निपाह वायरस के क्या हैं लक्षण, जानें बुखार और सिरदर्द हल्के में क्यों न लें?

निपाह वायरस के क्या हैं लक्षण, जानें बुखार और सिरदर्द हल्के में क्यों न लें?


Nipah Virus Cases Reported In West Bengal: भारत के पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस इंफेक्शन के मामलों की पुष्टि के बाद एशिया के कई देशों में स्वास्थ्य एजेंसियां अलर्ट मोड पर आ गई हैं. ताज़ा रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक पांच मामलों की पुष्टि हुई है, जबकि करीब 100 लोगों को एहतियातन क्वारंटीन में रखा गया है. ये सभी लोग इंफेक्शन मरीजों के करीबी संपर्क में आए थे. चिंता की बात यह है कि कई मामले अस्पतालों में इंफेक्शन फैलने से जुड़े बताए जा रहे हैं, जिससे हेल्थकेयर सिस्टम में जोखिम बढ़ गया है.

निपाह वायरस का केस फेटेलिटी रेट काफी ज्यादा माना जाता है, जो लगभग 40 से 75 प्रतिशत तक हो सकता है. यह कोविड-19 के मुकाबले कहीं अधिक घातक है. हालांकि, राहत की बात यह है कि फिलहाल इसे अत्यधिक इंफेक्शन नहीं माना जाता. कोविड की तरह यह हवा के जरिए फैलने वाला वायरस नहीं है. निपाह इंफेक्शन आमतौर पर इंफेक्टेड फल खाने वाले चमगादड़ों के संपर्क में आने, खराब भोजन के सेवन या फिर इंफेक्शन व्यक्ति के बेहद करीबी संपर्क से फैलता है. खासतौर पर यह इंफेक्टेड परिवारों और अस्पतालों जैसे स्थानों पर लंबे समय तक संपर्क में रहने से फैलने के मामले सामने आए हैं.

क्यों बढ़ रही हैं इसको लेकर चिंताएं?

इस वायरस की इनक्यूबेशन अवधि सामान्यतः 5 से 14 दिनों की होती है, हालांकि कुछ दुर्लभ मामलों में यह 21 दिन तक भी पहुंच सकती है. यह अवधि काफी हद तक कोविड-19 जैसी ही मानी जाती है. कम इंफेक्टेड होने के कारण अब तक बड़े स्तर पर शहरों को सील करने जैसे सख्त कदम उठाने की नौबत नहीं आई है, लेकिन चीन और उसके आसपास के देशों से नए मामलों की खबरों ने स्वास्थ्य अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है, खासकर नए साल  के दौरान अंतरराष्ट्रीय यात्राओं को देखते हुए.

एयरपोर्ट और बॉर्डर पर बढ़ी निगरानी

एशिया के कई देशों में एक बार फिर ट्रैवल स्क्रीनिंग और हेल्थ मॉनिटरिंग शुरू कर दी गई है. थाईलैंड ने सुवर्णभूमि, डॉन मुआंग और फुकेट इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर पश्चिम बंगाल और आसपास के इलाकों से आने वाले यात्रियों की जांच शुरू की है. 25 जनवरी 2026 से तापमान जांच और स्वास्थ्य दस्तावेजों की स्कैनिंग की जा रही है. थाईलैंड के डिजीज कंट्रोल विभाग के मुताबिक, यात्रियों का पूरा सहयोग मिल रहा है.

इसी तरह नेपाल ने त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और भारत से लगने वाले जमीनी बॉर्डर पर सख्त स्क्रीनिंग शुरू कर दी है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नेपाल और ताइवान जैसे देशों में भी प्रभावित इलाकों से आने वाले यात्रियों के लिए थर्मल स्क्रीनिंग और हेल्थ चेक अनिवार्य कर दिए गए हैं.

क्या है निपाह वायरस?

निपाह वायरस एक जूनोटिक बीमारी है, जो जानवरों से इंसानों में फैलती है. यह मुख्य रूप से फल खाने वाले चमगादड़ों और सूअरों से फैलता है.दूषित भोजन और कुछ मामलों में व्यक्ति से व्यक्ति में भी इंफेक्टेड संभव है. WHO ने निपाह वायरस को उन प्राथमिक बीमारियों की सूची में रखा है, जो गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकती हैं. इसके शुरुआती लक्षणों में बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, उल्टी और गले में खराश शामिल हैं. गंभीर मामलों में मरीज को निमोनिया, बेहोशी या एन्सेफलाइटिस हो सकती है, जो जानलेवा साबित हो सकती है. फिलहाल न तो इसका कोई प्रॉपर इलाज है और न ही वैक्सीन.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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अचानक खड़े होते ही आने लगता है चक्कर, यह किस बीमारी का संकेत?

अचानक खड़े होते ही आने लगता है चक्कर, यह किस बीमारी का संकेत?


Diabetes And Orthostatic Hypotension: अचानक कुर्सी से उठते ही चक्कर आना, आंखों के आगे अंधेरा छा जाना या गिरने जैसा महसूस होना, अगर आपके साथ भी ऐसा होता है, तो इसे हल्के में लेने की गलती न करें. यह एक आम समस्या जरूर है, लेकिन इसके पीछे एक मेडिकल कारण हो सकता है. इस स्थिति को ऑर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन या पोश्चर हाइपोटेंशन कहा जाता है. यह तब होता है, जब बैठी या लेटी हालत से अचानक खड़े होने पर शरीर ब्लड प्रेशर को जल्दी से एडजस्ट नहीं कर पाता और दिमाग तक पर्याप्त खून नहीं पहुंच पाता. इसी वजह से चक्कर, धुंधला दिखना या बेहोशी जैसा अहसास होने लगता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

राम मनोहर लोहिया अस्पताल, नई दिल्ली के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अभिषेक कुमार के अनुसार, जैसे ही हम खड़े होते हैं, ग्रेविटी की वजह से खून पैरों की ओर चला जाता है. आमतौर पर शरीर की ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम तुरंत नसों को सिकोड़कर और दिल की धड़कन बढ़ाकर इसकी भरपाई कर लेती है. लेकिन अगर यह प्रतिक्रिया धीमी हो जाए, तो चक्कर आ सकता है. डायटीशियन और वेट मैनेजमेंट एक्सपर्ट के अनुसार, खड़े होते समय पैरों में खून जमा हो जाता है, जिससे ब्रेन तक ऑक्सीजन कम पहुंचती है. पर्याप्त पानी पीना, इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखना और धीरे-धीरे खड़ा होना इस समस्या को कम कर सकता है.

किस कारण से होता है ऐसा?

डिहाइड्रेशन, खून की कमी, लंबे समय तक बिस्तर पर रहना, कुछ दवाएं और उम्र बढ़ने के साथ शरीर की प्रतिक्रिया क्षमता कम होना भी चक्कर की वजह बन सकते हैं. रिसर्च में यह भी सामने आया है कि खड़े होते ही पहले एक मिनट में ब्लड प्रेशर का अचानक गिरना डिमेंशिया के खतरे से जुड़ा हो सकता है. जिन लोगों में खड़े होने के 30 सेकंड के भीतर सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर 20 mmHg या उससे ज्यादा गिरा, उनमें भविष्य में डिमेंशिया का जोखिम ज्यादा पाया गया.

कब डॉक्टर से दिखाना होता है जरूरी?

एक्सपर्ट का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति बार-बार खड़े होते ही चक्कर महसूस करता है, तो डॉक्टर को जरूर बताना चाहिए और खड़े होकर ब्लड प्रेशर की जांच करानी चाहिए. खासकर बुजुर्गों में यह गिरने, हड्डी टूटने और गंभीर चोट का खतरा बढ़ा सकता है. इससे बचाव के लिए धीरे खड़े होना, पर्याप्त पानी पीना, पैरों की एक्सरसाइज करना, घर में फिसलन से बचाव के इंतजाम करना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से दवाओं की समीक्षा कराना जरूरी है. समय रहते ध्यान दिया जाए, तो इस समस्या को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है. लाइफस्टाइल में बदलाव के साथ हम इसपर काबू पा सकते हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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प्रोसेस्ड फूड-फैटी डाइट से सर्वाइवल मोड में जा सकता है लिवर, जानें कैसे बढ़ता है कैंसर का खतरा?

प्रोसेस्ड फूड-फैटी डाइट से सर्वाइवल मोड में जा सकता है लिवर, जानें कैसे बढ़ता है कैंसर का खतरा?


Long Term High Fat Diet Effects: साइंटिस्ट ने हालिया रिसर्च में यह चौंकाने वाला खुलासा किया है कि लंबे समय तक ज्यादा फैट वाला खाना न सिर्फ मोटापा बढ़ाता है, बल्कि यह शरीर के भीतर इतना नुकसान करता है, जो आगे चलकर जानलेवा कैंसर की वजह बन सकती है. खासतौर पर लिवर पर इसका असर बेहद खतरनाक बताया गया है. प्रोसेस्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड में मौजूद  अनहेल्दी फैट लगातार लिवर सेल्स पर दबाव डालता है, जिससे यह अंग धीरे-धीरे अपने सामान्य कामकाज को भूलने लगता है.

क्या निकला रिसर्च में?

रिसर्च के मुताबिक, जब लिवर पर लंबे समय तक खराब डाइट का बोझ बना रहता है, तो वह “सर्वाइवल मोड” में चला जाता है. इस स्थिति में लिवर खून साफ करने, पोषक तत्वों को प्रोसेस करने, टॉक्सिन्स बाहर निकालने और जरूरी प्रोटीन-एंजाइम बनाने जैसे अहम कामों को पीछे छोड़ देता है और सिर्फ खुद को जिंदा रखने पर ध्यान देने लगता है. महीनों और वर्षों तक चलने वाला यह तनाव लिवर सेल्स को धीरे-धीरे एक साधारण अवस्था में ले जाता है, जहां वे पूरी क्षमता से काम नहीं कर पातीं.

इतने साल पहले मिलने लगते हैं संकेत

शोध में पाया गया कि यह सेलुलर डैमेज लिवर कैंसर के खतरे को ट्यूमर बनने से 10 से 15 साल पहले ही संकेत देने लगता है. साइंटिस्ट ने बताया कि सर्वाइवल मोड वाला यह माहौल कैंसर सेल्स के पनपने के लिए अनुकूल होता है. इस दौरान ट्यूमर को रोकने वाले जीन निष्क्रिय होने लगते हैं और शरीर की वह सफाई प्रणाली भी कमजोर पड़ जाती है, जो खराब या डेड सेल्स को खत्म करती है. इसका नतीजा यह होता है कि सेल्स तेजी से बढ़ने, म्यूटेशन करने और अंत में ट्यूमर बनाने लगती हैं.

चूहों पर की गई स्टडी

MIT और हार्वर्ड से जुड़े साइंटिस्ट ने चूहों पर किए गए एक रियल-टाइम स्टडी में देखा कि हाई-फैट डाइट खाने से करीब छह महीने के भीतर ही लिवर सेल्स में कैंसर की तैयारी शुरू हो जाती है. डीएनए के वे हिस्से सक्रिय हो जाते हैं, जो कोशिकाओं की ग्रोथ और सर्वाइवल को कंट्रोल करते हैं. यह एक तरह की खतरनाक “रेडी स्टेट” होती है, जिसमें भविष्य में मामूली जेनेटिक नुकसान भी कैंसर को जन्म दे सकता है.

क्या कहते हैं साइंटिस्ट?

साइंटिस्ट के अनुसार, लिवर कैंसर शुरुआती दौर में अक्सर बिना लक्षणों के बढ़ता है. लेकिन जैसे-जैसे बीमारी आगे बढ़ती है, वजन कम होना, भूख न लगना, पेट के दाहिने हिस्से में दर्द, पीलिया, थकान और पेट में सूजन जैसे लक्षण दिखने लगते हैं. यही वजह है कि फैटी लिवर, हेपेटाइटिस या सिरोसिस जैसे जोखिम वाले लोगों की समय-समय पर जांच बेहद जरूरी है. इस स्टडी को प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल सेल में प्रकाशित किया गया है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सफेद दाग का आयुर्वेदिक समाधान! मेलानोग्रिट से विटिलिगो और ल्यूकोडर्मा का जड़ से उपचार

सफेद दाग का आयुर्वेदिक समाधान! मेलानोग्रिट से विटिलिगो और ल्यूकोडर्मा का जड़ से उपचार


Health News: मेलानिन हमारे शरीर के लिए एक अति महत्वपूर्ण रंजक (Pigment) है जो त्वचा को उसका रंग देने के साथ-साथ ही सूर्य की पराबैंगनी किरणों से भी बचाव करता है. मेलानिन  की मात्रा सभी के शरीर में अलग-अलग होती है, यह भूमध्य रेखा के आसपास रहने वाले देशो के लोगो में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, वहीं दूसरी ओर जैसे-जैसे हम ध्रुवीय क्षेत्र की ओर बढ़ते है यह मात्रा कम होती जाती है. मेलानोसाइट्स कोशिकाएं ही मेलानिन बनाती है. प्याज़ की तरह त्वचा की भी कई परतें हैं.

त्वचा की तीन परतें हैं, सबसे ऊपरी परत एपिडर्मिस, बीच की परत को डर्मिस और सबसे निचली परत को हाइपोडर्मिस कहते हैं. मेलानिन त्वचा की ऊपरी परत, एपिडर्मिस और मध्यम परत डर्मिस के जोड़ पर बनती है. एपिडर्मिस में केरोटोनोसाइट्स और मेलानोसाइट्स सामान्य रूप से पाए जाते हैं. मेलानोसाइट्स कोशिकाओं में मेलानोसोम होते हैं जो मेलानिन बनाते हैं. यह मेलानिन केराटिनोसाइट्स कोशिकाओं के माध्यम से पूरे शरीर में फैल जाते हैं जो हमारे शरीर को सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाते हैं.

विटिलिगो में शरीर पर सफेद धब्बे और मेलानिन उत्पादन में कमी

विटिलिगो, ल्यूकोडर्मा, सफ़ेद दाग या धब्बे, और श्वेत कुष्ठ एक शारीरिक बीमारी होने के साथ ही समाज में एक कलंक के रूप में भी विद्यमान है जिसमें रोगी के हाथ और पैरो पर सफ़ेद चकत्ते हो जाते हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार हर सौ में से एक व्यक्ति को विटिलिगो की बीमारी है. इस रोग में व्यक्ति के शरीर पर छोटे-छोटे सफ़ेद चकत्ते या बड़े-बड़े सफ़ेद धब्बे हो जाते है. इस बीमारी में शरीर में मेलानोसाइट्स कोशिकाएं मर जाती है और मेलानिन का उत्पादन होना समाप्त जाता है. कुछ रोगियों के हाथो में सूजन के साथ-साथ त्वचा लाल और खुरदुरी भी हो जाती हैं.

विटिलिगो और ल्यूकोडर्मा: कारण, अंतर और आधुनिक उपचार के दुष्परिणाम

आम बोलचाल की भाषा में विटिलिगो और ल्यूकोडर्मा को एक ही बीमारी माना जाता है, परन्तु ल्यूकोडर्मा किसी दुर्घटना की वजह से होने वाली बीमारी है जबकि विटिलिगो एक प्रकार की ऑटो इम्यून डिजीज है. ल्यूकोडर्मा में त्वचा में किसी प्रकार की चोट का लगना जरूरी है वहीं दूसरी ओर विटिलिगो हार्मोनल डिस्बैलेंस, डीओडरंट, परफ्यूम या किसी केमिकल पदार्थ की वजह से होने वाली एलर्जी, बार – बार पीलिया या टाइफाइड होने, कोई अधिक संवेदनशील घटना, या फिर काफी लम्बे समय से चले आ रहे एंटी बायोटिक दवाइयों के प्रयोग से भी हो सकता है.

वहीं कई बार इम्यून सिस्टम खुद में अनजाने में मेलानोसाइट्स को ख़त्म करना शुरू कर देता है. दोनों का उपचार भी लगभग एक प्रकार से ही होता है क्योंकि दोनों में ही पिगमेंटेशन और इम्युनिटी वर्धक दवाइयां दी जाती है, इसलिए इसमें अंतर बताना और भी कठिन हो जाता है.

आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों में दिया जाने वाला उपचार ज़्यादातर स्टेरॉयड के रूप में होता है या रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए दिया जाता है. इन दवाइयों के शरीर पर दुष्परिणाम भी बहुत अधिक होते हैं. इनसे कई बार स्किन के सेल्स मरने शुरू हो जाते हैं, या फिर त्वचा पर अधिक बाल आने लगते हैं, कई बार त्वचा कर रंग तो ठीक हो जाता है लेकिन उनमें झुर्रिया पड़ जाती है और कई बार धूप में जाने पर जलन भी होने लगती है.

कोशिकाओं और मेलानिन उत्पादन को बढ़ाने में आयुर्वेदिक अनुसंधान

आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथो के आधार पर निर्मित इस औषधि की जड़ी-बूटियों को प्रमाणित करने के लिए सर्वप्रथम हाई परफॉरमेंस लिक्विड क्रोमैटोग्राफी तकनीक के माध्यम से यह देखा गया कि वह कौन से सिग्नेचर फाइटोमेटाबोलाइट हैं जो सीधे तौर पर मेलेनिन को ठीक करने में मददगार है और उनका स्टैंडर्डाइजेशन किया गया. इस प्रक्रिया का प्रथम उद्देश्य उन तत्वों की खोज करना था जो आयुर्वेद ग्रंथो के अनुसार इन बिमारियों में लाभदायक हैं, द्वितीय यह भी सुनिश्चित करना जरूरी था कि जो भी आयुर्वेदिक औषधि निर्मित हो रही हो उसमें वह सभी तत्व सही मात्रा में विधमान रहे.

तत्पश्चात, कोशिकाओं पर परिक्षण के लिए प्रयोगशाला में ऊतकों का निर्माण किया गया और यह देखा गया कि इस दवाई से त्वचा पर किसी प्रकार कि कोई हानि तो नहीं हो रही है. 100 माइक्रोग्राम/एमएल की मेलानोग्रिट डोज़ के साथ भी यह देखा गया कि इन कोशिकाओं को कोई हानि तो नहीं हो रही है. उसके बाद यह भी देखा गया है कि मेलानोग्रिट देने के बाद इन कोशिकाओं के अंदर मौजूद फाइबर जैसे स्ट्रक्चर्स जिन्हें डैंड्राइट्स कहा जाता है में भी विस्तार हो रहा है. यह डैंड्राइट्स तय करते हैं कि वह कहां तक अपनी कनेक्टिविटी बना पाते हैं, जिससे कि एक कोशिकाओं से दूसरी कोशिकाओं तक मेलानिन पहुंचाया जा सके.

मेलानोग्रिट से त्वचा रंग और कोशिका स्वास्थ्य सुधार

इसके बाद एक और शोध के द्वारा मेलानोग्रिट की प्रमाणिकता की पुष्टि की गई, इसके लिए अल्फा – एमएसएच (अल्फ़ा – मेलानिन स्टिमुलेटिंग हार्मोन), जो कि एक प्रकार का हार्मोन है और आयुर्वेदिक हर्बल औषधि मेलानोग्रिट के द्वारा यह पाया गया कि अगर स्वस्थ कोशिकाओं में पहले यह हार्मोन इनड्यूस्ड किया जाये तो कोशिकाओं का रंग काला हो जाता है और फिर इस हार्मोन की मात्रा और भी कम कर दी जाये तो यह पारदर्शी जैसे हो जाते है परन्तु मेलानोग्रिट के प्रयोग से इनको फिर से उसी रूप और रंग मे किया जा सकता है जैसे वह स्वस्थ कोशकाएं हो.

उसके बाद इसके मोड ऑफ़ एक्शन को जानने की कोशिश की गई, एक एन्ज़ाइम टाइरोसिनेज़ जो एल-डोपा के लेवल को कण्ट्रोल करता है, उस पर शोध में यह पाया गया कि मेलानोग्रिट के प्रयोग से सेलुलर टाईरोसिनेज़ एक्टिविटी को भी बढ़ाया जा सकता है जो यह प्रमाणित करता है कि त्वचा कोशिकाओं के अंदर एंजाइम की कार्यशीलता बढ़ चुकी है.

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कंपकपी और मंद गति से मिलेगी राहत, पार्किंसंस के लक्षणों को जड़ से मिटाता है न्यूरोग्रिट गोल्ड

कंपकपी और मंद गति से मिलेगी राहत, पार्किंसंस के लक्षणों को जड़ से मिटाता है न्यूरोग्रिट गोल्ड


Health News: पार्किंसंस रोग मष्तिष्क या स्नायुतंत्र का एक न ठीक होने वाला और घातक रोग है. इस बीमारी में हमारे मस्तिष्क की स्नायु कोशिकाएं विभिन्न कारणों से मरने लगती हैं. लगभग 50 फीसदी से ज्यादा व्यक्तियों में यह रोग अज्ञात कारणों से होता है, वहीं अन्य 50 फीसदी में इसकी वजह विभिन्न प्रकार के विषाक्त पदार्थ, दवाइयों के साइड इफेक्ट्स, मष्तिष्क के संक्रमण या सर में चोट लगना होता है.

विश्व प्रसिद्द मुक्केबाज़ मोहम्मद अली को भी सर में चोट लगने के कारण कम उम्र में ही पार्किंसंस रोग हुआ था. ब्रिटिश चिकित्सक जेम्स पार्किंसन के 1817 में लिखे गए एक लेख ‘An Essay on the Shaking Palsy’ के आधार पर इस बीमारी का नाम रखा गया. विश्व भर में 65 साल के ज्यादा उम्र के व्यक्तियों में लगभग 1 फीसदी लोगों में यह बीमारी पाई जाती है. यह एल्ज़ाइमर्स के बाद दूसरी सबसे बड़ी स्नायुतंत्र सम्बन्धी बीमारी है. यह बीमारी एक बार शुरू होने पर बढ़ती ही जाती है.

डोपामिन की कमी से पार्किंसंस रोग

मष्तिष्क हमारे शरीर के सभी अंगो का सञ्चालन करता है. अंग सञ्चालन दो प्रकार से होता है – स्वैच्छिक और अनैच्छिक. मष्तिष्क के ऊपरी भाग की ओर स्थित ‘पिरामिडल’ स्वैच्छिक अंग सञ्चालन को नियंत्रित करता है वहीं “बेसल ग्यानग्लिया” अनैच्छिक अंग सञ्चालन को नियंत्रित करता है. बेसल ग्यानग्लिया में सब्सटेंसिया नियाग्रा नामक एक काले रंग का टिशू होता है. इस हिस्से के अंदर जब न्यूरॉन्स या मष्तिष्क कोशिकाएं मरने लगती है तो पार्किंसंस रोग की शुरुआत होती है.

न्यूरॉन्स एक दूसरे को संकेत भेजने के लिए न्यूरोट्रांसमीटर्स का प्रयोग करते हैं. ऐसा ही एक न्यूरोट्रांसमीटर डोपामिन है, जिसकी कमी होने पर न्यूरॉन्स की आपस की कनेक्टिविटी पर असर पड़ता है. इसके कारण न्यूरॉन्स बाकि शारीरिक कोशिकाओं को भली भांति सिग्नल्स नहीं भेज पाते हैं. फलस्वरूप शारीरिक मूवमेंट्स पर असर पड़ता है. मस्तिष्क में डोपामिन का मात्रा और सब्स्टेंसिया नियाग्रा की कोशिकाओं की मृत्यु इस बीमारी के प्रमुख कारक हैं.

जब इस डोपामिन का स्तर मस्तिष्क में 70 -80फीसदी तक कम हो जाता है तब इसके साथ-साथ स्नायु कोशिकाओं में कुछ संरचनात्मक परिवर्तन भी देखा जाता हैं, जिसे “ल्यू बॉडीज” कहते हैं, जिनके अंदर “साईन्यूक्लीन” नामक एक प्रोटीन जमा होते हैं. यह इस न्यूरो-डिजनरेटिव रोग के लिए एक बॉयोमार्कर की तरह काम करते है, जिसका मतलब अगर यह एक जगह जमा होना शुरू हो जाये तो, पार्किंसंस रोग की शुरुआत हो जाती है. स्नायु कोशिकाओं की मृत्यु होने से पार्किंसंस रोग के साथ -साथ तनाव, चिंता, अवसाद आदि विभिन्न प्रकार की मानसिक बीमारियां भी होने लगती हैं.

किस कारण से होती है ये बीमारी?

यह बीमारी 2 कारणों से हो सकती है, पहला अगर यह अनुवांशिक हो जिसका मतलब सीन्यूक्लीन प्रोटीन में अगर म्यूटेशन पैदा हो जाए और दूसरा तनाव, चिंता, अवसाद के कारण. इस बीमारी के प्रारंभिक लक्षणों में, अंगो के काम करने की गति धीमी पड़ जाती है और हाथ पैर का कांपना शुरू हो जाता है. धीरे-धीरे बीमारी बढ़ने पर शरीर का ऊपरी हिस्सा झुकने लगता है और घुटने भी मुड़ जाते हैं. खाते समय, बात करते समय और दैनिक दिनचर्या के अन्य कार्य करते समय भी गति मंद हो जाती है और अंत में रोगी किसी भी प्रकार के कार्य करने में असमर्थ हो जाते हैं.

आधुनिक चिकित्सा पद्धति में इस रोग के लिए बहुत सी दवाइयां हैं परन्तु इनका कोई स्थाई इलाज नहीं है. साथ ही इन दवाइयों के साइड इफेक्ट्स भी हैं. इसी समस्या से मुक्ति के लिए पतंजलि योगपीठ के माध्यम से पतंजलि अनुसंधान संस्थान द्वारा विभिन्न आधुनिक शोधो के उपरांत न्यूरोग्रित गोल्ड का निर्माण किया गया है. यह औषधि एकांगवीर रस, मोती पिष्टी, रजत भस्म, वसंत कुसुमाकर रस, रसराज रस, ज्योतिष्मती, गिलोय आदि महत्वपूर्ण जड़ी – बूटियों से बनी है, जिनका को दुष्परिणाम भी नही है.

न्यूरोग्रिट गोल्ड से न्यूरॉन्स की क्षमता बढ़ाना

इस उम्रर्वेदिक औषधि की प्रमाणिकता की पुष्टि के लिए सबसे पहले सी. एलेगंस को चुना गया. इन सी. एलेगंस की लम्बाई 1 एमएम तक होती है, यानि यह बहुत छोटे जीव होते हैं, साथ ही इनका जीवनचक्र मात्र 21 दिन का होता है. इन जीवों में 302 न्यूरॉन्स होते हैं जिन्हे गिना जा सकता हैं, इसके साथ ही इनमें ऐसे 8 न्यूरॉन्स होते हैं जो डोपामिन का स्राव करते हैं. इन्हीं सब कारणों से यह शोधपरक गतिविधियों के लिए यह एक उत्तम जीव है.

उसके बाद इन न्यूरॉन्स में कुछ बदलाव किये गए अर्थात इनको म्युटेशन दिया गया, इस प्रक्रिया में इन न्यूरॉन्स के आगे कुछ रंगीन प्रोटीन लगा दिए, जिससे यह पता लग पाए कि यह न्यूरॉन्स या जींस किस प्रकार से दिखाई दे रहे हैं. इन जीवों को न्यूरोग्रिट देने के बाद इनके जीवनचक्र में 2 दिन की बढ़ोतरी देखी गई, जो जीवनकाल पहले 21 दिन का था वह 23 दिन का हो गया था. एक न्यूरोटॉक्सिक 6-OHDA का प्रयोग कर यह पाया गया कि यह मस्तिष्क के लगभग 50फीसदी न्यूरॉन्स को ख़त्म करना शुरू कर देता है.

न्यूरोग्रिट के उपयोग से यह पाया गया कि इस औषधि के द्वारा न्यूरॉन्स की संख्या को वापिस पाया जा सकता है. पेट्रीप्लेट के द्वारा एक और शोध किया गया जिसमें एक ओर इन जीवों के आकर्षक और दूसरी ओर विकर्षक रखे गए. प्रायः यह देखा गया कि अच्छे जीव अपनी नैसर्गिक क्रिया के साथ ही आकर्षको की ओर गए , वहीं जब इन जीवों में न्यूरोटॉक्सिसिटी शुरू हो गई तो यह जीव विकर्षको की ओर आकर्षित होने लगे. तत्पश्चात इन जीवों को न्यूरोग्रिट गोल्ड दिया गया तो यह जीव फिर से अपनी नैसर्गिक किया को दोहराते हुए आकर्षको की ओर जाने लगे, जोकि एक सफल प्रतिक्रिया थी.

न्यूरोग्रिट से न्यूरॉन्स की संरचना और गतिविधि में सुधार

शोध से पहले ये जानने का प्रयास किया गया कि सी. एलेगंस की स्वाभाविक गतिविधियां या व्यवहार किस प्रकार का है. उसके बाद इनके न्यूरॉन्स में कुछ बदलाव किये गए अर्थात इनको म्युटेशन दिया गया. इस प्रक्रिया में इन न्यूरॉन्स के आगे कुछ रंगीन प्रोटीन लगा दिए, जिससे यह पता लग पाए कि यह न्यूरॉन्स या जींस किस प्रकार से दिखाई दे रहे हैं. तत्पश्चात इनकी प्रतिक्रियाओं का आकलन किया गया और पाया कि इनके व्यवहार जैसे सिर हिलाने की गति, चलने की गति के घुमाव में आदि में कमी आई.

इसके बाद उम्रर्वेदिक औषधि न्यूरोग्रिट गोल्ड की प्रभाविकता को नापने के लिए इन जीवों को यह औषधि दी गई, परिणामस्वरुप इन जीवों में स्वस्थ्य बदलाव देखने को मिले. इन जीवों को न्यूरोग्रिट देने के बाद इनके जीवनचक्र में 2 दिन की बढ़ोतरी देखी गई, जो जीवनकाल पहले 21 दिन का था वह 23 दिन का हो गया था. एक न्यूरोटॉक्सिक 6-OHDA का प्रयोग कर यह पाया गया कि यह मस्तिष्क के लगभग 50फीसदी न्यूरॉन्स को ख़त्म करना शुरू कर देता है. न्यूरोग्रिट के उपयोग से यह पाया गया कि इस औषधि के द्वारा न्यूरॉन्स की संख्या को वापिस पाया जा सकता है.

पेट्रीप्लेट के द्वारा एक और शोध किया गया जिसमें एक ओर इन जीवों के आकर्षक और दूसरी ओर विकर्षक रखे गए. प्रायः यह देखा गया कि अच्छे जीव अपनी नैसर्गिक क्रिया के साथ ही आकर्षको की ओर गए , वहीं जब इन जीवों में न्यूरोटॉक्सिसिटी शुरू हो गई तो यह जीव विकर्षको की ओर आकर्षित होने लगे. तत्पश्चात इन जीवों को न्यूरोग्रिट गोल्ड दिया गया तो यह जीव फिर से अपनी नैसर्गिक किया को दोहराते हुए आकर्षको की ओर जाने लगे, जोकि एक सफल प्रतिक्रिया थी.

न्यूरोग्रिट ने एलोपैथिक दवा एल-डोपा से बेहतर परिणाम दिखाए

एक अन्य शोध में अल्फा – सीन्यूक्लीन, जोकि पार्किंसंस रोग का मुख्य कारक है को हरे रंग की डाई के साथ इन जीवों में रोपित किया गया, जिससे इस बीमारी का पता चल सके, उसके बाद ऐलोपैथिक दवा एल – डोपा से तुलनात्मक अध्ययन के लिए इन जीवों में न्यूरोग्रिट और अल – डोपा दिया गया, जिससे परिणाम निकला कि न्यूरोग्रिट, अल – डोपा से अधिक प्रभावकारी है और उसने इन जीवों पर अधिक बेहतर प्रभाव दिखाया. एक और शोध के लिए सी. एलेगंस को उनका भोजन अर्थात बैक्टीरिया लाल स्टेन के साथ दिए गए, जिससे यह पता लगा कि इन जीवों कि भूख की क्षमता समाप्त हो गई थी. उसके बाद इन्हें हरे स्टेन के साथ मिला दिया गया. तुलनात्मक अध्ययन के लिए इन जीवों पर एलोपैथिक दवाई एल – डोपा और उम्रर्वेदिक औषधि न्यूरोग्रिट दिया गया, फलस्वरूप न्यूरोग्रिट ने एल – डोपा से बेहतर परिणाम दिए, जोकि एक प्रभावकारी शोध रहा.

उसके बाद एक अन्य शोध में न्यूरॉन्स में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ाने के लिए सोडियम आर्सेनिक दिया गया, जिसके फलस्वरूप न्यूरॉन्स मरने लगे, फिर जब उम्रर्वेदिक औषधि न्यूरोग्रिट दी गई तो फिर से सी. एलेगंस ठीक होने लगे. तत्पश्चात जींस एक्सप्रेशन के तौर पर भी न्यूरोग्रिट को परखने के बाद यह निष्कर्ष निकला की यह औषधि 3 बड़े जींस PINK – 1, PDR – 1, और CAT – 1, को भी कण्ट्रोल करती है.

न्यूरोग्रिट गोल्ड, उम्रर्वेद के प्राचीनतम सिद्धांतो पर निर्मित एक साक्ष्य आधारित उम्रर्वेदिक औषधि है जोकि पार्किंसंस जैसी मष्तिष्क से जुड़ी बीमारी को जड़ से समाप्त करने की क्षमता रखती है.

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सावधान! सिर्फ धूप से ही नहीं, शरीर के इन ‘छिपे हुए’ हिस्सों में भी हो सकता है स्किन कैंसर

सावधान! सिर्फ धूप से ही नहीं, शरीर के इन ‘छिपे हुए’ हिस्सों में भी हो सकता है स्किन कैंसर


Skin Cancer Symptoms: अक्सर लोग स्किन कैंसर को सिर्फ धूप और सनबर्न से जोड़कर देखते हैं. हमें बताया जाता है कि तिलों में बदलाव पर नजर रखें और सूरज की तेज किरणों से खुद को बचाएं. लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि स्किन कैंसर, खासकर मेलानोमा, शरीर के उन हिस्सों में भी हो सकता है, जहां धूप बिल्कुल नहीं पहुंचती. यही वजह है कि ऐसे छिपे हुए मेलानोमा ज्यादा खतरनाक माने जाते हैं, क्योंकि ये लंबे समय तक पकड़ में नहीं आते और जोखिम बढ़ जाता है. चलिए आपको इनके बारे में बताते हैं. 

क्या है इससे बचाव का तरीका?

स्किन कैंसर से बचाव की पहली सीढ़ी है खुद की नियमित जांच. लेकिन परेशानी यह है कि हम अक्सर उन्हीं हिस्सों को देखते हैं, जो खुले रहते हैं. जबकि कई गंभीर मामले ऐसे अंगों में सामने आते हैं, जिन पर आमतौर पर ध्यान नहीं जाता. माना जाता है कि धूप से डीएनए को होने वाला नुकसान, कुछ जेनेटिक कारण और कमजोर इम्यून सिस्टम मिलकर स्किन कैंसर के खतरे को बढ़ाते हैं.

कहां-कहां होते हैं स्किन कैंसर के लक्षण?

कान के बाहरी हिस्से में शुरू होने वाला स्किन कैंसर शुरुआत में सूखी, पपड़ीदार त्वचा या धीरे-धीरे बढ़ने वाली सफेद गांठ जैसा दिख सकता है. यह अक्सर दर्द नहीं देते हैं, जिससे लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं. अगर समय रहते इलाज न हो, तो यह अंदरूनी कान और वहां की हड्डियों तक फैल सकता है. नाखून के नीचे होने वाला कैंसर सबअंगुअल मेलानोमा कहलाता है. यह हाथ या पैर के नाखूनों के नीचे काले या गहरे निशान के रूप में दिख सकता है. पुरुषों में जननांगों की त्वचा पर भी संदिग्ध घाव स्किन कैंसर का संकेत हो सकते हैं, इसलिए इन हिस्सों की जांच भी जरूरी है.

आंखों में होने वाला मेलानोमा आंख के सफेद हिस्से या पुतली के आसपास गहरे धब्बे के रूप में नजर आ सकता है. वहीं, पलकों पर बनने वाली छोटी, सख्त गांठ तेजी से बढ़ सकती है और इसे स्किन कैंसर के आक्रामक रूपों में गिना जाता है जीभ और मुंह के अंदर भी कैंसर पनप सकता है, खासकर उन लोगों में जो धूम्रपान करते हैं या ज्यादा शराब पीते हैं. यहां गांठ, न भरने वाला घाव, झुनझुनी, सुन्नपन या सफेद कठोर धब्बे खतरे का संकेत हो सकते हैं.

इन हिस्सों में भी हो सकते हैं कैंसर

पैरों के तलवों और हाथों की हथेलियों पर भी स्किन कैंसर हो सकता है. गहरे रंग की त्वचा वाले लोगों में यह बिना धूप वाले हिस्सों में ज्यादा देखा गया है. सिर की त्वचा, खासकर जिन लोगों के बाल पतले हैं या गंजापन है, वहां भी कैंसर छिपा रह सकता है. होंठों पर होने वाला स्किन कैंसर पुरुषों में ज्यादा पाया जाता है और इसका संबंध धूम्रपान, शराब और HPV संक्रमण से जोड़ा जाता है. इसके अलावा टैटू वाले हिस्सों में तिल या धब्बे छिप सकते हैं, जिससे बदलाव पहचानना मुश्किल हो जाता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एक्सपर्ट का कहना है कि अगर परिवार में स्किन कैंसर का हिस्ट्री हो, त्वचा बहुत गोरी हो, तिल ज्यादा हों या लंबे समय तक बाहर रहना पड़ता हो, तो अतिरिक्त सतर्कता जरूरी है. हर तीन महीने में खुद की जांच करें, शीशे की मदद लें और अपनों से भी नजर रखने को कहें. स्किन कैंसर जितनी जल्दी पकड़ा जाए, इलाज उतना ही आसान और असरदार होता है.

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