2030 तक देश में बढ़ेगा फेफड़ों के कैंसर का खतरा, जानें कैसे घर में घुस रही मुसीबत?

2030 तक देश में बढ़ेगा फेफड़ों के कैंसर का खतरा, जानें कैसे घर में घुस रही मुसीबत?


Why Non Smokers Get Lung Cancer: कैंसर का मामले लगातार पूरी दुनिया में बढ़ रहा है. हाल ही में  Indian Journal of Medical Research (IJMR) में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, भारत में 2030 तक लंग्स के कैंसर के मामलों में तेजी देखने को मिल सकती है. रिपोर्ट में बताया गया है कि देश का नॉर्थ-ईस्ट क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित होगा, जबकि महिलाओं में मामलों की रफ्तार सबसे तेज रहने की आशंका है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार, फेफड़ों का कैंसर एक गंभीर पब्लिक हेल्थ समस्या है. साल 2022 में दुनियाभर में करीब 2 करोड़ नए कैंसर मामले सामने आए और 97 लाख लोगों की मौत हुई. आंकड़े बताते हैं कि हर पांच में से एक व्यक्ति को जीवनकाल में कभी न कभी कैंसर हो सकता है.

कब होता है लंग्स कैंसर

लंग्स कैंसर तब होता है, जब लंग्स की सेल्स अनकंट्रोल तरीके से बढ़ने लगती हैं. ये खराब सेल्स आपस में मिलकर गांठ या ट्यूमर बना लेती हैं, जिससे लंग्स का सामान्य कामकाज प्रभावित होने लगता है और धीरे-धीरे शरीर के अन्य अंग भी असर में आ जाते हैं.

किस हिस्से में सबसे ज्यादा मामले देखने को मिलेंगे

ICMR की नई स्टडी के अनुसार, नॉर्थ-ईस्ट में लंग्स के कैंसर की दर सबसे ज्यादा रहने की संभावना है. खास बात यह है कि यहां महिलाओं में इसके मामले पुरुषों के लगभग बराबर पहुंच रहे हैं. स्टडी में देश के छह अलग-अलग क्षेत्रों की 57 आबादियों के आंकड़ों का ऑब्जर्व किया गया. इनमें आइजोल सबसे ऊपर रहा, जहां पुरुषों में प्रति लाख आबादी पर 35.9 और महिलाओं में 33.7 मामले दर्ज किए गए, साथ ही मृत्यु दर भी सबसे अधिक रही.

इस कारण से बढ़ रहे मामले

TOI की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस क्षेत्र में तंबाकू का अत्यधिक इस्तेमाल अब भी एक बड़ा कारण है. यहां पुरुषों में 68 प्रतिशत से ज्यादा और महिलाओं में करीब 54 प्रतिशत लोग तंबाकू का सेवन करते हैं. हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि अब बीमारी का स्वरूप बदल रहा है. AIIMS के पल्मोनोलॉजी विभाग के डॉक्टर सौरभ मित्तल के अनुसार, “हम बिना स्मोकिंग वाली महिलाओं में भी फेफड़ों के कैंसर के मामले देख रहे हैं, जो इनडोर एयर पॉल्यूशन, बायोमास ईंधन, सेकेंड-हैंड स्मोक और काम से जुड़े प्रदूषण से जुड़े हैं.”

पुरुषों में बढ़ रहे मामले 

स्टडी में यह भी सामने आया कि दक्षिण भारत के कन्नूर, कासरगोड और कोल्लम जैसे जिलों में पुरुषों में लंग्स के कैंसर की दर ज्यादा है, जबकि यहां तंबाकू और शराब का सेवन अपेक्षाकृत कम है. दक्षिण में महिलाओं के सबसे ज्यादा मामले हैदराबाद और बेंगलुरु में दर्ज किए गए. उत्तर भारत में श्रीनगर में पुरुषों में मामले ज्यादा रहे, जबकि श्रीनगर और पुलवामा में महिलाओं में भी कम नशे के बावजूद उच्च दर देखी गई. रिपोर्ट के अनुसार, कुछ इलाकों में महिलाओं में लंग्स के कैंसर के मामले हर साल करीब 6.7 प्रतिशत और पुरुषों में 4.3 प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं. तिरुवनंतपुरम में महिलाओं और डिंडीगुल में पुरुषों के मामलों में सबसे तेज उछाल दर्ज किया गया.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पेट का भारीपन या मामूली थकान? नजरअंदाज न करें, जानिए फैटी लिवर की शुरुआती चेतावनी

पेट का भारीपन या मामूली थकान? नजरअंदाज न करें, जानिए फैटी लिवर की शुरुआती चेतावनी


पेट खराब होना एक आम अनुभव है. खाना खाने के बाद सूजन, हल्का दर्द या मतली को लोग खाना, तनाव या एसिडिटी से जोड़ देते हैं. लेकिन कुछ लोगों में ये दिक्कतें पेट से नहीं, बल्कि लिवर से जुड़ी होती हैं. फैटी लिवर की शुरुआती अवस्था में तेज दर्द नहीं होता, बल्कि हल्के संकेत मिलते हैं.

थोड़ा-सा खाने के बाद भी पेट बहुत भरा-भरा लगना अक्सर धीमे पाचन या गैस का नाम दे दिया जाता है. फैटी लिवर में लिवर पर फैट जमने से वह थोड़ा बढ़ जाता है, जिससे आसपास के अंगों पर दबाव पड़ता है. यही दबाव खाने के बाद भारीपन पैदा करता है, जो बार-बार होने लगता है.

थोड़ा-सा खाने के बाद भी पेट बहुत भरा-भरा लगना अक्सर धीमे पाचन या गैस का नाम दे दिया जाता है. फैटी लिवर में लिवर पर फैट जमने से वह थोड़ा बढ़ जाता है, जिससे आसपास के अंगों पर दबाव पड़ता है. यही दबाव खाने के बाद भारीपन पैदा करता है, जो बार-बार होने लगता है.

Published at : 14 Jan 2026 03:10 PM (IST)

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केले के पत्ते पर खाना खाने से क्या होता है फायदा, किन बीमारियों से बचेंगे आप?

केले के पत्ते पर खाना खाने से क्या होता है फायदा, किन बीमारियों से बचेंगे आप?


केले के पत्ते में पाए जाने वाले पॉलीफेनॉल प्राकृतिक एंटीऑक्सिडेंट होते हैं, जो ग्रीन टी और कुछ फलों में भी मिलते हैं. जब गर्म खाना पत्ते पर परोसा जाता है, तो ये तत्व भोजन में घुल सकते हैं. इससे शरीर को फ्री रेडिकल्स से लड़ने में मदद मिलती है और कैंसर, दिल की बीमारी व डायबिटीज का खतरा कम हो सकता है.

केले के पत्तों में एंटीबैक्टीरियल गुण भी पाए जाते हैं. पत्ते की सतह पर मौजूद कुछ तत्व बैक्टीरिया के पनपने से रोकते हैं. इससे फूड पॉइजनिंग जैसी समस्याओं का खतरा कम होता है और खाना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है.

केले के पत्तों में एंटीबैक्टीरियल गुण भी पाए जाते हैं. पत्ते की सतह पर मौजूद कुछ तत्व बैक्टीरिया के पनपने से रोकते हैं. इससे फूड पॉइजनिंग जैसी समस्याओं का खतरा कम होता है और खाना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है.

Published at : 14 Jan 2026 02:08 PM (IST)

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डायबिटीज की दवाओं पर कौन-सा देश सबसे ज्यादा पैसा करता है खर्च, किस पायदान पर भारत?

डायबिटीज की दवाओं पर कौन-सा देश सबसे ज्यादा पैसा करता है खर्च, किस पायदान पर भारत?


Which Country Spends Most On Diabetes: डायबिटीज मेलिटस एक क्रॉनिक मेटाबॉलिक बीमारी है और दुनिया की सबसे आम नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज में शामिल है. औसतन हर 10 में से 1 एडल्ट इससे प्रभावित है. डायबिटीज से जूझ रहे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे न सिर्फ स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है, बल्कि देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी प्रभावित हो रही हैं. एक नई स्टडी में डायबिटीज को लेकर कौन से देश कितना खर्च करते हैं, इसका आंकड़ा बताया गया है. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं.

क्या निकला रिसर्च में?

इस रिसर्च को IIASA और वियना यूनिवर्सिटी ऑफ इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस के एक्सपर्ट्स की टीम ने मिलकर किया है. स्टडी में 2020 से 2050 के बीच 204 देशों में डायबिटीज के आर्थिक असर का आकलन किया गया. नतीजे चौंकाने वाले हैं.

अगर परिवार के सदस्यों द्वारा दी जाने वाली इनफॉर्मल देखभाल को अलग रखा जाए, तो डायबिटीज की वैश्विक लागत करीब 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर बैठती है, जो दुनिया की सालाना GDP का लगभग 0.2 प्रतिशत है. लेकिन जब इनफॉर्मल देखभाल को भी शामिल किया गया, तो यह लागत बढ़कर करीब 152 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाती है, यानी दुनिया की GDP का लगभग 1.7 प्रतिशत. डायबिटीज जैसी बीमारियों के मामले में यह आंकड़ा बेहद अहम माना जा रहा है.

कौन से देश में कितना होता है खर्च?

रिपोर्ट के मुताबिक, कुल आर्थिक बोझ का 85 प्रतिशत से 90 प्रतिशत हिस्सा इनफॉर्मल देखभाल से जुड़ा है. इसकी वजह यह है कि डायबिटीज में मरीजों की संख्या, मौतों की संख्या से 30 से 50 गुना ज्यादा होती है. भले ही डायबिटीज कम आय वाले देशों में ज्यादा फैली हो, लेकिन सबसे ज्यादा आर्थिक खर्च अमेरिका उठाता है. इसके बाद भारत और चीन का नंबर आता है. अनुमान है कि भारत पर इसका कुल असर करीब 11.4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का है. अगर अमेरिका की बात करें, तो वहां डायबिटीज से जुड़ा खर्च 16.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है, जबकि चीन पर यह बोझ करीब 11 ट्रिलियन डॉलर आंका गया है.

अमीर देशों पर ज्यादा बोझ

रिसर्च में यह भी सामने आया कि हाई-इनकम और लो-इनकम देशों के बीच एक बड़ा फर्क इलाज की लागत और काम करने की क्षमता में कमी से जुड़े नुकसान के बंटवारे में है. अमीर देशों में इलाज की लागत कुल आर्थिक बोझ का करीब 41 प्रतिशत है, जबकि गरीब देशों में यह सिर्फ 14 प्रतिशत तक सीमित है. स्टडी के को-राइटर और IIASA में इकोनॉमिक फ्रंटियर्स रिसर्च ग्रुप के कार्यवाहक प्रमुख माइकल कुहन का कहना है कि यह स्थिति साफ तौर पर दिखाती है कि डायबिटीज जैसी क्रॉनिक बीमारियों के लिए बेहतर और आधुनिक इलाज की सुविधा मुख्य रूप से हाई-इनकम देशों तक ही सीमित है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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डेंगू होने पर सेहत के लिए पपीते के पत्ते कितने फायदेमंद? डॉक्टरों ने बताई सच्चाई

डेंगू होने पर सेहत के लिए पपीते के पत्ते कितने फायदेमंद? डॉक्टरों ने बताई सच्चाई


कई लोग सोचते हैं कि डेंगू साधारण बुखार है और घर पर ही ठीक हो जाएगा. लेकिन सच्चाई यह है कि डेंगू शुरुआत में हल्का लग सकता है. लेकिन यह अचानक गंभीर रूप ले सकता है. प्लेटलेट्स तेजी से गिर सकते हैं. शरीर में पानी की कमी और अंदरूनी ब्लीडिंग का खतरा हो सकता है. इसलिए डेंगू में डॉक्टर की निगरानी बहुत जरूरी होती है. पपीते के पत्तों में कुछ पोषक तत्व पाए जाते हैं जैसे एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन C, फ्लेवोनोइड और पैपेन जैसे एंजाइम. कुछ पुराने अध्ययनों और अनुभवों के आधार पर यह माना जाने लगा कि इससे प्लेटलेट्स बढ़ सकते हैं. इसी वजह से लोग इसे प्राकृतिक इलाज समझने लगे. लेकिन लोकप्रिय होना और वैज्ञानिक रूप से सही होना दोनों अलग बातें हैं.

पपीते के पत्तों में कुछ पोषक तत्व पाए जाते हैं जैसे एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन C, फ्लेवोनोइड और पैपेन जैसे एंजाइम. कुछ पुराने अध्ययनों और अनुभवों के आधार पर यह माना जाने लगा कि इससे प्लेटलेट्स बढ़ सकते हैं. इसी वजह से लोग इसे प्राकृतिक इलाज समझने लगे. लेकिन लोकप्रिय होना और वैज्ञानिक रूप से सही होना दोनों अलग बातें हैं.

पपीते के पत्तों में कुछ पोषक तत्व पाए जाते हैं जैसे एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन C, फ्लेवोनोइड और पैपेन जैसे एंजाइम. कुछ पुराने अध्ययनों और अनुभवों के आधार पर यह माना जाने लगा कि इससे प्लेटलेट्स बढ़ सकते हैं. इसी वजह से लोग इसे प्राकृतिक इलाज समझने लगे. लेकिन लोकप्रिय होना और वैज्ञानिक रूप से सही होना दोनों अलग बातें हैं.

Published at : 14 Jan 2026 10:18 AM (IST)

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