क्या शुगर के मरीज तरबूज खा सकते हैं, क्या कहते हैं एक्सपर्ट‌?

क्या शुगर के मरीज तरबूज खा सकते हैं, क्या कहते हैं एक्सपर्ट‌?


Does Watermelon Raise Blood Sugar Levels: तरबूज गर्मियों का सबसे पसंदीदा फल है, लेकिन जब बात डायबिटीज की आती है तो लोग अक्सर कंफ्यूज हो जाते हैं कि क्या इसे खाना सुरक्षित है या नहीं? एक्सपर्ट्स का कहना है कि तरबूज पूरी तरह से मना नहीं है, लेकिन मात्रा और तरीके का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको खाने के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.

क्यों शुगर के मरीजों के लिए नुकसानदायक हो सकता है?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline की रिपोर्ट के अनुसार,  तरबूज में प्राकृतिक शर्करा होती है, जो ब्लड शुगर को प्रभावित कर सकती है. लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितना खा रहे हैं. उदाहरण के तौर पर, एक कप कटे हुए तरबूज करीब 152 ग्राम  में लगभग 9.42 ग्राम शुगर और 11.5 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है, वहीं, एक बड़ा स्लाइस करीब 286 ग्राम में यह मात्रा और ज्यादा हो जाती है। इसलिए हिस्से पर कंट्रोल रखना जरूरी है.

क्या डायबिटीज के मरीज इसको खा सकते हैं?

अच्छी बात यह है कि सीमित मात्रा में तरबूज संतुलित डाइट का हिस्सा बन सकता है. अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन भी सलाह देता है कि डायबिटीज के मरीज ताजे फल खा सकते हैं, बशर्ते उनमें अतिरिक्त शुगर न हो. तरबूज में फाइबर के साथ-साथ विटामिन ए, सी, पोटैशियम, मैग्नीशियम, विटामिन बी6, आयरन और कैल्शियम जैसे पोषक तत्व होते हैं, जो शरीर के लिए फायदेमंद हैं. 

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आपके लिए हेल्दी 

विटामिन ए आंखों की सेहत के लिए अच्छा है, जबकि विटामिन सी इम्यूनिटी बढ़ाने और दिल को स्वस्थ रखने में मदद करता है. तरबूज में मौजूद एंटीऑक्सिडेंट्स शरीर को फ्री रेडिकल्स से बचाने में भी सहायक होते हैं. इसमें लाइकोपीन नाम का तत्व भी होता है, जो दिल से जुड़ी बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद कर सकता है और डायबिटीज के मरीजों में हार्ट की बीमारी का खतरा वैसे भी ज्यादा होता है. 

हाइड्रेटेड रखता है शरीर

तरबूज का एक और फायदा इसकी हाई वॉटर कंटेंट है. यह 90 प्रतिशत से ज्यादा पानी से भरपूर होता है, जिससे शरीर हाइड्रेटेड रहता है और पेट भरा हुआ महसूस होता है. इसके साथ ही, इसमें मौजूद फाइबर पाचन को बेहतर बनाने में मदद करता है. 

संतुलन में खाने की सलाह

अगर ग्लाइसेमिक इंडेक्स की बात करें, तो तरबूज का जीआई लगभग 72 होता है, जो थोड़ा ज्यादा माना जाता है. लेकिन इसका ग्लाइसेमिक लोड कम होता है, यानी सही मात्रा में खाने पर यह ब्लड शुगर को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करता. यही वजह है कि एक्सपर्ट्स इसे पूरी तरह से मना नहीं करते, बल्कि संतुलन में खाने की सलाह देते हैं. डायबिटीज के मरीजों के लिए यह भी जरूरी है कि वे तरबूज को अकेले ज्यादा मात्रा में खाने के बजाय संतुलित भोजन के साथ लें. इसके साथ ही, सूखे फल या जूस की बजाय ताजे फल को ज्यादा प्रिफर करना बेहतर होता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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खाना खिलाने के लिए बच्चों को दे देते हैं फोन तो हो जाएं सावधान, बढ़ जाता है इस बीमारी का खतरा

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Is It Safe To Use Mobile While Feeding Children: बच्चों को खाना खिलाते समय मोबाइल थमा देना आजकल आम आदत बन चुकी है. रोते हुए बच्चे को चुप कराने से लेकर उसे कुछ देर व्यस्त रखने तक, स्क्रीन एक आसान उपाय लगती है. लेकिन अब डॉक्टर और रिसर्चर्स इसे लेकर साफ चेतावनी दे रहे हैं. खासतौर पर एक साल से छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन एक्सपोजर खतरनाक हो सकता है और तीन साल की उम्र तक ऑटिज्म जैसे लक्षण विकसित होने का जोखिम बढ़ सकता है.

क्या निकला रिसर्च में?

दिल्ली के एम्स और अन्य संस्थानों के रिसर्चर ने पाया है कि छोटे बच्चे डिजिटल स्क्रीन के प्रभाव के प्रति बेहद सेंसिटिव होते हैं. एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को बिल्कुल भी स्क्रीन न दिखाई जाए और आदर्श रूप से तीन साल तक इससे दूर रखा जाए. हालांकि डॉक्टर यह भी स्पष्ट करते हैं कि स्क्रीन टाइम और क्लिनिकल ऑटिज्म के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध साबित नहीं हुआ है, लेकिन “वर्चुअल ऑटिज्म” जैसे लक्षण विकसित होने की संभावना जरूर बढ़ सकती है. 

मेटा एनालिसिस किया गया

एम्स रायपुर के रिसर्चर ने पांच साल से कम उम्र के 2,857 बच्चों पर एक मेटा-एनालिसिस किया. इसमें सामने आया कि बच्चों का औसत स्क्रीन टाइम 2.22 घंटे प्रतिदिन था, जो वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की सिफारिश से लगभग दोगुना है. अक्सर माता-पिता बच्चों को शांत रखने, गुस्सा संभालने या खुद को थोड़ा समय देने के लिए स्क्रीन का सहारा लेते हैं. यह तरीका तुरंत राहत तो देता है, लेकिन लंबे समय में बच्चे के दिमागी विकास पर असर डाल सकता है. 

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एक अन्य स्टडी में 3 से 18 वर्ष के 150 ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों और 50 सामान्य बच्चों को शामिल किया गया. इस रिसर्च में सिर्फ स्क्रीन एक्सपोजर ही नहीं, बल्कि डिवाइस की लत और उसके साइकोलॉजिकल व व्यवहारिक प्रभावों पर भी ध्यान दिया गया. यह एक क्रॉस-सेक्शनल स्टडी थी, यानी एक ही समय पर बच्चों के डेटा का एनालिसिस किया गया, इसलिए लंबे समय के प्रभावों पर पूरी तस्वीर सामने नहीं आती.

क्या निकला रिजल्ट?

रिसर्च में यह पाया गया कि जिन बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण थे, उन्हें कम उम्र में ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर मिला था. शुरुआती उम्र में स्क्रीन देखने और ऑटिज्म के बीच मजबूत संबंध जरूर दिखा, लेकिन इसे सीधा कारण नहीं माना गया.

ऑटिज्म क्या है?

ऑटिज्म एक न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है, जो बच्चे के संवाद और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करती है. शुरुआती सालों में दिमाग तेजी से विकसित होता है, इसलिए यह समय बेहद अहम होता है. इसके संकेतों में आंखों से संपर्क न करना, बोलने में देरी और पहले सीखी गई चीजों को भूलना शामिल है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

 

एम्स में पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. शेफाली गुलाटी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि ठऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर और स्क्रीन टाइम को लेकर काफी रिसर्च हुई है. जिन बच्चों को एक साल की उम्र में ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर मिला, उनमें तीन साल की उम्र तक ऑटिज्म के लक्षण ज्यादा देखने को मिले, खासकर लड़कों में, हालांकि लड़कियों में भी ये संकेत दिखे.”

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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गर्मी में 5 लीटर पानी पीने के कुछ ही घंटों बाद ICU में पहुंचा युवक, डॉक्टर ने बताया कारण

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Heatwave Health Risks: इस भीषण गर्मी और तेज धूप में आपने अक्सर सुना होगा कि एक व्यक्ति को रोज कम से कम 3 से 4 लीटर पानी जरूर पीना चाहिए ताकि शरीर डिहाइड्रेट न हो. लेकिन क्या होगा अगर आपको पता चलें कि,  कोई 5 लीटर पानी पीने के बाद भी अस्पताल के ICU तक पहुंच गया? ऐसे में ये हैरान होने वाली बात है. दिल्ली से सामने आया एक मामला यही सवाल खड़ा करता है,  कि सिर्फ पानी पीना ही काफी नहीं होता. जहां ज्यादा पानी पीने के बावजूद एक युवक की हालत इतनी बिगड़ गई कि उसे तुरंत भर्ती कराना पड़ा. एक 25 साल का युवक पूरे दिन करीब 5 लीटर पानी पीता रहा, फिर भी कुछ ही घंटों में उसकी हालत इतनी बिगड़ गई कि उसे ICU में भर्ती कराना पड़ा. यह घटना दिखाती है कि गर्मी में शरीर को सही तरीके से हाइड्रेट करना कितना जरूरी है?

क्या हुआ उस युवक के साथ?

रिपोर्ट के अनुसार, 25 साल का युवक दिनभर तेज गर्मी में बाइक से काम कर रहा था. कई युवा लोगों की तरह उसे भी लगता था कि ज्यादा पानी पीना सही है.  इसलिए वह बार-बार अपनी बोतल भरता था और पूरे दिन में करीब 5 लीटर पानी पी लेता था, लेकिन उसने कुछ भी ठोस नहीं खाया. न फल, न कोई इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक और न ही नमक वाला पेय लिया. जिसके कारण शाम तक उसे चक्कर आने लगे, उल्टी जैसा महसूस होने लगा जिसे उसने थकान समझ कर नजरअंदाज कर दिया फिर धिरे-धिरे उसकी हालत ओर बिगड़ने लगी. उसकी बोली भी धीमी हो गई और वह कन्फ्यूज होने लगा, जिसके बाद उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया. जहां डॉक्टरों ने जांच में पाया कि युवक के शरीर में सोडियम का स्तर काफी कम हो गया था. सामान्य स्तर 135–145 mEq/L होता है, लेकिन उसका स्तर 124 तक गिर गया था. इस स्थिति को हाइपोनेट्रेमिया कहा जाता है. यह तब होता है जब पसीने के जरिए शरीर से नमक निकल जाता है और उसकी भरपाई सिर्फ पानी से की जाती है. इससे शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है. 

यह भी पढ़ेंः जलवायु परिवर्तन से सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, अब मेंटल हेल्थ को भी खतरा

असली वजह: शरीर में नमक की कमी

डॉक्टरों ने जांच में पाया कि युवक के शरीर में सोडियम का स्तर काफी कम हो गया था. सामान्य स्तर 135–145 mEq/L होता है, लेकिन उसका स्तर 124 तक गिर गया था. इस स्थिति को हाइपोनेट्रेमिया कहा जाता है. यह तब होता है जब पसीने के जरिए शरीर से नमक निकल जाता है और उसकी भरपाई सिर्फ पानी से की जाती है. इससे शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है. यह यह सिर्फ एक व्यक्ति की बात नहीं है. पूरे भारत में, जहां गर्मियों में तापमान अक्सर 44 से 47 डिग्री तक पहुंच जाता है, अस्पतालों में गर्मी से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ रही हैं.  

क्यों खतरनाक है यह स्थिति?

पसीना आना शरीर का खुद को ठंडा रखने का तरीका है. जब पसीना त्वचा से सूखता है, तो शरीर की गर्मी कम होती है और तापमान नियंत्रित रहता है. लेकिन पसीना सिर्फ पानी नहीं होता. इसमें नमक और जरूरी खनिज जैसे सोडियम, पोटेशियम और क्लोराइड भी होते हैं. सोडियम शरीर में पानी के संतुलन और दिमाग के सही काम के लिए जरूरी होता है. जब इसकी मात्रा कम हो जाती है, तो पानी कोशिकाओं में जाने लगता है, जिससे दिमाग की कोशिकाएं सूज सकती हैं. शुरुआत में सिरदर्द, थकान, चक्कर और उल्टी जैसे लक्षण दिखते हैं, लेकिन हालत गंभीर होने पर बेहोशी, दौरे और कोमा तक हो सकता है.

हाइड्रेशन का सही तरीका क्या है?

अगर शरीर में पानी की कमी को सही तरीके से पूरा नहीं किया जाए, तो समस्या और बढ़ सकती है.  भारत में गर्मियों में अक्सर कहा जाता है कि “ज्यादा पानी पिएं”, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है.  सिर्फ पानी पीने से शरीर में जरूरी नमक और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी को पूरा नहीं करता है. अगर आप ज्यादा पानी पीते हैं लेकिन नमक नहीं लेते, तो खून में सोडियम कम हो सकता है, जो खतरनाक हो सकता है. इसलिए सिर्फ पानी नहीं, बल्कि ऐसे पेय भी जरूरी हैं जिनमें इलेक्ट्रोलाइट्स हों, ताकि शरीर का संतुलन बना रहे. जैसे नारियल पानी, नींबू पानी, छाछ, ORS, फलों का जूस जिससे शरीर को नमक और मिनरल्स मिलते रहें.  साथ ही समय पर खाना और धूप से बचाव भी जरूरी है.

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