सुस्ती से लेकर मांसपेशियों की कमजोरी तक, जानें विटामिन D की कमी के शुरुआती संकेत

सुस्ती से लेकर मांसपेशियों की कमजोरी तक, जानें विटामिन D की कमी के शुरुआती संकेत


Early Signs Of Vitamin D Deficiency You Should Not Ignore: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में थकान, कमजोरी या शरीर में सुस्ती महसूस होना आम बात माना जाता है. ज्यादातर लोग इसे तनाव, नींद की कमी या ज्यादा काम का नतीजा समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन कई बार ये साधारण दिखने वाले लक्षण शरीर में किसी जरूरी पोषक तत्व की कमी का संकेत भी हो सकते हैं. ऐसी ही एक समस्या है विटामिन D की कमी, जो अक्सर शुरुआती दौर में बिना स्पष्ट लक्षणों के सामने आती है.

डॉ. आशीष चौधरी के अनुसार, विटामिन D की कमी के शुरुआती संकेत इतने सामान्य होते हैं कि लोग उन्हें रोजमर्रा की थकान या तनाव समझकर अनदेखा कर देते हैं. हालांकि समय रहते इन संकेतों को पहचानना हड्डियों और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है.चलिए आपको इसके कुछ लक्षण के बारे में बताते हैं, जिससे आपको इसके बारे में पता लग जाएगा. 

लगातार थकान महसूस होना

अगर पर्याप्त नींद लेने के बावजूद दिनभर एनर्जी की कमी महसूस होती है और शरीर हमेशा थका-थका लगता है, तो यह विटामिन डी की कमी का संकेत हो सकता है. डॉ. आशीष चौधरी बताते हैं कि कई लोग इसे काम के दबाव या व्यस्त लाइफस्टाइल का असर मान लेते हैं, जबकि लंबे समय तक बनी रहने वाली थकान को गंभीरता से लेना चाहिए.

मांसपेशियों में कमजोरी

विटामिन डी की कमी का एक और आम संकेत मांसपेशियों की ताकत कम होना है. खासतौर पर जांघों, कमर या पैरों में भारीपन महसूस हो सकता है. कई लोग इसे बढ़ती उम्र या व्यायाम की कमी से जोड़ते हैं, लेकिन वास्तव में विटामिन डी मांसपेशियों के सही कामकाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है.

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शरीर और हड्डियों में दर्द

अगर बिना किसी स्पष्ट कारण के शरीर में दर्द, अकड़न या हड्डियों में हल्का-हल्का दर्द बना रहता है, तो यह भी कमी का संकेत हो सकता है. डॉ. आशीष चौधरी के मुताबिक, विटामिन डी शरीर में कैल्शियम के एब्जार्व में मदद करता ह. उसकी कमी से हड्डियां कमजोर हो सकती हैं और मांसपेशियों तथा जोड़ों में दर्द की समस्या बढ़ सकती है.

बाल झड़ना और मूड में बदलाव

कुछ लोगों में विटामिन डी की कमी का असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई देता है. चिड़चिड़ापन, उत्साह की कमी, मन उदास रहना या जरूरत से ज्यादा बाल झड़ना ऐसे संकेत हैं जिन्हें अक्सर तनाव का परिणाम मान लिया जाता है. हालांकि कई बार इसके पीछे पोषण संबंधी कमी भी जिम्मेदार हो सकती है.

ये भी है लक्षण

अगर आपको अक्सर सर्दी-जुकाम या अन्य इंफेक्शन हो जाते हैं और ठीक होने में सामान्य से ज्यादा समय लगता है, तो यह कमजोर इम्यून सिस्टम का संकेत हो सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार, विटामिन डी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है.

किन लोगों को इसका ज्यादा खतरा?

डॉ. आशीष चौधरी बताते हैं कि जो लोग ज्यादातर समय घर या ऑफिस के अंदर बिताते हैं और धूप के संपर्क में कम आते हैं, उनमें विटामिन डी की कमी का जोखिम अधिक होता है. इसके अलावा बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं, मेनोपॉज के बाद की महिलाएं और प्रदूषित क्षेत्रों में रहने वाले लोग भी ज्यादा संवेदनशील माने जाते हैं. अगर ये लक्षण कई हफ्तों तक बने रहें, तो डॉक्टर की सलाह लेकर विटामिन डी की जांच करानी चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मोबाइल फोन से लेकर सिरदर्द का असली सच, कैसे फैलता है ब्रेन ट्यूमर? डॉक्टरों ने खोला बड़ा राज

मोबाइल फोन से लेकर सिरदर्द का असली सच, कैसे फैलता है ब्रेन ट्यूमर? डॉक्टरों ने खोला बड़ा राज


Common Brain Tumour Myths And Facts: ब्रेन ट्यूमर का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगों के मन में डर बैठ जाता है. फिल्मों, सोशल मीडिया और अधूरी जानकारियों की वजह से इसके बारे में कई ऐसी धारणाएं बन गई हैं जो पूरी तरह सही नहीं हैं. हकीकत यह है कि ब्रेन ट्यूमर एक मुश्किल बीमारी है और इसके बारे में फैली गलतफहमियां कई बार मरीजों और उनके परिवारों को जरूरत से ज्यादा डराने का काम करती हैं. यही कारण है कि विशेषज्ञ समय-समय पर इन मिथकों को दूर करने की सलाह देते हैं. एस्टर इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज एंड स्पाइन केयर के ग्रुप डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ. सतीश रुद्रप्पा के अनुसार, कई बार बीमारी से ज्यादा नुकसान उसके बारे में फैली गलत जानकारी पहुंचाती है. 

क्या ब्रेन ट्यूमर कैंसर होता है?

सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि हर ब्रेन ट्यूमर कैंसर होता है. डॉ. सतीश रुद्रप्पा बताते हैं कि सभी ब्रेन ट्यूमर कैंसरयुक्त नहीं होते. कई ट्यूमर ऐसे होते हैं, जो शरीर के दूसरे हिस्सों में नहीं फैलते. हालांकि, ब्रेन के भीतर जगह सीमित होने के कारण ऐसे ट्यूमर भी दबाव बनाकर बोलने, चलने, याददाश्त, देखने या संतुलन जैसी महत्वपूर्ण क्षमताओं को प्रभावित कर सकते हैं. इसलिए किसी ट्यूमर की गंभीरता केवल उसके कैंसर होने या न होने से तय नहीं होती, बल्कि उसकी स्थिति, आकार और बढ़ने की गति भी महत्वपूर्ण होती है. 

क्या सिरदर्द ब्रेन ट्यूमर का लक्षण है?

एक और आम धारणा है कि ब्रेन ट्यूमर का पहला लक्षण हमेशा सिरदर्द होता है. लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसा जरूरी नहीं है. डॉ. रुद्रप्पा के मुताबिक, हर मरीज में लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं. कुछ लोगों में दौरे पड़ना, नजर कमजोर होना, बोलने में परेशानी, हाथ-पैरों में कमजोरी, संतुलन बिगड़ना या व्यवहार में बदलाव जैसे संकेत सिरदर्द से पहले भी दिखाई दे सकते हैं. यही वजह है कि लगातार बने रहने वाले न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

किन लोगों को होता है ब्रेन ट्यूमर?

कई लोग यह भी मानते हैं कि ब्रेन ट्यूमर सिर्फ बुजुर्गों को होता है. जबकि सच्चाई यह है कि यह किसी भी उम्र में हो सकता है. बच्चों, युवाओं और मध्यम आयु वर्ग के लोगों में भी विभिन्न प्रकार के ब्रेन ट्यूमर देखे जाते हैं. इसलिए उम्र कम होने के कारण लक्षणों को हल्के में लेना सही नहीं है.

मोबाइल फोन और ब्रेन ट्यूमर का संबंध क्या है?

मोबाइल फोन के इस्तेमाल और ब्रेन ट्यूमर के बीच संबंध को लेकर भी लंबे समय से बहस चल रही है. डॉ. सतीश रुद्रप्पा का कहना है कि दुनिया भर में कई दशकों से इस विषय पर रिसर्च किए जा रहे हैं, लेकिन अब तक ऐसा कोई ठोस साइंटफिक प्रमाण नहीं मिला है जो यह साबित करे कि सामान्य रूप से मोबाइल फोन का इस्तेमाल सीधे ब्रेन ट्यूमर का कारण बनता है. यूएस नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट भी बताती है कि बड़े स्टडी में मोबाइल फोन के नियमित उपयोग और ब्रेन ट्यूमर के जोखिम के बीच स्पष्ट संबंध नहीं पाया गया है.

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क्या ब्रेन ट्यूमर के बाद लाइफ खत्म हो जाती है?

सबसे नुकसानदायक मिथक यह है कि ब्रेन ट्यूमर का मतलब जीवन का अंत है. एक्सपर्ट का कहना है कि आधुनिक चिकित्सा ने इस क्षेत्र में बड़ी प्रगति की है. बेहतर ब्रेन इमेजिंग, अत्याधुनिक सर्जरी, सटीक रेडिएशन थेरेपी और नई दवाओं की मदद से आज कई मरीज इलाज के बाद सामान्य और संतोषजनक जीवन जी रहे हैं. इसलिए समय पर जांच, सही इलाज और एक्सपर्ट की सलाह इस बीमारी से लड़ने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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चुभती-जलती गर्मी में शुरू हो गया घमौरियों मौसम, ऐसे करें अपनी देखभाल

चुभती-जलती गर्मी में शुरू हो गया घमौरियों मौसम, ऐसे करें अपनी देखभाल


Heat Rash And Prickly Heat Home Remedies : गर्मी के मौसम में तापमान बढ़ते ही पसीना, चिपचिपाहट और स्किन से जुड़ी समस्याएं लोगों को परेशान करने लगती हैं. इन्हीं समस्याओं में से एक घमौरियां है, जिन्हें मेडिकल भाषा में हीट रैश या मिलिरिया कहा जाता है. यह समस्या बच्चों से लेकर बड़ों तक किसी को भी हो सकती है, लेकिन छोटे बच्चों और सेंसिटिव स्किन वाले लोगों में इसका खतरा ज्यादा होता है. इससे स्किन में सूजन आने लगती है और लाल दाने, जलन, चुभन साथ ही तेज खुजली जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं. 

अक्सर लोग घमौरियों से राहत पाने के लिए प्रिकली हीट पाउडर का इस्तेमाल करने लगते हैं, लेकिन कई मामलों में यह पाउडर पोर्स को और ज्यादा बंद कर सकता है, जिससे परेशानी बढ़ सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि घमौरियों को ठीक करने का सबसे अच्छा तरीका स्किन को ठंडा और सूखा रखना है. इसके अलावा कुछ आसान घरेलू उपाय भी राहत दिलाने में मदद कर सकते हैं. तो आइए जानते हैं कि चुभती-जलती गर्मी में घमौरियां होने पर अपनी देखभाल कैसे करें. 

कब होती हैं घमौरियां?

घमौरियां तब होती हैं जब शरीर का पसीना स्किन के नीचे फंस जाता है. पसीने को बाहर निकालने वाली छोटी-छोटी नलिकाएं बंद हो जाती हैं और पसीना स्किन के अंदर जमा होने लगता है. इससे लाल दाने निकल आते हैं और प्रभावित हिस्से में खुजली साथ ही जलन महसूस होती है. यह समस्या खासतौर पर गर्म और नमी वाले मौसम में ज्यादा देखने को मिलती है. गर्दन, छाती, पीठ, जांघों और स्किन की सिलवटों वाले हिस्सों में घमौरियां अधिक होती हैं. 

घमौरियों के क्या लक्षण होते हैं?

घमौरियों के लक्षण शुरुआत में मामूली लग सकते हैं, लेकिन समय के साथ ये काफी परेशान करने वाले हो जाते हैं. इसमें स्किन पर छोटे-छोटे लाल दाने निकल आते हैं, जिनमें तेज खुजली, जलन और चुभन महसूस हो सकती है. साथ ही प्रभावित हिस्से की स्किन में हल्की सूजन भी दिखाई दे सकती है और पसीना आने पर ये परेशानी और बढ़ जाती है. खासकर गर्मी और उमस वाले माहौल में दाने ज्यादा चुभने लगते हैं. बच्चों में घमौरियों की वजह से बेचैनी बढ़ सकती है और बार-बार उस जगह को खुजलाने लगते हैं, जिससे स्किन में संक्रमण का खतरा भी बढ़ सकता है. 

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चुभती-जलती गर्मी में घमौरियां होने पर अपनी देखभाल कैसे करें?

1. कोल्ड कंप्रेस – अगर घमौरियों वाली जगह पर ठंडी सिकाई की जाए तो जलन और सूजन में जल्दी आराम मिल सकता है. इसके लिए बर्फ को सीधे स्किन पर लगाने के बजाय किसी साफ कपड़े में लपेटकर इस्तेमाल करें. ठंडे पानी में कपड़ा भिगोकर भी सिकाई की जा सकती है. 

2. ठंडे पानी से नहाने की आदत डालें – दिन में एक या दो बार ठंडे पानी से नहाने से स्किन का तापमान कम होता है. इससे खुजली और जलन में राहत मिलती है. साथ ही स्किन पर जमा पसीना और गंदगी साफ होकर पोर्स खुलने में मदद मिलती है. 

3. कैलामाइन लोशन और एलोवेरा जेल का करें इस्तेमाल – कैलामाइन लोशन स्किन को ठंडक पहुंचा कर खुजली कम करने में मदद करता है. वहीं एलोवेरा जेल में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो लालिमा और सूजन को शांत कर सकते हैं. ताजा एलोवेरा जेल प्रभावित हिस्से पर लगाकर कुछ देर बाद धो लें. 

4. ओटमील और बेकिंग सोडा भी हैं फायदेमंद – ओटमील में एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं, जो स्किन को आराम पहुंचाने में मदद कर सकते हैं. ओट्स को पीसकर पेस्ट बनाकर लगाया जा सकता है. इसके अलावा पानी में बेकिंग सोडा मिलाकर तैयार पेस्ट भी खुजली और जलन कम करने में मदद कर सकता है. 

5. सूती कपड़े पहनें और शरीर को ठंडा रखें – घमौरियों से बचाव के लिए ढीले और सूती कपड़े पहनना सबसे अच्छा माना जाता है. सिंथेटिक कपड़े पसीना रोक सकते हैं और परेशानी बढ़ा सकते हैं. घर के अंदर पंखे या एसी का इस्तेमाल करें और शरीर को ज्यादा गर्म होने से बचाएं. 

इन बातों का भी रखें खास ध्यान

1. ज्यादा पानी और लिक्विड ड्रिंक्स पीकर शरीर को हाइड्रेट रखें.

2. नारियल पानी, नींबू पानी, सत्तू और लस्सी का सेवन करें.

3. बच्चों के डायपर समय-समय पर बदलते रहें.

4. हैवी मॉइस्चराइजर और ऐसे प्रोडक्ट्स से बचें जो पोर्स बंद कर सकते हैं.

5. अगर घमौरियां कई दिनों तक ठीक न हों, पस बनने लगे या बुखार के साथ दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें.

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अचानक एक कान से सुनाई देना पड़ गया बंद, तुरंत कराएं इलाज नहीं तो हो जाएगा परमानेंट बहरापन

अचानक एक कान से सुनाई देना पड़ गया बंद, तुरंत कराएं इलाज नहीं तो हो जाएगा परमानेंट बहरापन


Sudden hearing loss Causes : हम अक्सर कान में हल्का भारीपन या कम सुनाई देने जैसी समस्याओं को मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. कई लोग सोचते हैं कि कान में मैल जम गया होगा या सर्दी-जुकाम की वजह से ऐसा हो रहा होगा और कुछ दिनों में अपने आप ठीक हो जाएगा, लेकिन अगर अचानक एक कान से सुनाई देना कम हो जाए या पूरी तरह बंद हो जाए, तो इसे बिल्कुल भी हल्के में नहीं लेना चाहिए.

विशेषज्ञों के अनुसार, कई बार यह समस्या नॉर्मल कारणों से होती है, लेकिन कुछ मामलों में यह एसएसएचएल (Sudden Sensorineural Hearing Loss) का संकेत हो सकती है. यह एक मेडिकल इमरजेंसी मानी जाती है. अगर इसका इलाज समय रहते शुरू न किया जाए, तो सुनने की क्षमता हमेशा के लिए प्रभावित हो सकती है. लेकिन समय पर पहचान और सही इलाज से कई मरीजों की सुनने की क्षमता दोबारा वापस आ सकती है. इसलिए जरूरी है कि इसके कारणों, लक्षणों और इलाज के बारे में सही जानकारी हो. 

अचानक एक कान से कम सुनाई देने के क्या हो सकते हैं कारण?

1. कान में मैल जम जाना – कई बार कान में जरूरत से ज्यादा वैक्स जमा हो जाता है, जिससे आवाजा का रास्ता बंद हो जाता है और सुनने में परेशानी होने लगती है. इसके लक्षण कान में भारीपन महसूस होना, खुजली होना,आवाज का दबा-दबा सुनाई देना हो सकते हैं.ऐसी स्थिति में डॉक्टर ड्रॉप्स या सुरक्षित तरीके से मैल निकाल देते हैं और सुनने की क्षमता सामान्य हो सकती है. 

2. कान में संक्रमण या तरल पदार्थ जमा होना – सर्दी, फ्लू, एलर्जी या गले के संक्रमण के बाद कान के पर्दे के पीछे तरल पदार्थ जमा हो सकता है. इससे आवाज का कंपन ठीक तरह से अंदर नहीं पहुंच पाता है. इसके लक्षण कान में दर्द, बुखार, कान बंद होने जैसा एहसास, सुनाई कम देना है. वायरल संक्रमण अक्सर कुछ दिनों में ठीक हो जाते हैं, जबकि बैक्टीरियल संक्रमण में एंटीबायोटिक की जरूरत पड़ सकती है. 

3.  यूस्टेशियन ट्यूब में रुकावट – यह ट्यूब कान के अंदर और गले के बीच दबाव को संतुलित करने का काम करती है. एलर्जी, साइनस या जुकाम की वजह से इसमें सूजन आ सकती है. 

4. बैरोट्रॉमा यानी दबाव की वजह से चोट – हवाई यात्रा, पहाड़ों की यात्रा या स्कूबा डाइविंग के दौरान वातावरण का दबाव तेजी से बदलता है. इससे कान में पॉप जैसी आवाज आ सकती है और सुनाई देना प्रभावित हो सकता है. इस स्थिति में अक्सर बार-बार निगलना, जम्हाई लेना, च्युइंग गम चबाना मददगार हो सकता है, 

5. तेज आवाज का असर – लंबे समय तक तेज संगीत, मशीनों या पटाखों जैसी तेज आवाजों के संपर्क में रहने से कान के अंदर मौजूद सेंसिटिव सेल्स पर असर पड़ सकता है. 

6. एसएसएचएल  – यह सबसे खतरनाक स्थिति है, जिसमें कुछ घंटों या अधिकतम तीन दिनों के अंदर अचानक सुनने की क्षमता कम हो जाती है. कई बार मरीज सुबह उठता है और उसे एक कान से आवाज बहुत कम सुनाई देती है. इसके साथ कान में बजने की आवाज, चक्कर आना, संतुलन बिगड़ना, कान में पॉप या क्लिक महसूस होना, बिना दर्द के सुनाई देना कम हो जाना जैसे लक्षण भी हो सकते हैं. डॉक्टरों के अनुसार, यह मेडिकल इमरजेंसी है और इसका इलाज 72 घंटे के अंदर शुरू हो जाना चाहिए. 

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कैसे होता है इसका इलाज?

1. अगर कान में वैक्स जमा होने की वजह से सुनाई कम दे रहा है, तो डॉक्टर वैक्स को नरम करने वाली ड्रॉप्स देते हैं. इसके बाद सुरक्षित तरीके से सफाई या माइक्रोसक्शन तकनीक से मैल निकालकर सुनने की क्षमता होती है. 

2. कान में संक्रमण होने पर दर्द और बुखार कम करने की दवाएं दी जाती हैं. अगर संक्रमण बैक्टीरिया की वजह से हो या लंबे समय तक बना रहे, तो एंटीबायोटिक और डॉक्टर की निगरानी जरूरी होती है. 

3. सर्दी, एलर्जी या साइनस के कारण कान का दबाव बिगड़ने पर नाक के स्टेरॉयड स्प्रे और डिकंजेस्टेंट दवाएं दी जा सकती हैं. वाल्साल्वा तकनीक की मदद से कान के अंदर का दबाव संतुलित करने की कोशिश की जाती है. 

4, तेज आवाज के कारण सुनाई देने में दिक्कत होने पर कुछ दिनों तक शोर से दूर रहने और आराम की सलाह दी जाती है. नुकसान से बचने के लिए ईयरप्लग का इस्तेमाल और टिनिटस होने पर साउंड थेरेपी मददगार हो सकती है. 

5. एसएसएचएल में डॉक्टर तुरंत स्टेरॉयड थेरेपी शुरू कर सकते हैं. स्टेरॉयड गोलियों या कान के अंदर इंजेक्शन के रूप में दिए जाते हैं जिससे सुनने की क्षमता वापस आने की संभावना बढ़ सके. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल होने के बाद भी हार्ट अटैक का खतरा, जानिए LDL-C और ApoB का फर्क?

कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल होने के बाद भी हार्ट अटैक का खतरा, जानिए LDL-C और ApoB का फर्क?


अक्सर लोग सोचते हैं कि अगर LDL कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड्स और बाकी लिपिड प्रोफाइल की रिपोर्ट सामान्य है, तो उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ लोगों में रिपोर्ट सामान्य होने के बाद भी धमनियों में नुकसान पहुंचाने वाले कण ज्यादा हो सकते हैं. यही वजह है कि कुछ लोगों को बिना किसी चेतावनी के हार्ट अटैक आ जाता है.

LDL-C यानी लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन कोलेस्ट्रॉल यह बताता है कि खून में मौजूद LDL कणों के अंदर कुल कितना कोलेस्ट्रॉल है. वहीं ApoB टेस्ट यह बताता है कि खून में ऐसे हानिकारक कणों की कुल संख्या कितनी है, जो धमनियों में प्लाक जमा कर सकते हैं. इनमें LDL, VLDL और IDL जैसे कण शामिल होते हैं.

LDL-C यानी लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन कोलेस्ट्रॉल यह बताता है कि खून में मौजूद LDL कणों के अंदर कुल कितना कोलेस्ट्रॉल है. वहीं ApoB टेस्ट यह बताता है कि खून में ऐसे हानिकारक कणों की कुल संख्या कितनी है, जो धमनियों में प्लाक जमा कर सकते हैं. इनमें LDL, VLDL और IDL जैसे कण शामिल होते हैं.

Published at : 14 Jun 2026 07:47 AM (IST)

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IIT मद्रास ने जारी किया इंसानी ब्रेनस्टेम का 3D एटलस, मेडिकल साइंस के लिए कितना खास?

IIT मद्रास ने जारी किया इंसानी ब्रेनस्टेम का 3D एटलस, मेडिकल साइंस के लिए कितना खास?


3D Atlas Human Brainstem : IIT मद्रास ने इंसानी दिमाग के ब्रेनस्टेम का एक खास 3D एटलस तैयार किया है, जिसकी मदद से वैज्ञानिक दिमाग के सबसे मुश्किल हिस्से को पहले से ज्यादा आसानी और गहराई से समझ सकेंगे. इस खास एटलस की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें ब्रेनस्टेम को सेल स्तर तक देखा जा सकता है यानी वैज्ञानिक अब यह जान पाएंगे कि दिमाग के इस हिस्से में कौन-से सेल्स कहां मौजूद हैं और उनका आपस में क्या संबंध है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज फ्यूचर पार्किंसन, अल्जाइमर और अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के इलाज और रिसर्च में नई संभावनाएं खोल सकती है. ऐसे में आइए जानते हैं कि IIT मद्रास ने जारी किया इंसानी ब्रेनस्टेम का 3D एटलस कितना खास है. 

क्या है ब्रेनस्टेम और क्यों है इतना जरूरी?

ब्रेनस्टेम दिमाग का वह हिस्सा होता है, जो दिमाग को रीढ़ की हड्डी से जोड़ता है. यह शरीर के कई जरूरी कामों को कंट्रोल करता है, जिनमें सांस लेना, दिल की धड़कन को कंट्रोल करना, ब्लड प्रेशर बनाए रखना, निगलने की प्रक्रिया और नींद-जागने का सर्कल शामिल है. अगर ब्रेनस्टेम में किसी तरह की चोट या गड़बड़ी हो जाए, तो इसका असर शरीर की कई जरूरी एक्टिवीटी पर पड़ सकता है. यही वजह है कि वैज्ञानिक लंबे समय से इस हिस्से को गहराई से समझने की कोशिश कर रहे थे. 

क्या है ANCHOR 3D एटलस?

IIT मद्रास के सुधा गोपालकृष्णन ब्रेन सेंटर (SGBC) के तैयार किए गए इस एटलस का नाम ANCHOR रखा गया है. इसका पूरा नाम Atlas of Neurochemical Characterization of the Human Brainstem with 3D Reconstruction है. यह इंसानी ब्रेनस्टेम का एक डिजिटल 3D नक्शा है, जिसे मॉर्डन तकनीकों की मदद से तैयार किया गया है. इसकी मदद से वैज्ञानिक ब्रेनस्टेम के स्ट्रक्चर को अलग-अलग कोणों से देख सकते हैं और उसकी सूक्ष्म बनावट को समझ सकते हैं. 

किन तकनीकों का इस्तेमाल किया गया?

इस 3D एटलस को तैयार करने के लिए कई तकनीकों का यूज किया गया है. इसमें MRI स्कैनिंग, हिस्टोलॉजी, न्यूरोकेमिकल मैपिंग और 3D रिकंस्ट्रक्शन तकनीक को एक साथ जोड़ा गया. इन सभी तकनीकों की मदद से वैज्ञानिकों ने इंसानी ब्रेनस्टेम का बेहद बड़ा और सटीक एटलस तैयार किया. इस एटलस की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सेल्स स्तर की जानकारी उपलब्ध कराता है. शोधकर्ताओं ने सैकड़ों सीरियल सेक्शनों का विश्लेषण करके ब्रेनस्टेम की 200 से ज्यादा संरचनाओं यानी न्यूक्लियाई और फाइबर ट्रैक्ट्स को 3D रूप में तैयार किया है. साथ ही 500 से ज्यादा सेक्शनों पर आठ अलग-अलग इम्यूनोस्टेन तकनीकों का इस्तेमाल किया गया, जिससे अलग-अलग प्रकार की न्यूरोकेमिकल सेल्स की पहचान की जा सकी. इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि दिमाग की कौन-सी कोशिकाएं कौन-सा काम करती हैं और बीमारियों के दौरान उनमें क्या बदलाव आते हैं. 

कौन-कौन सा डेट शामिल किया गया है?

ANCHOR एटलस में इंसानी जीवन के अलग-अलग चरणों को शामिल किया गया है. इसमें प्रेगनेंसी के दौरान विकसित हो रहा दिमाग,बचपन का ब्रेनस्टेम और एडल्ट्स अवस्था का ब्रेनस्टेम शामिल है. इससे वैज्ञानिक यह समझ पाएंगे कि उम्र बढ़ने के साथ दिमाग के इस हिस्से में किस तरह के बदलाव आते हैं. 

दुनियाभर के वैज्ञानिकों के लिए खुला होगा एटलस

IIT मद्रास ने इस 3D एटलस को केवल अपने संस्थान तक सीमित नहीं रखा है. इसे एक विशेष ऑनलाइन पोर्टल के जरिए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया गया है, जिससे दुनियाभर के वैज्ञानिक, डॉक्टर और शोधकर्ता इसका यूज कर सकें.इससे न्यूरोसाइंस के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. 

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BRICS Neuroscience Symposium में हुआ लॉन्च

इस एटलस का अनावरण IIT मद्रास में आयोजित तीसरे BRICS Neuroscience Symposium 2026 के दौरान किया गया. इस मौके पर भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार अजय कुमार सूद ने कहा कि यह एटलस ब्रेनस्टेम से जुड़ी चोटों और बीमारियों से प्रभावित सेल्स की पहचान करने में मदद कर सकता है. फ्यूचर में इसका इस्तेमाल क्लीनिकल रिसर्च और मरीजों के बेहतर इलाज में भी किया जा सकता है.

न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के इलाज में खुल सकते हैं नए रास्ते

विशेषज्ञों का मानना है कि यह एटलस न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में गेमचेंजर साबित हो सकता है. इसकी मदद से वैज्ञानिक पार्किंसन, अल्जाइमर, ब्रेनस्टेम डिजीज और अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे. इसके अलावा, यह नई दवाओं के विकास और ज्यादा सटीक ट्रीटमेंट तैयार करने में भी जरूरी रोल निभा सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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