BCG, खसरा और MR वैक्सीन के दाम बढ़े, अब बच्चों का टीकाकरण होगा महंगा

BCG, खसरा और MR वैक्सीन के दाम बढ़े, अब बच्चों का टीकाकरण होगा महंगा


Vaccines Price Hike: सरकार ने बच्चों को लगाई जाने वाली कुछ जरूरी वैक्सीन की कीमतों में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है. राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने अपनी 147वीं बैठक में इन वैक्सीनों की कीमतों में संशोधन का फैसला किया. इनमें बीसीजी (BCG), खसरा (Measles) और एमआर (Measles- Rubella) वैक्सीन शामिल हैं. ये तीनों टीके बच्चों को गंभीर और जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम का जरूरी हिस्सा माने जाते हैं.

ऐसे में इनके दाम बढ़ने से पेरेंट्स की चिंता बढ़ गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि पेरेंट्स को कीमतों में बदलाव से घबराने की जरूरत नहीं है. ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर यह फैसला क्यों लिया गया और इसका लोगों पर क्या असर पड़ सकता है. 

किन वैक्सीन की कीमतों में हुई बढ़ोतरी?

राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने बीसीजी, खसरा और एमआर वैक्सीन की सीलिंग प्राइस में संशोधन को मंजूरी दी है. बीसीजी वैक्सीन बच्चों को टीबी जैसी गंभीर बीमारी से बचाने के लिए जन्म के बाद लगाई जाती है. वहीं खसरा और एमआर वैक्सीन बच्चों को खसरा और रूबेला संक्रमण से सुरक्षा देती हैं, जो कई बार गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकते हैं. 

बच्चों के लिए क्यों जरूरी हैं ये टीके?

1.BCG वैक्सीन – यह टीका न्यू बोर्न बेबी को टीबी के गंभीर रूपों से बचाने में मदद करता है. जन्म के तुरंत बाद या शुरुआती दिनों में इसे लगाया जाता है. 

2. खसरा (Measles) वैक्सीन – खसरा एक बेहद संक्रामक बीमारी है, जिससे तेज बुखार, दाने, निमोनिया और कई बार मेंटल हेल्थ संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं. ऐसे में समय पर टीकाकरण बच्चों को इससे सुरक्षित रखता है. 

3. MR (Measles- Rubella) वैक्सीन –  यह वैक्सीन खसरे के साथ- साथ रूबेला से भी सुरक्षा देती है. प्रेगनेंट महिलाओं में रूबेला संक्रमण होने पर जन्म लेने वाले बच्चे में गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए इसका टीकाकरण बेहद जरूरी माना जाता है. 

कीमतें क्यों बढ़ाई गईं?

एनपीपीए के मुताबिक, इन वैक्सीन का प्रोडक्शन करने वाली कंपनियों की संख्या सीमित है और लागत बढ़ने की वजह से इनके निर्माण और सप्लाई को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो रहा था. ऐसे में अगर कीमतों में संशोधन नहीं किया जाता, तो आगे इनकी उपलब्धता प्रभावित हो सकती थी. अथॉरिटी का कहना है कि कीमत बढ़ाने का उद्देश्य कंपनियों को फायदा पहुंचाना नहीं, बल्कि यह तय करना है कि देश में जरूरी वैक्सीन की सप्लाई बाधित न हो और बच्चों का टीकाकरण प्रभावित न पड़े. 

कैंसर की दो अहम दवाएं भी हुईं महंगी

बच्चों की वैक्सीन के अलावा एनपीपीए ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दो जरूरी कीमोथेरेपी दवाओं कार्बोप्लैटिन (Carboplatin) और सिस्प्लैटिन (Cisplatin) की सीलिंग प्राइस में भी 50 फीसदी तक बढ़ोतरी की मंजूरी दी है, अथॉरिटी के अनुसार, कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी और सप्लाई प्रभावित होने की आशंका को देखते हुए यह फैसला लिया गया है. कैंसर की दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल यानी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) की कीमतों में लगातार उतार- चढ़ाव और बढ़ोतरी देखी जा रही थी. 

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एंटी- टिटनेस इंजेक्शन भी हुआ महंगा

एंटी- टिटनेस इम्युनोग्लोबुलिन इंजेक्शन की कीमतों में भी 50 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है. 250 IU और 500 IU क्षमता वाले इन इंजेक्शनों को बनाने वाली कंपनियां काफी समय से कह रही थीं कि बढ़ती लागत की वजह से इनका उत्पादन करना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ रही बच्चे की लंबाई, जानें क्या करें?

उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ रही बच्चे की लंबाई, जानें क्या करें?


Child Height Growth Tips : हर पेरेंट्स यही चाहते हैं कि उनका बच्चा हेल्दी रहे और उसकी फिजिकल ग्रोथ के साथ ही लंबाई भी उम्र के अनुसार हो. ऐसे में जब आसपास के दूसरे बच्चों की तुलना में अपने बच्चे की लंबाई कम दिखाई देती है, तो पेरेंट्स परेशान हो जाते हैं. कई बार लोग यह सोचने लगते हैं कि कहीं बच्चे को कोई गंभीर बीमारी तो नहीं है या फिर उसके खान-पान में कोई बड़ी कमी तो नहीं रह गई.

दरअसल, हर बच्चे की बढ़ने की स्पीड अलग होती है. कुछ बच्चों की लंबाई तेजी से बढ़ती है, जबकि कुछ बच्चों की ग्रोथ धीरे-धीरे होती है. ऐसे में अगर आपको लगता है कि आपके बच्चे की लंबाई उसकी उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ रही है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि  जानते हैं कि उम्र के हिसाब से बच्चे की लंबाई नहीं बढ़ रही है तो क्या करें. 

बच्चे की लंबाई कम बढ़ने के कारण

1. जेनेटिक कारण – अगर पेरेंट्स या परिवार के ज्यादातर सदस्यों की लंबाई नॉर्मल से कम है, तो बच्चे की लंबाई भी उसी के अनुसार हो सकती है. यह पूरी तरह से नेचुरल प्रोसेस है और इसमें घबराने की जरूरत नहीं होती है,

2. गैर-जेनेटिक कारण – अगर परिवार में सभी की लंबाई सामान्य है, लेकिन बच्चे की ग्रोथ उसी तरीके से नहीं हो रही है, तो इसके पीछे दूसरे कारण हो सकते हैं, जैसे पोषण की कमी, बार-बार बीमार पड़ना, शरीर में किसी पोषक तत्व की कमी, हार्मोन संबंधी समस्याएं, पाचन तंत्र की दिक्कतें, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, पूरी नींद न लेना.

बार-बार बीमार पड़ना भी बन सकता है वजह
 
कई बच्चों को सर्दी-जुकाम, बुखार या संक्रमण जल्दी-जल्दी हो जाता है. ऐसे बच्चों का शरीर बीमारी से लड़ने में ज्यादा एनर्जी खर्च करता है, जिससे उनकी नॉर्मल ग्रोथ पर असर पड़ सकता है. अगर आपका बच्चा लगातार बीमार रहता है और उसकी लंबाई भी नहीं बढ़ रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. 

विशेषज्ञों के अनुसार ये कारण भी हैं ग्रोथ न होने की वजह 

विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे की लंबाई केवल जन्म के बाद मिलने वाले पोषण पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि प्रेगनेंसी के दौरान मां का स्वास्थ्य भी इसमें जरूरी भूमिका निभाता है. इन कारणों से भी बच्चे की ग्रोथ प्रभावित हो सकती है. प्रेगनेंसी में मां को पूरा पोषण न मिलना. जन्म के बाद बच्चे की सही देखभाल न होना. बच्चे का खेल-कूद में हिस्सा न लेना. लंबे समय तक मोबाइल, टीवी या वीडियो गेम में बिजी रहना. इसके अलावा बैठने, चलने और सोने का गलत तरीका, साथ ही धूप और फिजिकल एक्टिविटी की कमी भी शामिल है. 

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उम्र के हिसाब से बच्चे की लंबाई नहीं बढ़ रही है तो क्या करें

1. बैलेंस और हेल्दी डाइट लें – बच्चों की ग्रोथ के लिए सही डाइट सबसे जरूरी है. उनकी डाइट में दूध और दूध से बने प्रोडक्ट, दालें और राजमा, हरी पत्तेदार सब्जियां, मौसमी फल, अंडे और मछली, सूखे मेवे, साबुत अनाज शामिल करें. 

2. बाहर खेलना जरूरी है –  आजकल बच्चे ज्यादातर समय मोबाइल और वीडियो गेम में बिताने लगे हैं. लेकिन दौड़ना, कूदना, साइकिल चलाना और मैदान में खेलना उनकी हड्डियों और मांसपेशियों के ग्रोथ के लिए जरूरी है. रोजाना कम से कम एक घंटे की फिजिकल एक्टिविटी बच्चों के लिए फायदेमंद मानी जाती है. 

3. पूरी नींद – नींद के दौरान शरीर में ग्रोथ हार्मोन सक्रिय रूप से काम करते हैं. इसलिए बच्चों की उम्र के अनुसार पूरी नींद बेहद जरूरी है. 

 4. पाचन का ध्यान रखें – अगर बच्चे को कब्ज रहती है, पेट साफ नहीं होता या उसे पाचन संबंधी समस्याएं रहती हैं, तो शरीर को खाने से पूरा पोषण नहीं मिल पाता है, कुछ मामलों में लीवर या आंतों की समस्या भी बच्चों की ग्रोथ को प्रभावित कर सकती है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मिर्गी का दौरा पड़ने पर मोजे क्यों सुंघाते हैं, क्या इससे सच में ठीक हो जाता है मरीज?

मिर्गी का दौरा पड़ने पर मोजे क्यों सुंघाते हैं, क्या इससे सच में ठीक हो जाता है मरीज?


Epilepsy Attack Treatment Myth : अक्सर कई बार जब भी किसी को मिर्गी का दौरा पड़ता है तो लोग तुरंत जूता, चप्पल या मोजा सुंघाने लगते हैं. कुछ लोग मुंह में चम्मच डाल देते हैं, तो कुछ पानी पिलाने की कोशिश करते हैं. पुराने समय से चली आ रहे ये तरीके आज भी अपनाएं जाते हैं. लोग इन्हें इलाज का हिस्सा समझ लेते हैं. लेकिन ज्यादातर लोग इसे लेकर सवाल करते हैं कि क्या सच में मोजा या जूता सुंघाने से मिर्गी का दौरा रुक जाता है या फिर यह सिर्फ एक मिथक है. 

डॉक्टरों के मुताबिक, मिर्गी (Epilepsy) दिमाग से जुड़ी एक न्यूरोलॉजिकल समस्या है, जिसमें दिमाग की एक्टिविटी अचानक असामान्य हो जाती है. ऐसे में मरीज को झटके आ सकते हैं, वह बेहोश हो सकता है या कुछ सेकंड के लिए एकटक देखने लग सकता है. लेकिन सही इलाज से ज्यादातर मरीज ठीक हो सकते हैं ऐसे में आइए आज जानते हैं कि मिर्गी का दौरा पड़ने पर मोजे क्यों सुंघाते हैं और क्या इससे सच में मरीज ठीक हो जाता है. 

मिर्गी का दौरा पड़ने पर मोजे क्यों सुंघाते है?

पुराने समय से लोगों के बीच यह तरीका चलता आ रहा है कि मिर्गी का दौरा पड़ने पर मरीज को जूता, चप्पल या मोजा सुंघाने से उसे होश आ जाता है, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार, यह सिर्फ एक मिथक है और इसका इलाज से कोई वैज्ञानिक संबंध नहीं है. मिर्गी का दौरा ज्यादातर मामलों में कुछ सेकंड से लेकर 1-2 मिनट के अंदर अपने आप खत्म हो जाता है. ऐसे में अगर इसी दौरान किसी ने मरीज को जूता या मोजा सुंघा दिया और थोड़ी देर बाद मरीज सामान्य हो गया, तो लोग यह मान लेते हैं कि वह इसी वजह से ठीक हुआ है. जबकि मरीज दौरे का नेचुरल टाइम पूरा होने के कारण सामान्य होता है. 
 
क्या इससे सच में मरीज ठीक हो जाता है?

मिर्गी के दौरे में जूता, चप्पल या मोजा सुंघाने से मरीज ठीक नहीं होता है. मिर्गी (एपिलेप्सी) दिमाग से जुड़ी एक बीमारी है, जिसमें न्यूरॉन्स एक साथ जरूरत से ज्यादा इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजने लगती हैं. इससे दिमाग का सामान्य कामकाज कुछ समय के लिए रूक जाता है और व्यक्ति को दौरा पड़ सकता है.  मिर्गी का दौरा आमतौर पर कुछ सेकंड से लेकर 1-2 मिनट में अपने आप ठीक हो जाता है. दौरे के दौरान मरीज के हाथ-पैरों में तेज झटके आ सकते हैं, वह बेहोश होकर गिर सकता है, शरीर अकड़ सकता है या कुछ सेकंड तक बिना किसी प्रतिक्रिया के एक ही दिशा में देखता रह सकता है. यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है और इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. जैसे सिर पर गंभीर चोट लगना, तेज बुखार, स्ट्रोक, दिमाग में संक्रमण, ऑक्सीजन की कमी, ब्लड शुगर का बहुत कम या ज्यादा होना, ब्रेन ट्यूमर या कुछ मामलों में जेनेटिक कारण

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मिर्गी का दौरा पड़ने पर कौन-कौन से लक्षण दिखाई देते हैं?

हर मरीज में लक्षण अलग हो सकते हैं. आमतौर पर इनमें अचानक बेहोश हो जाना, हाथ-पैरों में तेज झटके आना, शरीर में अकड़न महसूस होना, मुंह से झाग निकलना, जबड़ा जकड़ जाना, कुछ सेकंड तक एकटक देखते रहना, चक्कर खाकर गिर जाना और दौरे के बाद भ्रम या थकान महसूस होना शामिल हैं. 

मिर्गी का दौरा पड़ने पर क्या करना चाहिए?

1. मरीज को करवट के बल लिटाएं – मरीज को सुरक्षित जगह पर एक करवट से लिटा दें. इससे मुंह में जमा लार या झाग आसानी से बाहर निकल सकेगा और सांस लेने में परेशानी नहीं होगी. 

2. आसपास की खतरनाक चीजें हटा दें – मरीज के आसपास रखी कुर्सी, मेज, नुकीली या धारदार चीजें दूर कर दें, जिससे उसे चोट न लगे. 

3. कपड़ों को ढीला करें – अगर शर्ट के ऊपरी बटन बंद हैं या कपड़े बहुत टाइट हैं, तो उन्हें थोड़ा ढीला कर दें. 

4. दौरे का समय नोट करें – ध्यान रखें कि दौरा कितनी देर तक चला. अगर दौरा 5 मिनट से ज्यादा समय तक जारी रहे, तो तुरंत अस्पताल ले जाएं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आंखों के नीचे सूजन और डार्क सर्कल बढ़ गए हैं? जानें इसकी वजह और बचाव

आंखों के नीचे सूजन और डार्क सर्कल बढ़ गए हैं? जानें इसकी वजह और बचाव


Eye Care Tips: गर्मियों का मौसम आते ही लोग स्किन पर टैनिंग, पिंपल्स, पसीना और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याओं की शिकायत करने लगते हैं, साथ ही तेज गर्मी का असर आपकी आंखों के आसपास की स्किन पर भी पड़ता है. कई लोगों की आंखों के नीचे सूजन आने लगती है, डार्क सर्कल गहरे दिखाई देने लगते हैं और चेहरा हमेशा थका-थका नजर आने लगता है. अक्सर लोग इसे सिर्फ नींद की कमी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि गर्मियों में बढ़ी हुई गर्मी, डिहाइड्रेशन, तेज धूप और लाइफस्टाइल की कुछ गलत आदतें भी इसके पीछे बड़ी वजह हो सकती हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार, अगर समय रहते सही कदम उठाए जाएं तो आंखों के नीचे की सूजन और डार्क सर्कल की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है. तो आइए जानते हैं कि गर्मियों में ऐसा क्यों होता है और इससे बचने के लिए आपको क्या करना चाहिए. 

गर्मियों में आंखों के नीचे सूजन क्यों आ जाती है?

आंखों के आसपास की स्किन बहुत पतली होती है. गर्म मौसम में शरीर ज्यादा पसीना छोड़ता है, जिससे डिहाइड्रेशन होने लगता है. इसके अलावा तेज धूप, प्रदूषण, ज्यादा नमक वाला खाना, पूरी नींद न लेना और लंबे समय तक मोबाइल या लैपटॉप स्क्रीन के सामने बैठे रहना भी आंखों के नीचे सूजन की वजह बन सकता है. डॉक्टरों के मुताबिक, इस स्थिति को पेरिऑर्बिटल पफीनेस (Periorbital Puffiness) कहा जाता है. इसमें आंखों के आसपास के ढीले टिशूज में पानी जमा होने लगता है, जिससे सूजन दिखाई देने लगती है. 

गर्मियों में डार्क सर्कल क्यों बढ़ जाते हैं?

डार्क सर्कल कई कारणों से हो सकते हैं. कुछ लोगों में यह स्किन के नीचे मौजूद ब्लड वेसल्स के ज्यादा दिखाई देने की वजह से होते हैं, जबकि कुछ में थकान, नींद की कमी और डिहाइड्रेशन इसकी वजह बनते हैं. कई बार धूप के ज्यादा संपर्क में रहने से आंखों के नीचे पिगमेंटेशन बढ़ जाता है, जिससे काले घेरे और ज्यादा गहरे दिखाई देने लगते हैं. शरीर में पानी की कमी होने पर आंखों के नीचे की स्किन बेजान और धंसी हुई भी नजर आ सकती है. 

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इससे बचने के लिए आपको क्या करना चाहिए

1. ठंडी सिकाई से मिलेगी राहत – अगर आंखों के नीचे सूजन है, तो ठंडी सिकाई काफी फायदेमंद हो सकती है. आप खीरे के ठंडे स्लाइस, फ्रिज में रखे हुए जेल आई मास्क, ठंडे चम्मच या ठंडी की हुई टी बैग्स को 10 से 15 मिनट तक बंद आंखों पर रख सकते हैं. इससे ब्लड वेसल्स सिकुड़ती हैं और सूजन कम होने में मदद मिलती है. 

2.टी बैग्स का इस्तेमाल भी कर सकते हैं – ग्रीन टी और ब्लैक टी बैग्स में कैफीन और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो आंखों के आसपास की सूजन को कुछ समय के लिए कम करने में मदद कर सकते हैं. हालांकि टी बैग्स को अच्छी तरह ठंडा करने के बाद ही इस्तेमाल करें. गर्म टी बैग्स आंखों की नाजुक स्किन को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

3. शरीर को हाइड्रेट रखें – गर्मियों में ज्यादा पसीना निकलने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है. इसका असर सबसे पहले चेहरे और आंखों के आसपास दिख सकता है. दिनभर पूरी मात्रा में पानी पिएं और खीरा, तरबूज, संतरा जैसे पानी से भरपूर फलों को अपनी डाइट में शामिल करें. इससे स्किन की नमी बनी रहती है और आंखों के नीचे की थकान कम नजर आती है. 

4. नमक का सेवन कम करें – बहुत ज्यादा नमक खाने से शरीर में पानी रुकने लगता है, जिससे आंखों की सूजन बढ़ सकती है. प्रोसेस्ड फूड, पैकेट वाले स्नैक्स और ज्यादा नमकीन चीजों का सेवन कम करें. इससे शरीर में फ्लूइड रिटेंशन कम होगा और आंखों की सूजन में राहत मिल सकती है. 

5. भरपूर नींद लेना जरूरी है – अगर आप रोजाना पूरी नींद नहीं लेते, तो डार्क सर्कल और पफीनेस दोनों ज्यादा नजर आने लगते हैं. रोजाना 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद लेने की कोशिश करें. इससे स्किन और ब्लड वेसल्स को रिकवर होने का समय मिलता है और चेहरा ज्यादा फ्रेश दिखाई देता है. 

6. धूप से आंखों की सुरक्षा करें – तेज धूप आंखों के नीचे पिगमेंटेशन बढ़ा सकती है और  स्किन की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को तेज कर सकती है. घर से बाहर निकलते समय UV प्रोटेक्शन वाले सनग्लासेस पहनें और चेहरे के लिए परफेक्ट सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें. इससे आंखों के आसपास की नाजुक स्किन सुरक्षित रहती है. 

कब डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है?

ज्यादातर मामलों में आंखों के नीचे हल्की सूजन और डार्क सर्कल अस्थायी होते हैं और सही देखभाल से ठीक हो जाते हैं, लेकिन अगर सूजन लगातार बनी रहे, आंखों में लालिमा, खुजली, दर्द हो या एक आंख में अचानक ज्यादा सूजन आ जाए, तो इसे नजरअंदाज न करें. ऐसे लक्षण एलर्जी, संक्रमण, थायराइड की समस्या या किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. 

यह भी पढ़ें – एक कटोरी भीगे चने खाने से कितना प्रोटीन मिलता है, जिम वालों के लिए कितनी बेस्ट ये डाइट?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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एक कटोरी भीगे चने खाने से कितना प्रोटीन मिलता है, जिम वालों के लिए कितनी बेस्ट ये डाइट?

एक कटोरी भीगे चने खाने से कितना प्रोटीन मिलता है, जिम वालों के लिए कितनी बेस्ट ये डाइट?


आमतौर पर जिन लोगों को अपनी स्ट्रेंथ बढ़ानी होती है या जो लोग जिम जा रहे होते हैं, वे अधिकतर महंगे-महंगे प्रोटीन शेक, कैप्सूल और पाउडर के भरोसे रहते हैं. मन में यही लगा रहता है कि जितना महंगा सप्लीमेंट, उतना जल्दी रिजल्ट. ऐसे में कई लोगों को यह पता नहीं होता कि प्रोटीन के लिए जिस चीज पर वे इतने पैसे खर्च कर रहे हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा वे सिर्फ एक छोटी सी आदत अपनाकर भी हासिल कर सकते हैं.

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि ऐसे लोगों को हर रोज एक कटोरा चना खाना चाहिए. यह कोई पुरानी दादी-नानी की बात नहीं है या फिर यूं ही नहीं कही जाती, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी मौजूद हैं. अगर आप भी अपनी ताकत बढ़ाना चाहते हैं या मसल्स बनाना चाहते हैं तो यह जानकारी आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है.  आइए आपको बताते हैं कि चने से कितना प्रोटीन मिलता है और इसे खाने के क्या-क्या फायदे हैं.

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एक कटोरी चने में कितना प्रोटीन होता है

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि चना प्रोटीन का सबसे बेहतरीन स्रोत माना जाता है. साथ ही इसमें मौजूद प्रोटीन आसानी से पच भी जाता है. वहीं जो लोग वजन बढ़ाना चाहते हैं, वे चने को गुड़ के साथ भी खा सकते हैं. बता दें कि 100 ग्राम भीगे हुए चने में करीब 15 से 17 ग्राम प्रोटीन होता है. अगर आप एक अच्छी कटोरी भरकर चने खाते हैं यानी करीब 150 से 200 ग्राम तो आपको एक बार में ही 20 से 25 ग्राम तक प्रोटीन मिल जाता है.यह उतना ही प्रोटीन है जितना कई महंगे प्रोटीन शेक में होता है. कई लोग वेट गेन करने, मसल्स को बेहतर बनाने और अपनी शारीरिक ताकत बढ़ाने के लिए चना, गुड़ और दूध का सेवन करते हैं. इसका एक कारण यह भी है कि इनमें कैल्शियम अच्छी मात्रा में मौजूद होता है. लेकिन चने की खासियत सिर्फ प्रोटीन की मात्रा नहीं है, एक्सपर्ट्स कहते हैं कि चने का प्रोटीन आसानी से पच जाता है यानी शरीर इसे जल्दी और अच्छे से सोख लेता है. यही वजह है कि जिम जाने वालों के लिए यह सबसे बेस्ट और सस्ती डाइट मानी जाती है. 

इसके अलावा चने का एक और फायदा यह बताया जाता है कि यह शरीर में जमा अतिरिक्त पानी को कम करने में मदद कर सकता है, जिससे शरीर टाइट और फिट दिखता है. कैल्शियम के साथ-साथ चने में आयरन भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है. वहीं जब चने को गुड़ के साथ खाया जाता है तो चने में मौजूद आयरन की  absorption और भी ज्यादा बढ़ जाती है, जिससे शरीर को इसका बेहतर लाभ मिलता है. 

सिर्फ जिम वाले नहीं, हर किसी के लिए फायदेमंद है चना

चने के फायदे सिर्फ जिम जाने वालों तक सीमित नहीं हैं. जिन लोगों को अस्थमा की परेशानी है उनके लिए भी भीगे चने बहुत फायदेमंद होते हैं क्योंकि यह फेफड़ों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं. कैल्शियम और आयरन दोनों एक साथ मिलने की वजह से यह खून की कमी यानी एनीमिया में भी काम आता है. 

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प्रीमैच्योर बेबी में अंधेपन का खतरा रोक सकती है शुरुआती आई स्क्रीनिंग, जानिए कैसे?

प्रीमैच्योर बेबी में अंधेपन का खतरा रोक सकती है शुरुआती आई स्क्रीनिंग, जानिए कैसे?


रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी एक ऐसी आंखों की बीमारी है, जो मुख्य रूप से प्रीमैच्योर बेबी में होती है. इसमें आंख के पीछे मौजूद रेटिना की रेड ब्लड सेल्स असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं. रेटिना वह हिस्सा होता है, जो रोशनी को पहचान कर दिमाग तक संदेश पहुंचाता है. अगर यह बीमारी गंभीर रूप ले ले, तो रेटिना अपनी जगह से अलग हो सकती है और बच्चे की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती है. हालांकि शुरुआती चरण में इसका इलाज संभव है.

भारत में हर साल बड़ी संख्या में प्रीमैच्योर बच्चों का जन्म होता है. पहले जहां ऐसे बच्चों के बचने की संभावना कम होती थी, वहीं अब बेहतर देखभाल के कारण उनकी जान बचाई जा रही है, लेकिन सभी अस्पतालों में आंखों की जांच की सुविधा और निगरानी की व्यवस्था समान रूप से उपलब्ध नहीं है. यही वजह है कि विशेषज्ञ भारत में ROP को तीसरी महामारी के रूप में देख रहे हैं. यहां केवल बहुत कम वजन वाले ही नहीं, बल्कि 34 हफ्ते तक जन्मे या 2 किलो तक वजन वाले बच्चों में भी यह बीमारी देखने को मिल रही है.

भारत में हर साल बड़ी संख्या में प्रीमैच्योर बच्चों का जन्म होता है. पहले जहां ऐसे बच्चों के बचने की संभावना कम होती थी, वहीं अब बेहतर देखभाल के कारण उनकी जान बचाई जा रही है, लेकिन सभी अस्पतालों में आंखों की जांच की सुविधा और निगरानी की व्यवस्था समान रूप से उपलब्ध नहीं है. यही वजह है कि विशेषज्ञ भारत में ROP को तीसरी महामारी के रूप में देख रहे हैं. यहां केवल बहुत कम वजन वाले ही नहीं, बल्कि 34 हफ्ते तक जन्मे या 2 किलो तक वजन वाले बच्चों में भी यह बीमारी देखने को मिल रही है.

Published at : 12 Jun 2026 05:45 PM (IST)

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