लंबी उम्र के लिए कार्डियो या स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, जानें कौन सही, समय से पहले मौत का खतरा 58% कम

लंबी उम्र के लिए कार्डियो या स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, जानें कौन सही, समय से पहले मौत का खतरा 58% कम


Is Strength Training Better Than Cardio For Longevity: फिटनेस की दुनिया में लंबे समय से एक बहस चलती आ रही है कि बेहतर स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए कार्डियो ज्यादा जरूरी है या फिर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग? एक तरफ दौड़ना, साइकिल चलाना और तेज चाल से चलने जैसी गतिविधियों के समर्थक हैं, तो दूसरी ओर वजन उठाने और मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाली एक्सरसाइज को सबसे प्रभावी मानने वाले लोग हैं. लेकिन अब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर की एक बड़ी स्टडी ने इस बहस को नई दिशा दे दी है.

अलग-अलग एक्सरसाइज से क्या होता है असर?

ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में पब्लिश इस रिसर्च में 1 लाख 47 हजार 374 एडल्ट के स्वास्थ्य और व्यायाम की आदतों का करीब 30 वर्षों तक एनालिसिस किया गया. रिसर्चर ने यह जानने की कोशिश की कि अलग-अलग प्रकार की एक्सरसाइज का मृत्यु दर, हृदय रोग, कैंसर और ब्रेन संबंधी बीमारियों पर क्या असर पड़ता है. रिसर्चर का सबसे दिलचस्प निष्कर्ष यह रहा कि ज्यादा व्यायाम हमेशा ज्यादा फायदा नहीं देता. खासतौर पर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के मामले में एक तय सीमा के बाद लाभ बढ़ना लगभग रुक जाता है. रिसर्च के अनुसार, सप्ताह में 90 से 120 मिनट तक मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाली एक्सरसाइज करना सबसे फायदेमंद साबित हुआ. 

कितने घंटे स्ट्रेंथ ट्रेनिंग फायदेमंद?

जो लोग हर सप्ताह लगभग डेढ़ से दो घंटे स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करते थे, उनमें किसी भी कारण से मृत्यु का खतरा 13 प्रतिशत कम पाया गया. वहीं हार्ट संबंधी बीमारियों से मौत का जोखिम 19 प्रतिशत और अल्जाइमर जैसी ब्रेन संबंधी बीमारियों से मृत्यु का खतरा 27 प्रतिशत तक कम देखा गया.  रिसर्चर का कहना है कि दो घंटे से अधिक स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करने पर अतिरिक्त लाभ बहुत सीमित हो जाते हैं.  हालांकि इस स्टडी का निष्कर्ष यह नहीं है कि स्ट्रेंथ ट्रेनिंग कार्डियो से बेहतर है. असल में सबसे ज्यादा फायदे उन लोगों को मिले जिन्होंने दोनों तरह की एक्सरसाइज को अपनी रूटीन का हिस्सा बनाया. कार्डियो और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग का संतुलित कम्बिनेशन समय से पहले मृत्यु के जोखिम को 58 प्रतिशत तक कम करने से जुड़ा पाया गया.

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स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करने से क्या होता है फायदा?

एक्सपर्ट का मानना है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर में मांसपेशियां कम होने लगती हैं, जिसे सारकोपेनिया कहा जाता है. इसके कारण कमजोरी, गिरने का खतरा, धीमा मेटाबॉलिज्म और रोजमर्रा के काम करने में परेशानी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं. स्ट्रेंथ ट्रेनिंग इन दिक्कतों को कम करने में मदद करती है. इसके अलावा यह हड्डियों को मजबूत बनाती है, इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार करती है, ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने में मदद करती है और ऑस्टियोपोरोसिस के खतरे को भी कम कर सकती है. डंबल, रेजिस्टेंस बैंड, बॉडीवेट एक्सरसाइज, योग, पिलाटीज और यहां तक कि कुछ कठिन बागवानी गतिविधियां भी इसमें शामिल मानी जाती हैं. एक्सपर्ट के अनुसार, तीव्रता से ज्यादा महत्वपूर्ण नियमितता है.

किसको चुनना बेहतर?

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की इस स्टडी का संदेश साफ है. यदि आप लंबा और स्वस्थ जीवन जीना चाहते हैं तो कार्डियो और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है. सप्ताह में लगभग दो घंटे स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और नियमित कार्डियो एक्सरसाइज का कम्बिनेशन आपके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और कई गंभीर बीमारियों के दिक्कतों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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नींबू पानी में भूलकर भी ना डालें ये चीज, जहर बन जाएगी फायदा देने वाली ये ड्रिंक

नींबू पानी में भूलकर भी ना डालें ये चीज, जहर बन जाएगी फायदा देने वाली ये ड्रिंक


Why You Should Avoid Adding Sugar To Lemon Water: गर्मी के मौसम में नींबू पानी सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले पेयों में से एक है. शरीर को ठंडक पहुंचाने से लेकर डिहाइड्रेशन से बचाने तक, इसके कई फायदे बताए जाते हैं. लेकिन अक्सर लोग इसका स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें भरपूर मात्रा में चीनी मिला देते हैं. यही आदत इस हेल्दी ड्रिंक के फायदों को कम कर सकती है. अगर आप भी रोजाना नींबू पानी पीते हैं, तो यह जानना जरूरी है कि इसमें जरूरत से ज्यादा चीनी मिलाना आपकी सेहत के लिए सही नहीं माना जाता.

नींबू पानी पीना फायदेमंद

नींबू पानी बिना चीनी के भारतीय घरों में लंबे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है. पारंपरिक निंबू पानी में अक्सर काला नमक, सेंधा नमक या भुना हुआ जीरा मिलाया जाता है. यह मिश्रण शरीर को हाइड्रेट रखने के साथ-साथ जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स की पूर्ति करने में मदद करता है. खासकर गर्मी और उमस के दिनों में यह ड्रिंक काफी राहत देती है. आयुर्वेद में भी नींबू को महत्वपूर्ण माना गया है. कई लोग सुबह खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू मिलाकर पीते हैं. माना जाता है कि इससे पाचन क्रिया को सक्रिय करने, शरीर को तरोताजा रखने और दिन की शुरुआत बेहतर तरीके से करने में मदद मिल सकती है. नींबू में मौजूद विटामिन-सी शरीर की इम्यून क्षमता को मजबूत बनाने में भी अहम भूमिका निभाता है.

चीनी मिलाने से क्या दिक्कत?

Utopian की रिपोर्ट के अनुसार, जब नींबू पानी में ज्यादा चीनी मिला दी जाती है, तो इसकी कैलोरी बढ़ जाती है. नियमित रूप से अधिक चीनी का सेवन वजन बढ़ने, ब्लड शुगर लेवल प्रभावित होने और अन्य हेल्थ समस्याओं के जोखिम को बढ़ा सकता है. यही वजह है कि आजकल कई हेल्थ एक्सपर्ट और डाइट एक्सपर्ट नींबू पानी को बिना चीनी या कम चीनी के पीने की सलाह देते हैं.

संतरे के जूस में भी नहीं मिलाना चाहिए

सिर्फ नींबू ही नहीं, संतरे का जूस भी बिना चीनी के ज्यादा फायदेमंद माना जाता है. संतरे में प्राकृतिक रूप से मिठास होती है, इसलिए इसमें अतिरिक्त चीनी मिलाने की जरूरत नहीं पड़ती. बिना चीनी वाला ताजा संतरे का जूस विटामिन-सी का अच्छा सोर्स है और शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद कर सकता है. यही कारण है कि फिटनेस और हेल्थ को लेकर जागरूक लोग अब ऐसे पेयों को प्राथमिकता दे रहे हैं जिनमें अतिरिक्त चीनी न हो.

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स्वाद बढ़ाने के लिए क्या करें?

अगर आपको नींबू पानी का स्वाद बढ़ाना है, तो चीनी की जगह पुदीने की पत्तियां, काला नमक, सेंधा नमक या भुना जीरा इस्तेमाल कर सकते हैं. इससे स्वाद भी बेहतर होगा और पेय की पौष्टिकता भी बनी रहेगी. वहीं संतरे का जूस हमेशा ताजा और बिना अतिरिक्त चीनी के पीना बेहतर माना जाता है. आज के समय में जब लोग पैकेज्ड और ज्यादा मीठे पेयों से दूरी बना रहे हैं, तब नींबू पानी और संतरे का जूस जैसे प्राकृतिक विकल्प फिर से लोकप्रिय हो रहे हैं. इसलिए अगली बार जब आप नींबू पानी बनाएं, तो उसमें चीनी डालने से पहले एक बार जरूर सोचें. कई बार छोटी-सी आदत ही आपकी हेल्थ पर बड़ा असर डाल सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सर्जरी के बाद रेडिएशन थेरेपी से थमेगा ब्लैडर कैंसर, दोबारा बीमारी लौटने का खतरा हुआ बेहद कम

सर्जरी के बाद रेडिएशन थेरेपी से थमेगा ब्लैडर कैंसर, दोबारा बीमारी लौटने का खतरा हुआ बेहद कम


How Radiation Therapy Helps In Bladder Cancer Treatment: ब्लैडर कैंसर के इलाज में सर्जरी को सबसे प्रभावी तरीकों में से एक माना जाता है, लेकिन कई मरीजों में ऑपरेशन के बाद भी बीमारी दोबारा लौटने का खतरा बना रहता है. खासतौर पर हाई-रिस्क मसल-इनवेसिव ब्लैडर कैंसर के मरीजों में यह चुनौती अधिक देखने को मिलती है. ऐसे में एक नए स्टडी ने संकेत दिया है कि सर्जरी के बाद दी जाने वाली रेडिएशन थेरेपी मरीजों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है और कैंसर की वापसी के जोखिम को कम कर सकती है. 

कैसे काम करती है रेडिएशन थेरेपी?

 जर्नल ऑफ क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी में पब्लिश रिसर्च निष्कर्ष में  एक फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल से सामने आया है. रिसर्चर ने पाया कि ब्लैडर को सर्जरी के जरिए हटाने और कीमोथेरेपी लेने के बाद रेडिएशन थेरेपी कराने वाले मरीजों में कैंसर के दोबारा उसी क्षेत्र में लौटने की संभावना कम रही. स्टडी के अनुसार, रेडिएशन थेरेपी से बीमारी पर बेहतर नियंत्रण हासिल किया जा सकता है, हालांकि कुल जीवित रहने की दर और बीमारी- मुक्त रहने की अवधि में दिखा सुधार पूरी तरह महत्वपूर्ण नहीं माना गया. 

किन लोगों को रिसर्च में शामिल किया गया?

यह टेस्ट भारत के चार शैक्षणिक चिकित्सा केंद्रों में किया गया, जिसमें नॉन-मेटास्टेटिक मसल-इनवेसिव ब्लैडर कैंसर से पीड़ित 153 मरीज शामिल थे. इनमें से 71 प्रतिशत मरीजों को सर्जरी से पहले कीमोथेरेपी दी गई थी, जबकि करीब 20 प्रतिशत मरीजों ने सर्जरी के बाद कीमोथेरेपी प्राप्त की. इसके बाद कुछ मरीजों को रेडिएशन थेरेपी दी गई, जबकि अन्य मरीजों को केवल निगरानी में रखा गया.

क्या निकला इसका रिजल्ट?

रेडियोथेरेपी सर्जरी या अंतिम कीमोथेरेपी सत्र के आठ सप्ताह के भीतर शुरू की गई. लगभग 47 महीने तक मरीजों की निगरानी के बाद रिसर्चर ने पाया कि दो साल तक कैंसर के स्थानीय या आसपास के हिस्सों में दोबारा न लौटने की दर रेडिएशन समूह में 87.1 प्रतिशत रही, जबकि केवल निगरानी वाले समूह में यह आंकड़ा 76 प्रतिशत था. रिसर्चर ने कहा कि एडजुवेंट पेल्विक इंटेंसिटी-मॉड्यूलेटेड रेडिएशन थेरेपी ने हाई-रिस्क यूरोथेलियल मसल-इनवेसिव ब्लैडर कैंसर मरीजों में लोकल कंट्रोल बेहतर किया और इसके साथ गंभीर बुरे प्रभाव में कोई उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं देखी गई. यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे सर्जरी के बाद दिए जाने वाले उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रहे हैं.

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डिजीज-फ्री सर्वाइवल 71.6 प्रतिशत 

स्टडी में यह भी देखा गया कि रेडिएशन लेने वाले मरीजों में डिजीज-फ्री सर्वाइवल 71.6 प्रतिशत रही, जबकि दूसरे समूह में यह 58.7 प्रतिशत थी. इसी तरह ब्लैडर कैंसर-विशिष्ट सर्वाइवल और ओवरऑल सर्वाइवल के आंकड़े भी रेडिएशन समूह में बेहतर पाए गए.  हालांकि इन परिणामों को स्टेटिकल फॉर्म से निर्णायक नहीं माना गया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि जिन मरीजों को पेल्विक रेडिएशन दी गई, उनमें लोकल या क्षेत्रीय स्तर पर कैंसर की पुनरावृत्ति केवल 7.9 प्रतिशत मामलों में हुई. वहीं, निगरानी वाले समूह में यह दर 25.6 प्रतिशत दर्ज की गई। इससे संकेत मिलता है कि रेडिएशन थेरेपी कैंसर को उसी क्षेत्र में वापस आने से रोकने में अहम भूमिका निभा सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल होने पर भी आ सकता है हार्ट अटैक? एक्सपर्ट से जानें

क्या कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल होने पर भी आ सकता है हार्ट अटैक? एक्सपर्ट से जानें


Hidden Cholesterol Marker: बदलती लाइफस्टाइल के चलते हमें हार्ट से जुड़ी तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में  हार्ट की सेहत की बात होती है तो आमतौर पर लोग एलडीएल, एचडीएल और ट्राइग्लिसराइड जैसे कोलेस्ट्रॉल के आंकड़ों पर ध्यान देते हैं. ज्यादातर लोग मानते हैं कि अगर उनकी कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट नॉर्मल है तो उनका दिल पूरी तरह सुरक्षित है. लेकिन हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां लोगों को कम उम्र में हार्ट अटैक आया, जबकि उनकी सामान्य कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट में कोई बड़ी गड़बड़ी नहीं थी. यही वजह है कि अब डॉक्टर केवल LDL, HDL और ट्राइग्लिसराइड्स पर ही ध्यान नहीं दे रहे हैं, बल्कि कुछ ऐसे छिपे हुए जोखिमों की भी जांच करने की सलाह दे रहे हैं जो सामान्य टेस्ट में नजर नहीं आते. एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई बार शरीर के अंदर ऐसी समस्याएं मौजूद होती हैं जो रिपोर्ट में नहीं दिखतीं, लेकिन दिल की सेहत पर गंभीर असर डाल सकती हैं. 

क्या है Lp(a), जिसे बताया जा रहा है छिपा हुआ खतरा?

डॉक्टरों के अनुसार Lipoprotein(a) या Lp(a) एक खास तरह का कोलेस्ट्रॉल कण होता है, जो दिखने में LDL यानी बैड कोलेस्ट्रॉल जैसा होता है, लेकिन इसमें एक अतिरिक्त प्रोटीन जुड़ा होता है. यही वजह है कि यह रक्त नलिकाओं में चर्बी जमा होने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि सामान्य लिपिड प्रोफाइल टेस्ट में Lp(a) की जांच नहीं की जाती. ऐसे में किसी व्यक्ति की कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट सामान्य आ सकती है, लेकिन फिर भी उसके दिल को खतरा बना रह सकता है. 

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बढ़ रहे हैं हार्ट अटैक के मामले

भारत में डॉक्टरों को एक चिंताजनक ट्रेंड दिखाई दे रहा है. कई लोग जिनकी कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट सामान्य होती है, वे भी 30 से 40 की उम्र में हार्ट अटैक का शिकार हो रहे हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ का मानना है कि इसके पीछे जेनेटिक कारणों से बढ़ा हुआ Lp(a) लेवल एक अहम वजह हो सकता है. यह फैक्टर ज्यादातर जेनेटिक्स से प्रभावित होता है, इसलिए डाइट या एक्सरसाइज का इस पर सीमित असर पड़ता है.

भारत में तेजी से बढ़ रहे हैं मामले

एक्सपर्ट के अनुसार भारत में समय से पहले दिल की बीमारी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. कई रिपोर्टों में बताया गया है कि देश में होने वाली कुल मौतों का बड़ा हिस्सा हार्ट रोगों से जुड़ा है. चिंता की बात यह है कि कई मरीजों में हार्ट अटैक पश्चिमी देशों की तुलना में 10 से 15 साल पहले हो रहा है. जेनेटिक प्रवृत्ति, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, अनएक्टिव लाइफस्टाइल और छिपे हुए लिपिड मार्कर जैसे Lp(a) इस जोखिम को बढ़ा सकते हैं.

डॉक्टरों का कहना है कि जिन लोगों के परिवार में कम उम्र में हार्ट अटैक, स्ट्रोक या दिल की बीमारी के मामले रहे हों, उन्हें कम से कम एक बार Lp(a) टेस्ट जरूर करवाना चाहिए. इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा और खराब लाइफस्टाइल वाले लोगों को भी दिल की जांच को गंभीरता से लेना चाहिए. हालांकि Lp(a) को सीधे कम करना आसान नहीं माना जाता, लेकिन इसकी जानकारी होने पर दूसरे जोखिमों जैसे LDL कोलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर को बेहतर तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है. 

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खाने की थाली बन रही मौत की वजह! खराब फूड से हर साल 15 लाख बच्चों की मौत, WHO ने जारी की रिपोर्ट

खाने की थाली बन रही मौत की वजह! खराब फूड से हर साल 15 लाख बच्चों की मौत, WHO ने जारी की रिपोर्ट


Food Safety : विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक नई रिपोर्ट ने फूड सेफ्टी को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, गंदे और खराब खाने की वजह से हर साल लाखों लोग बीमार पड़ रहे हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोगों की जान भी जा रही है. वहीं सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि छोटे बच्चे इस खतरे का सबसे बड़ा शिकार बन रहे हैं. पांच साल से कम उम्र के बच्चों में खराब खाने से होने वाली बीमारियों का खतरा बड़े बच्चों और एडल्ट्स की तुलना में लगभग तीन गुना ज्यादा है. दुनिया की कुल आबादी में इन बच्चों की हिस्सेदारी केवल 9 प्रतिशत है, लेकिन फूड बोर्न डिजीज के करीब एक-तिहाई मामले इन्हीं से जुड़े हैं. 

छोटे बच्चों पर सबसे ज्यादा खतरा क्यों है?

WHO की रिपोर्ट के अनुसार, छोटे बच्चों का इम्यून सिस्टम पूरी तरह ग्रो नहीं होता है. यही वजह है कि खराब खाने में मौजूद बैक्टीरिया, वायरस और परजीवियों से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं. खराब खाने की वजह से होने वाली कई बीमारियां डायरिया से जुड़ी होती हैं. छोटे बच्चों के लिए डायरिया जानलेवा साबित हो सकता है, क्योंकि इससे शरीर में पानी और जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो जाती है. 

2021 में करोड़ों लोग हुए बीमार

रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ साल 2021 में खराब खाने की वजह से दुनिया भर में करीब 86.6 करोड़ लोग बीमार पड़े. वहीं लगभग 15 लाख लोगों की मौत हो गई. विशेषज्ञों का मानना है कि इनमें से बड़ी संख्या में मौतों और बीमारियों को रोका जा सकता था. अगर साफ पानी उपलब्ध हो, खाने को सही तरीके से तैयार और स्टोर किया जाए, साफ-सफाई का ध्यान रखा जाए और समय पर इलाज मिल जाए तो इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है. 

खाने में मौजूद केमिकल हैं इतने खतरनाक 

अक्सर लोग सोचते हैं कि खराब खाने का मतलब सिर्फ बैक्टीरिया या वायरस से संक्रमण है, लेकिन WHO ने चेतावनी दी है कि खाने में मौजूद कुछ केमिकल भी बेहद खतरनाक हो सकते हैं, सीसा (Lead) और मिथाइलमरकरी जैसे केमिकल बच्चों के ग्रो हो रहे दिमाग को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इससे बच्चों के मानसिक विकास, सीखने की क्षमता और तंत्रिका तंत्र पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि केमिकल प्रदूषण को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि इसके प्रभाव कई बार लाइफटाइम बने रह सकते हैं. 

फूड बोर्न डिजीज हुई मौतों में केमिकल सबसे बड़ा कारण कैसे है?

रिपोर्ट में बताया गया है कि खाने से जुड़ी बीमारियों के ज्यादातर मामले बैक्टीरिया, वायरस और परजीवियों की वजह से होते हैं, लेकिन मौतों के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार केमिकल प्रदूषण है. 2021 में खराब खाने से जुड़ी कुल मौतों में लगभग 73 प्रतिशत हिस्सेदारी केमिकल खतरों की रही. इनमें अकार्बनिक आर्सेनिक (Inorganic Arsenic) और सीसा सबसे बड़े कारण रहे. ये दोनों तत्व हार्ट डिजीज स्ट्रोक और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं. WHO के अनुसार, फूड बोर्न डिजीज हुई मौतों में करीब 42 प्रतिशत मामलों का संबंध अकार्बनिक आर्सेनिक से था, जबकि 31 प्रतिशत मौतें सीसे के संपर्क से जुड़ी थीं. 

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WHO ने क्या कहा?

WHO  ने कहा कि फूड सेफ्टी कोई सामान्य मुद्दा नहीं है. यह हर फैमिली और हर दिन के खाने से जुड़ा हुआ विषय है. उन्होंने कहा कि खराब खाना लंबे समय से पब्लिक हेल्थ के लिए बड़ी चुनौती रहा है, लेकिन अब सामने आए नए आंकड़े यह दिखाते हैं कि इसका इंसानों और अर्थव्यवस्था पर कितना बड़ा असर पड़ रहा है. रिपोर्ट में दुनिया के कई क्षेत्रों के बीच बड़ी असमानता भी सामने आई है, हालांकि साल 2000 के बाद से फूड बोर्न डिजीज का कुल बोझ कुछ कम हुआ है, लेकिन अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया आज भी सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं. दुनिया भर में होने वाली लगभग 75 प्रतिशत फूड बोर्न डिजीज और करीब 60 प्रतिशत मौतें इन्हीं क्षेत्रों में दर्ज की गई हैं. खराब खाने असर सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है. WHO के अनुसार, 2021 में खराब खाने की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ. बीमारी के कारण लोगों के काम न कर पाने से दुनिया को लगभग 310 अरब अमेरिकी डॉलर की प्रोडक्टिवीटी का नुकसान हुआ. 

आगे और बढ़ सकती है चुनौती

WHO का कहना है कि जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रदूषण और एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बढ़ता Antimicrobial Resistance आगे फूड सेफ्टी की चुनौती को और मुश्किल बना सकता है. रिपोर्ट में 2000 से 2021 के बीच 194 देशों में 42 प्रमुख फूड खतरों का अध्ययन किया गया. इसमें बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी और रासायनिक प्रदूषकों को शामिल किया गया था. विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर आंकड़ों और निगरानी व्यवस्था की मदद से देश फूड सेफ्टी से जुड़े सबसे बड़े खतरों की पहचान कर सकते हैं और समय रहते जरूरी कदम उठा सकते हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कैंसर मरीजों के लिए बढ़ी चिंता, जरूरी कीमो दवाओं की कमी से इलाज पर मंडराया संकट

कैंसर मरीजों के लिए बढ़ी चिंता, जरूरी कीमो दवाओं की कमी से इलाज पर मंडराया संकट


Cancer Drug Shortage:  कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों के लिए इन दिनों एक नई चिंता सामने आ गई है. देश के कई अस्पतालों में कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली कुछ जरूरी दवाओं की कमी की खबरें सामने आ रही हैं. डॉक्टरों का कहना है कि Cisplatin और Carboplatin जैसी दवाएं कई तरह के कैंसर के इलाज में अहम भूमिका निभाती हैं. इस कमी के कारण देश भर में कैंसर के मरीजों के इलाज में रुकावटें आ रही हैं. बता दें कि ये दोनों दवाएं फेफड़े, Cervix, Ovary, और सिर-गर्दन  के कैंसर के इलाज के लिए बहुत जरूरी मानी जाती हैं.  कई जगह मरीज और उनके परिजन दवा की तलाश में एक मेडिकल स्टोर से दूसरे मेडिकल स्टोर तक भटक रहे हैं.  डॉक्टरों की चिंता यह है कि अगर समय पर दवा नहीं मिली मरीजों के कीमोथेरेपी सेशन को टालना पड़ रहा है या फिर इलाज का कोई दूसरा तरीका ढूंढना पड़ रहा है. 

आखिर क्यों खास हैं ये दवाएं?

Cisplatin और Carboplatin जैसी प्लैटिनम आधारित दवाएं कैंसर के इलाज में रीढ़ की हड्डी मानी जाती हैं.  इनका इस्तेमाल फेफड़ों, स्तन, सर्वाइकल, ओवेरियन, मुंह और कई अन्य प्रकार के कैंसर के इलाज में किया जाता है. कई मामलों में ये दवाएं मरीज के इलाज का मुख्य हिस्सा होती हैं. लेकिन इस समय देश में इनकी भारी कमी हो गई है. माना जा रहा है कि इस संकट की मुख्य वजह कच्चे माल (API) की कमी, कंपनियों की बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग लागत और दुनिया भर में सप्लाई चेन का प्रभावित होना है. साथ ही जानकारों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और प्लैटिनम की कीमतों में आई भारी तेजी ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है. शुरुआत में अस्पतालों ने अपने पुराने स्टॉक से काम चलाया, लेकिन अब वह भी खत्म हो चुका है. डॉक्टरों को मजबूरी में मरीजों के कीमोथेरेपी शेड्यूल और इलाज के तरीकों में बदलाव करना पड़ रहा है, जो मरीजों के ठीक होने की संभावनाओं के लिहाज से बेहद चिंताजनक है. 

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डॉक्टरों और विशेषज्ञों के बयानों पर केंद्रित पैराग्राफ फॉर्मेट

दवाओं की इस कमी से देश के बड़े अस्पतालों में स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी है. दिल्ली के एम्स (AIIMS) के सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. एमडी रे ने बताया कि इन जरूरी दवाओं के न मिलने से कैंसर रोगियों का पूरा ट्रीटमेंट प्लान बिगड़ सकता है, जिससे मरीजों का सर्वाइवल रेट पर बुरा असर पड़ सकता है और बीमारी दोबारा लौटने का खतरा बढ़ जाता है.  वहीं, सर गंगा राम अस्पताल के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. श्याम गर्ग ने चेतावनी देते हुए कहा है कि स्थिति इतनी गंभीर है कि अस्पताल में मुश्किल से केवल एक या दो दिन का ही स्टॉक बचा है.  

मरीजों और परिवारों के लिए सबसे जरूरी बात

डॉक्टरों का कहना है कि मरीजों को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सतर्क रहना जरूरी है.  यदि किसी मरीज का इलाज इन दवाओं से चल रहा है तो उसे अपने डॉक्टर के संपर्क में रहना चाहिए और दवा की उपलब्धता को लेकर समय-समय पर जानकारी लेते रहना चाहिए. किसी भी स्थिति में बिना डॉक्टर की सलाह के इलाज में बदलाव नहीं करना चाहिए. 

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