अब जिला अस्पतालों में भी आसानी से होगी कीमोथैरेपी, जानें क्या है केंद्र सरकार का प्लान?

अब जिला अस्पतालों में भी आसानी से होगी कीमोथैरेपी, जानें क्या है केंद्र सरकार का प्लान?


District Hospital Cancer Centers: दुनियाभर में कैंसर के मामले तेजी के साथ बढ़ रहे हैं और भारत उन देशों के सूची में शामिल हैं, जहां कैंसर के सबसे ज्यादा मामले देखने को मिलते हैं. देश में कैंसर इलाज को मजबूत करने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. आधिकारिक बयान के मुताबिक, अगले तीन सालों में देशभर के जिला अस्पतालों में डे-केयर कैंसर सेंटर स्थापित किए जाएंगे. चलिए आपको विस्तार से बताते हैं कि सरकार क्या कदम उठा रही है. 

बजट में हुआ था एलान

इसका ऐलान केंद्रीय बजट 2025-26 में किया गया था, जिसमें 2025-26 के दौरान ही 200 केंद्र शुरू करने की योजना है. इस पहल का मकसद कीमोथेरेपी जैसी सेवाएं मरीजों के घर के पास उपलब्ध कराना और बड़े टर्शियरी अस्पतालों पर पड़ने वाला दबाव कम करना है. आमतौर पर कैंसर का इलाज कई महीनों तक चलता है और इस दौरान मरीजों को बार-बार अस्पताल जाना पड़ता है. बेहतर परिणाम के लिए नियमित कीमोथेरेपी और फॉलो-अप जरूरी होता है.

गरीब लोगों को पड़ता है भारी

ग्रामीण इलाकों या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए शहरों के बड़े अस्पतालों तक बार-बार जाना शारीरिक और आर्थिक दोनों रूप से भारी पड़ता है. यात्रा, रहने, खाने और रोज़ की कमाई छूटने का खर्च परिवार पर अतिरिक्त बोझ डालता है. कीमोथेरेपी ले रहे मरीज अक्सर कमजोर होते हैं और उन्हें एक देखभाल करने वाले व्यक्ति की जरूरत होती है. इससे परिवार की आय पर और असर पड़ता है.

क्या होगा फायदा?

जिला अस्पतालों में कीमोथेरेपी सुविधा शुरू होने से मरीजों को लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी और यात्रा से जुड़े दूसरे खर्च भी कम होंगे. इससे परिवारों की बचत होगी और उनकी दिनचर्या पर कम असर पड़ेगा. इन केंद्रों को मंजूरी देने से पहले सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर विस्तृत गैप एनालिसिस किया. जिलों का चयन कैंसर के मामलों की संख्या, मरीजों का भार और उपलब्ध बुनियादी ढांचे के आधार पर किया गया है. 

इस कार्यक्रम में प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर भी खास ध्यान दिया गया है. चुने गए जिलों के डॉक्टरों और नर्सों को चार से छह सप्ताह तक सरकारी मेडिकल कॉलेजों, क्षेत्रीय कैंसर केंद्रों और राज्य कैंसर संस्थानों में व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया. इस प्रशिक्षण में कीमोथेरेपी देने की प्रक्रिया, दवा की सही मात्रा तय करना, दिक्कतों से बचाव, आपात स्थिति से निपटना, इंफेक्शन नियंत्रण, दवाओं की सुरक्षित हैंडलिंग और मरीजों को परामर्श देना शामिल रहा। इससे यह सुनिश्चित किया गया है कि जिला स्तर पर भी सुरक्षा और गुणवत्ता के मानकों का पालन हो.

दवाओं को लेकर क्या है नियम?

इस पहल की एक और अहम बात यह है कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर जरूरी कीमोथेरेपी दवाएं मुफ्त उपलब्ध कराई जाएंगी. कैंसर इलाज में दवाओं का खर्च सबसे बड़ा हिस्सा होता है। ऐसे में दवाएं मुफ्त मिलने से मरीजों का जेब से होने वाला खर्च काफी घटेगा. सरकार ने दवाओं की खरीद और सप्लाई व्यवस्था को भी मजबूत किया है, ताकि इनकी नियमित उपलब्धता बनी रहे.

इसे भी पढ़ें: Cancer Warning Symptoms: देश में हर साल बढ़ रहे कैंसर के 15 लाख मामले, जानें जानलेवा बीमारी के 3 सबसे कॉमन लक्षण

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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‘नेचुरल’ के चक्कर में कहीं लिवर-किडनी न हो जाए डैमेज? इन 7 सप्लीमेंट्स से आज ही बना लें दूरी

‘नेचुरल’ के चक्कर में कहीं लिवर-किडनी न हो जाए डैमेज? इन 7 सप्लीमेंट्स से आज ही बना लें दूरी


Can Supplements Damage Your Liver: अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि सप्लीमेंट सुरक्षित होते हैं क्योंकि उन्हें “नेचुरल” कहा जाता है. लेकिन सच्चाई थोड़ी अलग है. हाल ही में अमेरिका की फेमस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश एक स्टडी बताती है कि हर्बल और डाइटरी सप्लीमेंट्स को खाद्य उत्पादों की कैटेगरी में रखा जाता है, यानी इन्हें आहार की कमी पूरी करने के लिए लिया जाता है. इसका मतलब यह नहीं है कि ये हर व्यक्ति के लिए पूरी तरह सुरक्षित हों. खासकर अगर किडनी या लिवर पहले से कमजोर हों, तो कुछ सप्लीमेंट इन अंगों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि अगर आपको किडनी या लिवर की दिक्कत है, तो आपको किन प्रोडक्ट से दूरी बनाकर रखनी चाहिए. 

ग्रीन टी एक्सट्रैक्ट

ग्रीन टी का एक कप ज्यादातर लोगों के लिए सुरक्षित है, लेकिन CLD Clinical Liver Disease जर्नल के मुताबिक ग्रीन टी एक्सट्रैक्ट की गोलियों में कैटेचिन्स, खासकर एपिगैलोकैटेचिन गैलेट की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. अधिक मात्रा में लेने पर ये  लिवर में सूजन और गंभीर चोट तक का कारण बन सकते हैं, खासकर उन लोगों में जिन्हें पहले से लिवर की समस्या हो.

हाई-डोज प्रोटीन पाउडर

हाई-डोज प्रोटीन पाउडर भी खतरा पैदा कर सकते हैं. बॉडीबिल्डिंग या वजन बढ़ाने के लिए लिए जाने वाले प्रोटीन सप्लीमेंट अगर जरूरत से ज्यादा मात्रा में लिए जाएं तो किडनी पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं. अतिरिक्त प्रोटीन के कारण नाइट्रोजन युक्त गंदे पदार्. को बाहर निकालने में किडनी को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे क्रॉनिक किडनी डिजीज के मरीजों में स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है.

फैट-सोल्यूबल विटामिन

फैट-सोल्यूबल विटामिन जैसे A, D, E और K शरीर में जमा हो जाते हैं. पानी में घुलनशील विटामिन की तरह ये आसानी से बाहर नहीं निकलते. ज्यादा मात्रा में विटामिन A लिवर पर दबाव डाल सकता है और गंभीर क्षति का कारण बन सकता है. विटामिन D और E भी बिना डॉक्टर की सलाह के लेने पर, खासकर किडनी या लिवर की समस्या वाले लोगों में, नुकसान पहुंचा सकते हैं.

आयरन सप्लीमेंट

आयरन सप्लीमेंट भी बिना जांच के लेना खतरनाक हो सकता है. आयरन जरूरी है, लेकिन शरीर में इसकी अधिकता लिवर में जमा होकर हेमोक्रोमैटोसिस नामक स्थिति पैदा कर सकती हैय Journal Statpearls के अनुसार, यह रोग शरीर के टिश्यू में आयरन के अत्यधिक जमाव से जुड़ा है, जिससे कई अंगों की काम करने के तरीके प्रभावित होती है. 

हर्बल उपाय

कुछ हर्बल उपाय भी लिवर को नुकसान पहुंचा सकते हैंय कॉम्फ्री में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो लिवर को गंभीर क्षति पहुंचा सकते हैं. ब्लैक कोहोश, जिसे मेनोपॉज के लक्षणों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, लिवर टॉक्सिसिटी से जुड़ा पाया गया है. गार्सिनिया कंबोजिया, जो वजन घटाने वाले उत्पादों में आम है, लिवर इंजरी से संबंधित रही है. कई पारंपरिक जड़ी-बूटियों में सक्रिय तत्वों की मात्रा और शुद्धता पर सख्त कंट्रोल नहीं होता. 

मुलेठी

मुलेठी की जड़ भी सावधानी मांगती है. इसमें ग्लाइसिराइजिन होता है, जो ब्लड प्रेशर बढ़ा सकता है और पोटैशियम कम कर सकता है. यह किडनी या हार्ट रोगियों के लिए खतरनाक हो सकता है.  इसलिए ऐसे सप्लीमेंट, जिनमें ये मिनरल अधिक हों, सख्त निगरानी में ही लेने चाहिए.

डिटॉक्स या फैट-बर्निंग गोलियां

इसी तरह  डिटॉक्स या फैट-बर्निंग गोलियां भी जोखिम भरी हो सकती हैं. इनमें स्टिमुलेंट, डाययूरेटिक या अज्ञात तत्वों का मिश्रण हो सकता है, जो लिवर मेटाबॉलिज्म और किडनी फिल्ट्रेशन को प्रभावित करते हैं. खासकर लिवर को इन केमिकल को तोड़ने में अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है, जिससे ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन बढ़ सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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भारत में 10 करोड़ होने वाले हैं डायबिटीज के मरीज, स्किन पर ये 7 संकेत कभी न करें इग्नोर

भारत में 10 करोड़ होने वाले हैं डायबिटीज के मरीज, स्किन पर ये 7 संकेत कभी न करें इग्नोर


What Are the Early Skin Signs of Diabetes: इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने भारत में डायबिटीज़ को उभरते हुए बड़े स्वास्थ्य जोखिम के रूप में चिन्हित किया है. देश में एनसीडी में डायबिटीज सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है. लगभग 9 करोड़ वयस्क इससे प्रभावित हैं और अनुमान है कि 2026 तक यह संख्या 10 करोड़ के पार पहुंच सकती है. अक्सर लोग ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, थकान, धुंधला दिखना जैसे लक्षणों को ही डायबिटीज़ का संकेत मानते हैं. लेकिन त्वचा पर दिखने वाले कुछ बदलाव भी ब्लड शुगर असंतुलन के शुरुआती संकेत हो सकते हैं. हालांकि इन लक्षणों के पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं. चलिए आपको इसके 7 लक्षण आपको बताते हैं. 

डायबिटीज से जुड़े 7 सामान्य त्वचा संकेत

डायबिटिक डर्मोपैथी

पिंडलियों पर छोटे, गोल, भूरे या लाल धब्बे दिख सकते हैं. ये दर्द या खुजली नहीं करते, लेकिन ब्लड वेसल्स में बदलाव का संकेत हो सकते हैं. Journal of Cardiovascular Disease Research के अनुसार, 25 प्रतिशत से अधिक डायबिटीज मरीजों में त्वचा संबंधी बदलाव छोटे ब्लड वेसल्स और नसों के नुकसान से जुड़े पाए गए.

एकैंथोसिस नाइग्रिकन्स

गर्दन, बगल, जांघों या उंगलियों के जोड़ पर गहरे, मोटे और मखमली धब्बे दिखना इंसुलिन रेजिस्टेंस का संकेत हो सकता है. Indian Journal of Dermatology, Venereology and Leprology के मुताबिक, यह मोटापे और डायबिटीज से जुड़ा अहम त्वचा संकेत है.

घाव का देर से भरना

अगर चोट या जख्म जल्दी नहीं भरते, तो इसका कारण ब्लड फ्लो और नसों की क्षति हो सकती है.Arteriosclerosis, Thrombosis, and Vascular Biology जर्नल के अनुसार, इम्यून सेल्स की गड़बड़ी और टिश्यू मरम्मत में कमी से क्रॉनिक घाव बन सकते हैं, खासकर डायबिटिक फुट अल्सर में.

बार-बार फंगल या बैक्टीरियल इंफेक्शन

ब्लड शुगर बढ़ने से इम्युनिटी कमजोर होती है, जिससे फंगल और बैक्टीरियल इंफेक्शन बार-बार हो सकते हैं. यह बात Journal of Pure and Applied Microbiology में भी बताई गई है.

खुजली और रूखी स्किन

हाई बीपी शुगर शरीर से तरल पदार्थ खींच लेता है, जिससे त्वचा सूखी और खुजलीदार हो सकती है. छोटे ब्लड वेसल्स की क्षति के कारण पसीना और तेल का रिसाव कम हो जाता है. Frontiers in Medicine (2025) में भी इसे डायबिटीज़ से जुड़ा संकेत बताया गया है.

नेक्रोबायोसिस लिपॉइडिका

यह रेयर लेकिन गंभीर संकेत है, जिसमें पिंडलियों पर चमकदार लाल-भूरे या पीले धब्बे बन सकते हैं. त्वचा पतली होकर नसें दिखाई दे सकती हैं. International Journal of Molecular Sciences के अनुसार, यह लंबे समय से डायबिटीज से जूझ रहे मरीजों में ज्यादा दिखता है.

विटिलिगो

इस स्थिति में त्वचा के कुछ हिस्सों का रंग उड़कर सफेद हो जाता है. टाइप-1 डायबिटीज़ एक ऑटोइम्यून बीमारी है, इसलिए विटिलिगो ऐसे मरीजों में ज्यादा देखा जाता है. टाइप-2 में यह मेटाबॉलिक तनाव और इम्यून गड़बड़ी से जुड़ा हो सकता है. Cutaneous Manifestations in Diabetes और ICMR भी डायबिटीज कंट्रोल में स्किन जांच को जरूरी मानते हैं.

 इसे भी पढ़ें: Mobile Radiation Cancer Risk: सिरहाने मोबाइल रखकर सोने से क्या हो जाता है कैंसर, डॉक्टर से जानें कितनी सच है यह बात?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या सर्दियों में बियर पीने से हो जाती है खांसी, डॉक्टर से जानें यह कितनी नुकसानदायक?

क्या सर्दियों में बियर पीने से हो जाती है खांसी, डॉक्टर से जानें यह कितनी नुकसानदायक?


Can Drinking Beer In Winter Trigger Cough: गर्मियों में ठंडी बियर और सर्दियों में गाढ़ी, मजबूत एले बीयर का स्वाद मौसम के साथ बदलता हुआ सा लगता है. कंपनियां भी साल के अलग-अलग मौसम के हिसाब से बीयर तैयार करती हैं. गर्मियों में हल्की पिल्सनर या व्हीट बीयर ज्यादा पसंद की जाती है, जबकि ठंड के दिनों में स्टाउट और पोर्टर जैसे गहरे स्वाद वाली बीयर की मांग बढ़ जाती है. लेकिन सवाल यह है कि क्या सर्दियों में बियर पीने से खांसी हो जाती है? डॉक्टरों के मुताबिक, बियर खुद खांसी पैदा नहीं करती, लेकिन कुछ स्थितियों में यह पहले से मौजूद खांसी को ट्रिगर सकती है. खासकर अगर आपको हाल ही में सर्दी, वायरल या सीने का इंफेक्शन हुआ हो.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. फ्रांसिस पिट्सिलिस, हॉलिस्टिक हेल्थ एक्सपर्ट और फिजिशियन, जो पिछले 25 वर्षों से तनाव, थकान और लाइफस्टाइल से जुड़ी मुश्किल बीमारियों के इलाज में एक्सपर्ट हैं, उनके अनुसार,  करीब 25 प्रतिशत लोगों को इंफेक्शन के ठीक होने के बाद भी 3 से 8 हफ्तों तक खांसी बनी रह सकती है. इसे पोस्ट-इन्फेक्शियस कफ कहा जाता है. इस दौरान सांस नलियां संवेदनशील रहती हैं और ठंडी हवा, एसी, ज्यादा बोलना, हंसना या ठंडे पेय पदार्थ खांसी को ट्रिगर कर सकते हैं. ऐसे में ठंडी बियर पीने पर खांसी बढ़ सकती है, लेकिन यह हर किसी के साथ जरूरी नहीं है.

खांसी रहने के कारण

 फ्रांसिस पिट्सिलिस बताती हैं कि लगातार रहने वाली खांसी के पीछे तीन आम कारण माने जाते हैं, पोस्टनेजल ड्रिप, इंफेक्शन के बाद अस्थमा जैसी स्थिति, या श्वसन मार्ग में बनी रहने वाली सूजन और जलन. इसके अलावा साइनस की समस्या, एसिड रिफ्लक्स, ब्लड प्रेशर की कुछ दवाएं, दिल या लंग्स से जुड़ी बीमारियां भी जिम्मेदार हो सकती हैं. इसलिए अगर खांसी लंबे समय तक रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.यह भी समझना जरूरी है कि पोस्ट-इन्फेक्शियस कफ में एंटीबायोटिक असरदार नहीं होती, क्योंकि इंफेक्शन पहले ही खत्म हो चुका होता है. इलाज आमतौर पर लक्षणों के आधार पर किया जाता है, जैसे नेजल स्प्रे, एंटीहिस्टामिन, खांसी दबाने वाली दवाएं या जरूरत पड़ने पर स्टेरॉयड इनहेलर.

इन दिक्कतों को बढ़ा सकती हैं

जहां तक शराब की बात है, ज्यादा मात्रा में शराब शरीर में पानी की कमी कर सकती है और कंजेशन या गले की परेशानी बढ़ा सकती है. यह इम्यून सिस्टम को भी अस्थायी रूप से कमजोर कर सकती है और सर्दी की दवाओं के साथ प्रतिक्रिया कर सकती है. इसलिए अगर आप पहले से खांसी या इंफेक्शन से जूझ रहे हैं, तो शराब से परहेज करना बेहतर हो सकता है.

ये भी पढ़ें-RSV से हर साल 100000 बच्चों की होती है मौत, WHO के हिसाब से जानें कब लगवाएं इसकी वैक्सीन?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कितने दिन बाद फेंक देना चाहिए पुराना अंडरवियर, कब बन जाता है यह बीमारी की वजह?

कितने दिन बाद फेंक देना चाहिए पुराना अंडरवियर, कब बन जाता है यह बीमारी की वजह?


How Often Should You Replace Underwear:कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जो हमारे शरीर के संपर्क में हमेशा होती हैं, उनमें एक है अंडरगारमेंट्स. बाहरी कपड़ों के उल्टा, इनरवियर सीधे पसीने, बैक्टीरिया, डेड बॉडी सेल्स और शरीर की गंध के संपर्क में रहते हैं. अधिकतर लोग इन्हें नियमित रूप से धोते तो हैं, लेकिन एक्सपर्ट का का कहना है कि सिर्फ धोना ही काफी नहीं है. चलिए आपको बताते हैं कि कितने महीने या साल बाद आपको अपना अंडरवियर बदल लेना चाहिए. 

एक्सपर्ट के अनुसार, अंडरगारमेंट्स की भी एक तय उम्र होती है. भले ही वे ऊपर से साफ और ठीक दिखें, लेकिन उन्हें हमेशा के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. आमतौर पर सलाह दी जाती है कि हर 6 से 12 महीने में इनरवियर बदल देना चाहिए. समय के साथ कपड़े के रेशों में ऐसे बदलाव आने लगते हैं जो बैक्टीरिया और फंगस के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण बना देते हैं.

क्या होते हैं नुकसान?

पुराने या ठीक से साफ न किए गए अंडरगारमेंट्स पहनने से त्वचा में जलन, खुजली, इंफेक्शन और अन्य हाइजीन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. समय-समय पर बदलना भी काफी अहम है. एम्स , हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड से प्रशिक्षित एक प्रसिद्ध गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और लिवर एक्सपर्ट डॉ. सौरभ सेठी  के अनुसार, हर एक इस्तेमाल के बाद इसको साफ करना जरूरी होता है.

 

बदलना क्यों जरूरी?

दरअसल, लगातार इस्तेमाल और धुलाई के कारण कपड़े के रेशों में छोटे छेद बनने लगते हैं. इन बेहद छोटे छेदों में बैक्टीरिया, फंगस, डेड स्किन और शारीरिक द्रव फंस सकते हैं, जिन्हें सामान्य धुलाई से पूरी तरह हटाना संभव नहीं होता. यही जमा गंदगी दुर्गंध और त्वचा संक्रमण का कारण बन सकती है. कुछ संकेत ऐसे भी होते हैं जो बताते हैं कि अब अंडरगारमेंट बदलने का समय आ गया है. यदि इलास्टिक ढीली हो जाए, कपड़ा पतला पड़ने लगे या छोटे-छोटे छेद दिखने लगें, तो समझिए उसे बदलना चाहिए. जिद्दी दाग, जो धुलने के बाद भी बने रहें, या धोने के बाद भी आने वाली बदबू भी इस बात का संकेत है कि कपड़ा अपनी क्वालिटी खो चुका है. रंग फीका पड़ना भी फैब्रिक के खराब होने का इशारा है.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी की सलाह है कि अंडरगारमेंट्स रोज बदले जाएं, खासकर तब जब अधिक पसीना आता हो या मौसम गर्म हो. वहीं मायो क्लीनिक भी कहता है कि गर्म, नम या धूलभरे माहौल में इनरवियर दिन में एक से ज्यादा बार बदलना पड़ सकता है. शरीर की गर्मी, नमी और रगड़ माइक्रोबियल ग्रोथ के लिए अनुकूल माहौल बनाते हैं, जिससे इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है।

फैब्रिक का चुनाव भी महत्वपूर्ण है. रिसर्च बताते हैं कि कॉटन जैसे प्राकृतिक और सांस लेने वाले कपड़े त्वचा के लिए बेहतर होते हैं. ये नमी को सोखते हैं और हवा का फ्लो बनाए रखते हैं, जिससे यीस्ट और बैक्टीरियल इंफेक्शन का खतरा कम होता है. इसके विपरीत, सिंथेटिक कपड़े नमी को फंसा सकते हैं और जलन या एलर्जी की संभावना बढ़ा सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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घर रोशन करने वाली लाइटें ही आपकी जिंदगी में ला रहीं अंधेरा, जानें इनसे कैसे हो रहा कैंसर? 

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