बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम बना खतरे की घंटी, एम्स के डॉक्टरों ने दी सख्त चेतावनी

बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम बना खतरे की घंटी, एम्स के डॉक्टरों ने दी सख्त चेतावनी


राजधानी दिल्ली से सामने आई एक अहम चेतावनी ने पैरेंट्स की चिंता बढ़ा दी है. देश के शीर्ष चिकित्सा संस्थान एम्स के विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि बच्चों का ज्यादा स्क्रीन टाइम उनके विकास पर गंभीर असर डाल सकता है. अगर समय रहते सावधानी नहीं बरती गई तो इसके दूरगामी परिणाम सामने आ सकते हैं.

जन्म के शुरुआती महीनों में स्क्रीन से दूरी जरूरी

पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी डिवीजन के फैकल्टी इंचार्ज प्रोफेसर शैफाली गुलाटी का कहना है कि जन्म से लेकर 18 महीने तक के बच्चों को मोबाइल, टीवी या किसी भी तरह की स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए. इस उम्र में बच्चों का दिमाग तेजी से विकसित होता है और स्क्रीन उनके प्राकृतिक विकास में बाधा डाल सकती है.

भाषा और व्यवहार पर पड़ता है सीधा असर

एक्सपर्ट्स के अनुसार, ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों में भाषा सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. इसके साथ ही उनका सामाजिक व्यवहार भी कमजोर पड़ सकता है. कई बार ऐसे लक्षण सामने आते हैं जो ऑटिज्म जैसे दिखाई देते हैं, हालांकि इसे सीधे तौर पर ऑटिज्म का कारण नहीं माना गया है.

छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम सीमित करना जरूरी

डॉक्टरों ने सलाह दी है कि 18 महीने से 6 साल तक के बच्चों का स्क्रीन टाइम बेहद सीमित होना चाहिए. इस उम्र में बच्चों को खेलकूद, बातचीत और रचनात्मक गतिविधियों में ज्यादा शामिल करना जरूरी है ताकि उनका मानसिक और सामाजिक विकास बेहतर हो सके.

ऑटिज्म को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर जोर

अप्रैल महीने को दुनिया भर में ऑटिज्म अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाया जाता है. साल 2026 के लिए संयुक्त राष्ट्र ने “Autism & Humanity: Every Life has Value” थीम तय की है. इसी के तहत 30 अप्रैल को एम्स, नई दिल्ली में एक विशेष पब्लिक हेल्थ लेक्चर आयोजित किया जा रहा है, जिसमें ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से जुड़ी जटिलताओं पर विस्तार से चर्चा होगी.

कम उम्र में पहचान से बेहतर हो सकते हैं परिणाम

विशेषज्ञ बताते हैं कि ऑटिज्म के लक्षण 12 से 18 महीने की उम्र में ही पहचाने जा सकते हैं. ऐसे में शुरुआती पहचान और सही समय पर इलाज बेहद जरूरी है. आंकड़ों के मुताबिक, हर 31 में से एक व्यक्ति ऑटिज्म से प्रभावित पाया जा रहा है, जो इसे एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनाता है.

ऑटिज्म से जुड़े अन्य स्वास्थ्य जोखिम भी चिंता का कारण

एम्स के आंकड़ों के अनुसार, ऑटिज्म से पीड़ित करीब 80 प्रतिशत बच्चों में अन्य समस्याएं भी पाई जाती हैं. इनमें मिर्गी, ध्यान की कमी, व्यवहारिक समस्याएं और नींद से जुड़ी दिक्कतें शामिल हैं. इन समस्याओं के कारण बच्चों और उनके परिवार की जिंदगी की गुणवत्ता पर गहरा असर पड़ता है.

परिवार आधारित इलाज और सही जानकारी की अहमियत

डॉक्टरों का मानना है कि ऑटिज्म के इलाज में परिवार की भूमिका बेहद अहम होती है. सही जानकारी, समय पर हस्तक्षेप और व्यक्तिगत देखभाल से बच्चों के विकास में काफी सुधार किया जा सकता है. साथ ही बिना वैज्ञानिक आधार वाली वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों से बचने की भी सलाह दी गई है.

समावेशी समाज की दिशा में बढ़ते कदम

इस पहल का मकसद सिर्फ बीमारी का इलाज नहीं बल्कि समाज में जागरूकता बढ़ाना और ऑटिज्म से प्रभावित लोगों को सम्मानजनक जीवन देना है. एम्स की ओर से हेल्पलाइन, डिजिटल प्लेटफॉर्म और शैक्षणिक सामग्री के जरिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं ताकि हर बच्चे को बेहतर अवसर मिल सके और समाज में किसी के साथ भेदभाव न हो.

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How To Improve Heart Recovery After Heart Attack: ज्यादातर लोग मानते हैं कि ब्रश और फ्लॉस करना सिर्फ दांत साफ रखने और बदबू से बचने के लिए जरूरी है. लेकिन नई स्टडी बताती है कि मुंह की सेहत का दिल पर भी गहरा असर पड़ सकता है, खासकर हार्ट अटैक के बाद. चलिए आपको बताते हैं कि स्टडी में क्या निकला. 
 
हार्ट अटैक के बाद रिकवरी मुश्किल

जापान की टोक्यो मेडिकल एंड डेंटल यूनिवर्सिटी की एक स्टडी, जो इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ओरल साइंस में प्रकाशित हुई है, उसमें एक चौंकाने वाला संबंध सामने रखा है. इसमें बताया गया है कि मुंह में पाई जाने वाली एक आम बैक्टीरिया हार्ट के ठीक होने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है. यानी अगर मुंह की सेहत खराब है, तो हार्ट अटैक के बाद रिकवरी मुश्किल हो सकती है.

रिकवरी की कोशिश करता है हार्ट

हार्ट अटैक के बाद शरीर खुद को ठीक करने की कोशिश करता है. इसमें एक अहम प्रक्रिया होती है, जिसे ऑटोफैगी कहा जाता है. इसमें सेल्स अपने अंदर जमा खराब हिस्सों को साफ करके दोबारा इस्तेमाल करती हैं, जिससे दिल को ठीक होने में मदद मिलती है. रिसर्चर ने खास तौर पर पोर्फाइरोमोनस जिंजिवालिस नाम की बैक्टीरिया पर ध्यान दिया. यह बैक्टीरिया मुंह में पाया जाता है और मसूड़ों की बीमारी का कारण बनता है. अगर समय पर इलाज न हो, तो मसूड़े सूज जाते हैं, खून आने लगता है और दांत भी गिर सकते हैं. 

क्या है जिंजिपेन?

साइंटिस्ट को पहले से पता था कि यह बैक्टीरिया शरीर के दूसरे हिस्सों में भी पहुंच सकता है, लेकिन यह दिल को कैसे प्रभावित करता है, यह साफ नहीं था. इसे समझने के लिए उन्होंने जिंजिपेन नाम के एक पदार्थ का अध्ययन किया, जो यह बैक्टीरिया बनाता है.  जिंजिपेन एक तरह का प्रोटीन होता है, जो शरीर के टिश्यू को नुकसान पहुंचाने में मदद करता है और शरीर की इम्यून सिस्टम से बच निकलता है. रिसर्चर ने यह जानने की कोशिश की कि यह हार्ट के सेल्स पर क्या असर डालता है.

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क्या निकला नतीजा?

इसके लिए उन्होंने बैक्टीरिया का एक ऐसा रूप तैयार किया, जिसमें जिंजिपेन नहीं बनता था. फिर इसकी तुलना सामान्य बैक्टीरिया से की गई.  नतीजे साफ थे कि जिन सेल्स पर बिना जिंजिपेन वाला बैक्टीरिया असर कर रहा था, वे ज्यादा स्वस्थ रहीं. जबकि सामान्य बैक्टीरिया के संपर्क में आई सेल्स को ज्यादा नुकसान हुआ. चूहों पर किए गए प्रयोग में भी यही बात सामने आई। जिन चूहों में सामान्य बैक्टीरिया था, उनमें हार्ट अटैक के बाद दिल को ज्यादा नुकसान हुआ. रिसर्च में पाया गया कि जिंजिपेन ऑटोफैगी की प्रक्रिया को बाधित करता है. इससे सेल्स के अंदर खराब पदार्थ जमा होने लगते हैं, जो दिल की मरम्मत को धीमा कर देते हैं. यही वजह है कि दिल को ठीक होने में ज्यादा समय लगता है और नुकसान बढ़ जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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रेक्टल कैंसर से ज्यादा क्यों हो रही युवाओं की मौत, लाइफस्टाइल में क्या बदलाव करने की जरूरत?

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Why Rectal Cancer Is Increasing In Young Adults: कई सालों तक कोलोरेक्टल कैंसर को बुजुर्गों की बीमारी माना जाता रहा. हेल्थ सलाह भी ज्यादातर उम्रदराज लोगों की जांच पर ही केंद्रित रही, जबकि युवाओं को कम जोखिम वाला समझा गया. लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है, और यह बदलाव चिंता बढ़ाने वाला है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर क्या नया निकला है. 

स्टडी में चौंकाने वाले खुलासे

स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क अपस्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी की मिथिली मेनन पथियिल के नेतृत्व में हुई एक स्टडी, जो Digestive Disease Week (DDW 2026) में पेश की गई, रिपोर्ट में बताया गया कि कम उम्र के लोगों में रेक्टल कैंसर से मौत के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. खासकर 30 के मध्य से 40 की शुरुआत तक की उम्र वाले लोगों में यह बढ़ोतरी ज्यादा देखी गई है. 

किस तरह से बदल रहे हैं मौत के आंकड़े?

रिसर्चर ने 1999 से 2023 तक के आंकड़ों का एनालिसिस किया. इसमें 20 से 44 साल के लोगों के रिकॉर्ड को शामिल किया गया। इतने लंबे समय के डेटा से यह समझने में मदद मिली कि मौत के आंकड़े किस तरह बदलते गए. नतीजे काफी चिंताजनक रहे. कुल मिलाकर कोलोरेक्टल कैंसर से मौत के मामले बढ़े हैं, लेकिन रेक्टल कैंसर की वजह से मौत की दर कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है. कई समूहों में यह बढ़ोतरी कोलन कैंसर के मुकाबले दो से तीन गुना ज्यादा पाई गई. 

अलग- अलग समुदायों पर स्टडी

स्टडी में यह भी सामने आया कि अलग-अलग समुदायों में असर अलग है. हिस्पैनिक लोगों में रेक्टल कैंसर से मौत के मामले सबसे तेजी से बढ़े, जबकि अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों में रहने वाले लोगों में भी यह वृद्धि ज्यादा देखी गई.  इससे संकेत मिलता है कि सामाजिक, पर्यावरण या लाइफस्टाइल से जुड़े कारण इसमें भूमिका निभा सकते हैं. भविष्य को समझने के लिए रिसर्चर ने 2035 तक का अनुमान भी लगाया. इसके अनुसार अगर हालात नहीं बदले, तो आने वाले वर्षों में रेक्टल कैंसर से मौत के मामले और बढ़ सकते हैं. खासकर 35 से 44 साल के लोगों में जोखिम सबसे ज्यादा बना रहेगा.

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क्या है सबसे बड़ी वजह?

इस स्टडी में एक अहम वजह देरी से पहचान को माना गया है. कम उम्र के लोग अक्सर कैंसर के लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं. डॉक्टर भी कई बार युवाओं में कैंसर की संभावना कम मानते हैं. जैसे मलद्वार से खून आना या पेट साफ करने की आदत में बदलाव, इन्हें अक्सर छोटी समस्या समझ लिया जाता है. इसी कारण युवा मरीजों में बीमारी का पता देर से चलता है. जहां बुजुर्गों में लक्षण दिखने के एक महीने के भीतर इलाज शुरू हो जाता है, वहीं युवा कई महीनों तक इंतजार करते रहते हैं. यह देरी स्थिति को ज्यादा गंभीर बना सकती है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या ओट्स खाना सच में है फायदेमंद? सुपरफूड मानकर कहीं आप भी तो नहीं कर रहे गलती

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Oats And Mineral Absorption Issues: ओट्स को आजकल हेल्दी खाने का सबसे बड़ा प्रतीक मान लिया गया है. सुबह के नाश्ते से लेकर रात के हल्के खाने तक, हर जगह इसकी मौजूदगी दिखती है. पैकेट पर लिखी जानकारी इसे फाइबर से भरपूर बताती है और फिटनेस रूटीन की शुरुआत भी अक्सर ओट्स से ही होती है. लेकिन असली सवाल यह है कि क्या ओट्स हर व्यक्ति के लिए उतने ही फायदेमंद हैं? डॉक्टरों के अनुसार इसका जवाब इतना सीधा नहीं है. ओट्स के फायदे जरूर हैं, लेकिन इसके कुछ नुकसान भी हैं जिन पर कम चर्चा होती है. 

क्या ओट्स सबके लिए फायदेमंद है?

ओट्स को “सुपरफूड” का दर्जा इसलिए मिला क्योंकि इसमें बीटा-ग्लूकन नाम का घुलनशील फाइबर पाया जाता है. यह डाइजेशन को धीमा करता है और समय के साथ कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद करता है. इसी वजह से इसे दिल की सेहत के लिए अच्छा माना जाता है.  डॉ. आलोक कुमार सिंह ने TOI को बताया कि  “बीटा-ग्लूकन कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद करता है, लेकिन इसका असर इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप ओट्स किस रूप में खा रहे हैं और आपकी शरीर की संवेदनशीलता कैसी है.” 

 रिसर्च भी इसे सही मानती है कि नियमित सेवन से एलडीएल कोलेस्ट्रॉल कम हो सकता है.  न्यूट्रिशन एक्सपर्ट अंशुल सिंह कहते हैं कि इसमें मौजूद फाइबर पाचन सुधारता है और लंबे समय तक पेट भरा रखता है. 

ओट्स कैसे करता है काम?

लेकिन हर तरह के ओट्स एक जैसे काम नहीं करते.  खासकर इंस्टेंट ओट्स जल्दी पच जाते हैं, जिससे ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है. डॉ. सिंह के अनुसार, ज्यादा प्रोसेस्ड होने की वजह से ये शरीर में ग्लूकोज तेजी से बढ़ाते हैं. वहीं फ्लेवर्ड ओट्स में अतिरिक्त शक्कर भी होती है, जो समस्या बढ़ा सकती है. डायबिटीज या इंसुलिन रेजिस्टेंस वाले लोगों के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है. इसके मुकाबले स्टील-कट या रोल्ड ओट्स बेहतर माने जाते हैं क्योंकि ये धीरे पचते हैं.

फाइबर हर किसी के लिए फायदेमंद नहीं

ओट्स में फाइबर ज्यादा होता है, जो हर किसी के लिए आरामदायक नहीं होता. अचानक ज्यादा मात्रा में लेने से पेट फूलना, गैस या दर्द जैसी दिक्कत हो सकती है. डॉ. सिंह बताते हैं कि कुछ लोगों को इससे पाचन संबंधी परेशानी होती है. इसके अलावा ओट्स में फाइटेट्स भी होते हैं, जो आयरन और जिंक जैसे जरूरी मिनरल्स के अब्जॉर्व को कम कर सकते हैं. अंशुल सिंह के मुताबिक, अगर रोजाना जरूरत से ज्यादा ओट्स खाए जाएं और खाने में विविधता न हो, तो यह समस्या बढ़ सकती है.

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सबके लिए सुरक्षित नहीं 

ओट्स ग्लूटेन-फ्री होते हैं, लेकिन फिर भी हर किसी के लिए सुरक्षित नहीं हैं. कई बार इन्हें ऐसी जगह प्रोसेस किया जाता है जहां गेहूं भी होता है, जिससे मिलावट की संभावना रहती है। सीलिएक बीमारी या ग्लूटेन सेंसिटिविटी वाले लोगों के लिए यह जोखिम भरा हो सकता है. इसके अलावा जिन लोगों का पाचन कमजोर है या ब्लड शुगर कंट्रोल में नहीं रहता, उन्हें भी सावधानी रखनी चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बिना वजह रहता है मूड खराब? शरीर में इन विटामिन की कमी तो नहीं है वजह

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Which Deficiency Causes Mood Problems: जब मन अचानक भारी लगने लगे, तो वजह हमेशा बाहरी नहीं होती. कई बार शरीर खुद इशारा कर रहा होता है. कुछ दिन ऐसे आते हैं जब नींद ठीक होती है, काम का दबाव भी ज्यादा नहीं होता, फिर भी मूड गिरा हुआ महसूस होता है.  ऐसे में हम अक्सर लाइफस्टाइल को दोष देते हैं, लेकिन असली कहानी थोड़ी गहरी होती है. रोज प्लेट में क्या जा रहा है, इसका असर दिमाग के काम करने के तरीके पर पड़ता है. 

टामिन और मिनरल्स से जुड़ी दिक्कत

डॉक्टर अब एक पैटर्न देख रहे हैं. कई लोग चिंता, चिड़चिड़ापन या लो मूड की शिकायत लेकर आते हैं और बाद में पता चलता है कि शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी है. दिमाग सिर्फ भावनाओं से नहीं चलता, बल्कि यह केमिकल प्रक्रियाओं पर भी निर्भर करता है और ये प्रक्रियाएं विटामिन और मिनरल्स से जुड़ी होती हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

मे़दांता के विशेषज्ञ डॉ. सौरभ मेहरोत्रा ने TOI को बताया कि “तनाव, चिंता और मूड में बदलाव को अक्सर भागदौड़ भरी जिंदगी या नींद की कमी से जोड़ा जाता है, लेकिन कई मामलों में पोषण की कमी भी इसकी वजह हो सकती है. दिमाग को सेरोटोनिन, डोपामिन और गाबा जैसे न्यूरोट्रांसमीटर बनाने के लिए पर्याप्त विटामिन और मिनरल्स की जरूरत होती है, जो मूड और फोकस को नियंत्रित करते हैं.”

विटामिन डी की कमी का असर 

विटामिन डी की कमी अक्सर चुपचाप असर डालती है. इसे हड्डियों के लिए जरूरी माना जाता है, लेकिन यह मेंटल स्थिति को भी प्रभावित करता है. शहरों में धूप कम मिलना, लंबे समय तक घर या ऑफिस में रहना और प्रदूषण जैसे कारण शरीर में इसकी मात्रा घटा देते हैं. इससे थकान, सुस्ती और मूड में गिरावट महसूस हो सकती है. डॉ. मेहरोत्रा के अनुसार, यह सबसे आम कमियों में से एक है और इससे डिप्रेशन जैसे लक्षण भी दिख सकते हैं. 

विटामिन बी12 की कमी

विटामिन बी12 की कमी धीरे-धीरे असर करती है। लगातार थकान, दिमाग में धुंधलापन और ध्यान की कमी इसके संकेत हो सकते हैं. यह समस्या खासकर शाकाहारी लोगों, बुजुर्गों और पाचन संबंधी दिक्कत वाले लोगों में ज्यादा देखी जाती है.  यह नसों और दिमाग के सही काम के लिए जरूरी है, इसलिए इसकी कमी इमोशनल स्थिति को भी प्रभावित करती है. 

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इन चीजों की कमी से ये होती है दिक्कत

इसी तरह विटामिन बी6 और फोलेट भी ब्रेन के लिए जरूरी होते हैं. ये ऐसे रसायनों के निर्माण में मदद करते हैं जो हमें शांत और संतुलित रखते हैं. इनकी कमी अक्सर शारीरिक नहीं, बल्कि इमोशनल असंतुलन के रूप में दिखती है. मैग्नीशियम शरीर का प्राकृतिक शांत करने वाला तत्व माना जाता है. इसकी कमी होने पर बेचैनी, सिरदर्द, नींद की कमी और चिंता बढ़ सकती है,  वहीं आयरन की कमी दिमाग तक ऑक्सीजन की सप्लाई घटा देती है, जिससे थकान, ध्यान की कमी और मूड में गिरावट आती है. हालांकि हर बार मूड खराब होने की वजह पोषण की कमी नहीं होती. डॉ. मेहरोत्रा कहते हैं कि चिंता और तनाव कई कारणों से हो सकते हैं.

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क्या ज्यादा आम खाने से सच में बढ़ती है शरीर की गर्मी? डॉक्टर से जानें सच

क्या ज्यादा आम खाने से सच में बढ़ती है शरीर की गर्मी? डॉक्टर से जानें सच


What Happens If You Eat Too Many Mangoes: गर्मी आते ही आम का मौसम शुरू हो जाता है और फिर यह सिर्फ फल नहीं, एक आदत बन जाता है.  नाश्ते से लेकर रात तक, हर वक्त इसे खाने का मन करता है. लेकिन हर साल एक बात जरूर सुनने को मिलती है कि “ज्यादा आम मत खाओ, शरीर में गर्मी बढ़ जाएगी.” तो क्या सच में ऐसा होता है या यह सिर्फ पुरानी मान्यता है जो आज तक चली आ रही है?. चलिए आपको बताते हैं कि एक्सपर्ट क्या कहते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

 न्यूट्रिशन हेड डॉ. करुणा चतुर्वेदी ने TOI को बताया कि आम को पारंपरिक रूप से “गर्म फल” कहा जाता है, लेकिन साइंस इसे इस तरह नहीं देखता. उनके अनुसार, किसी भी खाने को उसके पोषक तत्वों के आधार पर समझा जाता है, न कि गर्म या ठंडा मानकर. आम में प्राकृतिक शर्करा और मैंगिफेरिन जैसे तत्व होते हैं, जो पाचन के दौरान शरीर में हल्की गर्माहट का एहसास दे सकते हैं. लेकिन यह बुखार की तरह शरीर का तापमान नहीं बढ़ाते. यानी जो गर्मी महसूस होती है, वह हल्की और अस्थायी होती है. 

किसका रखना चाहिए आपको ध्यान?

असल फर्क मात्रा से पड़ता है. एक आम खाना और एक साथ तीन-चार आम खा लेना, दोनों का असर अलग होता है. डॉ. चतुर्वेदी के अनुसार, ज्यादा आम खाने से पेट से जुड़ी परेशानियां हो सकती हैं. इसमें मौजूद फाइबर और फ्रक्टोज ज्यादा मात्रा में लेने पर पेट फूलना, दस्त या ऐंठन जैसी दिक्कतें पैदा कर सकते हैं.

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ज्यादा आम खाने के नुकसान

ज्यादा आम खाने के कुछ आम प्रभाव भी देखे जाते हैं. जैसे पाचन बिगड़ना, क्योंकि ज्यादा फाइबर और प्राकृतिक शक्कर आंतों को प्रभावित कर सकते हैं. ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है, जो डायबिटीज वाले लोगों के लिए चिंता की बात है. कुछ लोगों को होंठों के आसपास जलन या खुजली भी महसूस होती है.  इसकी वजह आम के छिलके के पास मौजूद चिपचिपा पदार्थ होता है, जिसमें ऐसे तत्व होते हैं जो त्वचा को रिएक्ट कर सकते हैं. इसके अलावा ज्यादा मात्रा में खाने से वजन बढ़ने का खतरा भी रहता है.

यह गर्म क्यों लगता है?

गर्मी के मौसम में आम गर्म क्यों लगता है, इसका कारण सिर्फ फल नहीं है. इस समय शरीर पहले से ही डिहाइड्रेशन और धीमे पाचन से गुजर रहा होता है. ऐसे में जब ज्यादा मीठा फल खाया जाता है, तो शरीर भारी और गर्म महसूस कर सकता है. यानी जो गर्मी का एहसास होता है, वह कई चीजों का मिला-जुला असर है. इसका मतलब यह नहीं कि आम खाना छोड़ दिया जाए. बस इसे समझदारी से खाने की जरूरत है. रोज एक या दो आम तक सीमित रहें, ज्यादा एक साथ खाने से बचें. दही या पानी वाली चीजों के साथ लें, ताकि संतुलन बना रहे. खाली पेट खाने से बचें अगर पाचन संवेदनशील है. खाने से पहले कुछ देर पानी में भिगोना भी फायदेमंद माना जाता है.

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