घर में रोज इस्तेमाल होने वाली ये 6 चीजें बन जाती हैं जहर, समय पर नहीं बदली तो पहुंचा सकती है नुकसान

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घर के फ्रिज में रखी प्लास्टिक की आइस क्यूब ट्रे को हर 2 साल में बदल देना चाहिए. फ्रीजर में रहने के बावजूद इनमें समय के साथ गंदगी बदबू और बैक्टीरिया जमा हो सकते हैं. इनमें छोटे-छोटे क्रैक हो जाते हैं, जहां जर्म्स छिप जाते हैं. अगर बर्फ का स्वाद अजीब लगे या ट्रे का रंग बदल जाए तो इसे बदलने का समय आ गया है.



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दिल्ली में कैंसर का कहर, हर तीसरी मौत 44 साल से कम उम्र के शख्स की, 20 साल में इतने लाख लोग मरे

दिल्ली में कैंसर का कहर, हर तीसरी मौत 44 साल से कम उम्र के शख्स की, 20 साल में इतने लाख लोग मरे


Delhi Government Cancer Data: दिल्ली सरकार के ताजा आंकड़े राजधानी में कैंसर की एक गंभीर और चिंताजनक तस्वीर सामने रखते हैं. पिछले 20 वर्षों में कैंसर से जान गंवाने वालों में हर तीन में से एक व्यक्ति 44 वर्ष से कम उम्र का रहा है. यानी यह बीमारी अब केवल बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि युवाओं और कामकाजी उम्र के लोगों को भी तेजी से प्रभावित कर रही है. बीते दो दशकों में दिल्ली में कुल करीब 1.1 लाख लोगों की मौत कैंसर से हुई, जिनमें से लगभग 93 हजार मौतें अस्पतालों में दर्ज की गईं.

कैंसर से मरने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी

आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2005 में कैंसर से मरने वालों की संख्या जहां 2,000 से ज्यादा थी, वहीं 2024 तक यह बढ़कर करीब 7,400 पहुंच गई. हालांकि यह बढ़ोतरी हर साल समान नहीं रही. उदाहरण के तौर पर, 2011 में कैंसर से मौतों का आंकड़ा लगभग 10,000 तक पहुंच गया था, जो इस बीमारी के बढ़ते खतरे को साफ दिखाता है. आयु वर्ग के लिहाज से देखें तो 45 से 64 वर्ष की उम्र के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित रहे, जिनकी हिस्सेदारी 41 प्रतिशत से अधिक रही. इसके अलावा, 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की हिस्सेदारी करीब 8 प्रतिशत और 15 से 24 वर्ष के युवाओं की 5.8 प्रतिशत रही. इन 20 वर्षों में दिल्ली के अस्पतालों में 7,298 बच्चों और 5,415 युवाओं (24 वर्ष से कम) की कैंसर से मौत दर्ज की गई.

दिल्ली में कैसर से होने वाली मौतें बढ़ीं

दिल्ली में कैंसर से होने वाली मौतें हर साल औसतन 7 प्रतिशत की दर से बढ़ीं, जो राजधानी की जनसंख्या वृद्धि दर से तीन गुना से भी ज्यादा है. कुल मौतों में से 90 प्रतिशत से अधिक अस्पतालों में हुईं और 2018 में यह आंकड़ा लगभग 98 प्रतिशत तक पहुंच गया. एक्सपर्ट का मानना है कि यह बेहतर रिपोर्टिंग और इलाज के लिए अस्पतालों पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाता है. वास्तविक संख्या के लिहाज से, 2005 से 2024 के बीच अस्पतालों में 45 से 64 वर्ष आयु वर्ग के 38,481 लोगों की मौत हुई, जबकि 65 वर्ष से अधिक उम्र के 23,141 और 25 से 44 वर्ष के 18,220 लोगों ने कैंसर के कारण जान गंवाई.

महिलाओं और पुरुषों की संख्या में अंतर

जेंडर के आधार पर आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों में कैंसर से मौतें ज्यादा दर्ज की गईं. इस अवधि में पुरुषों की करीब 55,300 और महिलाओं की 37,600 से अधिक संस्थागत मौतें हुईं. हालांकि उम्र का पैटर्न दोनों में लगभग समान रहा. पुरुषों में जहां 45 से 64 वर्ष आयु वर्ग में करीब 40 प्रतिशत मौतें हुईं, वहीं महिलाओं में यह अनुपात 43 प्रतिशत से ज्यादा रहा. डॉक्टरों के मुताबिक, 25 से 44 वर्ष की उम्र में महिलाओं की संख्या पुरुषों से थोड़ी अधिक रही, जिसका संबंध ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर जैसे रोगों से जोड़ा जा रहा है.

किस कैंसर से कितनी मौतें हुईं?

महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर  से 411 मौतें और ओवेरियन कैंसर से 194 मौतें दर्ज की गईं. वहीं,  पुरुषों में रेस्पिरेटरी कैंसर  से 553 मौतें और प्रोस्टेट कैंसर से 117 मौतें दर्ज की गईं. तंबाकू से जुड़े कैंसर भी बड़ी वजह बने रहे, ओरल कैंसर से पुरुषों में 607 और महिलाओं में 214 मौतें हुईं. इसके अलावा, डाइजेशन सिस्टम से जुड़े कैंसर जैसे पेट, कोलन और पैंक्रियाज कैंसर ने भी बड़ी संख्या में लोगों की जान ली.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

दिल्ली एम्स में  रेडिएशन ऑन्कोलॉजी डिपार्टमेंट के एमडी डॉ. अभिषेक शंकर के मुताबिक, वायु प्रदूषण फेफड़े और ब्रेस्ट कैंसर के मामलों में वास्तविक बढ़ोतरी का बड़ा कारण बन रहा है. इसके अलाला इलाज की असमान उपलब्धता भी मृत्यु दर को ऊंचा बनाए हुए है, जिसमें प्राइवेट अस्पताल महंगे हैं और सरकारी अस्पतालों पर अत्यधिक दबाव है. एक्सपर्ट बताते हैं कि युवाओं में कैंसर न सिर्फ बढ़ रहा है, बल्कि इस उम्र में यह बीमारी ज्यादा खतरनाक होती है. ऐसे में समय पर जांच और सही इलाज न मिले तो जान जाने का खतरा बढ़ जाता है.

इसे भी पढ़ें: कितनी खतरनाक है सेंट्रल रेटिनल वेन ऑक्लूज़न बीमारी, जिससे छिन सकती है इमरान खान की आंखों की रोशनी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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शरीर में 45 दिनों तक साइलेंटली रह सकता है निपाह वायरस, जानें कब हो जाता है खतरनाक?

शरीर में 45 दिनों तक साइलेंटली रह सकता है निपाह वायरस, जानें कब हो जाता है खतरनाक?


Nipah Virus Bat Transmission: पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस के मामले के सामने आने के बाद एक बार फिर पूरी दुनिया की चिंता बढ़ गई है. वजह साफ है कि यह वायरस जानवरों से इंसानों में फैलता है और अगर इंसान से इंसान में फैलने लगे, तो हालात बहुत तेजी से बिगड़ सकते हैं. आमतौर पर इसका सोर्स फल खाने वाले चमगादड़ होते हैं, कभी-कभी कच्चे खजूर के रस  या चमगादड़ों द्वारा दूषित फलों के ज़रिए यह वायरस शरीर में पहुंच जाता है. सबसे डरावनी बात इसकी मृत्यु दर है, जो करीब 40 से 75 प्रतिशत तक बताई जाती है. यही कारण है कि किसी भी देश में निपाह का एक भी केस मिलते ही स्वास्थ्य एजेंसियां हाई अलर्ट पर चली जाती हैं.

निपाह वायरस इतना खतरनाक क्यों है?

निपाह को खतरनाक बनाने वाली सबसे बड़ी वजह यह है कि अब तक इसका कोई पक्का इलाज या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है. इलाज सिर्फ लक्षणों के आधार पर किया जाता है और कई मामलों में मरीज को आईसीयू में रखना पड़ता है. डॉ अशुतोष कुमार गर्ग ने TOI को बताया कि जो लोग इससे बच जाते हैं, उनमें भी लंबे समय तक न्यूरोलॉजिकल यानी दिमाग से जुड़ी समस्याएं रह सकती हैं.

शरीर में कैसे बढ़ता है निपाह?

निपाह वायरस तुरंत असर नहीं दिखाता.डॉ. भरत कुमार सुरिसेट्टी बताते हैं कि इसका इन्क्यूबेशन पीरियड आमतौर पर 4 से 14 दिन का होता है, लेकिन कुछ मामलों में यह 45 दिन तक छुपा रह सकता है. इस दौरान व्यक्ति खुद को बिल्कुल ठीक महसूस करता है, लेकिन अंदर ही अंदर वायरस सक्रिय होता रहता है.

बीमारी के दो चरण

एक्सपर्ट के अनुसार, निपाह संक्रमण अक्सर दो स्टेज में सामने आता है, जिसमें

पहला चरण – फ्लू जैसा दौर

इस स्टेज में तेज बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, गले में खराश, उल्टी और मितली जैसी शिकायतें होती हैं. कई बार इसे लोग सामान्य फ्लू या कोविड समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.

दूसरा चरण – सबसे खतरनाक

यहां से बीमारी जानलेवा रूप ले सकती है. निपाह वायरस दिमाग पर हमला करता है और एन्सेफलाइटिस पैदा कर सकता है. इस दौरान चक्कर आना, अत्यधिक नींद आना, भ्रम की स्थिति, होश कम होना, सांस लेने में दिक्कत, दौरे पड़ना और यहां तक कि 24 से 48 घंटे में कोमा तक की नौबत आ सकती है.

कैसे फैलता है निपाह वायरस?

संक्रमित चमगादड़ों या सूअरों के सीधे संपर्क से

चमगादड़ों द्वारा दूषित फल या कच्चा खजूर रस पीने से

संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थों के संपर्क में आने से (मानव से मानव)

किन देशों में मिल चुके हैं केस?

दुनिया के कई हिस्सों में निपाह वायरस के मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें बांग्लादेश, मलेशिया, सिंगापुर और फिलीपींस शामिल हैं. भारत में रिपोर्ट के अनुसार इससे पश्चिम बंगाल में दो लोगों की मौत हो चुकी है, जिसके बाद दुनिया के कई देशों में अलर्ट जारी कर दिया गया है. आपको बता दें कि जैसे ही इसका कोई मामला सामने आता है, टेस्टिंग, आइसोलेशन और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग तेज कर दी जाती है ताकि इंफेक्शन को फैलने से रोका जा सके. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कितनी खतरनाक है सेंट्रल रेटिनल वेन ऑक्लूज़न बीमारी, जो छीन सकती है इमरान खान की आंखों की रोशनी

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सीटी स्कैन और एक्सरे में क्या होता है अंतर, किस बीमारी में कौन-सा कराना जरूरी?

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Difference Between CT Scan And X Ray: आधुनिक चिकित्सा में मेडिकल इमेजिंग की भूमिका बेहद अहम हो चुकी है. इसकी मदद से डॉक्टर शरीर के अंदरूनी हिस्सों को साफ तौर पर देख पाते हैं और सही बीमारी की पहचान कर पाते हैं. एक्स-रे और सीटी स्कैन ऐसी दो प्रमुख जांच तकनीकें हैं, जिन्होंने डायग्नोसिस की दुनिया में बड़ा बदलाव किया है. हालांकि दोनों ही जांचों में रेडिएशन का इस्तेमाल होता है, लेकिन इनके उपयोग, फायदे और सीमाएं अलग-अलग हैं. चलिए आपको बताते हैं कि दोनों में क्या अंतर है. 

एक्स-रे: सबसे पुरानी और भरोसेमंद जांच

एक्स-रे एक तरह की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें होती हैं, जो शरीर के सॉफ्ट टिश्यू से होकर निकल जाती हैं, लेकिन हड्डियों जैसी सख्त स्ट्रक्चर द्वारा रोक ली जाती हैं. इसी वजह से एक्स-रे में हड्डियां साफ दिखाई देती हैं. यह जांच कम समय में हो जाती है, खर्च भी कम होता है और लगभग हर अस्पताल में उपलब्ध होती है. एक्स-रे का इस्तेमाल हड्डियों के फ्रैक्चर, दांतों की समस्याओं, फेफड़ों और हार्ट से जुड़ी बीमारियों की जांच में किया जाता है. इसके अलावा महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर की शुरुआती जांच के लिए मैमोग्राफी भी एक्स-रे तकनीक पर आधारित होती है.

एक्स-रे का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह जल्दी हो जाता है और रेडिएशन की मात्रा भी अपेक्षाकृत कम होती है. हालांकि इसकी सीमा यह है कि सॉफ्ट टिश्यू जैसे मांसपेशियां, नसें या अंग इसमें स्पष्ट नहीं दिखते. बार-बार एक्स-रे कराना, खासकर बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए जोखिम भरा हो सकता है.

सीटी स्कैन: ज्यादा जानकारी देने वाली जांच

सीटी स्कैन को एक्स-रे का एडवांस रूप माना जाता है. इसमें घूमने वाली एक्स-रे मशीन शरीर के अलग-अलग एंगल से तस्वीरें लेती है, जिन्हें कंप्यूटर जोड़कर थ्री-डायमेंशनल इमेज बना देता है. इससे शरीर के अंदरूनी अंगों की बेहद स्पष्ट तस्वीर मिलती है. 

सीटी स्कैन का इस्तेमाल गंभीर चोट, एक्सीडेंट, ट्यूमर, कैंसर, ब्रेन इंजरी, स्ट्रोक, किडनी स्टोन, अपेंडिसाइटिस और पेट से जुड़ी बीमारियों की जांच में किया जाता है. यह जांच डॉक्टरों को बीमारी की सटीक स्थिति समझने में मदद करती है. हालांकि सीटी स्कैन में रेडिएशन की मात्रा एक्स-रे से ज्यादा होती है और यह जांच महंगी भी होती है. कुछ मामलों में कॉन्ट्रास्ट डाई का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे एलर्जी की समस्या भी हो सकती है.

किस बीमारी में कौन-सी जांच जरूरी?

अगर हड्डी टूटने, दांत या फेफड़ों की सामान्य समस्या हो, तो एक्स-रे पर्याप्त होता है. लेकिन जब बीमारी जटिल हो, अंदरूनी चोट, कैंसर या ब्रेन से जुड़ी समस्या हो, तब सीटी स्कैन जरूरी हो जाता है.

हालांकि, एक्स-रे और सीटी स्कैन दोनों ही अपनी जगह जरूरी जांचें हैं. मरीज की स्थिति, बीमारी की गंभीरता और जोखिम को देखते हुए डॉक्टर तय करते हैं कि कौन-सी जांच सबसे सही रहेगी.

इसे भी पढ़ें- Zakir Khan Health: किन लोगों को होती है जाकिर खान वाली बीमारी, कैसे दिखते हैं इसके लक्षण?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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देखने में हेल्दी हैं लेकिन बेबी नहीं कर पा रहीं कंसीव, डॉक्टर्स से समझें फर्टिलिटी बैरियर

देखने में हेल्दी हैं लेकिन बेबी नहीं कर पा रहीं कंसीव, डॉक्टर्स से समझें फर्टिलिटी बैरियर


आज बड़ी संख्या में ऐसी युवा महिलाएं हैं जो फिट हैं, एक्टिव हैं, सही खाना खाती हैं, योग-जिम करती हैं और बाहर से बिल्कुल हेल्दी नजर आती हैं. ऐसे में जब महीनों तक कोशिश करने के बाद भी प्रेगनेंसी नहीं ठहरती, तो सबसे पहला सवाल यही आता है, मैं तो बिल्कुल ठीक दिखती हूं, फिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है. यह सवाल सिर्फ उलझन का नहीं, बल्कि मानसिक तनाव, खुद पर शक और कई बार अपराधबोध तक ले जाता है.

कई महिलाएं सोचने लगती हैं कि शायद उनसे ही कोई गलती हो रही है, जबकि सच्चाई यह है कि फर्टिलिटी सिर्फ बाहर से दिखने वाली हेल्थ से तय नहीं होती है. आज के तेज, तनाव भरे और अनियमित जीवन में फर्टिलिटी से जुड़ी कई समस्याएं ऐसी होती हैं, जिनके कोई साफ लक्षण दिखाई नहीं देते. इसी वजह से महिलाएं समय पर जांच नहीं करा पातीं और इलाज में देरी हो जाती है. 

हेल्दी दिखना और फर्टाइल होना दोनों अलग कैसे हैं

डॉक्टर्स कहते हैं कि यह एक बहुत आम गलतफहमी है कि जो महिला बाहर से हेल्दी दिखती है, उसे गर्भधारण में कोई दिक्कत नहीं हो सकती, हकीकत यह है कि आज कई ऐसी महिलाएं, जो पूरी तरह सामान्य जीवन जी रही हैं, फिर भी कंसीव नहीं कर पा रही हैं और यह अब असामान्य नहीं रह गया है.  मेडिकल भाषा में, 35 साल से कम उम्र की महिला अगर 12 महीने तक बिना किसी सुरक्षा के संबंध बनाने के बाद भी प्रेग्नेंट नहीं होती और 35 साल से अधिक उम्र की महिला अगर 6 महीने में कंसीव नहीं कर पाती, तो इसे बांझपन (Infertility) माना जाता है.  दुनियाभर में लगभग हर 6 में से 1 दंपत्ति इस समस्या से जूझ रहा है.  समय पर जांच न कराने से न सिर्फ इलाज मुश्किल होता है, बल्कि मानसिक दबाव भी बढ़ता जाता है. 

प्रेगनेंसी एक नाजुक और जटिल प्रक्रिया 

अक्सर लोग सोचते हैं कि बस संबंध बनाने से प्रेग्नेंट हो जाती है, लेकिन असल में इसके पीछे शरीर के अंदर कई जरूरी प्रक्रियाएं सही तरह से काम करनी होती हैं. प्रेगनेंस के लिए जरूरी है कि हर महीने सही समय पर ओव्यूलेशन होना, फैलोपियन ट्यूब का खुला और हेल्दी होना, शुक्राणुओं की अच्छी क्वालिटी और संख्या, अंडाणु और शुक्राणु का सही तरह से निषेचित होना और निषेचित अंडाणु का गर्भाशय में जाकर सफलतापूर्वक चिपकना (इम्प्लांटेशन) इनमें से किसी भी स्टेज पर अगर छोटी-सी भी गड़बड़ी हो जाए, तो प्रेगनेंसी रुक सकती है और खास बात यह है कि अक्सर इसके कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते हैं.

कौन सी बीमारियां जो दिखती नहीं, लेकिन फर्टिलिटी को प्रभावित करती हैं
 
1. पीसीओएस (PCOS) – यह एक हार्मोनल समस्या है, जो प्रजनन आयु की 6 से 13 प्रतिशत महिलाओं को प्रभावित करती है. इसमें ओव्यूलेशन नियमित नहीं होता, जिससे कंसीव करने में दिक्कत आती है., कई महिलाओं को इसके लक्षण भी साफ महसूस नहीं होते है. 

2. एंडोमेट्रियोसिस – इस स्थिति में यूर्टस टिशू यूर्टस के बाहर बनने लगता है. यह अंडाशय और फैलोपियन ट्यूब के काम में रुकावट डाल सकता है. हैरानी की बात यह है कि कई बार इसमें तेज दर्द भी नहीं होता, इसलिए महिला को पता ही नहीं चलता है. 

3. फैलोपियन ट्यूब का ब्लॉक होना – पुराने संक्रमण, सर्जरी या गर्भाशय की बनावट से जुड़ी समस्याओं के कारण ट्यूब ब्लॉक हो सकती हैं. यह समस्या अक्सर बिना किसी लक्षण के होती है, लेकिन प्रेगनेंसी की संभावना को काफी कम कर देती है. 

जब सभी जांच सामान्य हों, फिर भी प्रेग्नेंसी न हो

कुछ मामलों में सभी टेस्ट नॉर्मल आने के बावजूद प्रेगनेंसी नहीं ठहरती है. इसे डॉक्टर अस्पष्ट बांझपन (Unexplained Infertility) कहते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि अब कोई रास्ता नहीं बचा, इसका मतलब सिर्फ इतना है कि ओव्यूलेशन के समय, अंडाणु और शुक्राणु की आपसी प्रक्रिया या इम्प्लांटेशन में कोई बहुत सूक्ष्म समस्या हो सकती है, जिसे आज के टेस्ट पकड़ नहीं पाते, ऐसे मामलों में पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट और सहायक प्रजनन तकनीकें मददगार साबित होती हैं. 

डॉक्टर से जल्दी मिलना क्यों जरूरी है?

डॉक्टर महिलाओं को सलाह देते हैं कि अगर आप 6 से 12 महीने तक कोशिश करने के बाद भी कंसीव नहीं कर पा रही हैं, तो इंतजार न करें. समय पर जांच कराने से समस्या की सही पहचान होती है, लाइफस्टाइल में जरूरी बदलाव किए जा सकते हैं, दवाओं या आईवीएफ जैसी तकनीकों से सही समय पर इलाज संभव होता है. आज जब कई महिलाएं करियर या निजी कारणों से मातृत्व को टाल रही हैं, तब जागरूकता और समय पर कदम उठाना बेहद जरूरी हो गया है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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