क्या है चैटजीपीटी हेल्थ, क्या है इसकी खासियत और मरीजों के लिए कितना फायदेमंद?

क्या है चैटजीपीटी हेल्थ, क्या है इसकी खासियत और मरीजों के लिए कितना फायदेमंद?


Can ChatGPT Analyze Medical Reports: OpenAI ने 7 जनवरी को चैटजीपीटी हेल्थ नाम से एक नया हेल्थ-फोकस्ड फीचर लॉन्च किया है, जो यूजर्स को स्वास्थ्य से जुड़े सवालों के जवाब देने के साथ-साथ मेडिकल रिकॉर्ड अपलोड करने और वेलनेस ऐप्स को कनेक्ट करने की सुविधा देता है. इस नए टैब के जरिए यूजर Apple Health, MyFitnessPal जैसे ऐप्स को जोड़कर अपनी हेल्थ जानकारी को एक जगह देख और समझ सकते हैं.

इसलिए किया गया तैयार

चैटजीपीटी हेल्थ को खास तौर पर इसलिए तैयार किया गया है क्योंकि चैटबॉट से सबसे ज्यादा पूछे जाने वाले सवालों में हेल्थ से जुड़े सवाल शामिल रहते हैं. अब यूजर्स को स्वास्थ्य जानकारी के लिए अलग-अलग जगह भटकने की जरूरत नहीं होगी. यह एक डेडिकेटेड स्पेस देता है, जहां हेल्थ से जुड़ी बातचीत ज्यादा सटीक और उपयोगी हो जाती है. इस फीचर की मदद से लोग अपनी हाल की मेडिकल रिपोर्ट या लैब टेस्ट रिजल्ट को आसानी से समझ सकते हैं. डॉक्टर के पास जाने से पहले रिपोर्ट का सार जानना, ब्लड टेस्ट की जानकारी समझना या अपॉइंटमेंट की तैयारी करना अब पहले से कहीं आसान हो जाएगा. इसके अलावा, यह डाइट और वर्कआउट से जुड़ी गाइडेंस भी दे सकता है.

बीमा से जुड़े फैसलों में भी मददगार

चैटजीपीटी हेल्थ बीमा से जुड़े फैसलों में भी मददगार साबित हो सकता है. यूजर अपनी हेल्थ जरूरतों के हिसाब से अलग-अलग इंश्योरेंस विकल्पों की तुलना कर सकते हैं और यह समझ सकते हैं कि उनके लिए कौन सा विकल्प ज्यादा फायदेमंद हो सकता है.

हेल्थ प्राइवेसी को लेकर क्या का

प्राइवेसी को लेकर OpenAI ने साफ किया है कि चैटजीपीटी हेल्थ एक अलग और सुरक्षित स्पेस में काम करता है, यहां की गई बातचीत और अपलोड किया गया हेल्थ डेटा मॉडल को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. कंपनी के मुताबिक, संवेदनशील स्वास्थ्य जानकारी की सुरक्षा को इसमें प्राथमिकता दी गई है. OpenAI का कहना है कि चैटजीपीटी हेल्थ का मकसद मेडिकल केयर की जगह लेना नहीं है, बल्कि लोगों को सही जानकारी देकर बेहतर फैसले लेने में मदद करना है. यह एक सपोर्ट टूल की तरह काम करेगा, जिससे मरीज ज्यादा जागरूक बन सकें.

लोगों को कैसे मिलेगा फायदा

फिलहाल इस फीचर को इस्तेमाल करने के लिए यूजर्स को वेटलिस्ट में साइन-अप करना होगा. एक्सेस मिलने के बाद चैटजीपीटी के साइडबार में हेल्थ ऑप्शन चुनकर मेडिकल रिकॉर्ड अपलोड किए जा सकते हैं और हेल्थ ऐप्स को कनेक्ट किया जा सकता है. अगर सरल शब्दों में बात की जाए, तो चैटजीपीटी हेल्थ मरीजों के लिए जानकारी समझने और हेल्थ मैनेजमेंट को आसान बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आंखों के नीचे पड़ रहे पीले धब्बे तो न करें इग्नोर, चेहरे पर दिखते हैं कोलेस्ट्रॉल के ये 5 लक्षण

आंखों के नीचे पड़ रहे पीले धब्बे तो न करें इग्नोर, चेहरे पर दिखते हैं कोलेस्ट्रॉल के ये 5 लक्षण


Symptoms Of High Cholesterol On Face: अक्सर कोलेस्ट्रॉल को सिर्फ हार्ट से जोड़कर देखा जाता है, जबकि इसके संकेत चेहरे और आंखों पर भी नजर आ सकते हैं. कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए जरूरी है, लेकिन जब खराब एलडीएल बढ़ जाता है और अच्छा एचडीएल घटता है, तब समस्या शुरू होती है. ऐसे में आर्टरीज में फैट जमा होने लगता है, जिससे हार्ट डिजीज और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है.

नॉर्मली कोलेस्ट्रॉल लेवल 100 mg/dL से नीचे होना चाहिए. हाई कोलेस्ट्रॉल की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इसके लक्षण साफ तौर पर महसूस नहीं होते. लेकिन शरीर कभी-कभी त्वचा और आंखों के जरिए इशारे जरूर देता है, जिन्हें समय रहते समझना जरूरी है. चलिए आपको इसके पांच ऐसे लक्षणों के बारे में बताते हैं, जो आपके चेहरे पर दिखाई देते हैं. 

 

 आंखों के आसपास पीले उभरे धब्बे
अगर पलकों के अंदरूनी कोने पर हल्के पीले, मुलायम धब्बे दिखें, तो यह Xanthelasma हो सकता है. ये धब्बे त्वचा के नीचे जमा कोलेस्ट्रॉल से बनते हैं. कई मामलों में ऐसे लोगों का एलडीएल या कुल कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ पाया गया है.

आंख की पुतली के चारों ओर सफेद या ग्रे रिंग
कॉर्नियल आर्कस नाम की यह रिंग आंख के बाहरी हिस्से में नजर आती है। उम्र बढ़ने पर यह सामान्य हो सकती है, लेकिन कम उम्र में दिखे तो यह हाई कोलेस्ट्रॉल और हार्ट के खतरे का संकेत हो सकता है.

चेहरे की त्वचा का रूखा या बदला हुआ रंग
कोलेस्ट्रॉल असंतुलन शरीर में सूजन बढ़ा सकता है, जिसका असर चेहरे की त्वचा पर भी दिखता है. लगातार रफनेस, पैचेज या रंग में बदलाव को हल्के में नहीं लेना चाहिए.

 होंठ या चेहरे पर हल्का नीलापन या फीका रंग
जब धमनियों में फैट जमा होने लगता है, तो ब्लड फ्लो प्रभावित होता है. इससे त्वचा तक ऑक्सीजन सही से नहीं पहुंचती और चेहरे पर फीका या नीला-सा रंग दिख सकता है.

चेहरे पर लगातार सूजन या रेडनेस
हाई कोलेस्ट्रॉल से जुड़ी अंदरूनी सूजन कभी-कभी चेहरे पर भी झलकती है. बार-बार रेडनेस, जलन या एक्ने-जैसी समस्या इसका संकेत हो सकती है.

अगर चेहरे या आंखों पर ऐसे बदलाव दिखें, तो सिर्फ क्रीम या घरेलू उपायों पर निर्भर न रहें. सही तरीका यही है कि लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराकर कोलेस्ट्रॉल लेवल की जांच कराई जाए. समय रहते खान-पान, एक्सरसाइज और जरूरत पड़ने पर दवा से इसे कंट्रोल किया जा सकता है. एक बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि ये लक्षण तभी चेहेर पर दिखाई देते हैं जब कोलेस्ट्रॉल का लेवल काफी बढ़ जाता है. इसलिए जब आपको ये लक्षण दिखाई दें, तो समझ लाजिए कि स्थिति काफी खराब है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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उत्तर भारत में ठंड का प्रकोप, AIIMS के डॉक्टरों ने बताया किन बीमारियों पर पड़ रहा सबसे ज्यादा असर?

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अंडों में मिलने वाला नाइट्रोफ्यूरान कितना खतरनाक, इससे क्या-क्या बीमारियां होने का खतरा?

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FSSAI Rejects Cancer Claims Linked To Eggs: आजकल सोशल मीडिया के जमाने में लोग फेमस होने के लिए कुछ भी पोस्ट करते रहते हैं. हालांकि, कई बार हद तब हो जाती है, जब ये पोस्ट आपकी सेहत से जुड़ा हो. हाल ही में सोशल मीडिया पोस्ट में यह दावा किया जा रहा था कि अंडों में नाइट्रोफ्यूरान नामक प्रतिबंधित रसायन पाया गया है. लोगों ने इसको कैंसर बताने वाला बता दिया. फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया  ने अंडों को कैंसर से जोड़ने वाले दावों को सख्ती से खारिज किया है. एफएसएसएआई ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा कि भारत में बिकने वाले अंडे पूरी तरह सुरक्षित हैं और हाल में सामने आई रिपोर्ट्स व सोशल मीडिया पोस्ट वैज्ञानिक आधारहीन हैं, जो अनावश्यक डर फैलाती हैं.

नाइट्रोफ्यूरान का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित

फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने नाइट्रोफ्यूरान मेटाबोलाइट्स को लेकर उठी आशंकाओं पर भी स्थिति स्पष्ट की थी. ये ऐसे ट्रेस मार्कर होते हैं, जो मुर्गी पालन में प्रतिबंधित नाइट्रोफ्यूरान एंटीबायोटिक्स के अवैध इस्तेमाल की स्थिति में अंडों में मिल सकते हैं. एफएसएसएआई के मुताबिक, भारत के फूड सेफ्टी नियमों के तहत पोल्ट्री और अंडा उत्पादन के हर स्तर पर नाइट्रोफ्यूरान का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित हैय इसलिए अंडों में कैंसर पैदा करने वाले तत्व होने का दावा भ्रामक हैय

FSSAI ने बताया कि नाइट्रोफ्यूरान मेटाबोलाइट्स के लिए 1.0 माइक्रोग्राम प्रति किलोग्राम की एक्स्ट्रेनियस मैक्सिमम रेजिड्यू लिमिट सिर्फ जांच की नियामक सीमा है, न कि कोई अनुमान के योग्य मात्रा. EMRL से नीचे की मामूली मौजूदगी न तो फूड सेफ्टी उल्लंघन मानी जाती है और न ही इससे स्वास्थ्य को कोई खतरा होता है.

FSSAI ने यह भी कहा कि भारत के मानक वैश्विक नियमों के अनुरूप हैं. यूरोपियन यूनियन और अमेरिका भी नाइट्रोफ्यूरान पर प्रतिबंध लगाते हैं और ऐसे संदर्भ मानकों का उपयोग केवल लागू करने के लिए किया जाता है, न कि सुरक्षा सीमा तय करने के लिए. अलग-अलग देशों में आंकड़ों का फर्क जांच तकनीकों के कारण होता है, न कि सुरक्षा मानकों में अंतर की वजह से.

क्या इससे कैंसर होता है?

पब्लिक हेल्थ के लिहाज से FSSAI ने स्पष्ट किया कि नाइट्रोफ्यूरान मेटाबोलाइट्स के बेहद कम स्तर के आहार सेवन और कैंसर के बीच कोई स कारण-परिणाम संबंध नहीं है. दुनिया की किसी भी स्वास्थ्य संस्था ने सामान्य अंडा सेवन को कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से नहीं जोड़ा है. किसी खास ब्रांड से जुड़ी रिपोर्ट्स पर प्रतिक्रिया देते हुए एफएसएसएआई  ने कहा कि ऐसे मामले अलग-थलग और बैच-विशेष होते हैं, जो अक्सर अनजाने गंदगी या फीड से जुड़े कारणों से सामने आते हैं. ये पूरे अंडा सप्लाई चेन का प्रतिनिधित्व नहीं करते.  एफएसएसएआई ने उपभोक्ताओं से आधिकारिक सलाह और वैज्ञानिक साक्ष्यों पर भरोसा करने की अपील करते हुए दोहराया कि तय मानकों के अनुसार बने और यूज किए गए अंडे उर्जा और सुरक्षित आहार का हिस्सा बने रहते हैं. 

अंडे सेहत के लिए कितने फायदेमंद?

अगर अंडों से सेहत को होने वाले फायदों की बात करें, तो 2025 की फ्रेमिंघम ऑफस्प्रिंग स्टडी के अनुसार एक खुलासा किया किया गया था. इसमें बताया गया था कि  पांच या उससे ज्यादा अंडे एक हफ्ते में सेवन करने वालों को प्री-डायबिटीज, टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और कार्डियोवस्कुलर का खतरा कम होता है. इसके पीछे इन अंडों में पाया जाने  वाला एंटीऑक्सिडेंट्स प्रोटीन सबसे बड़ी वजह है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! क्या आपको भी खाने के बाद महसूस होता है पेट में भारीपन? इस बीमारी के हो सकते हैं लक्षण

सावधान! क्या आपको भी खाने के बाद महसूस होता है पेट में भारीपन? इस बीमारी के हो सकते हैं लक्षण


Early Stomach Symptoms Of Fatty Liver Disease: फैटी लिवर डिजीज, जिसे अब MASLD कहा जाता है, अक्सर बहुत हल्के और नजरअंदाज़ होने वाले पेट से जुड़े लक्षणों के साथ सामने आती है. कई बार तो ब्लड टेस्ट या स्कैन में कोई गड़बड़ी दिखने से पहले ही शरीर संकेत देने लगता है. वर्ल्ड जर्नल ऑफ हेपेटोलॉजी में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक, पेट फूलना, बेचैनी और ऊपरी पेट में भारीपन जैसे लक्षण इस बात का इशारा हो सकते हैं कि लिवर पर पहले से ही दबाव पड़ रहा है और उसका मेटाबॉलिज्म प्रभावित होने लगा है.

मेडिकल भाषा में फैटी लिवर को पहले नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज कहा जाता था, जिसे अब मेटाबॉलिक डिसफंक्शन एसोसिएटेड स्टीएटोटिक लिवर डिजीज  कहा जा रहा है. यह बीमारी काफी आम है, लेकिन अक्सर समय पर पहचान में नहीं आ पाती. शुरुआत में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं और ज्यादातर पेट या पाचन से जुड़े रहते हैं, इसलिए लोग इन्हें सामान्य गैस या अपच समझकर टाल देते हैं.

क्या निकला रिसर्च में?

रिसर्च बताती है कि फैटी लिवर के शुरुआती संकेत अक्सर पेट में ही दिखाई देते हैं. अध्ययन में पाया गया कि कई मरीजों को ब्लड रिपोर्ट या अल्ट्रासाउंड नॉर्मल होने के बावजूद पेट फूलना, मतली और दाईं ओर ऊपरी पेट में असहजता महसूस होती है। ये संकेत बताते हैं कि लिवर का पाचन और पोषक तत्वों को प्रोसेस करने वाला काम प्रभावित होने लगा है. फैटी लिवर तब होता है जब लिवर में जरूरत से ज्यादा चर्बी जमा होने लगती है, जो अक्सर शराब से जुड़ी नहीं होती. जैसे-जैसे यह चर्बी बढ़ती है, लिवर सूज सकता है या उसमें हल्की सूजन आ सकती है, जिससे पेट के ऊपरी हिस्से में परेशानी महसूस होने लगती है.

पेट की दिक्कत में छिपे होते हैं संकेत

अक्सर लोग सोचते हैं कि लिवर की बीमारी में सिर्फ पीलिया जैसे साफ लक्षण दिखते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि शुरुआती संकेत पेट में ही छिपे होते हैं, सबसे आम लक्षण है पेट के दाहिने ऊपरी हिस्से में हल्का लेकिन लगातार दर्द या दबाव महसूस होना, कई लोगों को ऐसा लगता है जैसे पेट के अंदर कुछ भारी-सा दब रहा हो, खासकर करवट लेने पर.फैटी लिवर वाले लोगों में पेट फूलने और जल्दी भरा-भरा महसूस होने की शिकायत भी आम है. हल्का सा खाने के बाद भी पेट भरा हुआ लग सकता है, गैस बन सकती है और कभी-कभी पेट हल्का फूला हुआ दिखने लगता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लिवर पाचन प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है और जब वह ठीक से काम नहीं करता, तो पाचन धीमा पड़ जाता है.

मतली और अपच भी फैटी लिवर के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं. कई लोगों को तला-भुना या भारी खाना खाने के बाद उलझन, जी मिचलाना या पेट में जलन महसूस होती है, ये लक्षण अक्सर आते-जाते रहते हैं और खराब डाइट, ज्यादा खाने या फिजिकल एक्टिविटी की कमी से बढ़ सकते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर पेट से जुड़े इन शुरुआती लक्षणों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो फैटी लिवर को गंभीर स्टेज जैसे फाइब्रोसिस या सिरोसिस तक बढ़ने से रोका जा सकता है. सही खानपान, नियमित एक्सरसाइज, प्रोसेस्ड फूड से दूरी और समय पर डॉक्टर से सलाह लेने से लिवर की सेहत को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है.

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क्या बार-बार ब्लड प्रेशर चेक करने से जल्दी बीमार पड़ते हैं आप, जान लें क्या कहते हैं डॉक्टर?

क्या बार-बार ब्लड प्रेशर चेक करने से जल्दी बीमार पड़ते हैं आप, जान लें क्या कहते हैं डॉक्टर?


Is It Bad To Check Blood Pressure Frequently: कई लोग बार-बार अपना ब्लड प्रेशर चेक करते रहते हैं, लेकिन सवाल यह है कि कितनी बार जांच करना ठीक है और कब यह आदत नुकसानदेह हो सकती है. यही सवाल हाल ही में क्वोरा पर भी सामने आया क्या बार-बार ब्लड प्रेशर चेक करना गलत है? इसको लेकर इंडियन एक्सप्रेस से जुबिटर हॉस्पिटल, ठाणे में इंटरनल मेडिसिन के डायरेक्टर डॉक्टर अमित सराफ ने बात की. उन्होंने बताया कि नियमित रूप से ब्लड प्रेशर मापना अपने आप में नुकसानदेह नहीं है, लेकिन इसे किस तरह और किस वजह से किया जा रहा है, यह ज्यादा मायने रखता है. कुछ लोगों के लिए बार-बार मापने से तसल्ली मिलती है और बीमारी को संभालने में मदद मिलती है, जबकि कुछ लोगों में यही आदत चिंता बढ़ा देती है, जिससे रीडिंग भी अस्थायी रूप से ज्यादा आ सकती है.

कब नहीं होता है यह फायदेमंद?

डॉक्टर के मुताबिक, समस्या तब शुरू होती है जब लोग बिना डॉक्टर की सलाह के दिन में कई बार ब्लड प्रेशर मापने लगते हैं. हर तनावपूर्ण स्थिति, हर खाने के बाद या हल्के-फुल्के लक्षणों पर तुरंत मशीन निकाल लेना फायदेमंद नहीं होता. ऐसा करने से मेजरमेंट एंग्जायटी हो सकती है, यानी रीडिंग को लेकर तनाव इतना बढ़ जाता है कि ब्लड प्रेशर अस्थायी रूप से बढ़ा हुआ दिखने लगता है. यह जरूरी नहीं कि व्यक्ति का असली ब्लड प्रेशर हाई हो, कई बार यह सिर्फ मानसिक तनाव का असर होता है.

होम ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग उन लोगों के लिए ज्यादा उपयोगी मानी जाती है, जिन्हें पहले से हाई ब्लड प्रेशर की समस्या है, जो ब्लड प्रेशर की दवाइयां ले रहे हैं, खासतौर पर तब, जब हाल ही में दवा की डोज बदली गई हो या फिर जिन्हें डायबिटीज, किडनी की बीमारी या दिल से जुड़ी समस्याएं हों. वहीं, जिन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर नहीं है और जो सामान्य तौर पर स्वस्थ हैं, उनके लिए रोज़ाना ब्लड प्रेशर चेक करना जरूरी नहीं होता.

कब मापना चाहिए ब्लड प्रेशर?

अगर जांच की सही फ्रीक्वेंसी की बात करें, तो डॉक्टर बताते हैं कि ज्यादातर हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए कुछ दिनों तक सुबह और शाम एक-एक बार ब्लड प्रेशर मापना पर्याप्त होता है, वह भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार. लंबे समय में हफ्ते में कुछ बार या डॉक्टर से मिलने से पहले रीडिंग लेना काफी माना जाता है. इसके अलावा, अगर लगातार सिरदर्द, चक्कर, सीने में भारीपन, असामान्य थकान या दिल की धड़कन तेज महसूस हो, तो उस समय ब्लड प्रेशर जांचना मददगार हो सकता है. इससे डॉक्टर को यह समझने में आसानी होती है कि रीडिंग का मरीज की मौजूदा स्थिति से क्या संबंध है.

किन चीजों का ध्यान रखना चाहिए?

घर पर ब्लड प्रेशर मापते समय सटीकता का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. मापने से पहले कम से कम पांच मिनट तक शांति से बैठना चाहिए. जांच से आधे घंटे पहले कैफीन, धूम्रपान या एक्सरसाइज से बचना बेहतर होता है. हाथ को दिल के स्तर पर सहारा देकर रखना चाहिए और भरोसेमंद डिजिटल ब्लड प्रेशर मशीन का इस्तेमाल करना चाहिए. बेहतर नतीजों के लिए दो रीडिंग लेकर उनका औसत नोट करना सही रहता है. डॉक्टर कहते हैं कि समझदारी से किया गया ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग डॉक्टरों को सही फैसले लेने में मदद करता है, लेकिन अगर यह आदत जरूरत से ज्यादा और बिना कारण की हो जाए, तो यह उलझन और तनाव ही बढ़ाती है. मकसद जागरूक रहना होना चाहिए, घबराना नहीं.

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