सुबह उठते ही आने लगती है छींक तो हो जाएं अलर्ट, इस बीमारी के हो सकते हैं लक्षण

सुबह उठते ही आने लगती है छींक तो हो जाएं अलर्ट, इस बीमारी के हो सकते हैं लक्षण


सुबह की शुरुआत आमतौर पर ताजगी, चाय की खुशबू और नए दिन की उम्मीद से होती है. लेकिन कुछ लोगों के लिए सुबह का मतलब होता है, लगातार छींकें, बहती नाक और रुमाल की तलाश. आंख खुलते ही छीं-छीं की आवाजें आने लगती हैं और समझ नहीं आता कि आखिर हुआ क्या. अक्सर हम सोचते हैं कि शायद रात में ठंड लग गई होगी या हल्का सा जुकाम हो गया है. लेकिन जब यही समस्या रोज होने लगे और दिन चढ़ते-चढ़ते अपने आप ठीक भी हो जाए, तो सवाल उठता है क्या ये सिर्फ ठंड है या शरीर किसी बड़ी समस्या की ओर इशारा कर रहा है. 

सुबह उठते ही बार-बार छींक आना एक आम लेकिन नजरअंदाज की जाने वाली समस्या है. बहुत से लोग इसे हल्के में लेते हैं, जबकि यह एलर्जी, साइनस या नाक से जुड़ी किसी बीमारी का संकेत हो सकता है. अच्छी बात यह है कि समय रहते इसके कारण समझ लिए जाएं, तो इससे आसानी से राहत पाई जा सकती है. आइए जानते हैं कि सुबह छींक क्यों आती है, इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं, किन बीमारियों के लक्षण हो सकते हैं और इससे बचाव कैसे किया जाए. 

सुबह उठते ही छींक क्यों आती है?

1. प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र – छींक आना हमारे शरीर का एक प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र है. जब नाक के अंदर कोई चीज जैसे धूल, गंदगी, तेज गंध या ठंडी हवा जाती है, तो शरीर छींक के जरिए उसे बाहर निकालने की कोशिश करता है. 

2. आपका बिस्तर ही बन सकता है समस्या की जड़ – जिस बिस्तर पर आप सुकून की नींद लेते हैं, वही कभी-कभी छींक की वजह बन जाता है. गद्दे, तकिये और चादरों में बहुत बारीक धूल के कण (डस्ट माइट्स) होते हैं, जो हमें दिखाई नहीं देते, ये कण रात भर बिस्तर में जमा रहते हैं. सुबह जैसे ही आप करवट बदलते हैं या उठते हैं, ये धूल हवा में उड़ जाती है और आपकी नाक में चली जाती है. नाक इसे खतरा समझकर तुरंत प्रतिक्रिया देती है और छींकें शुरू हो जाती हैं. 

3. कमरे में जमा एलर्जी फैलाने वाली चीजें – अगर आपके घर में पालतू जानवर हैं, तो उनके बाल भी बिस्तर और कमरे में जमा हो सकते हैं. खुली खिड़की से परागकण (पोलन), धूल और बाहर की गंदगी रात भर कमरे में आ जाती है. सुबह उठते ही जब आपकी नाक इन सबके संपर्क में आती है, तो वह जरूरत से ज्यादा रिएक्शन कर बैठती है. 

4. तापमान में अचानक बदलाव – रात में आप रजाई या कंबल के अंदर गर्म माहौल में होते हैं. सुबह उठते ही पंखा, एसी या ठंडी हवा से सामना होता है. यह अचानक तापमान बदलना नाक की संवेदनशील त्वचा को परेशान करता है और छींक आने लगती है. इसे एलर्जी नहीं बल्कि नाक की संवेदनशील प्रतिक्रिया भी कहा जा सकता है. 

5. तेज खुशबू और केमिकल्स – कुछ लोग रात में तेज परफ्यूम लगाते हैं, मच्छर भगाने वाली मशीन चलती रहती है या नया डिटर्जेंट इस्तेमाल किया जाता है. बंद कमरे में ये गंध रात भर जमा हो जाती है और सुबह नाक में जलन पैदा करती है. 

6. पेट की गड़बड़ी भी हो सकती है कारण – कई बार रात में एसिडिटी या एसिड रिफ्लक्स की समस्या होती है. इससे पेट का एसिड गले और नाक के पीछे के हिस्से को परेशान करता है. इसके कारण सुबह छींक और हल्की खांसी होने लगती है. 

सुबह छींक आना किन बीमारियों का संकेत हो सकता है?

1. एलर्जिक राइनाइटिस – यह सबसे आम कारण है. इसमें शरीर धूल, पराग या जानवरों के बालों को दुश्मन समझ कर प्रतिक्रिया करता है. इसके लक्षण सुबह लगातार छींक आना, नाक बहना या बंद होना, आंखों में खुजली या पानी, गले में खराश होना. 

2. साइनसाइटिस – अगर छींक के साथ सिरदर्द, चेहरे पर दबाव या नाक भारी लगे, तो यह साइनस की समस्या हो सकती है. 

3. फीवर – मौसमी एलर्जी जिसमें नाक, आंख और गले में जलन होती है. 

रोज सुबह छींक आए तो क्या करें

1. बिस्तर और कमरे की सफाई करें. चादर और तकिए के कवर हर हफ्ते गर्म पानी में धोएं. भारी पर्दे और कालीन हटाएं. सूखे झाड़ू के बजाय गीले कपड़े से सफाई करें.

2. जल्दी-जल्दी न उठें, पहले कुछ मिनट बैठें, उठते ही गुनगुने पानी से चेहरा धोएं और एक गिलास सादा पानी पिएं. 

3. नमक मिले गुनगुने पानी से नाक साफ करना फायदेमंद है. 

4. कमरे में धूल कम रखें, पालतू जानवरों को बिस्तर से दूर रखें, जरूरत हो तो एयर प्यूरीफायर का यूज करें. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें 

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ज्यादा देर तक रोककर रखते हैं पेशाब तो हो जाइए सावधान, खराब हो सकती है किडनी

ज्यादा देर तक रोककर रखते हैं पेशाब तो हो जाइए सावधान, खराब हो सकती है किडनी


आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सभी कभी न कभी अपने शरीर की जरूरतों को नजरअंदाज कर देते हैं. ऑफिस की मीटिंग हो, स्कूल या कॉलेज की क्लास, लंबा सफर या फिर पास में वॉशरूम न होना, ऐसी कई परिस्थितियां होती हैं जब हम पेशाब को रोककर रखते हैं. कई बार तो हम जानबूझकर भी पेशाब टाल देते हैं, यह सोचकर कि थोड़ी देर और रुक जाते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बार-बार और लंबे समय तक पेशाब रोकने की यह आदत आपकी सेहत पर क्या असर डाल सकती है. 

शरीर हमें बार-बार संकेत देता है कि कब पेशाब करना जरूरी है, लेकिन जब हम इन संकेतों को अनदेखा करते हैं, तो यह आदत धीरे-धीरे गंभीर बीमारियों की वजह बन सकती है. खासतौर पर किडनी, ब्लैडर और पूरे यूरिनरी सिस्टम के लिए यह बहुत नुकसानदायक हो सकता है. तो आइए जानते हैं कि ज्यादा देर तक पेशाब रोकने से किडनी कैसे खराब हो सकती है और इससे कौन-कौन सी बीमारियां हो सकती हैं. 

ज्यादा देर तक पेशाब रोकने से किडनी कैसे खराब हो सकती है 

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, किडनी लगातार खून को साफ करके यूरिन बनाती रहती है. जब हम पेशाब रोकते हैं, तो यूरिन ब्लैडर में जमा होता जाता है. अगर यह दबाव लंबे समय तक बना रहे, तो यह दबाव उल्टा किडनी की ओर जाने लगता है, जिससे किडनी पर जोर पड़ता है और उसकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम हो सकती है. यूरिन के जरिए शरीर से टॉक्सिन, बैक्टीरिया और अतिरिक्त नमक बाहर निकलते हैं.पेशाब रोकने पर ये गंदे तत्व बाहर नहीं निकल पाते और शरीर में जमा रहने लगते हैं.  इससे किडनी को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और किडनी की कोशिकाएं धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं. 

इससे कौन-कौन सी बीमारियां हो सकती हैं

1. यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI) – जब हम पेशाब रोकते हैं, तो यूरिन में मौजूद बैक्टीरिया बाहर नहीं निकल पाते, ये बैक्टीरिया मूत्र मार्ग में बढ़ने लगते हैं और यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन हो सकता है. UTI के लक्षण पेशाब में जलन, बार-बार पेशाब की इच्छा, कम पेशाब आना, पेशाब से बदबू, पेट या कमर में दर्द महिलाओं में UTI का खतरा ज्यादा होता है, लेकिन पुरुष भी इससे प्रभावित हो सकते हैं. 

2. किडनी स्टोन (पथरी) – जब आप कम पानी पीते हैं और पेशाब रोकते हैं, तो यूरिन ज्यादा गाढ़ा हो जाता है. इससे मिनरल्स जमा होने लगते हैं और किडनी स्टोन बन सकते हैं. किडनी स्टोन से तेज असहनीय दर्द, उल्टी, पेशाब में खून जैसी समस्याएं हो सकती हैं. कई मामलों में सर्जरी तक की जरूरत पड़ जाती है. 

3. ब्लैडर की मांसपेशियों का कमजोर होना – लगातार पेशाब रोकने से ब्लैडर की मांसपेशियों पर ज्यादा जोर पड़ता है. इससे पेशाब कंट्रोल करने में दिक्कत, पेशाब अपने आप निकल जाना (Urinary Incontinence), बार-बार पेशाब आने की समस्या हो सकती है. इसे ब्लैडर डिसफंक्शन भी कहा जाता है. 

4. पहले से बीमार लोगों के लिए ज्यादा खतरा – कुछ लोगों को पेशाब बिल्कुल नहीं रोकना चाहिए. जैसे प्रोस्टेट बढ़ने की समस्या वाले पुरुष, डायबिटीज के मरीज, पहले से किडनी की बीमारी वाले लोग, यूरिन रुकने की समस्या वाले लोग, इनमें किडनी खराब होने का खतरा बहुत ज्यादा होता है.  

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें

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क्या वैक्सीन से ठीक हो सकता है पैंक्रियाज कैंसर, इसमें 90% मरीजों की हो जाती है मौत

क्या वैक्सीन से ठीक हो सकता है पैंक्रियाज कैंसर, इसमें 90% मरीजों की हो जाती है मौत


पैंक्रियाज यानी अग्नाशय का कैंसर दुनिया के सबसे खतरनाक और जानलेवा कैंसरों में गिना जाता है. यह बीमारी इतनी चुपचाप बढ़ती है कि जब तक इसके लक्षण साफ दिखाई देते हैं, तब तक अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है. यही वजह है कि इस कैंसर से पीड़ित करीब 90 प्रतिशत मरीजों की मौत पांच साल के भीतर हो जाती है. 

डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के लिए यह कैंसर लंबे समय से एक बड़ी चुनौती बना हुआ है. न तो इसका जल्दी पता चल पाता है और न ही इसके इलाज के बहुत प्रभावी विकल्प मौजूद हैं. लेकिन अब, कई दशकों की निराशा के बाद कुछ नए शोधों ने उम्मीद की एक नई रोशनी दिखाई है. हाल के वर्षों में वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि शरीर का अपना इम्यून सिस्टम को कैसे इस तरह तैयार किया जाए कि वह खुद कैंसर से लड़ सके. इसी दिशा में अब वैक्सीन और इम्यूनोथेरेपी पर आधारित इलाज को लेकर उत्साह बढ़ा है.

चूहों पर सफल प्रयोग, इंसानों के लिए उम्मीद

स्पेन के वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक नई संयोजन चिकित्सा पद्धति (कॉम्बिनेशन थेरेपी) विकसित की है, जिसने प्रयोगशाला में चूहों के शरीर से पैंक्रियाज कैंसर के ट्यूमर को पूरी तरह खत्म कर दिया. हालांकि यह शोध अभी इंसानों पर आजमाया नहीं गया है, लेकिन इसके नतीजे इतने सकारात्मक हैं कि वैज्ञानिकों को लगने लगा है कि भविष्य में यह तरीका मरीजों की जिंदगी बचाने में मदद कर सकता है.

इससे पहले अमेरिका में भी वैज्ञानिकों ने mRNA आधारित व्यक्तिगत पैंक्रियाज कैंसर वैक्सीन का शुरुआती मानव परीक्षण किया था, जिसमें कुछ मरीजों में अच्छे परिणाम देखने को मिले थे. इन दोनों अध्ययनों ने मिलकर यह संकेत दिया है कि वैक्सीन आधारित इलाज भविष्य में एक बड़ा बदलाव ला सकता है. 

यह नई थेरेपी कैसे काम करती है?

स्पेन में हुए इस अध्ययन को स्पेनिश नेशनल कैंसर रिसर्च सेंटर (CNIO) के वैज्ञानिक मारियानो बारबासिड और उनकी टीम ने किया. यह इलाज किसी एक दवा पर आधारित नहीं है, बल्कि इसमें तीन अलग-अलग तरीकों को एक साथ यूज किया गया है. जिसमें पहला एडवांस इम्यूनोथेरेपी है, इससे शरीर का इम्यून सिस्टम को मजबूत किया जाता है. इसके बाद दूसरा कैंसर वैक्सीन, जो इम्यून सिस्टम को कैंसर कोशिकाओं को पहचानना सिखाती है.

वहीं तीसरा चेकपॉइंट इनहिबिटर्स,जो इम्यून सिस्टम पर लगे ब्रेक को हटाकर उसे खुलकर कैंसर से लड़ने देते हैं. इन तीनों को मिलाकर वैज्ञानिकों ने कैंसर के चारों ओर बनी उसकी सुरक्षा ढाल को तोड़ दिया, जिससे टी-सेल्स कैंसर पर हमला कर सकीं और ट्यूमर दोबारा लौट नहीं पाया. विशेषज्ञों का मानना है कि एक से ज्यादा तरीकों को साथ में यूज करने से इलाज ज्यादा असरदार होता है, बजाय इसके कि सिर्फ एक ही दवा दी जाए. 

आंकड़े बताते हैं बीमारी की गंभीरता

विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर एजेंसी के अनुसार, 2022 में दुनिया भर में पैंक्रियाज कैंसर के लगभग 5.1 लाख नए मामले सामने आए. उसी साल करीब 4.6 लाख लोगों की मौत इस कैंसर से हुई. भारत में भी स्थिति चिंताजनक है. यहां 13,661 नए मरीज और 12,759 मौतें दर्ज की गई. ये आंकड़े साफ बताते हैं कि यह कैंसर कितनी तेजी से जान लेता है. 

KRAS जीन और दवा रेजिस्टेंस की समस्या

पैंक्रियाज कैंसर के लगभग 90 प्रतिशत मामलों में KRAS नाम का एक जीन खराब (म्यूटेटेड) होता है. लंबे समय तक इस जीन को निशाना बनाने वाली कोई दवा उपलब्ध नहीं थी. करीब 50 साल तक इलाज मुख्य रूप से कीमोथेरेपी पर ही निर्भर रहा. 2021 में पहली बार KRAS को टारगेट करने वाली दवाएं मंजूर हुईं, लेकिन समस्या यह रही कि कुछ महीनों में ही ट्यूमर ने उन दवाओं के खिलाफ रेजिस्टेंस विकसित कर लिया.

बारबासिड और उनकी टीम ने इस समस्या का अनोखा हल निकाला. उन्होंने KRAS के सिग्नलिंग रास्ते को एक नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग जगहों से रोका. हालांकि नतीजे बहुत उत्साहजनक हैं, लेकिन वैज्ञानिक खुद भी सतर्क हैं. बारबासिड ने साफ कहा है कि हम अभी इस ट्रिपल थेरेपी को इंसानों पर आजमाने के लिए तैयार नहीं हैं. उन्होंने बताया कि मानव परीक्षण शुरू करने से पहले अभी और शोध, सुरक्षा जांच और तैयारी की जरूरत है. 

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HIV से बचने के लिए शख्स ने AI से पूछकर खाई दवाई, हो गया जानलेवा स्टीवन्स जॉनसन सिंड्रोम

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क्या होती है हाथी पांव वाली बीमारी, क्या इसमें सच में हाथी जैसा हो जाता है पैर?

क्या होती है हाथी पांव वाली बीमारी, क्या इसमें सच में हाथी जैसा हो जाता है पैर?


2024 में उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में हाथी पांव बीमारी ने लोगों की चिंता बढ़ाई थी. मच्छरों के काटने से होने वाली इस बीमारी को मेडिकल भाषा में लिम्फैटिक फाइलेरियासिस या एलिफेंटिएसिस कहा जाता है. इस बीमारी में शरीर के कुछ हिस्सों में इतनी ज्यादा सूजन आ जाती है कि वे हाथी के पैर जैसे बड़े, मोटे और सख्त दिखने लगते हैं. पैरों के अलावा ये सूजन हाथ, चेस्ट और जननांगों में भी हो सकती है. जिससे शरीर के ये हिस्से भारी और गांठदार दिखने लगते हैं. साथ ही सूजन वाले हिस्से में दर्द भी हो सकता है.

क्यों कहा जाता है इसे हाथी पांव

इस बीमारी में सबसे ज्यादा असर पैरों पर पड़ता है. धीरे-धीरे पैर असामान्य रूप से फूल जाते हैं और उनकी त्वचा मोटी, खुरदरी और सख्त हो जाती है. यही वजह है कि इसे आम भाषा में हाथी पांव कहा जाता है. वहीं हाथी पांव बीमारी संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलती है. जब मच्छर किसी संक्रमित व्यक्ति को काटता है और फिर किसी हेल्दी व्यक्ति को काटता है, तो परजीवी कीड़े शरीर में प्रवेश कर जाते हैं. ये कीड़े मानव शरीर की लसीका प्रणाली में जाकर उसे ब्लॉक कर देते हैं, जिससे तरल पदार्थ जमा होने लगता है और सूजन बढ़ती जाती है.

शुरुआत में नहीं दिखते लक्षण

हाथी पांव की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआत में इसके लक्षण साफ दिखाई नहीं देते हैं. कई मामलों में संक्रमण के बाद सालों तक कोई परेशानी नजर नहीं आती. लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, बुखार, दर्द और सूजन जैसे लक्षण सामने आने लगते हैं. इसके अलावा सूजन वाले हिस्से में दर्द और बेचैनी हो सकती है. वहीं कुछ मामलों में बार-बार बैक्टीरियल संक्रमण भी हो जाता है, जिससे कंडीशन और खतरनाक हो जाती है. इसके अलावा  लंबे समय तक इलाज न मिलने पर व्यक्ति की चलने-फिरने और काम करने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है.

कितनी खतरनाक है यह बीमारी

दुनियाभर में करीब 12 करोड़ लोग इस बीमारी से प्रभावित है. यह बीमारी खासकर उन इलाकों में ज्यादा पाई जाती है, जहां स्वच्छता की स्थिति खराब होती है और मच्छरों का प्रकोप ज्यादा रहता है. भारत के कुछ राज्यों में इसका बोझ अब भी काफी ज्यादा है. वहीं हाथी पांव बीमारी का कोई स्थायी इलाज या टीका फिलहाल मौजूद नहीं है, लेकिन दवाओं से संक्रमण को आगे फैलने से रोका जा सकता है. एंटी-पैरासिटिक दवाएं शरीर में मौजूद कीड़ों को खत्म करने में मदद करती है. कुछ मामलों में सूजन कम करने या हाइड्रोसील जैसी समस्या के लिए सर्जरी भी की जाती है.

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भारतीय रसोई में सरसों के तेल को क्यों माना जाता है बेस्ट, जानिए इससे दिल की सेहत को कैसे होता है फायदा

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