठन होने लगती है.
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किडनी को नुकसान पहुंचाने वाले कारण
लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर किडनी की ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचाता है. इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर किडनी पर दबाव डालता है और धीरे-धीरे उसे कमजोर करता है. कुछ दर्द निवारक दवाइयों का ज्यादा इस्तेमाल किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है. लंबे समय तक शरीर में पानी की कमी किडनी पर बुरा असर डालती है. गलत खान-पान और एक्सरसाइज की कमी भी किडनी बिमारी का कारण बन सकती है.
किडनी को स्वस्थ कैसे रखें?
1. शुगर और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल रखें – ये दोनों किडनी खराब होने के सबसे बड़े कारण हैं.
2. बैलेंस डाइट लें – हरी सब्जियां, फल और कम नमक वाला खाना खाएं.
3. ज्यादा पानी पिएं – शरीर को हाइड्रेट रखना बहुत जरूरी है.
4. धूम्रपान और शराब से बचें – ये दोनों किडनी और पूरे शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं.
5. नियमित जांच कराएं – अगर आपको डायबिटीज, BP या फैमिली हिस्ट्री है, तो समय-समय पर किडनी टेस्ट कराना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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How Dangerous Is Hantavirus Infection: अटलांटिक महासागर में सफर कर रहे एक लग्जरी क्रूज पर संदिग्ध हंता वायरस इंफेक्शन ने चिंता बढ़ा दी है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, इस घटना में तीन लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि एक मामले की पुष्टि हुई है और पांच अन्य संदिग्ध मामलों की जांच जारी है. एमवी होंडियस नाम के इस क्रूज पर फैले इस ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर यह वायरस कितना खतरनाक है और इससे बचाव कैसे संभव है.
क्या है हंता वायरस?
हंता वायरस कोई एक वायरस नहीं, बल्कि वायरस के एक समूह का नाम है, जो मुख्य रूप से चूहों जैसे ऐसे स्तनधारी जीवों में पाया जाता है जो भोजन को कुतरकर खाते हैं. यह इंसानों में सीधे नहीं फैलता, बल्कि इंफेक्टेड चूहों के मल, यूरिन या लार के सूखे कण जब हवा में मिल जाते हैं और सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं, तब इंफेक्शन होता है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक, यही इसका सबसे सामान्य फैलने का तरीका है.
हजारों लोग होते हैं प्रभावित
दुनियाभर में हर साल इस वायरस से हजारों लोग प्रभावित होते हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के आंकड़ों के अनुसार, हेमोरेजिक फीवर विथ रीनल सिंड्रोम के करीब 1.5 लाख मामले हर साल सामने आते हैं, जिनमें से आधे से ज्यादा चीन में दर्ज होते हैं. वहीं अमेरिका में 1993 से 2023 के बीच करीब 890 मामलों की पुष्टि हुई है. हालांकि, इसका एक स्ट्रेन सियोल वायरस दुनिया के कई हिस्सों में पाया जाता है.
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इस वायरस की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
इस वायरस की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसका कोई निश्चित इलाज नहीं है. डॉक्टर आमतौर पर मरीज के लक्षणों के आधार पर इलाज करते हैं, जिसमें ऑक्सीजन थेरेपी, वेंटिलेशन सपोर्ट और गंभीर मामलों में डायलिसिस तक की जरूरत पड़ सकती है. कई मरीजों को आईसीयू में भर्ती करना पड़ता है, खासकर जब इंफेक्शन तेजी से लंग्स को प्रभावित करता है.
कब आया था यह चर्चा में?
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में फरवरी 2025 में एक मामला चर्चा में आया था, जब ऑस्कर विजेता अभिनेता जीन हैकमैन की पत्नी बेट्सी अराकावा की मौत भी हंता वायरस से जुड़ी सांस की बीमारी के कारण हुई थी. जांच में पाया गया कि उनके घर के आसपास चूहों के घोंसले मौजूद थे, जिससे इंफेक्शन की आशंका बढ़ी. एक्सपर्ट के अनुसार, इस वायरस से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है चूहों जैसे जानवरों से दूरी बनाना. घर या काम करने की जगह पर चूहों के आने-जाने के रास्तों को बंद करना, सफाई के दौरान मास्क और दस्ताने पहनना, और गंदगी को सीधे हाथ से न छूना बेहद जरूरी है.
क्रूज में क्यों होती है दिक्कत?
क्रूज जैसी बंद जगहों पर इस तरह के इंफेक्शन का खतरा इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि यहां सीमित स्थान में कई लोग एक साथ रहते हैं. ऐसे में अगर इंफेक्शन फैलता है, तो उसे नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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Early Signs Of Vitamin D Deficiency: विटामिन डी की कमी अक्सर अचानक सामने नहीं आती, बल्कि धीरे-धीरे शरीर में असर दिखाती है. शुरुआत में बस हल्की थकान महसूस होती है, मूड ठीक नहीं रहता और शरीर पहले से ज्यादा भारी लगने लगता है. आमतौर पर लोग इसे रोजमर्रा की थकान या तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन कई बार यही संकेत किसी गहरी कमी की ओर इशारा करते हैं.
फंक्शनल न्यूट्रिशनिस्ट मुग्धा प्रधान, सीईओ और फाउंडर ऑफ iThrive ने TOI को बताया कि विटामिन डी सिर्फ एक विटामिन नहीं है, बल्कि यह शरीर में हार्मोन की तरह काम करता है. जब इसका स्तर कम होता है, तो शरीर पहले हल्के संकेत देता है और बाद में असर ज्यादा साफ दिखने लगता है.
क्या होते हैं इसके कमी के संकेत?
ऐसी थकान जो आराम से भी दूर न हो, इस कमी का एक बड़ा संकेत हो सकती है. कई बार पूरी नींद लेने के बाद भी शरीर में ऊर्जा महसूस नहीं होती. मुग्धा प्रधान के अनुसार, कम विटामिन डी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और सेल्स में एनर्जी बनाने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है. यही वजह है कि व्यक्ति को हमेशा थकान महसूस होती है, जैसे शरीर पूरी तरह चार्ज ही नहीं हो पा रहा हो.
बार-बार बीमार पड़ना भी संकेत
बार-बार बीमार पड़ना भी एक अहम संकेत है. छोटी-छोटी बीमारियां जल्दी-जल्दी होना और उनसे उबरने में ज्यादा समय लगना इस ओर इशारा करता है कि शरीर की इम्यूनिटी सही तरीके से काम नहीं कर रही. मुग्धा प्रधान बताती हैं कि विटामिन डी शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया को संतुलित रखने में मदद करता है और इसकी कमी होने पर यह संतुलन बिगड़ जाता है.
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मूड खराब होना भी पहचान
मूड में लगातार गिरावट भी इस कमी से जुड़ी हो सकती है. बिना किसी खास वजह के चिड़चिड़ापन, उदासी या दिमाग का ठीक से काम न करना जैसे लक्षण नजर आते हैं. विटामिन डी दिमाग में उन केमिकल्स को प्रभावित करता है, जो हमारे मूड को नियंत्रित करते हैं. यही कारण है कि धूप में समय बिताने से मन हल्का महसूस होता है. इसके अलावा शरीर में बिना वजह दर्द और कमजोरी भी दिख सकती है. मांसपेशियों में हल्का दर्द, कमर में जकड़न या ताकत कम होना ऐसे संकेत हैं, जिन्हें अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं. समय के साथ यह समस्या हड्डियों को भी प्रभावित कर सकती है.
लाइफस्टाइल भी जिम्मेदार
आज की जीवनशैली भी इस कमी को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रही है. लंबे समय तक घर या ऑफिस के अंदर रहना, धूप की कमी और संतुलित आहार न लेना इसके मुख्य कारण हैं. मुग्धा प्रधान सलाह देती हैं कि अगर थकान, मूड में बदलाव और शरीर में दर्द एक साथ महसूस हो रहे हों, तो इसे नजरअंदाज न करें और जांच करवाना बेहतर रहता है. इससे बचाव के लिए रोजाना कुछ समय धूप में बिताना जरूरी है, खासकर सुबह या शाम के समय. इसके साथ ही खानपान में पोषण से भरपूर चीजें शामिल करनी चाहिए. हालांकि, किसी भी तरह के सप्लीमेंट लेने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए.
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What Causes Sudden Lower Back Pain: अचानक कमर के निचले हिस्से में तेज दर्द होना आम बात लग सकती है. अक्सर लोग इसे लंबे समय तक बैठने, गलत तरीके से सोने या हल्की मोच समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन हर बार दर्द मांसपेशियों से जुड़ा हो, ऐसा जरूरी नहीं. कई बार यह शरीर का इशारा होता है कि अंदर कुछ और गंभीर हो रहा है, खासकर किडनी से जुड़ी समस्या. चलिए आपको बताते हैं कि एक्सपर्ट क्या कहते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
किडनी स्टोन यानी पथरी ऐसी ही एक स्थिति है, जो बिना किसी चेतावनी के सामने आ सकती है और दर्द इतना तेज होता है कि समझ पाना मुश्किल हो जाता है. डॉ. अंकुर भटनागर ने TOI को बताया कि अचानक शुरू होने वाला कमर दर्द कई बार किडनी या यूरिन नली में पथरी का संकेत होता है. यह दर्द एक जगह टिकता नहीं, बल्कि कमर से आगे की तरफ पेट या जांघ के पास तक फैल सकता है, जो इसकी सबसे बड़ी पहचान है.
डॉ. रितेश मोंगा भी बताते हैं कि यह दर्द अक्सर कमर के किनारे से शुरू होकर धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ता है. यही वजह है कि इसे सामान्य कमर दर्द समझने की गलती हो जाती है, जबकि मांसपेशियों का दर्द आमतौर पर एक ही जगह रहता है.
क्या होती है दिक्कत?
असल में जब पथरी किडनी से निकलकर यूरिन के रास्ते में फंस जाती है, तो यूरिन का फ्लो रुक जाता है. इससे किडनी में दबाव बढ़ता है और तेज दर्द महसूस होता है. यह दर्द लहरों की तरह आता-जाता है, कभी बहुत तेज और कभी थोड़ा कम. डॉ. मोंगा के अनुसार, पथरी का आकार छोटा हो या बड़ा, दर्द की तीव्रता उससे हमेशा तय नहीं होती.
ये होते हैं संकेत
इसके साथ कुछ और संकेत भी दिख सकते हैं, जैसे उल्टी आना, पेशाब के दौरान जलन, बार-बार पेशाब की इच्छा और कभी-कभी पेशाब में खून आना. कई लोग इन लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं और दर्द कम करने की दवाइयां लेकर काम चलाते रहते हैं. डॉ. भटनागर चेतावनी देते हैं कि बिना डॉक्टर की सलाह के ज्यादा दर्दनाशक दवाइयां लेने से किडनी को स्थायी नुकसान हो सकता है.
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आजकल यह समस्या पहले से ज्यादा आम होती जा रही है, खासकर शहरों में रहने वाले लोगों में. कम पानी पीना, ज्यादा नमक या मीठा खाना, मोटापा और डायबिटीड जैसी बीमारियां इसका खतरा बढ़ाती हैं. भारत जैसे गर्म देश में डिहाइड्रेशन भी एक बड़ा कारण है, जहां शरीर को जरूरत से कम पानी मिल पाता है.
पहले की तुलना में इलाज आसान
अच्छी बात यह है कि अब इसका इलाज पहले की तुलना में काफी आसान हो गया है. डॉ. भटनागर बताते हैं कि अब बिना चीरा लगाए आधुनिक तकनीकों से पथरी का इलाज संभव है. वहीं डॉ. मोंगा कहते हैं कि कई मामलों में लेजर तकनीक से भी बिना कट के पथरी हटाई जा सकती है. फिर भी सबसे जरूरी है समय पर ध्यान देना. अगर दर्द अचानक, तेज और जगह बदलने वाला हो, तो इसे नजरअंदाज न करें। सही समय पर जांच और इलाज से बड़ी समस्या बनने से रोका जा सकता है.
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