सिर्फ जिम जाने से नहीं बनेगी बात, दिमाग को भी चाहिए ‘कसरत’; न्यूरोलॉजिस्ट से जानें 3 आसान तरीके

सिर्फ जिम जाने से नहीं बनेगी बात, दिमाग को भी चाहिए ‘कसरत’; न्यूरोलॉजिस्ट से जानें 3 आसान तरीके


How To Improve Brain Health Naturally: हम सभी जानते हैं कि शरीर को फिट रखने के लिए एक्सरसाइज जरूरी है, जैसे कि चलना, वेट उठाना, स्ट्रेचिंग करना आदि.  लेकिन अक्सर हम एक अहम चीज भूल जाते हैं. दिमाग को भी कसरत की जरूरत होती है और वह सिर्फ कभी-कभार क्रॉसवर्ड हल करने से पूरी नहीं होती. दिमाग भी शरीर के अन्य अंगों की तरह है. अगर उसे चुनौती नहीं दी जाए, तो वह सुस्त पड़ने लगता है. नई चीजें सीखना, जैसे कोई भाषा, वाद्ययंत्र, नई हॉबी, गहराई से पढ़ना या सार्थक बातचीत करना ये ब्रेन में नए न्यूरल कनेक्शन बनाता है। यही कनेक्शन याददाश्त और सोचने की क्षमता को मजबूत बनाए रखते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

आज के समय में ब्रेन एक्सरसाइज और भी जरूरी हो गई है. हम रास्ते याद रखने के बजाय जीपीएस पर निर्भर हैं, ध्यान लगाने की बजाय लगातार स्क्रॉल करते रहते हैं और एक साथ कई काम करने की कोशिश करते हैं. धीरे-धीरे इससे ध्यान की क्षमता और मेंटल सहनशक्ति प्रभावित हो सकती है. न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विवेक कुमार ने TOI को बताया कि, मेंटल एक्सरसाइज स्वास्थ्य बनाए रखने, उम्र से जुड़ी गिरावट कम करने और मानसिक लचीलापन बढ़ाने में मदद करते हैं. पहेलियां सुलझाना, सुडोकू खेलना, नई स्किल सीखना या माइंडफुलनेस का अभ्यास करना, ये सब याददाश्त, ध्यान और इमोशनल संतुलन बेहतर करने में सहायक हैं.

मल्टीटास्किंग कैसे प्रभावित करती है?

मल्टीटास्किंग को अक्सर प्रोडक्ट का प्रतीक माना जाता है, लेकिन डॉक्टर बताते हैं कि लगातार काम बदलने से दिमाग पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है. इससे कार्यक्षमता कम हो सकती है, ध्यान अवधि घटती है और मानसिक थकान बढ़ती है. लंबे समय तक ऐसा करने से तनाव और बर्नआउट का खतरा भी बढ़ सकता है. ध्यान और माइंडफुलनेस के लाभ भी अब रिसर्च से साबित हो रहे हैं. रेगुलर ध्यान से तनाव हार्मोन कोर्टिसोल कम हो सकता है, ब्लड प्रेशर कंट्रोल रहता है और मानसिक स्पष्टता बढ़ती है. सांसों पर ध्यान केंद्रित करना या शांत बैठकर मन को स्थिर करना इमोशनल संतुलन मजबूत करता है.

क्या करना चाहिए आपको?

कुछ शुरुआती संकेत भी हैं जिन पर ध्यान देना चाहिए, डेली कामों में बाधा डालने वाली भूलने की आदत, निर्णय क्षमता में कमी, तारीख या स्थान भूल जाना, बार-बार वही सवाल दोहराना, या मूड में अचानक बदलाव. ये संकेत बताते हैं कि कॉग्निटिव स्वास्थ्य को गंभीरता से लेने का समय आ गया है. डॉ. कुमार तीन सरल आदतें सुझाते हैं कि रोज कोई दिमागी खेल या पहेली हल करें, नई स्किल या शौक अपनाएं और सामाजिक मेलजोल बढ़ाएं. छोटे लेकिन नियमित प्रयास दिमाग को सक्रिय, तेज और संतुलित बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हेडफोन लगाते हैं तो हो जाइए सावधान, जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल से हो सकती है ये बीमारी

हेडफोन लगाते हैं तो हो जाइए सावधान, जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल से हो सकती है ये बीमारी


Can Headphones Cause Permanent Hearing Loss: आज के दौर में टेक्नोलॉजी हमारी जरूरत भी है और मजबूरी भी. ईयरफोन या हेडफोन इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. सुबह की वॉक हो, मेट्रो का सफर, बस में यात्रा, कैफे में बैठना या ऑफिस में कॉल, हर जगह लोग कानों में ईयरफोन लगाए नजर आते हैं. इससे आसपास के लोगों को भले परेशानी न हो, लेकिन लगातार और लापरवाही से इस्तेमाल आपकी सुनने की क्षमता पर गंभीर असर डाल सकता है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन का अनुमान है कि अनसेफ सुनने की आदतों के कारण दुनिया भर में करीब एक अरब युवा सुनने की क्षमता खोने के जोखिम में हैं.

सबसे बड़ी चिंता आवाज की तीव्रता और इस्तेमाल की अवधि को लेकर है. ईयरफोन बहुत कम दूरी से तेज आवाज सीधे कानों तक पहुंचाते हैं. लगातार ऊंची आवाज़ में संगीत सुनना या लंबे समय तक ईयरफोन लगाए रखना, दोनों ही खतरनाक हैं. इसके अलावा, ईयरफोन अलग-अलग जगहों पर रखे जाते हैं, जिससे उन पर बैक्टीरिया जमा हो जाते हैं. इन्हें शेयर करने से इंफेक्शन का खतरा और बढ़ जाता है.

क्या होती है दिक्कत?

Manipalhospitals की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब हम तेज़ आवाज में कुछ सुनते हैं तो ध्वनि तरंगें कान के पर्दे को कंपन करती हैं. यह कंपन अंदरूनी कान के कोक्लिया तक पहुंचता है, जहां हजारों सूक्ष्म हेयर सेल्स होती हैं. तेज आवाज इन कोशिकाओं पर ज्यादा दबाव डालती है. लगातार ऐसा होने पर ये सेल्स अपनी संवेदनशीलता खो सकती हैं या स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती हैं. यही स्थिति शोर से होने वाली सुनने की कमी का कारण बनती है.

कई लोगों को कानों में घंटी बजने जैसी आवाज़ सुनाई देने लगती है, जिसे टिनिटस कहा जाता है. कुछ मामलों में सामान्य आवाजें भी असहनीय लगने लगती हैं, जिसे हाइपरएक्यूसिस कहते हैं. लंबे समय तक तेज शोर के संपर्क में रहने से चक्कर आना, कान दर्द, अत्यधिक ईयरवैक्स जमा होना और बार-बार इंफेक्शन की समस्या भी हो सकती है.

इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए?

हेल्थ एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि आवाज़ हमेशा मध्यम रखें और लगातार लंबे समय तक न सुनें. नॉइज-कैंसिलिंग या ओवर-द-ईयर हेडफोन बेहतर विकल्प हो सकते हैं क्योंकि ये बाहरी शोर कम कर देते हैं, जिससे वॉल्यूम बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती. ईयरफोन को रेगुलर रूप से साफ करना भी जरूरी है. सफर के दौरान पहले से शोर भरे माहौल में ईयरफोन लगाने से बचें, क्योंकि इससे कुल डेसिबल स्तर और बढ़ जाता है. छोटी-सी सावधानी आपके कानों को स्थायी नुकसान से बचा सकती है.

ये भी पढ़ें: RSV से हर साल 100000 बच्चों की होती है मौत, WHO के हिसाब से जानें कब लगवाएं इसकी वैक्सीन?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या सिर में भी चढ़ जाती है गैस, जानें कितनी खतरनाक होती है यह बीमारी?

क्या सिर में भी चढ़ जाती है गैस, जानें कितनी खतरनाक होती है यह बीमारी?


Can Gas Cause Headache: आपके साथ कितनी बार ऐसा हुआ है कि सिर में धड़कता दर्द हुआ और आपने उसे बस तनाव समझकर नजरअंदाज कर दिया? ऑफिस का दबाव, अनरेगुलर दिनचर्या और जल्दबाजी में खाया गया खाना, इन सबके बीच सिरदर्द आम बात लगने लगता है. लेकिन हर सिरदर्द का कारण तनाव नहीं होता. कई बार इसकी जड़ पेट में छिपी होती है. इसे ही आम भाषा में गैस से होने वाला सिरदर्द या गैस्ट्रिक हेडेक कहा जाता है. चलिए आपको बताते हैं कि गैस सर पर कब चढ़ जाती है. 

गैस्ट्रिक सिरदर्द कोई सामान्य टेंशन या साइनस हेडेक नहीं है. यह तब होता है जब डाइजेशन सिस्टम  में गड़बड़ी, जैसे अपच, एसिडिटी या गैस होती है. पेट और दिमाग के बीच गहरा संबंध है. जब पेट में असंतुलन होता है तो शरीर रिएक्शन देता है, और कई लोगों में यह दर्द सिर तक पहुंच जाता है. मसालेदार खाना, अनियमित भोजन, ज्यादा चाय-कॉफी और लगातार तनाव इस समस्या को बढ़ा सकते हैं.

कब होती है दिक्कत?

Bangaloregastrocentre की रिपोर्ट के अनुसार, सामान्य गैस्ट्रिक सिरदर्द और गैस्ट्रिक माइग्रेन में फर्क समझना भी जरूरी है. गैस्ट्रिक सिरदर्द हल्का या लगातार रहने वाला दर्द हो सकता है, जबकि गैस्ट्रिक माइग्रेन ज्यादा तीव्र, धड़कन जैसा दर्द देता है. इसमें रोशनी और आवाज से परेशानी, मितली या उल्टी भी हो सकती है. दोनों ही स्थितियों में मूल कारण डाइजेशन की गड़बड़ी ही होती है. अगर यह समस्या कभी-कभार हो तो चिंता की बात नहीं, लेकिन बार-बार होने लगे तो इसे नजरअंदाज न करें. लगातार गैस्ट्रिक सिरदर्द क्रॉनिक गैस्ट्राइटिस, पेप्टिक अल्सर, गालब्लैडर की बीमारी, इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम या गैस्ट्रोइसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज जैसी गंभीर स्थितियों का संकेत हो सकता है.

डॉक्टर से कब मिलें? 

अगर सिरदर्द हफ्ते में दो बार से ज्यादा हो रहा है, वजन बिना कारण कम हो रहा है, लगातार उल्टी या तेज पेट दर्द हो रहा है या घरेलू उपायों से आराम नहीं मिल रहा, तो गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से सलाह लें. जरूरत पड़ने पर एंडोस्कोपी जैसी जांच से डाइजेशन सिस्टम की स्थिति स्पष्ट की जा सकती है. इलाज का आधार केवल दर्दनिवारक दवा नहीं, बल्कि पाचन सुधारना है. समय पर खाना, हल्का और संतुलित आहार, पर्याप्त पानी और डिप्रेशन कंट्रोल से काफी राहत मिल सकती है. आप इसको सिर्फ यह कहकर नहीं टाल सकते कि सिर में गैस चढ़ गई है और खासकर तब जब आपको यह समस्या बार-बार हो रही हो. अगर आप समय पर इसपर ध्यान नहीं देते हैं, तो आगे चलकर यह आपके लिए काफी दिक्कत का कारण बन सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ऑफिस के बाहर प्लास्टिक के कप में पीते हैं चाय, हो सकती है यह जानलेवा बीमारी

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Is Drinking Tea In Plastic Cups Safe: ऑफिस के बाहर ठेले से आई गरमा-गरम चाय, जो पॉलिथीन की थैली या पतले प्लास्टिक कप में सीधे आपकी टेबल तक पहुंचती है, यह रोज की आदत भले सुकून देती हो, लेकिन सेहत के लिहाज से खतरे की घंटी भी हो सकती है. एक्सपर्ट का कहना है कि गरम चाय जब कम क्वालिटी वाले प्लास्टिक या पॉलिथीन में डाली जाती है, तो उसमें मौजूद रसायन पेय में घुल सकते हैं.

एनएमसीएच हॉस्पिटल पटना के इंटरनल मेडिसिन और एंडोक्रिनोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. धर्मेन्द्र कुमार के मुताबिक,  60 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर फ्थैलेट्स, बिस्फेनॉल ए और स्टाइरीन जैसे हानिकारक तत्व चाय में मिल सकते हैं. ये पदार्थ शरीर के हार्मोन तंत्र को प्रभावित करते हैं और लंबे समय में गंभीर बीमारियों की आशंका बढ़ा सकते हैं.

डॉक्टर बताते हैं कि ये केमिकल एंडोक्राइन डिसरप्टर्स की तरह काम करते हैं, यानी एस्ट्रोजन, टेस्टोस्टेरोन, इंसुलिन और थायरॉइड जैसे हार्मोन के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं. अगर कोई व्यक्ति दिन में दो से चार बार ऐसी चाय पीता है, तो कम मात्रा में भी लगातार संपर्क शरीर पर जमा असर डाल सकता है. इसके रिजल्ट के तौर पर हार्मोन असंतुलन, बांझपन की समस्या, वजन बढ़ना, थकान, नींद की गड़बड़ी, इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप-2 डायबिटीज जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं. कुछ एक्सपर्ट तो ब्रेस्ट, प्रोस्टेट और थायरॉइड कैंसर के जोखिम में भी वृद्धि की आशंका जताते हैं.

क्या कहते हैं रिसर्च

एक्सपर्ट का कहना है कि भले ही बड़े स्तर पर मानव अध्ययन सीमित हों, लेकिन लैब और पशु स्टडी में यह संकेत मिले हैं कि ये रसायन ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाकर डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जो कैंसर का कारण बन सकता है. हालिया शोध भी चिंता बढ़ाते हैं. कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि डिस्पोजेबल कप में परोसे गए गरम पेय में हजारों माइक्रोप्लास्टिक कण मौजूद हो सकते हैं. आईआईटी खड़गपुर के साइंटिस्ट का अनुमान है कि लंबे समय तक सिंगल-यूज़ कप के इस्तेमाल से व्यक्ति के शरीर में ग्रामों के हिसाब से प्लास्टिक जमा हो सकता है. वहीं, विदेश में हुए रिसर्च में ह्यूमन ब्रेन टिश्यू में भी माइक्रोप्लास्टिक के अंश पाए गए हैं.

देश में क्या हैं नियम

Business Standard की एक रिपोर्ट के अनुसार,  भारत में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी  ने फूड-ग्रेड प्लास्टिक के उपयोग की अनुमति दी है, लेकिन जमीनी स्तर पर सस्ता और रिसाइकिल्ड प्लास्टिक अब भी धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे में एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि गरम चाय हमेशा कांच, स्टील या सिरेमिक के बर्तन में ही लें. कुल्हड़ या मिट्टी के कप भी तुलना सुरक्षित विकल्प माने जाते हैं. 

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सिरदर्द, नींद में कमी और बार-बार आ रहे क्रैम्प? शरीर में इस चीज की हो सकती है कमी

सिरदर्द, नींद में कमी और बार-बार आ रहे क्रैम्प? शरीर में इस चीज की हो सकती है कमी


How To Identify Magnesium Deficiency Naturally: बार-बार होने वाला सिरदर्द, नींद का पूरा न होना और अचानक मांसपेशियों में ऐंठन, इन लक्षणों को अक्सर हम डेली की थकान या तनाव का नतीजा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन कई बार इन सबके पीछे एक ही पोषक तत्व की कमी छिपी होती है, मैग्नीशियम. यह एक ऐसा आवश्यक खनिज है जो शरीर में 300 से अधिक जैव- केमिकल तरीकों में भूमिका निभाता है. नसों के संदेशों के आदान-प्रदान से लेकर मांसपेशियों के सिकुडन और बेहतर नींद तक, मैग्नीशियम की बड़ी भूमिका होती है. 

आधुनिक लाइफस्टाइल में मैग्नीशियम की कमी चुपचाप बढ़ रही है. एक्सपर्ट के अनुसार, यह खनिज न्यूरोमस्क्युलर स्थिरता के लिए बेहद जरूरी है. यह नसों की काम करने के तरीके को संतुलित रखता है, मांसपेशियों को रिलैक्स करने में मदद करता है और दिल की धड़कन को सामान्य बनाए रखने में भी भूमिका निभाता है. जब शरीर में इसकी कमी हो जाती है तो नसें अधिक संवेदनशील हो सकती हैं, जिससे सिरदर्द, मांसपेशियों में फड़कन, ऐंठन और यहां तक कि घबराहट जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

रोहिणी स्थित एक निजी क्लीनिक के सीनियर कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन एक्सपर्ट डॉ. सौरभ स्वराज बताते हैं कि मैग्नीशियम मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को प्रभावित करता है और पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम को कंट्रोल करता है, जो शरीर को शांत अवस्था में लाने में मदद करता है. यही वजह है कि इसकी कमी अक्सर खराब और अधूरी नींद के रूप में दिखती है. लंबे समय तक रहने वाले सिरदर्द, खासकर माइग्रेन, भी कम मैग्नीशियम स्तर से जुड़े पाए गए हैं. यह ब्लड बेसल्स और न्यूरोट्रांसमीटर को स्थिर रखने में मदद करता है, इसलिए कमी होने पर सिरदर्द की संभावना बढ़ सकती है.

क्या होते हैं संकेत?

मांसपेशियों में खिंचाव और रात के समय पैरों में ऐंठन भी शुरुआती संकेत हो सकते हैं. मांसपेशियों की सेल्स में कैल्शियम संकुचन को बढ़ाता है, जबकि मैग्नीशियम उन्हें ढीला करने में मदद करता है. संतुलन बिगड़ने पर ऐंठन और स्पाज्म की समस्या बढ़ सकती है. लगातार तनाव भी स्थिति को खराब करता है, क्योंकि इससे शरीर से मैग्नीशियम का उत्सर्जन बढ़ जाता है.

इन लोगों को रखना चाहिए ध्यान

डायबिटीज से जूझ रहे लोग, अत्यधिक कैफीन या शराब का सेवन करने वाले और डाइजेशन संबंधी समस्याओं से ग्रस्त लोग अधिक जोखिम में हो सकते हैं. एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि सप्लीमेंट लेने से पहले आहार में सुधार पर ध्यान दें. कद्दू के बीज, बादाम, पालक, दालें और साबुत अनाज मैग्नीशियम के अच्छे सोर्स हैं. जरूरत पड़ने पर ही डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लेना बेहतर रहता है.

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क्या आप भी 110 फास्टिंग शुगर को मान रहे हैं ‘नॉर्मल’? एक्सपर्ट ने इसको लेकर दी बड़ी चेतावनी

क्या आप भी 110 फास्टिंग शुगर को मान रहे हैं ‘नॉर्मल’? एक्सपर्ट ने इसको लेकर दी बड़ी चेतावनी


Is Borderline Blood Sugar Dangerous: हममें से कई लोग यह मान लेते हैं कि अगर फास्टिंग शुगर ‘लगभग नॉर्मल’ है या HbA1c डायबिटीज की सीमा से थोड़ा कम है, तो सब ठीक है. लेकिन यही सबसे बड़ी भूल हो सकती है. बॉर्डरलाइन शुगर लेवल यह संकेत है कि शरीर अंदर ही अंदर संघर्ष कर रहा है. ब्लड शुगर अचानक नहीं बढ़ती, यह धीरे-धीरे सालों में ऊपर जाती है और इस दौरान ब्लड़ बेसल्स, नसों और अंगों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देती है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

सीनियर एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. स्वाति पंडित ने TOI हेल्थ को बताया कि भारत में प्री-डायबिटीज के मामले डायबिटीज से भी ज्यादा हैं. आईसीएमआर के एक स्टडी में पाया गया कि देश में डायबिटीज की दर लगभग 11.4 प्रतिशत है, जबकि प्री-डायबिटीज करीब 15.3 प्रतिशत लोगों में मौजूद है. फास्टिंग शुगर 110 से अधिक, खाने के बाद 160 से ऊपर और HbA1c 5.7 से 6.4 के बीच हो तो इसे बॉर्डरलाइन या प्री-डायबिटीज माना जाता है. इसे नजरअंदाज करना सुरक्षित नहीं है, क्योंकि यही वह चरण है जहां से बीमारी पूरी तरह विकसित हो सकती है. 

कब करनी चाहिए चिंता?

अक्सर लोग सोचते हैं कि जब तक कोई लक्षण नहीं, तब तक चिंता की जरूरत नहीं. लेकिन इंसुलिन रेजिस्टेंस, खाने के बाद हल्के शुगर स्पाइक्स या अचानक थकान जैसे संकेत बताते हैं कि शरीर संतुलन खो रहा है. यही समय है जब सतर्क होकर बदलाव किए जाएं तो स्थिति को पलटा जा सकता है. डॉ. पंडित कहती हैं कि सबसे बड़ी गलती है बढ़े हुए शुगर लेवल को हल्के में लेना. बैठकर लंबे समय तक काम करना, अनियमित खान-पान, देर से नाश्ता या रात का खाना, दिन में ज्यादा सोना और रात में जागना, ये सभी आदतें शुगर को डायबिटीज की ओर धकेल सकती हैं. इसके अलावा अत्यधिक शराब, धूम्रपान, पारिवारिक हिस्ट्री और बढ़ता वजन भी जोखिम बढ़ाते हैं.

कैसे इससे बच सकते हैं?

एक्सपर्ट बताते हैं कि अच्छी बात यह है कि प्री-डायबिटीज को कई मामलों में रिवर्स किया जा सकता है. संतुलित और समय पर भोजन, नियमित फिजिकल एक्टिविटी, पर्याप्त नींद और तनाव में कमी बेहद अहम हैं. फास्टिंग शुगर 110 से कम, पोस्ट-प्रांडियल 160 से कम और HbA1c 5.6 से नीचे रखना सुरक्षित माना जाता है, लेकिन अगर परिवार में डायबिटीज का हिस्ट्री है या लाइफस्टाइल अनहेल्दी है, तो और भी सावधानी जरूरी है. डायबिटीज सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि कई गंभीर रोगों की जमीन तैयार करती है, जैसे कि हार्ट की बीमारी, हाई ब्लड प्रेशर, किडनी और लिवर की समस्या, स्ट्रोक और यहां तक कि कैंसर का जोखिम भी बढ़ सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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