गर्दन चटकाने की आदत कहीं स्ट्रोक का खतरा तो नहीं, फिजिशियन ने बताया- कब बढ़ जाती है यह परेशानी?

गर्दन चटकाने की आदत कहीं स्ट्रोक का खतरा तो नहीं, फिजिशियन ने बताया- कब बढ़ जाती है यह परेशानी?


गर्दन में अकड़न या तनाव महसूस होते ही कई लोग बिना सोचे-समझे उसे चटका लेते हैं. वहीं उस क्लिक की आवाज के साथ तुरंत राहत भी मिलती है, लेकिन कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि यह आदत आगे चलकर खतरा बन सकती है. इसी सवाल को लेकर कई एक्सपर्ट्स जरूरी जानकारी देते हैं. दरअसल एक्सपर्ट्स बताते हैं कि बार-बार गर्दन चटकाने से शरीर के अंदर क्या होता है और किन हालात में यह स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकता है.

गर्दन चटकाने पर असल में होता क्या है?

एक्सपर्ट्स के अनुसार गर्दन चटकाने पर जो आवाज आती है, वह अपने आप में खतरनाक नहीं होती है. यह आवाज जोड़ों के अंदर मौजूद साइनोवियल फ्लूइड में गैस बबल्स के तेजी से रिलीज होने की वजह से आती है. यही वजह है कि गर्दन चटकाने के बाद थोड़ी देर के लिए हल्कापन या राहत महसूस होती है. हालांकि डॉक्टर यह भी साफ कहते हैं कि दिक्कत आवाज से नहीं, बल्कि आदत से शुरू होती है. जब कोई व्यक्ति बार-बार और जोर लगाकर अपनी गर्दन को उसकी नॉर्मल सीमा से ज्यादा झटका देता है तभी समस्या पैदा होती है. एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि लगातार ऐसा करने से गर्दन को सपोर्ट करने वाले लिगामेंट्स ढीले पड़ सकते हैं. इससे सर्वाइकल स्पाइन की स्थिरता कम हो जाती है और गर्दन अचानक मुड़ने या झटके लगने पर ज्यादा अनियंत्रित हो जाती है.वहीं जब गर्दन की स्थिरता घटती है तो उसके अंदर मौजूद नाजुक संरचनाएं ज्यादा संवेदनशील हो जाती है. खासकर वो ब्लड सेल्स जो दिमाग तक खून पहुंचाती है.

कैसे बढ़ सकता है स्ट्रोक का खतरा?

डॉक्टरों के अनुसार जोरदार गर्दन के मूवमेंट से वर्टिब्रल और कैरोटिड आर्टरी पर दबाव पड़ सकता है. वहीं दुर्लभ मामलों में इससे आर्टरी की अंदरूनी परत फट सकती है, जिसे सर्वाइकल आर्टरी डिसेक्शन कहा जाता है. ऐसी कंडीश में उस जगह खून जमा होकर थक्का बना सकता है. वहीं अगर यह थक्का दिमाग तक पहुंच जाए और ब्लड फ्लो को रोक दे तो स्ट्रोक का खतरा हो सकता है. डॉक्टर्स यह भी साफ कहते हैं कि स्ट्रोक के गंभीर मामले बहुत कम होते हैं. वहीं ज्यादातर लोग जो कभी-कभार गर्दन चटकाते हैं उनको स्ट्रोक जैसी समस्या नहीं होती है. लेकिन यह भी सच है कि मेडिकल साइंस में इस तरह के खतरों के बारे में बताया गया है. इसलिए बार-बार और खुद से जोरदार गर्दन चटकाने की सलाह नहीं दी जाती है.

गर्दन की जकड़न से राहत के तरीके

अगर गर्दन में जकड़न या दर्द बना रहता है, तो डॉक्टर बताते हैं कि हल्की स्ट्रेचिंग और मोबिलिटी एक्सरसाइज पर ध्यान देना चाहिए. इसके अलावा सही पोस्चर पर ध्यान देना गर्दन और कंधों की मांसपेशियों को मजबूत करने वाली एक्सरसाइज करना भी जरूरी होता है.

ये भी पढ़ें-Fatty Liver Disease: पेट का भारीपन या मामूली थकान? नजरअंदाज न करें, जानिए फैटी लिवर की शुरुआती चेतावनी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

इस बीमारी में होती है एक दिन में 10 से 12 बार फिजिकल होने की इच्छा, जानें कितनी अजीब है डिजीज

इस बीमारी में होती है एक दिन में 10 से 12 बार फिजिकल होने की इच्छा, जानें कितनी अजीब है डिजीज


हर व्यक्ति की फिजिकल रिलेशन बनाने की इच्छा अलग-अलग होती है. कोई व्यक्ति ज्यादा फिजिकल रिलेशन बनाने वाला हो सकता है, तो कोई कम. लेकिन क्या होगा अगर किसी व्यक्ति में यह इच्छा इतनी बढ़ जाए कि वह खुद पर कंट्रोल नहीं रख पाए. ऐसी स्थिति को निम्फोमेनिया कहा जाता है. यह एक मानसिक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति को शारीरिक संबंध बनाने की ज्यादा और अन कंट्रोल इच्छा होती है.

निम्फोमेनिया सिर्फ एक सामान्य फिजिकल रिलेशन बनाने की इच्छा नहीं है. इसमें दिन में कई बार यौन संबंध बनाने की इच्छा इतनी जबरदस्त होती है कि व्यक्ति का डेली रूटीन, रिश्ते, करियर और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होने लगता है. कुछ मामलों में, व्यक्ति को एक दिन में 10 से 12 बार शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा हो सकती है. यह सिर्फ एक इच्छा नहीं रहती, बल्कि एक बाध्यकारी व्यवहार (Compulsive Behavior) बन जाती है, जिसे रोक पाना बहुत मुश्किल हो जाता है. 

निम्फोमेनिया के लक्षण

1. अन कंट्रोल फिजिकल रिलेशन-  व्यक्ति चाहकर भी अपनी फिजिकल रिलेशन इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता. यह स्थिति कभी-कभी इतनी तेज हो जाती है कि रोजमर्रा के कामों पर इसका असर पड़ता है. 

2. लगातार फिजिकल रिलेशन विचार –  दिनभर लगातार फिजिकल रिलेशन कल्पनाएं और विचार दिमाग में घूमते रहते हैं, जिससे अन्य कामों पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाता है. 

3. नकारात्मक परिणाम – फिजिकल रिलेशन एक्टिवीटीज के कारण रिश्तों, काम और सामाजिक जीवन में समस्याएं आती हैं, जैसे झगड़े या नौकरी में असफलता. 

4. जोखिम भरा व्यवहार – व्यक्ति कई पार्टनर्स के साथ असुरक्षित फिजिकल रिलेशन बनाता है और इसके परिणामों की परवाह नहीं करता है. 

क्यों होता है निम्फोमेनिया?

किसी व्यक्ति में यह स्थिति अचानक नहीं आती है. इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. जैसे  दिमाग में हार्मोन और न्यूरोट्रांसमीटर का असंतुलन होने पर यह स्थिति उत्पन्न हो सकती है. कभी-कभी जीवन में हुई कुछ परेशानियां या तनाव, जैसे यौन उत्पीड़न या मानसिक आघात, व्यक्ति को इस स्थिति में ला सकते हैं. लगातार तनाव में रहने वाले व्यक्ति के दिमाग में हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे यह स्थिति उत्पन्न हो सकती है. 

पुरुष और महिलाओं में निम्फोमेनिया

महिलाओं में यह स्थिति अधिक देखने को मिलती है और इसे निम्फोमेनिया कहा जाता है. पुरुषों में इसी तरह की स्थिति को सैटेराइसिस (Satyriasis) कहा जाता है. दोनों में इसका प्रभाव समान होता है. फिजिकल रिलेशन बनाने की इच्छा पर नियंत्रण खोना और लगातार संबंध बनाने की आदत. 

निम्फोमेनिया का इलाज

निम्फोमेनिया को पूरी तरह से एक बीमारी के रूप में पूरी दुनिया में मान्यता नहीं मिली है, लेकिन इसे हाइपरसेक्सुअलिटी डिसऑर्डर (Hypersexuality Disorder) या सेक्सुअल एडिक्शन (Sexual Addiction) के रूप में देखा जाता है.  इस विशेषकर CBT (Cognitive Behavioral Therapy) जैसी साइकोथेरपी मददगार होती है. डॉक्टर कुछ दवाइयां लिख सकते हैं, जो फिजिकल रिलेशन बनाने की इच्छा और compulsive behavior को नियंत्रित करने में मदद करती हैं. ऐसे लोगों के लिए सहायता समूह भी होते हैं, जहां एक्सपीरियंस शेयर करने और समस्या को समझने में मदद मिलती है. 

इसे भी पढ़ें- Diabetes Treatment Cost: डायबिटीज की दवाओं पर कौन-सा देश सबसे ज्यादा पैसा करता है खर्च, किस पायदान पर भारत?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

शरीर अपने आप करने लगेगा खुद को डिटॉक्स, बस करना होगा ये काम

शरीर अपने आप करने लगेगा खुद को डिटॉक्स, बस करना होगा ये काम


How To Detox Body Naturally At: आजकल लोग शरीर को डिटॉक्स करने के लिए तरह-तरह के ट्रेंड्स और महंगे प्रोडक्ट्स अपनाते हैं. लेकिन सच यह है कि हमारा शरीर खुद ही टॉक्सिन्स बाहर निकालने की क्षमता रखता है. जरूरत सिर्फ इतनी है कि हम उसे सही सपोर्ट दें. कुछ आसान आदतें और घरेलू डिटॉक्स ड्रिंक्स इस नेचुरल प्रक्रिया को तेज करने में मदद कर सकती हैं. चलिए आपको बताते हैं कि आप इसके लिए क्या अपना सकते हैं. 

कैसे कर सकते हैं बॉडी डिटॉक्स

पटना स्थित ऑरो सुपर स्पेशलिटी क्लीनिक की डॉक्टर अंजली सौरभ बताती हैं कि “शरीर में टॉक्सिन्स का जमा होना कई बीमारियों की जड़ माना जाता है. इसलिए शरीर को समय-समय पर डिटॉक्स करना जरूरी है. यह डिटॉक्स सिर्फ डाइट से नहीं, बल्कि तेल मालिश, पसीना निकालने वाली एक्सरसाइज और सही तरल पदार्थों के सेवन से भी होता है. इनमें डिटॉक्स ड्रिंक्स सबसे आसान और असरदार तरीका मानी जाती हैं.”

कौन सा ड्रिंक्स फायदेमंद

डिटॉक्स ड्रिंक्स इसलिए फायदेमंद होती हैं क्योंकि तरल रूप में ये जल्दी शरीर में घुल जाती हैं और ब्लड व अंगों की गहराई से सफाई में मदद करती हैं. इससे लिवर, किडनी और पाचन तंत्र बेहतर तरीके से काम करने लगते हैं और शरीर अपने आप टॉक्सिन्स बाहर निकालने लगता है. ऐसी ही एक असरदार ड्रिंक है ऑलस्पाइस इन्फ्यूजन. इसमें दालचीनी, लौंग, अदरक, काली मिर्च, करी पत्ता, गुड़हल, तुलसी, इलायची, शहद और नींबू जैसे तत्व शामिल होते हैं. इसे रातभर पानी में भिगोकर सुबह पिया जाता है. यह ड्रिंक एंटी-इंफ्लेमेटरी होती है और मेटाबॉलिज्म को संतुलन में रखने में मदद करती है.

एलोवेरा जूस भी शरीर की नेचुरल डिटॉक्स प्रक्रिया को सपोर्ट करता है. पानी, एलो जेल, नींबू और थोड़ी सी काली मिर्च से बना यह ड्रिंक शरीर में पानी की कमी को रोकता है. इससे टॉक्सिन्स का जमाव कम होता है और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस घटता है, जिससे शरीर खुद को हील करने लगता है. सेब और दालचीनी से बनी डिटॉक्स ड्रिंक दिन की शुरुआत के लिए बेहतर मानी जाती है. सेब में मौजूद विटामिन और मिनरल्स शरीर को पोषण देते हैं, जबकि दालचीनी ब्लड शुगर और वजन को कंट्रोल करने में मदद करती है. इसे रातभर भिगोकर सुबह पीने से शरीर में ताजगी महसूस होती है.

इन समस्याओं से मिलती है राहत

इन डिटॉक्स ड्रिंक्स को नियमित रूप से अपनाने से शरीर का होमियोस्टैसिस बना रहता है. शरीर की सफाई के साथ-साथ इनमें मौजूद मसाले सूजन कम करते हैं, इम्युन सिस्टम मजबूत करते हैं, दिल की सेहत सुधारते हैं और मतली जैसी समस्याओं में भी राहत देते हैं. यह आपके ओवरऑल सेहत के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकती है. 

इसे भी पढ़ें: Oversleeping Side Effects: कहीं जरूरत से ज्यादा तो नहीं सो रहे आप? हो सकती है यह गंभीर समस्या, एक्सपर्ट ने दी चेतावनी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

2030 तक देश में बढ़ेगा फेफड़ों के कैंसर का खतरा, जानें कैसे घर में घुस रही मुसीबत?

2030 तक देश में बढ़ेगा फेफड़ों के कैंसर का खतरा, जानें कैसे घर में घुस रही मुसीबत?


Why Non Smokers Get Lung Cancer: कैंसर का मामले लगातार पूरी दुनिया में बढ़ रहा है. हाल ही में  Indian Journal of Medical Research (IJMR) में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, भारत में 2030 तक लंग्स के कैंसर के मामलों में तेजी देखने को मिल सकती है. रिपोर्ट में बताया गया है कि देश का नॉर्थ-ईस्ट क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित होगा, जबकि महिलाओं में मामलों की रफ्तार सबसे तेज रहने की आशंका है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार, फेफड़ों का कैंसर एक गंभीर पब्लिक हेल्थ समस्या है. साल 2022 में दुनियाभर में करीब 2 करोड़ नए कैंसर मामले सामने आए और 97 लाख लोगों की मौत हुई. आंकड़े बताते हैं कि हर पांच में से एक व्यक्ति को जीवनकाल में कभी न कभी कैंसर हो सकता है.

कब होता है लंग्स कैंसर

लंग्स कैंसर तब होता है, जब लंग्स की सेल्स अनकंट्रोल तरीके से बढ़ने लगती हैं. ये खराब सेल्स आपस में मिलकर गांठ या ट्यूमर बना लेती हैं, जिससे लंग्स का सामान्य कामकाज प्रभावित होने लगता है और धीरे-धीरे शरीर के अन्य अंग भी असर में आ जाते हैं.

किस हिस्से में सबसे ज्यादा मामले देखने को मिलेंगे

ICMR की नई स्टडी के अनुसार, नॉर्थ-ईस्ट में लंग्स के कैंसर की दर सबसे ज्यादा रहने की संभावना है. खास बात यह है कि यहां महिलाओं में इसके मामले पुरुषों के लगभग बराबर पहुंच रहे हैं. स्टडी में देश के छह अलग-अलग क्षेत्रों की 57 आबादियों के आंकड़ों का ऑब्जर्व किया गया. इनमें आइजोल सबसे ऊपर रहा, जहां पुरुषों में प्रति लाख आबादी पर 35.9 और महिलाओं में 33.7 मामले दर्ज किए गए, साथ ही मृत्यु दर भी सबसे अधिक रही.

इस कारण से बढ़ रहे मामले

TOI की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस क्षेत्र में तंबाकू का अत्यधिक इस्तेमाल अब भी एक बड़ा कारण है. यहां पुरुषों में 68 प्रतिशत से ज्यादा और महिलाओं में करीब 54 प्रतिशत लोग तंबाकू का सेवन करते हैं. हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि अब बीमारी का स्वरूप बदल रहा है. AIIMS के पल्मोनोलॉजी विभाग के डॉक्टर सौरभ मित्तल के अनुसार, “हम बिना स्मोकिंग वाली महिलाओं में भी फेफड़ों के कैंसर के मामले देख रहे हैं, जो इनडोर एयर पॉल्यूशन, बायोमास ईंधन, सेकेंड-हैंड स्मोक और काम से जुड़े प्रदूषण से जुड़े हैं.”

पुरुषों में बढ़ रहे मामले 

स्टडी में यह भी सामने आया कि दक्षिण भारत के कन्नूर, कासरगोड और कोल्लम जैसे जिलों में पुरुषों में लंग्स के कैंसर की दर ज्यादा है, जबकि यहां तंबाकू और शराब का सेवन अपेक्षाकृत कम है. दक्षिण में महिलाओं के सबसे ज्यादा मामले हैदराबाद और बेंगलुरु में दर्ज किए गए. उत्तर भारत में श्रीनगर में पुरुषों में मामले ज्यादा रहे, जबकि श्रीनगर और पुलवामा में महिलाओं में भी कम नशे के बावजूद उच्च दर देखी गई. रिपोर्ट के अनुसार, कुछ इलाकों में महिलाओं में लंग्स के कैंसर के मामले हर साल करीब 6.7 प्रतिशत और पुरुषों में 4.3 प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं. तिरुवनंतपुरम में महिलाओं और डिंडीगुल में पुरुषों के मामलों में सबसे तेज उछाल दर्ज किया गया.

इसे भी पढ़ें: Oversleeping Side Effects: कहीं जरूरत से ज्यादा तो नहीं सो रहे आप? हो सकती है यह गंभीर समस्या, एक्सपर्ट ने दी चेतावनी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

पेट का भारीपन या मामूली थकान? नजरअंदाज न करें, जानिए फैटी लिवर की शुरुआती चेतावनी

पेट का भारीपन या मामूली थकान? नजरअंदाज न करें, जानिए फैटी लिवर की शुरुआती चेतावनी


पेट खराब होना एक आम अनुभव है. खाना खाने के बाद सूजन, हल्का दर्द या मतली को लोग खाना, तनाव या एसिडिटी से जोड़ देते हैं. लेकिन कुछ लोगों में ये दिक्कतें पेट से नहीं, बल्कि लिवर से जुड़ी होती हैं. फैटी लिवर की शुरुआती अवस्था में तेज दर्द नहीं होता, बल्कि हल्के संकेत मिलते हैं.

थोड़ा-सा खाने के बाद भी पेट बहुत भरा-भरा लगना अक्सर धीमे पाचन या गैस का नाम दे दिया जाता है. फैटी लिवर में लिवर पर फैट जमने से वह थोड़ा बढ़ जाता है, जिससे आसपास के अंगों पर दबाव पड़ता है. यही दबाव खाने के बाद भारीपन पैदा करता है, जो बार-बार होने लगता है.

थोड़ा-सा खाने के बाद भी पेट बहुत भरा-भरा लगना अक्सर धीमे पाचन या गैस का नाम दे दिया जाता है. फैटी लिवर में लिवर पर फैट जमने से वह थोड़ा बढ़ जाता है, जिससे आसपास के अंगों पर दबाव पड़ता है. यही दबाव खाने के बाद भारीपन पैदा करता है, जो बार-बार होने लगता है.

Published at : 14 Jan 2026 03:10 PM (IST)

हेल्थ फोटो गैलरी



Source link

YouTube
Instagram
WhatsApp