सीटी स्कैन और एक्सरे में क्या होता है अंतर, किस बीमारी में कौन-सा कराना जरूरी?

सीटी स्कैन और एक्सरे में क्या होता है अंतर, किस बीमारी में कौन-सा कराना जरूरी?


Difference Between CT Scan And X Ray: आधुनिक चिकित्सा में मेडिकल इमेजिंग की भूमिका बेहद अहम हो चुकी है. इसकी मदद से डॉक्टर शरीर के अंदरूनी हिस्सों को साफ तौर पर देख पाते हैं और सही बीमारी की पहचान कर पाते हैं. एक्स-रे और सीटी स्कैन ऐसी दो प्रमुख जांच तकनीकें हैं, जिन्होंने डायग्नोसिस की दुनिया में बड़ा बदलाव किया है. हालांकि दोनों ही जांचों में रेडिएशन का इस्तेमाल होता है, लेकिन इनके उपयोग, फायदे और सीमाएं अलग-अलग हैं. चलिए आपको बताते हैं कि दोनों में क्या अंतर है. 

एक्स-रे: सबसे पुरानी और भरोसेमंद जांच

एक्स-रे एक तरह की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें होती हैं, जो शरीर के सॉफ्ट टिश्यू से होकर निकल जाती हैं, लेकिन हड्डियों जैसी सख्त स्ट्रक्चर द्वारा रोक ली जाती हैं. इसी वजह से एक्स-रे में हड्डियां साफ दिखाई देती हैं. यह जांच कम समय में हो जाती है, खर्च भी कम होता है और लगभग हर अस्पताल में उपलब्ध होती है. एक्स-रे का इस्तेमाल हड्डियों के फ्रैक्चर, दांतों की समस्याओं, फेफड़ों और हार्ट से जुड़ी बीमारियों की जांच में किया जाता है. इसके अलावा महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर की शुरुआती जांच के लिए मैमोग्राफी भी एक्स-रे तकनीक पर आधारित होती है.

एक्स-रे का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह जल्दी हो जाता है और रेडिएशन की मात्रा भी अपेक्षाकृत कम होती है. हालांकि इसकी सीमा यह है कि सॉफ्ट टिश्यू जैसे मांसपेशियां, नसें या अंग इसमें स्पष्ट नहीं दिखते. बार-बार एक्स-रे कराना, खासकर बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए जोखिम भरा हो सकता है.

सीटी स्कैन: ज्यादा जानकारी देने वाली जांच

सीटी स्कैन को एक्स-रे का एडवांस रूप माना जाता है. इसमें घूमने वाली एक्स-रे मशीन शरीर के अलग-अलग एंगल से तस्वीरें लेती है, जिन्हें कंप्यूटर जोड़कर थ्री-डायमेंशनल इमेज बना देता है. इससे शरीर के अंदरूनी अंगों की बेहद स्पष्ट तस्वीर मिलती है. 

सीटी स्कैन का इस्तेमाल गंभीर चोट, एक्सीडेंट, ट्यूमर, कैंसर, ब्रेन इंजरी, स्ट्रोक, किडनी स्टोन, अपेंडिसाइटिस और पेट से जुड़ी बीमारियों की जांच में किया जाता है. यह जांच डॉक्टरों को बीमारी की सटीक स्थिति समझने में मदद करती है. हालांकि सीटी स्कैन में रेडिएशन की मात्रा एक्स-रे से ज्यादा होती है और यह जांच महंगी भी होती है. कुछ मामलों में कॉन्ट्रास्ट डाई का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे एलर्जी की समस्या भी हो सकती है.

किस बीमारी में कौन-सी जांच जरूरी?

अगर हड्डी टूटने, दांत या फेफड़ों की सामान्य समस्या हो, तो एक्स-रे पर्याप्त होता है. लेकिन जब बीमारी जटिल हो, अंदरूनी चोट, कैंसर या ब्रेन से जुड़ी समस्या हो, तब सीटी स्कैन जरूरी हो जाता है.

हालांकि, एक्स-रे और सीटी स्कैन दोनों ही अपनी जगह जरूरी जांचें हैं. मरीज की स्थिति, बीमारी की गंभीरता और जोखिम को देखते हुए डॉक्टर तय करते हैं कि कौन-सी जांच सबसे सही रहेगी.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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देखने में हेल्दी हैं लेकिन बेबी नहीं कर पा रहीं कंसीव, डॉक्टर्स से समझें फर्टिलिटी बैरियर

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आज बड़ी संख्या में ऐसी युवा महिलाएं हैं जो फिट हैं, एक्टिव हैं, सही खाना खाती हैं, योग-जिम करती हैं और बाहर से बिल्कुल हेल्दी नजर आती हैं. ऐसे में जब महीनों तक कोशिश करने के बाद भी प्रेगनेंसी नहीं ठहरती, तो सबसे पहला सवाल यही आता है, मैं तो बिल्कुल ठीक दिखती हूं, फिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है. यह सवाल सिर्फ उलझन का नहीं, बल्कि मानसिक तनाव, खुद पर शक और कई बार अपराधबोध तक ले जाता है.

कई महिलाएं सोचने लगती हैं कि शायद उनसे ही कोई गलती हो रही है, जबकि सच्चाई यह है कि फर्टिलिटी सिर्फ बाहर से दिखने वाली हेल्थ से तय नहीं होती है. आज के तेज, तनाव भरे और अनियमित जीवन में फर्टिलिटी से जुड़ी कई समस्याएं ऐसी होती हैं, जिनके कोई साफ लक्षण दिखाई नहीं देते. इसी वजह से महिलाएं समय पर जांच नहीं करा पातीं और इलाज में देरी हो जाती है. 

हेल्दी दिखना और फर्टाइल होना दोनों अलग कैसे हैं

डॉक्टर्स कहते हैं कि यह एक बहुत आम गलतफहमी है कि जो महिला बाहर से हेल्दी दिखती है, उसे गर्भधारण में कोई दिक्कत नहीं हो सकती, हकीकत यह है कि आज कई ऐसी महिलाएं, जो पूरी तरह सामान्य जीवन जी रही हैं, फिर भी कंसीव नहीं कर पा रही हैं और यह अब असामान्य नहीं रह गया है.  मेडिकल भाषा में, 35 साल से कम उम्र की महिला अगर 12 महीने तक बिना किसी सुरक्षा के संबंध बनाने के बाद भी प्रेग्नेंट नहीं होती और 35 साल से अधिक उम्र की महिला अगर 6 महीने में कंसीव नहीं कर पाती, तो इसे बांझपन (Infertility) माना जाता है.  दुनियाभर में लगभग हर 6 में से 1 दंपत्ति इस समस्या से जूझ रहा है.  समय पर जांच न कराने से न सिर्फ इलाज मुश्किल होता है, बल्कि मानसिक दबाव भी बढ़ता जाता है. 

प्रेगनेंसी एक नाजुक और जटिल प्रक्रिया 

अक्सर लोग सोचते हैं कि बस संबंध बनाने से प्रेग्नेंट हो जाती है, लेकिन असल में इसके पीछे शरीर के अंदर कई जरूरी प्रक्रियाएं सही तरह से काम करनी होती हैं. प्रेगनेंस के लिए जरूरी है कि हर महीने सही समय पर ओव्यूलेशन होना, फैलोपियन ट्यूब का खुला और हेल्दी होना, शुक्राणुओं की अच्छी क्वालिटी और संख्या, अंडाणु और शुक्राणु का सही तरह से निषेचित होना और निषेचित अंडाणु का गर्भाशय में जाकर सफलतापूर्वक चिपकना (इम्प्लांटेशन) इनमें से किसी भी स्टेज पर अगर छोटी-सी भी गड़बड़ी हो जाए, तो प्रेगनेंसी रुक सकती है और खास बात यह है कि अक्सर इसके कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते हैं.

कौन सी बीमारियां जो दिखती नहीं, लेकिन फर्टिलिटी को प्रभावित करती हैं
 
1. पीसीओएस (PCOS) – यह एक हार्मोनल समस्या है, जो प्रजनन आयु की 6 से 13 प्रतिशत महिलाओं को प्रभावित करती है. इसमें ओव्यूलेशन नियमित नहीं होता, जिससे कंसीव करने में दिक्कत आती है., कई महिलाओं को इसके लक्षण भी साफ महसूस नहीं होते है. 

2. एंडोमेट्रियोसिस – इस स्थिति में यूर्टस टिशू यूर्टस के बाहर बनने लगता है. यह अंडाशय और फैलोपियन ट्यूब के काम में रुकावट डाल सकता है. हैरानी की बात यह है कि कई बार इसमें तेज दर्द भी नहीं होता, इसलिए महिला को पता ही नहीं चलता है. 

3. फैलोपियन ट्यूब का ब्लॉक होना – पुराने संक्रमण, सर्जरी या गर्भाशय की बनावट से जुड़ी समस्याओं के कारण ट्यूब ब्लॉक हो सकती हैं. यह समस्या अक्सर बिना किसी लक्षण के होती है, लेकिन प्रेगनेंसी की संभावना को काफी कम कर देती है. 

जब सभी जांच सामान्य हों, फिर भी प्रेग्नेंसी न हो

कुछ मामलों में सभी टेस्ट नॉर्मल आने के बावजूद प्रेगनेंसी नहीं ठहरती है. इसे डॉक्टर अस्पष्ट बांझपन (Unexplained Infertility) कहते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि अब कोई रास्ता नहीं बचा, इसका मतलब सिर्फ इतना है कि ओव्यूलेशन के समय, अंडाणु और शुक्राणु की आपसी प्रक्रिया या इम्प्लांटेशन में कोई बहुत सूक्ष्म समस्या हो सकती है, जिसे आज के टेस्ट पकड़ नहीं पाते, ऐसे मामलों में पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट और सहायक प्रजनन तकनीकें मददगार साबित होती हैं. 

डॉक्टर से जल्दी मिलना क्यों जरूरी है?

डॉक्टर महिलाओं को सलाह देते हैं कि अगर आप 6 से 12 महीने तक कोशिश करने के बाद भी कंसीव नहीं कर पा रही हैं, तो इंतजार न करें. समय पर जांच कराने से समस्या की सही पहचान होती है, लाइफस्टाइल में जरूरी बदलाव किए जा सकते हैं, दवाओं या आईवीएफ जैसी तकनीकों से सही समय पर इलाज संभव होता है. आज जब कई महिलाएं करियर या निजी कारणों से मातृत्व को टाल रही हैं, तब जागरूकता और समय पर कदम उठाना बेहद जरूरी हो गया है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बेहद खतरनाक पैंक्रियाटिक कैंसर का मिला इलाज! इसी बीमारी ने ली थी एपल CEO स्टीव जॉब्स की जान

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Early Signs Of Pancreatic Cancer: स्पेन की एक रिसर्च टीम ने दावा किया है कि उसने पैंक्रियाटिक कैंसर के सबसे खतरनाक रूप को लैब में चूहों से पूरी तरह खत्म करने वाला इलाज विकसित किया है. यह कैंसर दुनिया के सबसे जानलेवा कैंसरों में गिना जाता है. यह स्टडी स्पेन के नेशनल कैंसर रिसर्च सेंटर (CNIO) में साइंटिस्ट मारियानो बार्बासिद के नेतृत्व में किया गया. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर क्या-क्या दावा किया गया है. 

क्या निकला है रिसर्च में?

रिसर्च के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने तीन दवाओं के एक नए कॉम्बिनेशन का इस्तेमाल किया, जिससे चूहों में मौजूद पैंक्रियाटिक ट्यूमर पूरी तरह खत्म हो गए. सबसे अहम बात यह रही कि इलाज के बाद दोबारा कैंसर लौटने के कोई संकेत नहीं मिले. छह साल तक चली इस रिसर्च में यह भी पाया गया कि इलाज से जानवरों पर बहुत कम साइड इफेक्ट पड़े।. पैंक्रियाटिक कैंसर, खासतौर पर पैंक्रियाटिक डक्टल एडेनोकार्सिनोमा, इसलिए जानलेवा माना जाता है क्योंकि यह इलाज के प्रति बेहद प्रतिरोधी होता है और अक्सर देर से पकड़ में आता है. आमतौर पर एक दवा पर आधारित इलाज इसलिए फेल हो जाता है क्योंकि कैंसर सेल्स खुद को तेजी से ढाल लेती हैं. 

रिसर्चर का क्या कहना है?

CNIO की यह नई थेरेपी अलग रास्ता अपनाती है. इसमें एक नहीं, बल्कि तीन दवाओं को मिलाकर कैंसर की कई जीवन-रक्षक प्रक्रियाओं को एक साथ बंद किया गया. शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे कैंसर सेल्स को खुद को दोबारा ढालने का मौका ही नहीं मिलता. लैब में किए गए प्रयोगों में पाया गया कि उन्नत अवस्था के पैंक्रियाटिक कैंसर से पीड़ित चूहों में ट्यूमर पूरी तरह गायब हो गए. लंबे समय तक निगरानी के बावजूद ट्यूमर दोबारा नहीं उभरा, जो इस बीमारी में बेहद दुर्लभ माना जाता है.

इंसानों के लिए अभी इंतजार

इस स्टडी को प्रतिष्ठित जर्नल Proceedings of the National Academy of Sciences (PNAS) में पब्लिश किया गया है. समीक्षकों ने इलाज के लंबे समय तक असर और कम नुकसान को खास तौर पर हाईलाइट किया है.  कैंसर एक्सपर्ट का कहना है कि बिना दोबारा कैंसर लौटे ऐसे नतीजे पैंक्रियाटिक कैंसर रिसर्च में बेहद असामान्य हैं.  इस खोज के बाद सोशल मीडिया पर उत्साह के साथ-साथ संदेह भी देखने को मिला. कुछ लोगों ने इसे इलाज की दिशा में बड़ी छलांग बताया, तो कुछ ने इसे सीधे ‘क्योर’ कहे जाने पर सवाल उठाए। विशेषज्ञों का कहना है कि चूहों में मिली सफलता के बाद अभी इंसानों पर ट्रायल और लंबी प्रक्रिया बाकी है.

क्या होता है पैंक्रियाटिक कैंसर?

पैंक्रियाटिक कैंसर वह बीमारी है जो पैंक्रियाज  में सेल्स की असामान्य वृद्धि से शुरू होती है. पैंक्रियाज  पेट के निचले हिस्से के पीछे होता है और यह पाचन में मदद करने वाले एंजाइम तथा ब्लड शुगर को नियंत्रित करने वाले हार्मोन बनाता है. इसका सबसे आम प्रकार पैंक्रियाटिक डक्टल एडेनोकार्सिनोमा होता है.

यह कैंसर शुरुआती दौर में अक्सर पकड़ में नहीं आता, क्योंकि लक्षण देर से दिखाई देते हैं. इसके लक्षणों में पेट या पीठ में दर्द, वजन कम होना, भूख न लगना, पीलिया, पेशाब का रंग गहरा होना, थकान और अचानक डायबिटीज बढ़ना शामिल है. ऐसे लक्षण दिखें तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें. इसमें 80 से 85 प्रतिशत मामलों के लक्षण देर से दिखाई देते हैं और सिर्फ 10 प्रतिशत मरीज ही 5 साल तक जिंदा रह पाते हैं. 

इसे भी पढ़ें- Bowel Cancer: क्या होता है बाउल कैंसर? जानिए क्या हैं इसके शुरुआती लक्षण, जिसको लोग कर देते हैं इग्नोर

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कपूर या नेफथलीन बॉल्स, आपकी सेहत के लिए क्या ज्यादा बेहतर? जानें काम की बात

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इनका इस्तेमाल कपड़ों को कीड़ों, नमी और सीलन से बचाने के लिए किया जाता है. लेकिन जो गंध कीड़ों को भगाती है, वही हवा इंसान भी सांस के साथ अंदर लेता है.



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सुबह उठने के बाद क्यों पीना चाहिए पानी, इससे सेहत को क्या होता है फायदा?

सुबह उठने के बाद क्यों पीना चाहिए पानी, इससे सेहत को क्या होता है फायदा?


Benefits Of Drinking Water On Empty Stomach: अच्छी सेहत के लिए पानी पीना बेहद जरूरी है. यह डाइजेशन, ब्लड फ्लो, शरीर का तापमान संतुलन और विषैले तत्वों को बाहर निकालने जैसी कई अहम शारीरिक प्रक्रियाओं को सही तरीके से चलाने में मदद करता है. सुबह उठते ही पानी पीने की आदत एक छोटा-सा लेकिन असरदार कदम है, जिससे सेहत को कई फायदे मिलते हैं. रात भर की नींद के बाद शरीर में पानी की कमी हो जाती है. ऐसे में सुबह पानी पीना शरीर को फिर से हाइड्रेट करता है, मेटाबॉलिज्म को एक्टिव करता है और पाचन प्रक्रिया को बेहतर बनाता है. चलिए आपको बताते हैं कि सुबह पानी पीने से क्या फायदा होता है.

शरीर को फिर से हाइड्रेट करता है
कई घंटों की नींद के बाद शरीर डिहाइड्रेट हो जाता है. सुबह पानी पीने से शरीर में तरल पदार्थ की कमी पूरी होती है और सभी अंग बेहतर तरीके से काम करते हैं.

मेटाबॉलिज्म को तेज करता है
सुबह पानी पीने से मेटाबॉलिज्म अगले कुछ घंटों तक लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. इससे दिनभर ज्यादा कैलोरी बर्न करने में मदद मिलती है और वजन नियंत्रण में भी सहारा मिलता है.

शरीर से टॉक्सिन बाहर निकालता है
रात के समय शरीर खुद को रिपेयर करता है, इस दौरान कुछ विषैले तत्व जमा हो जाते हैं. सुबह पानी पीने से ये टॉक्सिन बाहर निकलते हैं और किडनी बेहतर तरीके से काम करती है.

पाचन को बेहतर बनाता है
सुबह पानी पीने से डाइजेशन सिस्टम सक्रिय होता है, कब्ज की समस्या कम होती है और पेट भोजन के लिए तैयार हो जाता है. इससे पोषक तत्वों का अवशोषण भी बेहतर होता है.

 त्वचा को रखता है स्वस्थ
त्वचा की सेहत के लिए सही मात्रा में पानी बेहद ज़रूरी है. सुबह पानी पीने से त्वचा की नमी बनी रहती है, झुर्रियां कम दिखती हैं और चेहरे पर प्राकृतिक चमक आती है.

दिमागी क्षमता बढ़ाता है
दिमाग का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा पानी से बना होता है. पानी की कमी से एकाग्रता और याददाश्त प्रभावित हो सकती है. सुबह पानी पीने से फोकस, सतर्कता और मानसिक स्पष्टता बेहतर होती है.

किन लोगों को नहीं पीना चाहिए सुबह पानी

चंडीगढ़ स्थित डाइटकल्प न्यूट्रिशन सेंटर की विशेषज्ञ डॉक्टर जमना शर्मा बताती हैं कि ज्यादातर लोगों के लिए सुबह उठते ही पानी पीना फायदेमंद होता है, लेकिन कुछ स्वास्थ्य स्थितियों में सावधानी जरूरी है. किडनी की बीमारी, हार्ट फेल्योर, एसिड रिफ्लक्स या शरीर में सूजन (एडेमा) की समस्या वाले लोगों को सुबह बहुत ज्यादा पानी नहीं पीना चाहिए. ऐसे मामलों में डॉक्टर की सलाह जरूरी होती है. बुजुर्गों में साइलेंट डिहाइड्रेशन का खतरा ज्यादा होता है, क्योंकि उन्हें प्यास महसूस नहीं होती इससे भ्रम, कमजोरी और एकाग्रता की कमी हो सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बिना दवा कंट्रोल करें एंग्जायटी, अमेरिकी डॉक्टर ने बताईं स्ट्रेस घटाने वाली 6 डेली हैबिट्स

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एक्सपर्ट के अनुसार सुबह की धूप शरीर की स्लीप वेक साइकिल को सही करने में मदद करती है. सुबह जल्दी धूप लेने से मेलाटोनिन हार्मोन बैलेंस रहता है, जिससे मूड बेहतर होता है और एंग्जायटी के लक्षण कम होते हैं. वहीं कई रिसर्च में भी सामने आया है कि सुबह की रोशनी में समय बिताने से पॉजिटिव मूड बढ़ता है और एंग्जायटी का खतरा कम होता है.

इसके अलावा लंबे समय तक भूखे रहने से शरीर में स्ट्रेस हार्मोन बढ़ सकते हैं. एक्सपर्ट के अनुसार जब खाने में ज्यादा गैप होता है तो एड्रेनालिन और कोर्टिसोल जैसे हार्मोन बढ़ते हैं, जिससे घबराहट, दिल की धड़कन तेज होना और बेचैनी महसूस हो सकती है. समय पर और नियमित खाना खाने से ब्लड शुगर कंट्रोल में रहती है और एंग्जायटी कम होती है.

इसके अलावा लंबे समय तक भूखे रहने से शरीर में स्ट्रेस हार्मोन बढ़ सकते हैं. एक्सपर्ट के अनुसार जब खाने में ज्यादा गैप होता है तो एड्रेनालिन और कोर्टिसोल जैसे हार्मोन बढ़ते हैं, जिससे घबराहट, दिल की धड़कन तेज होना और बेचैनी महसूस हो सकती है. समय पर और नियमित खाना खाने से ब्लड शुगर कंट्रोल में रहती है और एंग्जायटी कम होती है.

Published at : 30 Jan 2026 08:49 AM (IST)

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