लू लगने से पहले ये संकेत देता है हमारा शरीर, भूलकर भी न करें नजरअंदाज

लू लगने से पहले ये संकेत देता है हमारा शरीर, भूलकर भी न करें नजरअंदाज


Early Signs Of Heat Stroke In Summer: गर्मी बढ़ते ही शरीर कई बार ऐसे संकेत देने लगता है, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन यही छोटे-छोटे संकेत आगे चलकर लू जैसी गंभीर स्थिति में बदल सकते हैं. लू तब लगती है जब शरीर का तापमान अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता. ऐसी स्थिति में समय रहते सावधानी बेहद जरूरी हो जाती है. 

लू लगने से पहले शरीर में क्या होते हैं बदलाव?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार, लू लगने से पहले शरीर कई तरह के बदलाव दिखाता है. शुरुआत में हल्का चक्कर आना, कमजोरी महसूस होना और सिर भारी लगना जैसे संकेत सामने आते हैं. कई बार व्यक्ति को उल्टी जैसा महसूस होता है या पेट भी खराब हो सकता है. यह वह समय होता है जब शरीर पहले ही चेतावनी दे रहा होता है कि अब ज्यादा देर तक गर्मी सहन करना मुश्किल हो रहा है. 

धीरे-धीरे गंभीर होती है स्थिति

धीरे-धीरे ये लक्षण और गंभीर हो सकते हैं. शरीर का तापमान बढ़ने लगता है, दिल की धड़कन तेज हो जाती है और सांस भी सामान्य से तेज चलने लगती है. कुछ लोगों को पसीना आना बंद हो जाता है, जबकि कुछ मामलों में अत्यधिक पसीना भी देखा जाता है. त्वचा लाल या असामान्य रूप से सूखी लग सकती है. सबसे खतरनाक संकेत तब होते हैं जब इसका असर दिमाग पर पड़ने लगता है. व्यक्ति को भ्रम होने लगता है, बात करने में परेशानी होती है या वह सामान्य तरीके से सोच नहीं पाता. कुछ मामलों में बेहोशी भी आ सकती है. यही वह स्थिति है, जब लू जानलेवा बन सकती है और तुरंत इलाज की जरूरत होती है.

लू लगने के क्या होते हैं कारण?

अब बात करते हैं इसके कारण की, तो  लू लगने के पीछे कई कारण होते हैं. तेज धूप में लंबे समय तक रहना, बंद और गर्म जगहों में रहना या बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत करना इसका मुख्य कारण बनता है. जब शरीर जरूरत से ज्यादा गर्म हो जाता है और पसीने के जरिए खुद को ठंडा नहीं कर पाता, तब यह समस्या पैदा होती है.

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किन लोगों को होती है सबसे ज्यादा दिक्कत?

कुछ लोग दूसरों की तुलना में ज्यादा जोखिम में होते हैं. छोटे बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और पहले से बीमार लोग जल्दी प्रभावित हो सकते हैं. इसके अलावा जो लोग खुले में काम करते हैं या गर्मी में ज्यादा मेहनत करते हैं, उन्हें भी ज्यादा सावधान रहने की जरूरत होती है.

इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए?

इससे बचने के लिए जरूरी है कि शरीर को समय-समय पर आराम दिया जाए. पर्याप्त पानी पीना, हल्के और ढीले कपड़े पहनना और तेज धूप से बचना बहुत जरूरी है. अगर किसी में शुरुआती लक्षण दिखें, तो तुरंत ठंडी जगह पर ले जाएं और शरीर को ठंडा करने की कोशिश करें. लू कोई मामूली समस्या नहीं है. अगर शरीर के संकेतों को समय रहते समझ लिया जाए, तो इससे बचा जा सकता है. लेकिन अगर इन्हें नजरअंदाज किया गया, तो यह स्थिति तेजी से गंभीर हो सकती है. इसलिए शरीर जो संकेत दे रहा है, उसे हल्के में लेना भारी पड़ सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दिल्ली में हीट स्ट्रोक मरीजों के लिए स्पेशल यूनिट, जानें कैसे मिलेगा इसका फायदा?

दिल्ली में हीट स्ट्रोक मरीजों के लिए स्पेशल यूनिट, जानें कैसे मिलेगा इसका फायदा?


उत्तर भारत में बढ़ती भीषण गर्मी और लू के खतरे के बीच दिल्ली के Dr. Ram Manohar Lohia Hospital ने गंभीर हीट स्ट्रोक मरीजों के इलाज के लिए विशेष यूनिट तैयार की है. यहां मरीजों का शरीर का तापमान तेजी से कम करने के लिए ‘कोल्ड वॉटर इमर्शन’ तकनीक अपनाई जा रही है. माना जा रहा है कि इस साल भीषण गर्मी पड़ सकती है. ऐसे में यह व्यवस्था गर्मी से जूझ रहे मरीजों के लिए राहत और जीवन बचाने की अहम कोशिश बन रही है.

गर्मी के बीच अस्पताल की तैयारी

भीषण गर्मी और लू के बढ़ते असर को देखते हुए अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में खास इंतजाम किए गए हैं. स्पेशल यूनिट में बर्फ से भरे टब, मॉनिटरिंग मशीनें और जरूरी मेडिकल उपकरण मौजूद हैं. 

कैसे काम करती है ‘कोल्ड वॉटर इमर्शन’ तकनीक?

हीट स्ट्रोक मरीजों के इलाज के लिए ‘कोल्ड वॉटर इमर्शन’ तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसमें टब में तेजी से पानी भरा जाता है और करीब 50 किलो बर्फ डाली जाती है. मरीज को ठंडे पानी में रखा जाता है, ताकि शरीर का तापमान जल्दी कम किया जा सके. डॉक्टरों के अनुसार, यह तकनीक गंभीर मरीजों के लिए बेहद असरदार मानी जाती है.

डेमो और इलाज की प्रक्रिया

इस तकनीक को समझाने के लिए वॉलंटियर के साथ डेमो भी किया गया है. डेमो में दिखाया गया है कि मरीज को किस तरह टब में रखा जाता है. मरीज की गर्दन का हिस्सा बाहर रहता है, जबकि शरीर का बाकी हिस्सा पानी के अंदर रखा जाता है. इलाज के दौरान लगातार मॉनिटरिंग की जाती है, ताकि मरीज की स्थिति पर नजर रखी जा सके.

क्या कहते हैं डॉक्टर?

Dr. Amlendu Yadav बताते हैं कि हीट स्ट्रोक में हर मिनट बेहद जरूरी होता है. मरीज का इलाज घर से शुरू किया जा सकता है, लेकिन शरीर का तापमान 104–105 डिग्री फॉरेनहाइट तक पहुंचने पर अस्पताल में इलाज जरूरी हो जाता है.  इस स्थिति में शरीर तापमान नियंत्रित करने की क्षमता खो देता है. मरीज को तेजी से हाइड्रेट किया जाता है और शरीर का तापमान कम करने की कोशिश की जाती है. इलाज में देरी होने पर मल्टी ऑर्गन फेलियर का खतरा बढ़ जाता है.

अस्पताल में कैसे किया जाता है इलाज?

इलाज के दौरान हार्ट रेट, ऑक्सीजन सैचुरेशन, कोर बॉडी टेम्परेचर और पानी के तापमान पर लगातार नजर रखी जाती है. पानी का तापमान 1 से 5 डिग्री के बीच रखा जाता है. डॉक्टरों के मुताबिक, मरीज के शरीर का तापमान 38 डिग्री तक लाना जरूरी होता है।. हर मरीज को लगभग 25 से 35 मिनट तक इस थैरेपी में रखा जाता है. डॉक्टरों के अनुसार, हीट स्ट्रोक बेहद खतरनाक स्थिति है. अगर समय पर इलाज न मिले तो मृत्यु दर 80 प्रतिशत तक पहुंच सकती है.

फील्ड और एम्बुलेंस में ऐसे किया जाता है शुरुआती इलाज

अस्पताल में इन्फ्लेटेबल टब की सुविधा भी मौजूद है, जिसमें जरूरत पड़ने पर मरीज का इलाज किया जा सकता है. इसके अलावा तिरपाल के जरिए ‘टाको तकनीक’ का इस्तेमाल भी किया जाता है. इसमें मरीज को 20–25 किलो बर्फ के साथ रखा जाता है. इस तकनीक का इस्तेमाल एम्बुलेंस और फील्ड में भी किया जा सकता है.

किन लोगों को ज्यादा खतरा?

डॉक्टरों के अनुसार, सिक्योरिटी गार्ड, कंस्ट्रक्शन वर्कर, प्रेग्नेंट महिलायें , पुलिसकर्मी और मीडियाकर्मी जैसे लोग ज्यादा समय तक धूप में रहते हैं. इस वजह से इन्हें हीट स्ट्रोक का खतरा ज्यादा होता है.

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रामपुर जिला अस्पताल में बढ़े आंखों के मरीज, जानें गर्मी के मौसम में क्यों होती है दिक्कत?

रामपुर जिला अस्पताल में बढ़े आंखों के मरीज, जानें गर्मी के मौसम में क्यों होती है दिक्कत?


भीषण गर्मी की वजह से आंखों से संबंधित बीमारियों के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. इस बीच रामपुर के जिला अस्पताल की ओपीडी में रोजाना 40-50 मरीज आंखों की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं. बढ़ते तापमान को देखते हुए हेल्थ डिपार्टमेंट अलर्ट मोड पर आ गया है और लोगों से सावधानी बरतने की अपील की जा रही है.

कैसे नजर आ रहे लक्षण?

मौसम में बढ़ती गर्मी का असर अब लोगों की आंखों पर साफ दिखाई देने लगा है. रामपुर जिला अस्पताल और ग्रामीण क्षेत्रों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर आंखों के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. मरीजों में आंखों से पानी आना, खुजली, सूजन, लालिमा और दर्द जैसी समस्याएं आम हो गई हैं.

डॉक्टर ने बताई वजह

डॉ. संजय कपूर का कहना है कि तेज धूप, धूल और गर्म हवाओं की वजह से आंखों में संक्रमण और एलर्जी के मामले बढ़ रहे हैं. अस्पताल प्रशासन ने इन मरीजों के इलाज के लिए विशेष इंतजाम किए हैं और दवाइयों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की गई है.

गलती से भी न बरतें लापरवाही

मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. दीपा सिंह ने बताया कि गर्मियों में आंखों की समस्याएं बढ़ना आम बात है, लेकिन लापरवाही खतरनाक हो सकती है. उन्होंने लोगों से अपील की है कि बिना डॉक्टर की सलाह के मेडिकल स्टोर से दवा न लें और किसी भी तरह की परेशानी होने पर तुरंत नजदीकी अस्पताल या सीएचसी/पीएचसी में जाकर जांच कराएं. उन्होंने बताया कि फिलहाल स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह सतर्क है, लेकिन बढ़ती गर्मी के बीच लोगों को भी अपनी सेहत को लेकर जागरूक रहने की जरूरत है, ताकि आंखों की इन समस्याओं से बचा जा सके.

गर्मियों में तेजी से होती हैं आंखों की ये बीमारियां

कंजंक्टिवाइटिस: यह गर्मियों में होने वाली सबसे कॉमन प्रॉब्लम है. यह बैक्टीरियल, वायरल या एलर्जी के कारण हो सकती है. पसीना, धूल और एक-दूसरे के संपर्क में आने से यह तेजी से फैलती है. इसमें आंखें लाल होना, सूजन आना, पानी गिरना, खुजली होना, दर्द, आंखों में पीला या सफेद कीचड़ आना जैसे लक्षण नजर आते हैं.

आंखों में एलर्जी: गर्मियों में लू, धूल के कण, प्रदूषण और परागकण आंखों में एलर्जी पैदा करते हैं. इसकी वजह से आंखों में तेज खुजली, लालिमा, जलन और बार-बार पानी आने की दिक्कत होती है.

ड्राई आई सिंड्रोम: चिलचिलाती धूप, लू और लंबे समय तक एसी बैठने के कारण आंखों की नमी कम हो जाती है और आंसू जल्दी सूख जाते हैं. इस दिक्कत में आंखों में सूखापन महसूस होने, जलन, आंखों में रेत या किरकिरी पड़ने और थकान जैसे लक्षण होते हैं. 

स्टाई या गुहेरी: गर्मियों में पसीने और गंदगी के कारण पलकों की ग्रंथियों में बैक्टीरिया का इंफेक्शन हो जाता है, जिससे पलक के किनारे पर छोटी फुंसी निकल आती है. पलक के किनारे पर लाल सूजन, दर्द, चुभन और छूने पर तकलीफ होना इसके लक्षण हैं.

यूवी किरणों से नुकसान: सूरज की अल्ट्रावायलेट (UV) किरणें सीधे आंखों पर पड़ने से कॉर्निया को नुकसान पहुंच सकता है. इसे ‘आंखों का सनबर्न’ भी कह सकते हैं. तेज रोशनी से परेशानी, आंखों में लालिमा, तेज दर्द और पानी आना इसके लक्षण हैं.

कॉर्नियल अल्सर: अगर एलर्जी या ड्राई आई के कारण आंखों को बहुत ज्यादा रगड़ा जाए या कॉन्टैक्ट लेंस साफ न रखे जाएं तो कॉर्निया पर घाव हो सकता है. यह गर्मियों में बैक्टीरिया पनपने के कारण बढ़ सकता है.

गर्मियों में आंखों को बचाने के तरीके

  • बाहर निकलते समय हमेशा अच्छी क्वालिटी के UV-प्रोटेक्टेड सनग्लासेस पहनें.
  • आंखों को दिन में 2-3 बार ठंडे और साफ पानी से धोएं.
  • गंदे हाथों से आंखों को छूने या रगड़ने से बचें.
  • अगर आप एसी में ज्यादा रहते हैं या कंप्यूटर पर काम करते हैं तो डॉक्टर की सलाह से लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल करें.
  • आई फ्लू या इंफेक्शन होने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं. खुद से कोई दवा न डालें.
  • पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, ताकि शरीर और आंखों में नमी बनी रहे.

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दिल्ली में हीट वेव का असर, डॉक्टरों ने बताए बचाव के उपाय, येलो अलर्ट के बीच अस्पताल भी तैयार

दिल्ली में हीट वेव का असर, डॉक्टरों ने बताए बचाव के उपाय, येलो अलर्ट के बीच अस्पताल भी तैयार


राजधानी दिल्ली इन दिनों भीषण गर्मी और लू की चपेट में है. हालात को देखते हुए मौसम विभाग ने यलो अलर्ट जारी कर लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है. लगातार बढ़ते तापमान ने आम जनजीवन को प्रभावित कर दिया है और स्वास्थ्य पर खतरा भी बढ़ा दिया है.

लू के बढ़ते असर ने बढ़ाई चिंता

पिछले कई दिनों से दिल्ली में हीट वेव का असर साफ देखा जा रहा है. तेज धूप और गर्म हवाओं के चलते बाहर निकलना मुश्किल हो गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस दौरान बिना जरूरी काम के बाहर निकलने से बचना चाहिए, क्योंकि लंबे समय तक धूप में रहने से हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है.

हीट स्ट्रोक बन सकता है जानलेवा

डॉक्टरों के अनुसार हीट स्ट्रोक एक बेहद गंभीर स्थिति है, जिसमें समय पर इलाज न मिले तो जान जाने का खतरा काफी ज्यादा रहता है. आंकड़ों के मुताबिक ऐसे मामलों में मृत्यु दर 60 से 80 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. इसी खतरे को देखते हुए अस्पतालों ने पहले से तैयारी शुरू कर दी है.

आरएमएल अस्पताल में विशेष वॉर्ड तैयार

दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में इस साल भी हीट स्ट्रोक के मरीजों के लिए अलग वार्ड शुरू किया गया है. इस वार्ड की जिम्मेदारी डॉ. अजय चौहान को दी गई है. यहां प्राथमिक इलाज के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं ताकि मरीजों को तुरंत राहत मिल सके.

बर्फ और पानी से किया जाता है शुरुआती इलाज

वार्ड में हीट स्ट्रोक के मरीजों के लिए दो बेड रिजर्व रखे गए हैं. साथ ही बड़े टब में ठंडे पानी और बर्फ का इंतजाम किया गया है. मरीज के आते ही उसे ठंडे पानी में डालकर शरीर का तापमान कम किया जाता है. इसके बाद उसे बेड पर रखकर आगे का इलाज शुरू किया जाता है. स्थिति स्थिर होने पर मरीज को इमरजेंसी वार्ड में शिफ्ट किया जाता है. फिलहाल इस साल अभी तक कोई मरीज यहां नहीं पहुंचा है.

डॉक्टरों का कहना है कि हीट स्ट्रोक का सबसे ज्यादा असर मजदूरों और बाहर काम करने वाले लोगों पर पड़ता है. ऐसे लोगों को खास सावधानी बरतने की जरूरत है. सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक बाहर निकलने से बचना चाहिए. अगर बाहर जाना जरूरी हो तो बीच-बीच में छांव में आराम करें और लगातार पानी पीते रहें.

बचाव ही सबसे कारगर उपाय

स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि शरीर को हाइड्रेट रखना बेहद जरूरी है. घर से बाहर निकलते समय पानी की बोतल साथ रखें. हल्के कपड़े पहनें और सिर को ढककर रखें. थोड़ी-थोड़ी देर में आराम करना भी जरूरी है ताकि शरीर का तापमान संतुलित बना रहे.

ये लक्षण दिखें तो हो जाएं अलर्ट

हीट स्ट्रोक के शुरुआती संकेतों में शरीर का अत्यधिक गर्म होना, उल्टी, दस्त और चक्कर आना शामिल हैं. ऐसे लक्षण दिखने पर मरीज को तुरंत ठंडा करने की कोशिश करनी चाहिए. गर्दन के नीचे पानी डालें और बिना देरी किए अस्पताल पहुंचाएं. समय पर इलाज मिलने से जान बचाई जा सकती है. डॉ. अजय चौहान के अनुसार साल 2024 में इस वार्ड में 75 मरीज भर्ती हुए थे, जिनमें से 27 की मौत हो गई थी. ये आंकड़े बताते हैं कि हीट स्ट्रोक को हल्के में लेना कितना खतरनाक साबित हो सकता है.

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बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम बना खतरे की घंटी, एम्स के डॉक्टरों ने दी सख्त चेतावनी

बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम बना खतरे की घंटी, एम्स के डॉक्टरों ने दी सख्त चेतावनी


राजधानी दिल्ली से सामने आई एक अहम चेतावनी ने पैरेंट्स की चिंता बढ़ा दी है. देश के शीर्ष चिकित्सा संस्थान एम्स के विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि बच्चों का ज्यादा स्क्रीन टाइम उनके विकास पर गंभीर असर डाल सकता है. अगर समय रहते सावधानी नहीं बरती गई तो इसके दूरगामी परिणाम सामने आ सकते हैं.

जन्म के शुरुआती महीनों में स्क्रीन से दूरी जरूरी

पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी डिवीजन के फैकल्टी इंचार्ज प्रोफेसर शैफाली गुलाटी का कहना है कि जन्म से लेकर 18 महीने तक के बच्चों को मोबाइल, टीवी या किसी भी तरह की स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए. इस उम्र में बच्चों का दिमाग तेजी से विकसित होता है और स्क्रीन उनके प्राकृतिक विकास में बाधा डाल सकती है.

भाषा और व्यवहार पर पड़ता है सीधा असर

एक्सपर्ट्स के अनुसार, ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों में भाषा सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. इसके साथ ही उनका सामाजिक व्यवहार भी कमजोर पड़ सकता है. कई बार ऐसे लक्षण सामने आते हैं जो ऑटिज्म जैसे दिखाई देते हैं, हालांकि इसे सीधे तौर पर ऑटिज्म का कारण नहीं माना गया है.

छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम सीमित करना जरूरी

डॉक्टरों ने सलाह दी है कि 18 महीने से 6 साल तक के बच्चों का स्क्रीन टाइम बेहद सीमित होना चाहिए. इस उम्र में बच्चों को खेलकूद, बातचीत और रचनात्मक गतिविधियों में ज्यादा शामिल करना जरूरी है ताकि उनका मानसिक और सामाजिक विकास बेहतर हो सके.

ऑटिज्म को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर जोर

अप्रैल महीने को दुनिया भर में ऑटिज्म अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाया जाता है. साल 2026 के लिए संयुक्त राष्ट्र ने “Autism & Humanity: Every Life has Value” थीम तय की है. इसी के तहत 30 अप्रैल को एम्स, नई दिल्ली में एक विशेष पब्लिक हेल्थ लेक्चर आयोजित किया जा रहा है, जिसमें ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से जुड़ी जटिलताओं पर विस्तार से चर्चा होगी.

कम उम्र में पहचान से बेहतर हो सकते हैं परिणाम

विशेषज्ञ बताते हैं कि ऑटिज्म के लक्षण 12 से 18 महीने की उम्र में ही पहचाने जा सकते हैं. ऐसे में शुरुआती पहचान और सही समय पर इलाज बेहद जरूरी है. आंकड़ों के मुताबिक, हर 31 में से एक व्यक्ति ऑटिज्म से प्रभावित पाया जा रहा है, जो इसे एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनाता है.

ऑटिज्म से जुड़े अन्य स्वास्थ्य जोखिम भी चिंता का कारण

एम्स के आंकड़ों के अनुसार, ऑटिज्म से पीड़ित करीब 80 प्रतिशत बच्चों में अन्य समस्याएं भी पाई जाती हैं. इनमें मिर्गी, ध्यान की कमी, व्यवहारिक समस्याएं और नींद से जुड़ी दिक्कतें शामिल हैं. इन समस्याओं के कारण बच्चों और उनके परिवार की जिंदगी की गुणवत्ता पर गहरा असर पड़ता है.

परिवार आधारित इलाज और सही जानकारी की अहमियत

डॉक्टरों का मानना है कि ऑटिज्म के इलाज में परिवार की भूमिका बेहद अहम होती है. सही जानकारी, समय पर हस्तक्षेप और व्यक्तिगत देखभाल से बच्चों के विकास में काफी सुधार किया जा सकता है. साथ ही बिना वैज्ञानिक आधार वाली वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों से बचने की भी सलाह दी गई है.

समावेशी समाज की दिशा में बढ़ते कदम

इस पहल का मकसद सिर्फ बीमारी का इलाज नहीं बल्कि समाज में जागरूकता बढ़ाना और ऑटिज्म से प्रभावित लोगों को सम्मानजनक जीवन देना है. एम्स की ओर से हेल्पलाइन, डिजिटल प्लेटफॉर्म और शैक्षणिक सामग्री के जरिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं ताकि हर बच्चे को बेहतर अवसर मिल सके और समाज में किसी के साथ भेदभाव न हो.

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रोज नहीं करते ब्रश तो आपके हार्ट पर लगातार बढ़ रहा खतरा, इस स्टडी में हुआ डराने वाला खुलासा

रोज नहीं करते ब्रश तो आपके हार्ट पर लगातार बढ़ रहा खतरा, इस स्टडी में हुआ डराने वाला खुलासा


How To Improve Heart Recovery After Heart Attack: ज्यादातर लोग मानते हैं कि ब्रश और फ्लॉस करना सिर्फ दांत साफ रखने और बदबू से बचने के लिए जरूरी है. लेकिन नई स्टडी बताती है कि मुंह की सेहत का दिल पर भी गहरा असर पड़ सकता है, खासकर हार्ट अटैक के बाद. चलिए आपको बताते हैं कि स्टडी में क्या निकला. 
 
हार्ट अटैक के बाद रिकवरी मुश्किल

जापान की टोक्यो मेडिकल एंड डेंटल यूनिवर्सिटी की एक स्टडी, जो इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ओरल साइंस में प्रकाशित हुई है, उसमें एक चौंकाने वाला संबंध सामने रखा है. इसमें बताया गया है कि मुंह में पाई जाने वाली एक आम बैक्टीरिया हार्ट के ठीक होने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है. यानी अगर मुंह की सेहत खराब है, तो हार्ट अटैक के बाद रिकवरी मुश्किल हो सकती है.

रिकवरी की कोशिश करता है हार्ट

हार्ट अटैक के बाद शरीर खुद को ठीक करने की कोशिश करता है. इसमें एक अहम प्रक्रिया होती है, जिसे ऑटोफैगी कहा जाता है. इसमें सेल्स अपने अंदर जमा खराब हिस्सों को साफ करके दोबारा इस्तेमाल करती हैं, जिससे दिल को ठीक होने में मदद मिलती है. रिसर्चर ने खास तौर पर पोर्फाइरोमोनस जिंजिवालिस नाम की बैक्टीरिया पर ध्यान दिया. यह बैक्टीरिया मुंह में पाया जाता है और मसूड़ों की बीमारी का कारण बनता है. अगर समय पर इलाज न हो, तो मसूड़े सूज जाते हैं, खून आने लगता है और दांत भी गिर सकते हैं. 

क्या है जिंजिपेन?

साइंटिस्ट को पहले से पता था कि यह बैक्टीरिया शरीर के दूसरे हिस्सों में भी पहुंच सकता है, लेकिन यह दिल को कैसे प्रभावित करता है, यह साफ नहीं था. इसे समझने के लिए उन्होंने जिंजिपेन नाम के एक पदार्थ का अध्ययन किया, जो यह बैक्टीरिया बनाता है.  जिंजिपेन एक तरह का प्रोटीन होता है, जो शरीर के टिश्यू को नुकसान पहुंचाने में मदद करता है और शरीर की इम्यून सिस्टम से बच निकलता है. रिसर्चर ने यह जानने की कोशिश की कि यह हार्ट के सेल्स पर क्या असर डालता है.

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क्या निकला नतीजा?

इसके लिए उन्होंने बैक्टीरिया का एक ऐसा रूप तैयार किया, जिसमें जिंजिपेन नहीं बनता था. फिर इसकी तुलना सामान्य बैक्टीरिया से की गई.  नतीजे साफ थे कि जिन सेल्स पर बिना जिंजिपेन वाला बैक्टीरिया असर कर रहा था, वे ज्यादा स्वस्थ रहीं. जबकि सामान्य बैक्टीरिया के संपर्क में आई सेल्स को ज्यादा नुकसान हुआ. चूहों पर किए गए प्रयोग में भी यही बात सामने आई। जिन चूहों में सामान्य बैक्टीरिया था, उनमें हार्ट अटैक के बाद दिल को ज्यादा नुकसान हुआ. रिसर्च में पाया गया कि जिंजिपेन ऑटोफैगी की प्रक्रिया को बाधित करता है. इससे सेल्स के अंदर खराब पदार्थ जमा होने लगते हैं, जो दिल की मरम्मत को धीमा कर देते हैं. यही वजह है कि दिल को ठीक होने में ज्यादा समय लगता है और नुकसान बढ़ जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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