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कलाई पर रखें उंगली और 10 सेकंड में जानें दिल का हाल, एक्सपर्ट ने बताया बीमारी पकड़ने का तरीका

कलाई पर रखें उंगली और 10 सेकंड में जानें दिल का हाल, एक्सपर्ट ने बताया बीमारी पकड़ने का तरीका


How To Check Your Pulse For Heart Problems: आज के दौर में लोग अपनी सेहत को लेकर पहले से कहीं ज्यादा जागरूक हो गए हैं. कोई स्मार्टवॉच से कदम गिन रहा है तो कोई ब्लड प्रेशर और नींद पर नजर रख रहा है. लेकिन दिल की सेहत से जुड़ा एक बेहद आसान और पुराना तरीका आज भी ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं कि अपनी नाड़ी यानी पल्स चेक करना. चलिए आपको बताते हैं कि क्यों यह आपके लिए जरूरी है. 

पल्स जांचकर हार्ट के बारे में पता करना

एक्सपर्ट का कहना है कि केवल 10 सेकंड में अपनी पल्स जांचकर दिल की एक ऐसी समस्या का शुरुआती संकेत पाया जा सकता है, जो लंबे समय तक बिना किसी लक्षण के शरीर में मौजूद रह सकती है. यह जानकारी खास तौर पर वर्ल्ड हार्ट रिदम वीक के दौरान महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसका उद्देश्य लोगों को दिल की धड़कन से जुड़ी बीमारियों के प्रति जागरूक करना है. 

कैसे काम करता है यह?

हार्ट की सबसे आम रिदम संबंधी समस्याओं में से एक है एट्रियल फिब्रिलेशन .  इस स्थिति में दिल के ऊपरी चैम्बर अनियमित तरीके से धड़कने लगते हैं और दिल की सामान्य लय बिगड़ जाती है. समस्या यह है कि कई लोगों को इसके कोई स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते. कुछ मरीजों को धड़कन तेज महसूस होना, सांस फूलना, चक्कर आना या थकान हो सकती है, लेकिन कई लोग पूरी तरह सामान्य महसूस करते हैं. 

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कई बार बिना किसी लक्षण के मौजूद

अमेरिका के नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के अनुसार, एट्रियल फिब्रिलेशन कई बार बिना किसी लक्षण के मौजूद रह सकता है और इसका पता केवल नियमित जांच के दौरान चलता है.  यदि इसका समय पर इलाज न किया जाए तो स्ट्रोक और अन्य हार्ट संबंधी दिक्कतों का खतरा बढ़ सकता है. डॉ. प्रदीप जैन ने TOI को बताया कि एक साधारण पल्स चेक कई बार दिल की अनियमित धड़कन का शुरुआती संकेत दे सकता है. 

10 सेकंड में कैसे पता कर सकते हैं?

उनके अनुसार, अपनी तर्जनी और मध्यमा उंगली को अंगूठे के नीचे कलाई के अंदरूनी हिस्से पर रखें और करीब 10 सेकंड तक धड़कन महसूस करें. यदि धड़कन नियमित और समान अंतराल पर महसूस हो रही है तो आमतौर पर चिंता की बात नहीं होती. लेकिन अगर धड़कन कभी तेज, कभी धीमी या अनियमित महसूस हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो सकता है. हालांकि एक्सपर्ट यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल पल्स चेक करके एट्रियल फिब्रिलेशन या किसी अन्य बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती. यह सिर्फ एक शुरुआती चेतावनी संकेत की तरह काम करता है, जिससे समय रहते मेडिकल जांच कराई जा सके. डॉ. प्रदीप जैन के मुताबिक, बढ़ती उम्र, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, हार्ट रोग और शारीरिक गतिविधि की कमी जैसी स्थितियां अनियमित दिल की धड़कन का जोखिम बढ़ा सकती हैं. भारत में इन समस्याओं के तेजी से बढ़ते मामलों को देखते हुए लोगों को अपने दिल की लय पर ध्यान देना चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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नाम भूलना सामान्य पर चेहरा भूलना बड़ी बीमारी का संकेत, एक्सपर्ट ने दी बड़ी चेतावनी

नाम भूलना सामान्य पर चेहरा भूलना बड़ी बीमारी का संकेत, एक्सपर्ट ने दी बड़ी चेतावनी


Difference Between Forgetting Names And Forgetting Faces: क्या किसी का नाम भूल जाना और उसका चेहरा भूल जाना एक ही बात है? पहली नजर में यह दोनों सामान्य भूलने की आदत लग सकती हैं, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि हमारे दिमाग में इन दोनों के लिए अलग-अलग सिस्टम काम करते हैं. यही वजह है कि किसी परिचित व्यक्ति का चेहरा पहचान लेने के बावजूद उसका नाम याद न आना आम बात है, जबकि किसी करीबी का चेहरा ही न पहचान पाना कहीं अधिक गंभीर संकेत माना जाता है. 

क्यों भूल जाता है इंसान?

कल्पना कीजिए कि आप किसी समारोह में पहुंचे और सामने खड़े व्यक्ति को देखते ही पहचान गए, लेकिन उसका नाम याद नहीं आया. ऐसा अक्सर कई लोगों के साथ होता है. दरअसल, नाम याद रखना और उसे सही समय पर दिमाग से निकाल पाना भाषा और याद से जुड़े नेटवर्क पर निर्भर करता है. वहीं चेहरों की पहचान करने का काम दिमाग के स्पेशल विजुअल रिकग्निशन नेटवर्क की तरफ किया जाता है. एपोक एल्डर केयर की मुख्य कार्यकारी अधिकारी और को- फाउंडर, डिमेंशिया विशेषज्ञ एवं क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट नेहा सिन्हा के अनुसार “किसी का नाम भूलना और किसी का चेहरा भूलना देखने में समान लग सकता है, लेकिन इनके पीछे काम करने वाले ब्रेन मार्ग पूरी तरह अलग होते हैं. यह पहचान और स्मरण के बीच का अंतर है.”

क्या नाम भूल जाना सामान्य होता है?

एक्सपर्ट का कहना है कि नाम केवल एक शब्द या पहचान का लेबल होता है, जिसका अक्सर किसी सीन छवि से सीधा संबंध नहीं होता. इसलिए तनाव, थकान, व्यस्तता या एक साथ कई लोगों से मिलने जैसी परिस्थितियों में नाम भूल जाना सामान्य माना जाता है. नेहा सिन्हा बताती हैं कि तेज रफ्तार सामाजिक माहौल में किसी का नाम भूल जाना पूरी तरह सामान्य बात है और अधिकांश स्वस्थ वयस्कों के साथ ऐसा कभी न कभी होता है.

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क्या इससे कोई दिक्कत होती है?

हालांकि, चेहरों को पहचानने की क्षमता ह्यूमन इवोल्यूशन का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. इंसान हजारों वर्षों से अपने परिवार, दोस्तों और संभावित खतरों की पहचान चेहरे के आधार पर करता आया है. यही कारण है कि ब्रेन में चेहरे पहचानने के लिए विशेष नेटवर्क मौजूद होते हैं. रिसर्च बताते हैं कि इन नेटवर्क्स में किसी प्रकार की गड़बड़ी या गिरावट होने पर प्रोसोपैग्नोसिया यानी फेस ब्लाइंडनेस जैसी स्थिति विकसित हो सकती है. कुछ मामलों में इसका संबंध अल्जाइमर रोग, फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया और अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से भी देखा गया है. बार-बार होने वाली स्मृति संबंधी समस्याएं न्यूरोकॉग्निटिव गिरावट का शुरुआती संकेत हो सकती हैं. खासकर अल्जाइमर और फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया जैसी स्थितियों में कई बार चेहरे पहचानने की क्षमता प्रभावित होना अन्य लक्षणों से पहले भी दिखाई दे सकता है. इसलिए यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार के सदस्य, जीवनसाथी या बेहद करीबी लोगों को पहचानने में कठिनाई महसूस करने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

कब एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी?

असल अंतर यही है कि कभी-कभार किसी का नाम भूल जाना उम्र बढ़ने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन परिचित चेहरों को पहचानने में लगातार कठिनाई होना गंभीर चेतावनी संकेत साबित हो सकता है. इसलिए हर छोटी भूल पर घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन यदि स्मृति संबंधी बदलाव बार-बार होने लगें, बढ़ते जाएं या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगें, तो एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! वायु प्रदूषण से कमजोर होती है याददाश्त, दिमाग को भी पहुंच रहा भारी नुकसान

सावधान! वायु प्रदूषण से कमजोर होती है याददाश्त, दिमाग को भी पहुंच रहा भारी नुकसान


How Air Pollution Affects Memory And Brain Function: हम रोज जिस हवा में सांस लेते हैं, उसका असर सिर्फ लंग्स और हार्ट तक सीमित नहीं है. नई रिसर्च बताती है कि वायु प्रदूषण हमारे ब्रेन और याददाश्त को भी नुकसान पहुंचा सकता है. खासतौर पर ट्रैफिक, इंडस्ट्री और जंगलों में लगने वाली आग से निकलने वाले सूक्ष्म प्रदूषक कणों का संबंध कमजोर होती कॉग्निटिव फंक्शन से पाया गया है. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे प्रदूषण आपके ब्रेन को प्रभावित कर रहा है. 

क्या सच में ब्रेन पर पड़ता है असर?

यह स्टडी कनाडा की मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के रिसर्चर की तरफ से किया गया है और 13 मई 2026 को जर्नल स्ट्रोक में ऑनलाइन पब्लिश हुआ. रिसर्च में पाया गया कि जिन इलाकों में वायु प्रदूषण का स्तर अधिक था, वहां रहने वाले लोगों का प्रदर्शन याददाश्त, समझने की क्षमता और मानसिक गति से जुड़े परीक्षणों में अपेक्षाकृत कमजोर रहा. दिलचस्प बात यह है कि यह असर उन क्षेत्रों में भी देखा गया जहां वायु प्रदूषण का स्तर अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से कम माना जाता है.

किस प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर होता है?

रिसर्च के दौरान यह भी सामने आया कि ट्रैफिक से पैदा होने वाले प्रदूषण के अधिक संपर्क में रहने वाले लोगों के दिमाग में एमआरआई स्कैन के जरिए कुछ सूक्ष्म क्षति के संकेत दिखाई दिए. महिलाओं में यह प्रभाव और अधिक स्पष्ट पाया गया. रिसर्चर ने हाईबीपी, डायबिटीज और शरीर में अतिरिक्त चर्बी जैसे हार्ट रोग संबंधी जोखिम कारकों को भी ध्यान में रखा, लेकिन इसके बावजूद वायु प्रदूषण और दिमागी बदलावों के बीच संबंध बना रहा. 

धीरे- धीरे प्रभावित करते हैं

मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ रिसर्च मेथड्स, एविडेंस एंड इम्पैक्ट के एसोसिएट प्रोफेसर रसेल डी सूजा कहते हैं कि डिमेंशिया अचानक नहीं होता. यह कई दशकों में धीरे-धीरे विकसित होता है. ऐसे कारकों की पहचान करना जो शुरुआती चरण में दिमाग को नुकसान पहुंचा सकते हैं और जिन्हें रोका जा सकता है, भविष्य में ब्रेन हेल्थ  की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है.  हालांकि यह स्टडी सीधे तौर पर यह साबित नहीं करता कि वायु प्रदूषण डिमेंशिया का कारण बनता है, लेकिन यह उन बढ़ते साइंटफिक प्रमाणों में एक और महत्वपूर्ण कड़ी जोड़ता है जो बताते हैं कि हवा की गुणवत्ता उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है.

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इस अध्ययन की प्रमुख लेखक और मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ मेडिसिन की असिस्टेंट प्रोफेसर सैंडी अज़ाब कहती हैं कि कनाडा की हवा को अक्सर साफ माना जाता है, लेकिन हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि कम स्तर का वायु प्रदूषण भी ब्रेन हेल्थ पर असर डाल सकता है. ये बदलाव कई बार बिना किसी स्पष्ट लक्षण के वर्षों पहले शुरू हो जाते हैं. 

लोगों की सोचने-समझने की क्षमता पर स्टडी

शोधकर्ताओं ने करीब 7,000 मध्यम आयु वर्ग के लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया. उन्होंने पीएम2.5 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसे प्रदूषकों के लंबे समय तक संपर्क और लोगों की सोचने-समझने की क्षमता के बीच संबंध का स्टडी किया. एक्सपर्ट का मानना है कि भविष्य में और लंबे समय तक किए जाने वाले स्टडी यह समझने में मदद करेंगे कि स्वच्छ हवा किस तरह दिमाग और याददाश्त को सुरक्षित रखने में भूमिका निभा सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या भारतीय थाली सच में बढ़ाती है डायबिटीज, जानें किन लोगों के लिए सही नहीं है दाल-रोटी?

क्या भारतीय थाली सच में बढ़ाती है डायबिटीज, जानें किन लोगों के लिए सही नहीं है दाल-रोटी?


Does Indian Thali Increase Diabetes Risk: भारत में खाने की बात हो और थाली में दाल, रोटी और चावल न हों, ऐसा कम ही देखने को मिलता है. कई घरों में आज भी लोग एक ही भोजन में चावल और रोटी दोनों खाते हैं. यह सिर्फ स्वाद या आदत का मामला नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है. लेकिन अब स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यही आदत कुछ लोगों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है.

क्यों हो रही है दिक्कत?

भारत पहले से ही दुनिया में सबसे ज्यादा डायबिटीज मरीजों वाले देशों में गिना जाता है. ऐसे में डॉक्टर अब उन खानपान की आदतों पर भी नजर डाल रहे हैं जो ब्लड शुगर बढ़ाने और मोटापे का जोखिम बढ़ाने में भूमिका निभा सकती हैं. सीके बिरला हॉस्पिटल, जयपुर की सीनियर डाइटिशियन दिव्या जैन बताती हैं कि समस्या दाल, रोटी या चावल में नहीं है, बल्कि इन्हें किस मात्रा में और किस तरह खाया जा रहा है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है.

भारतीय थाली किन लोगों को कर रही बीमार?

दरअसल, एक सामान्य भारतीय थाली में अक्सर चावल, रोटी, आलू की सब्जी, दाल, मिठाई और कभी-कभी मीठे पेय भी शामिल होते हैं. इनमें से ज्यादातर चीजें कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होती हैं. जब एक ही भोजन में कई कार्ब स्रोत शामिल हो जाते हैं, तो शरीर पर ग्लूकोज का भार बढ़ जाता है. इसका असर खासतौर पर उन लोगों पर ज्यादा पड़ सकता है जो पहले से प्रीडायबिटीज, डायबिटीज, मोटापे, हाई ब्लड प्रेशर या इंसुलिन रेजिस्टेंस जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं.

क्या करते हैं हम गलती?

दिव्या जैन कहती हैं कि आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोगों की थाली में कार्बोहाइड्रेट तो भरपूर होता है, लेकिन प्रोटीन और फाइबर की मात्रा कम होती है। कई लोग दो-तीन रोटियों के साथ चावल भी खाते हैं, जबकि पनीर, दही, अंडे, मछली, चिकन या दाल जैसी प्रोटीन वाली चीजें सीमित मात्रा में लेते हैं, वहीं सब्जियों को अक्सर सिर्फ साइड डिश की तरह देखा जाता है.

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हमें किस बात का ध्यान रखना चाहिए?

आधुनिक लाइफस्टाइल ने इस समस्या को और बढ़ाया है। पहले लोग अधिक शारीरिक मेहनत करते थे, जिससे शरीर अतिरिक्त एनर्जी का उपयोग कर लेता था. लेकिन अब लंबे समय तक बैठकर काम करना, कम शारीरिक गतिविधि और प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता सेवन स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा रहा है. हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको चावल या रोटी खाना बंद कर देना चाहिए. एक्सपर्ट के अनुसार दोनों ही संतुलित आहार का हिस्सा हो सकते हैं. जरूरत इस बात की है कि थाली का संतुलन सही रखा जाए.

कैसी होनी चाहिए हमारी थाली?

स्वस्थ थाली के लिए आधी प्लेट में सब्जियां और सलाद रखें. एक चौथाई हिस्से में दाल, पनीर, अंडा, चिकन, मछली या दही जैसे प्रोटीन स्रोत शामिल करें. बाकी एक चौथाई हिस्से में रोटी या चावल रखें. नियमित रूप से बड़ी मात्रा में चावल और रोटी दोनों एक साथ खाने से बचें. एक्सपर्ट का कहना है कि डायबिटीज का खतरा किसी एक खाद्य पदार्थ से नहीं, बल्कि लंबे समय तक बनी असंतुलित खाने की आदतों से बढ़ता है. इसलिए दाल-रोटी छोड़ने की नहीं, बल्कि थाली को संतुलित बनाने की जरूरत है.

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