सिर्फ सिगरेट-शराब से नहीं कैंसर का खतरा, आपकी ये 5 छोटी आदतें भी जिम्मेदार; एक्सपर्ट से जानें

सिर्फ सिगरेट-शराब से नहीं कैंसर का खतरा, आपकी ये 5 छोटी आदतें भी जिम्मेदार; एक्सपर्ट से जानें


Can Daily Pollution Increase Cancer Risk: कैंसर के बारे में सोचते हैं तो दिमाग में सबसे पहले बड़े और डरावने जोखिम आते हैं. यानी वे खतरे जिन पर साफ चेतावनी लिखी होती है, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि यह पूरी तस्वीर नहीं है. मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. राजीव विजयकुमार के मुताबिक, कैंसर का खतरा अक्सर धीरे-धीरे बनता है, रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों और एक्सपोजर के जरिए, जिन पर हम शायद ही ध्यान देते हैं. थोड़ा प्रदूषण, सनस्क्रीन न लगाना, नींद की कमी, प्रोसेस्ड फूड ज्यादा खाना, ये सब उस समय गंभीर नहीं लगते, इसलिए अनदेखे रह जाते हैं.

माइक्रो-एक्सपोजर की चर्चा कम

डॉक्टर बताते हैं कि कैंसर के बारे में आम बातचीत में इन ‘माइक्रो-एक्सपोजर’ की चर्चा कम होती है. ये इतने दिखते नहीं होते कि डर पैदा करें, लेकिन रोजाना मौजूद रहते हैं और समय के साथ असर जमा करते रहते हैं. उदाहरण के लिए वायु प्रदूषण, गाड़ियों के धुएं, निर्माण की धूल और ईंधन के दहन से निकलने वाले सूक्ष्म कण PM2.5 लंग्स की गहराई तक पहुंच सकते हैं. लंबे समय तक इनके संपर्क में रहना, यहां तक कि नॉन-स्मोकर्स में भी, लंग्स के कैंसर के जोखिम से जुड़ा पाया गया है. एक दिन का असर मामूली लगता है, लेकिन वर्षों में यह जमा हो जाता है.

इसी तरह अल्ट्रावायलेट किरणें. समुद्र तट पर तेज धूप से सनबर्न होने पर लोग सतर्क हो जाते हैं, लेकिन रोजाना की हल्की धूप ऑफिस आना-जाना, दोपहिया चलाना, आउटडोर एक्सरसाइज अक्सर नजरअंदाज हो जाती है. लगातार हल्का यूवी नुकसान त्वचा की सेल्स में डीएनए बदलाव बढ़ा सकता है.

हमारी लाइफस्टाइल का भी होता है असर

 एक्सपर्ट बताते हैं कि खानपान भी अहम है. प्रोसेस्ड मीट, ज्यादा शराब, लगातार अधिक शुगर और उससे जुड़ी मोटापा, ये रातोंरात असर नहीं दिखाते, लेकिन शरीर में सूजन, इंसुलिन रेजिस्टेंस और हार्मोनल बदलाव ऐसा माहौल बनाते हैं जिसमें असामान्य सेल्स पनप सकती हैं. नींद और सर्कैडियन रिद्म का बिगड़ना भी अब शोध का विषय है. नाइट शिफ्ट, कम नींद और अनियमित दिनचर्या मेलाटोनिन और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकती है, जो कुछ कैंसर के जोखिम से जुड़ी पाई गई है.

कैसे कर सकते हैं बचाव?

डॉ. विजयकुमार कहते हैं कि उद्देश्य डर फैलाना नहीं, बल्कि जागरूकता बढ़ाना है. हर एक्सपोजर बीमारी में नहीं बदलता, क्योंकि शरीर में डीएनए रिपेयर और इम्यून सिस्टम जैसी मजबूत सुरक्षा व्यवस्था होती है. लेकिन जब छोटे-छोटे जोखिम परत दर परत जुड़ते हैं, तब उनका महत्व बढ़ जाता है. नियमित सनस्क्रीन, घर में बेहतर वेंटिलेशन, प्रोसेस्ड मीट कम करना, शराब सीमित रखना, पर्याप्त नींद लेना और लंबे समय तक बैठने से बचना, समय के साथ जोखिम घटा सकते हैं. कैंसर अक्सर किसी एक बड़े फैसले से नहीं, बल्कि वर्षों की आदतों से आकार लेता है. इसलिए छोटी लेकिन लगातार सही पसंदें लंबी अवधि में बड़ा फर्क ला सकती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बार-बार फड़कती है आंख या चेहरे पर रहती है सूजन? इग्नोर न करें, शरीर दे रहा है ये बड़ी वार्निंग

बार-बार फड़कती है आंख या चेहरे पर रहती है सूजन? इग्नोर न करें, शरीर दे रहा है ये बड़ी वार्निंग


How To Know If You Have Magnesium Deficiency: मैग्नीशियम एक जरूरी मिनरल है जो मांसपेशियों की कार्यप्रणाली, नसों के सिग्नल, दिल की धड़कन और त्वचा की सेहत को संतुलित रखने में मदद करता है. जब शरीर में इसकी कमी होने लगती है, तो कुछ हल्के संकेत चेहरे और आंखों के आसपास दिखाई दे सकते हैं.

हालांकि यह समझना जरूरी है कि सिर्फ चेहरे में बदलाव दिखना हमेशा मैग्नीशियम की कमी का प्रमाण नहीं होता. नींद की कमी, तनाव, एलर्जी या दिनचर्या में बदलाव भी इसके पीछे हो सकते हैं. लेकिन जब लाइफस्टाइल सुधारने के बाद भी समस्या बनी रहे, तो आपको सावधान होने की जरूरत है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. मोहित शर्मा ने TOI को बताया कि मैग्नीशियम की कमी अक्सर जोरदार लक्षण नहीं देती. यह चुपचाप नसों और मांसपेशियों के संतुलन, नींद, ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म और सेल्स की मरम्मत में भूमिका निभाता है. कमी होने पर शरीर पहले खुद को एडजस्ट करने की कोशिश करता है, इसलिए शुरुआती संकेत हल्के हो सकते हैं. चलिए आपको इसके कुछ लक्षण बताते हैं.

आंख की पलक फड़कना

आंख की पलक फड़कना एक आम शिकायत है. अक्सर यह थकान, ज्यादा स्क्रीन टाइम, कैफीन या तनाव से जुड़ा होता है. लेकिन मैग्नीशियम नसों और मांसपेशियों के बीच संतुलन बनाए रखता है. इसकी कमी से न्यूरोमस्कुलर उत्तेजना बढ़ सकती है, जिससे पलक बार-बार फड़कने लगती है. अगर यह लंबे समय तक या दोनों आंखों में हो, तो जांच जरूरी हो सकती है.

डार्क सर्कल और सूजन

डार्क सर्कल और आंखों के नीचे सूजन भी कई कारणों से हो सकते हैं. नींद की कमी, एलर्जी या आयरन की कमी आम वजहें हैं. मगर मैग्नीशियम नींद को बेहतर बनाने और सूजन नियंत्रित करने में मदद करता है. इसकी कमी से चेहरा थका हुआ, फीका या सूजा हुआ दिख सकता है. कुछ लोगों में स्किन ड्राय या संवेदनशील भी हो जाती है, क्योंकि यह स्किन बैरियर और सेल रिपेयर में सहायक होता है.

ये भी होते हैं साइन

जबड़े में जकड़न, चेहरे में तनाव, हल्का कंपन या बार-बार सिरदर्द भी संकेत हो सकते हैं. मैग्नीशियम प्राकृतिक मसल रिलैक्सेंट है, इसलिए कमी होने पर मांसपेशियां अधिक सक्रिय हो सकती हैं. माइग्रेन और रोशनी के प्रति संवेदनशीलता भी कुछ मामलों में इससे जुड़ी पाई गई है.

क्या करना चाहिए आपको?

डॉक्टरों के अनुसार, मैग्नीशियम की जांच आसान नहीं है. सामान्य सीरम टेस्ट हमेशा सही तस्वीर नहीं दिखाता. इसलिए लक्षण, डाइट और जोखिम कारकों को साथ में देखकर ही निर्णय लिया जाता है. हरी पत्तेदार सब्जियां, नट्स, बीज, साबुत अनाज और दालें इसके अच्छे सोर्स हैं. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लिया जा सकता है. यदि बार-बार मांसपेशियों में ऐंठन, थकान, नींद की समस्या या गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोग हो, तो डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए. सही समय पर ध्यान देने से छोटी कमी बड़ी समस्या बनने से रोकी जा सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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छोटी उम्र में बच्चों को हो रहा ‘बुढ़ापे वाला दर्द’, डॉक्टर ने बताई झुकी कमर और गर्दन दर्द की वजह

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How To Fix Poor Posture In Children: आजकल बच्चों की झुकी हुई कमर और आगे निकली गर्दन आम दृश्य बन गया है. किसी भी क्लासरूम में नजर डालें तो कई बच्चे डेस्क पर झुके हुए, कंधे गोल किए और सिर आगे की ओर निकाले बैठे दिखते हैं. खराब पोश्चर अब सिर्फ दिखने की बात नहीं रही, यह पीठ दर्द, गर्दन में खिंचाव, थकान और यहां तक कि सांस लेने व एकाग्रता पर भी असर डाल सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं कि इससे क्या दिक्कत हो सकती है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

बाल रोग एक्सपर्ट डॉ. बबीता जैन ने TOI को बताया कि आज के बच्चे उन समस्याओं से जूझ रहे हैं जो पहले ज्यादातर वयस्कों में देखी जाती थीं. महामारी के बाद बदली जीवनशैली ने बच्चों की बढ़ती रीढ़ पर अतिरिक्त दबाव डाला है. उनका कहना है कि स्क्रीन टाइम इस बढ़ती समस्या का सबसे बड़ा कारण है. ऑनलाइन पढ़ाई, स्मार्टफोन, टैबलेट, गेमिंग कंसोल और लैपटॉप के लंबे इस्तेमाल के कारण बच्चे घंटों बैठे रहते हैं. अक्सर वे बिस्तर या सोफे पर बिना पीठ के सही सहारे के झुके रहते हैं. धीरे-धीरे यह आदत कंधों को गोल कर देती है, गर्दन आगे की ओर झुक जाती है जिसे ‘टेक्स्ट नेक’ कहा जाता है और मांसपेशियों में लगातार खिंचाव बना रहता है.

आउटडोर खेल एक बड़ी चिंता

इसके साथ ही, आउटडोर खेलकूद में कमी भी चिंता का विषय है. दौड़ना, कूदना और चढ़ना-उतरना बच्चों की कोर और पीठ की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है. जब शारीरिक गतिविधि घटती है तो रीढ़ को सहारा देने वाली मांसपेशियां कमजोर पड़ने लगती हैं. नतीजा यह होता है कि बच्चे जल्दी थक जाते हैं, झुककर बैठते हैं और दर्द की शिकायत करते हैं. भारी स्कूल बैग भी समस्या बढ़ाते हैं, खासकर जब बच्चे उसे एक ही कंधे पर टांगते हैं. डॉ. जैन चेतावनी देती हैं कि गर्दन या कमर में बार-बार दर्द, कंधों का असमान दिखना, लगातार झुका हुआ बैठना या थोड़ी देर बैठने में भी असहजता महसूस होना शुरुआती संकेत हो सकते हैं. समय रहते ध्यान न दिया जाए तो आगे चलकर क्रॉनिक दर्द या रीढ़ की संरचना से जुड़ी दिक्कतें विकसित हो सकती हैं.

कैसे ठीक कर सकते हैं इसे?

अच्छी बात यह है कि समाधान कठिन नहीं है. बच्चों को रोज फिजिकल एक्टिविटी के लिए प्रेरित करें, स्ट्रेचिंग या योग को दिनचर्या में शामिल करें और स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण रखें. बैठते समय पीठ सीधी, पैर जमीन पर सपाट और स्क्रीन आंखों के स्तर पर होनी चाहिए. स्कूल बैग का वजन बच्चे के शरीर के वजन का 10 से 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए. छोटी-छोटी सही आदतें बच्चों की रीढ़ की लंबी उम्र तक रक्षा कर सकती हैं. समय पर जागरूकता और अभिभावकों का सहयोग ही बच्चों को मजबूत, आत्मविश्वासी और दर्दमुक्त रख सकता है.

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महिलाओं के लिए सर्वाइकल कैंसर दूसरा सबसे बड़ा खतरा, जानें 5 मिनट का टेस्ट कैसे बचा सकता है जान?

महिलाओं के लिए सर्वाइकल कैंसर दूसरा सबसे बड़ा खतरा, जानें 5 मिनट का टेस्ट कैसे बचा सकता है जान?


At What Age To Start Cervical Cancer Screening: भारत में सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में होने वाले कैंसर का बड़ा हिस्सा है और यह अब देश में दूसरा सबसे आम कैंसर बन चुका है.  एक्सपर्ट का मानना है कि अगर किसी बीमारी में समय रहते जांच सचमुच जान बचा सकती है, तो वह कैंसर की स्क्रीनिंग है.  डॉ. सहाना के. पी ने TOI को बताया कि सर्वाइकल कैंसर उन गिने-चुने कैंसरों में से है जिनके लिए प्रभावी, किफायती और भरोसेमंद स्क्रीनिंग टेस्ट उपलब्ध है.

बचाव के लिए जांच बहुत जरूरी

करीब 70 से 80 प्रतिशत मामलों की जड़ हाई-रिस्क एचपीवी ह्यूमन पैपिलोमा वायरस इंफेक्शन से जुड़ी होती है. यह इंफेक्शन वर्षों तक बिना लक्षण के रह सकता है, लेकिन बाद में प्रीकैंसरस बदलाव या कैंसर का रूप ले सकता है. ऐसे में एचपीवी से बचाव और समय पर जांच बेहद जरूरी हो जाती है. पैप स्मीयर, जिसे आमतौर पर पैप टेस्ट कहा जाता है, 1940 के दशक में विकसित हुआ था. इसमें सर्विक्स से सेल्स लेकर माइक्रोस्कोप से जांच की जाती है, जिससे शुरुआती असामान्य बदलाव पकड़े जा सकते हैं.  शुरुआती चरण में पहचान होने पर इलाज आसान और सफल होने की संभावना ज्यादा रहती है.

कितने तरीके के होते हैं टेस्ट?

पैप टेस्ट दो तरीकों से किया जाता हैय पहला पारंपरिक तरीका है, जिसमें सर्विक्स से सेल्स लेकर स्लाइड पर रखी जाती हैं. दूसरा, लिक्विड बेस्ड साइटोलॉजी, जिसमें विशेष ब्रश से सेल्स लेकर तरल माध्यम में सुरक्षित करके लैब भेजी जाती हैं. यह तकनीक ज्यादा उन्नत मानी जाती है, क्योंकि इससे उसी सैंपल में एचपीवी डीएनए की जांच भी संभव होती है.

क्यों करना चाहिए टेस्ट?

कई महिलाएं यह सोचकर जांच नहीं करातीं कि अगर कोई लक्षण नहीं है तो टेस्ट की जरूरत नहीं. जबकि स्क्रीनिंग का उद्देश्य ही बिना लक्षण वाली महिलाओं में शुरुआती बदलाव पकड़ना है. सामान्य तौर पर 21 वर्ष की उम्र से या कामुक सक्रिय होने के बाद पैप टेस्ट शुरू करने की सलाह दी जाती है. 21 से 30 वर्ष तक हर तीन साल में और 30 से 65 वर्ष के बीच हर तीन साल में पैप टेस्ट या हर पांच साल में पैप के साथ एचपीवी टेस्ट कराने की सिफारिश की जाती है.

इन चीजों को रखें ख्याल

यह जांच सरल है और क्लिनिक में कुछ ही मिनटों में पूरी हो जाती है. जांच के दिन टैम्पॉन या मेंस्ट्रुअल कप का इस्तेमाल न करें और पीरियड्स के दौरान टेस्ट टालें. रिपोर्ट में “स्क्रीन पॉजिटिव” आने का मतलब कैंसर होना नहीं, बल्कि आगे की जांच की जरूरत है, जबकि “स्क्रीन नेगेटिव” रिलैक्स करने वाला परिणाम है. अगर सरल शब्दों में कहा जाए, तो  पैप टेस्ट एक सरल, सुरक्षित और जीवनरक्षक जांच है. नियमित स्क्रीनिंग से सर्वाइकल कैंसर का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है और महिलाओं को लंबी, स्वस्थ जिंदगी का भरोसा मिलता है.

इसे भी पढ़ें: Cancer Warning Symptoms: देश में हर साल बढ़ रहे कैंसर के 15 लाख मामले, जानें जानलेवा बीमारी के 3 सबसे कॉमन लक्षण

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कुछ लोगों को दिक्कत क्यों देता है अमरूद, जानें किन 4 लोगों को इसे खाने से करना चाहिए परहेज?

कुछ लोगों को दिक्कत क्यों देता है अमरूद, जानें किन 4 लोगों को इसे खाने से करना चाहिए परहेज?


Who Should Avoid Eating Guava: अमरूद देखने में भले ही छोटा और साधारण लगे, लेकिन पोषण के मामले में यह बेहद समृद्ध फल है. इसमें विटामिन सी, फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और नेचुरल ऊर्जा देने वाले तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. पाचन सुधारने, इम्यूनिटी मजबूत करने, दिल की सेहत बेहतर रखने और त्वचा में निखार लाने के लिए कई लोग इसे अपनी रोजमर्रा की डाइट में शामिल करते हैं. पोषण एक्सपर्ट भी इसे हेल्दी फल मानते हैं. हेल्थ के मामले में जानकारी देने वाली बेवसाइट  Medicalnewstoday के अनुसार इससे कुछ दिक्कत हो सकती है, चलिए जानते हैं. 

जिनका डाइजेशन संवेदनशील है या IBS की समस्या है

अमरूद में फाइबर की मात्रा अधिक होती है, खासकर इसके सख्त बीज कई लोगों के लिए पचाना मुश्किल हो सकते हैं. जिन्हें अक्सर गैस, एसिडिटी, पेट फूलना या इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम  की शिकायत रहती है, उनके लिए ज्यादा फाइबर आंतों में जलन पैदा कर सकता है. ऐसे लोगों को अमरूद खाने के बाद पेट दर्द, ऐंठन, दस्त या भारीपन महसूस हो सकता है. इसलिए एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि अगर पाचन कमजोर है तो अमरूद बहुत कम मात्रा में खाएं, बीज निकाल दें या कच्चा अमरूद खाने से बचें.

डायबिटीज या ब्लड शुगर की समस्या वाले लोग

अमरूद में प्राकृतिक शर्करा मौजूद होती है, जो बिना संतुलन के खाने पर ब्लड ग्लूकोज बढ़ा सकती है. टाइप 2 डायबिटीज से जूझ रहे लोगों को पका हुआ अमरूद या उसका जूस लेने से शुगर स्पाइक का खतरा हो सकता है. खाली पेट अमरूद खाने से ग्लूकोज तेजी से एब्जॉर्व हो सकता है. इसलिए डायबिटीज मरीजों को सीमित मात्रा में, कम पका अमरूद और डॉक्टर या न्यूट्रिशनिस्ट की सलाह के बाद ही इसका सेवन करना चाहिए.

ये दिक्कतें भी हो सकती हैं

कुछ लोगों में अमरूद खाने से खुजली, लाल चकत्ते या एक्जिमा भड़क सकता है. माना जाता है कि अमरूद शरीर की आंतरिक गर्मी बढ़ा सकता है, जो संवेदनशील त्वचा वालों में जलन और सूजन को बढ़ा देता हैय अगर अमरूद खाने के बाद बार-बार त्वचा पर प्रतिक्रिया दिखे तो यह संकेत है कि शरीर इसे सहन नहीं कर पा रहा. ऐसे में इसका सेवन सीमित या बंद करना बेहतर होता है. अमरूद को ठंडी तासीर वाला फल माना जाता है. यानि लोगों को जल्दी सर्दी, खांसी, साइनस या गले में खराश की समस्या रहती है, उनमें यह बलगम बढ़ा सकता है. खासकर सर्दियों में या रात के समय अमरूद खाने से कुछ लोगों में खांसी और गले की तकलीफ बढ़ सकती है.

क्या करना चाहिए आपको?

अमरूद पौष्टिक है, लेकिन सेहत हमेशा व्यक्तिगत होती है. अगर इसे खाने से पेट दर्द, सूजन, खुजली या असहजता महसूस हो तो इसे नजरअंदाज न करें. हर शरीर की पाचन क्षमता, मेटाबॉलिज्म और जरूरत अलग होती है. समझदारी इसी में है कि अपने शरीर के संकेतों को पहचानें और उसी के अनुसार भोजन का चुनाव करें. सही जानकारी और जागरूकता के साथ लिया गया निर्णय ही लंबे समय तक स्वस्थ जीवन की कुंजी है.

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क्या रोज सुबह 3 बजे खुल जाती है आपकी नींद, जान लें क्या है इसका मतलब?

क्या रोज सुबह 3 बजे खुल जाती है आपकी नींद, जान लें क्या है इसका मतलब?


Why Do I Wake Up At 3 AM Every Night: सफलता अक्सर खुशियां, सम्मान और समृद्धि लेकर आती है, लेकिन कई बार यही सफलता आसपास के लोगों के मन में हल्की असहजता भी पैदा कर देती है. हिंदू मान्यताओं में कहा गया है कि शनि की साढ़ेसाती के दौरान व्यक्ति के कर्म, धैर्य और विनम्रता की परीक्षा होती है. जब आप आगे बढ़ते हैं, आत्मविश्वास से भरते हैं और उपलब्धियां हासिल करते हैं, तो कुछ लोगों के भीतर छिपी तुलना और असुरक्षा सतह पर आ सकती है. यह आपकी गलती नहीं, बल्कि उनके अपने जीवन-पाठ का हिस्सा है. चलिए आपको हेल्थ के नजरिए से बताते हैं कि क्या होता है. 

क्या हो रही है दिक्कत?

मेंटल और इमोशनल दबाव का असर सिर्फ रिश्तों पर ही नहीं, नींद पर भी पड़ता है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था Mayoclinic के अनुसार मेंटेनेंस इंसोम्निया यानी रात में बार-बार नींद खुल जाना, आजकल एक आम समस्या बनती जा रही है. इसका सबसे बड़ा कारण तनाव है.

जब मन लगातार सतर्क अवस्था में रहता है, तो शरीर गहरी नींद में नहीं जा पाता. काम का दबाव, परिवार की जिम्मेदारियां, पैसों की चिंता या स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां रात में जागने का कारण बनती हैं. तनाव बढ़ने पर शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जो दिमाग को सक्रिय रखता है. कई बार बुरे सपने, पुराने चोट या नींद न आने की चिंता भी इसी चक्र को और मजबूत कर देती है.

किन कारणों से रात में नींद खुलती है?

शारीरिक असुविधा भी नींद टूटने की बड़ी वजह हो सकती है. कमर दर्द, गठिया, नसों का दर्द, एसिड रिफ्लक्स या बार-बार यूरिन आना रात में जागने के सामान्य कारण हैं. उम्र बढ़ने के साथ ये समस्याएं और बढ़ सकती हैं, जिससे नींद की क्लालिटी प्रभावित होती है.

शरीर में हल्की सी तकलीफ भी ब्रेन को संकेत देती है और गहरी नींद टूट जाती है. ऐसे में मूल कारण का इलाज जरूरी है. सही गद्दे और तकिए का चुनाव, डॉक्टर की सलाह और दर्द प्रबंधन से राहत मिल सकती है.

उम्र के साथ बदलता है नींद का पैटर्न

उम्र के साथ नींद का पैटर्न बदलना स्वाभाविक है. बढ़ती उम्र में नींद हल्की हो जाती है और बार-बार खुल सकती है. महिलाओं में रजोनिवृत्ति के आसपास हार्मोनल बदलाव, खासकर एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन में उतार-चढ़ाव, भी नींद को प्रभावित करते हैं. हॉट फ्लैश और मूड में बदलाव आराम को बाधित करते हैं.

आपका सोने का वातावरण भी अहम भूमिका निभाता है. कमरे में ज्यादा रोशनी, बाहर का शोर, असुविधाजनक तापमान या साथी के खर्राटे नींद में बाधा डाल सकते हैं. सोने से पहले मोबाइल या लैपटॉप का इस्तेमाल मेलाटोनिन के स्राव को कम करता है. बेहतर है कि कमरा शांत, अंधेरा और ठंडा रखा जाए और सोने से कम से कम आधा घंटा पहले स्क्रीन से दूरी बना ली जाए.

कैसे बचा जा सकता है?

क्रॉनिक अनिद्रा के इलाज में कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी फॉर इंसोम्निया को प्रभावी माना जाता है. यह थेरेपी निगेटिव सोच को बदलने और सोने की आदतों को सुधारने में मदद करती है. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर सीमित समय के लिए दवा भी दे सकते हैं. नियमित सोने-जागने का समय तय करना, शाम को कैफीन से बचना, दिन में लंबी झपकी न लेना और गहरी सांस लेने जैसे अभ्यास अपनाने से सर्कैडियन रिदम बहाल किया जा सकता है.

इसे भी पढ़ें- Dietary Supplements Health Risks: ‘नेचुरल’ के चक्कर में कहीं लिवर-किडनी न हो जाए डैमेज? इन 7 सप्लीमेंट्स से आज ही बना लें दूरी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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