साइलेंट किलर है किडनी की बीमारी! शरीर के इन हिस्सों में दर्द हो सकता है खतरे का संकेत

साइलेंट किलर है किडनी की बीमारी! शरीर के इन हिस्सों में दर्द हो सकता है खतरे का संकेत


Early Detection Of Kidney Disease: किडनी शरीर के बेहद अहम अंगों में से एक है. यह मुट्ठी के आकार की, बीन्स जैसी संरचना वाली होती है और रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर पसलियों के ठीक नीचे स्थित रहती है. किडनी का मुख्य काम खून से गंदगी और अतिरिक्त पानी को छानकर यूरिन के रूप में बाहर निकालना है. इसके अलावा यह शरीर में फ्लूइड और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखने, ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने और हड्डियों व रेड ब्लड सेल्स के लिए जरूरी हार्मोन बनाने में भी अहम भूमिका निभाती है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

मानवता अस्पताल, नासिक के कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजिस्ट और ट्रांसप्लांट फिजिशियन डॉ. मोहन पटेल के अनुसार, किडनी की बीमारी को अक्सर “साइलेंट किलर” कहा जाता है, क्योंकि शुरुआती दौर में इसके लक्षण सामने नहीं आते. डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर किडनी खराब होने की सबसे बड़ी वजहें हैं.शुरुआत में किडनी डैमेज होने पर न दर्द होता है और न कोई असहजता महसूस होती है, जिससे बीमारी की पहचान बिना जांच के मुश्किल हो जाती है.

यूरिन टेस्ट करवाना जरूरी

यही कारण है कि डायबिटीज या हाई बीपी से पीड़ित लोगों को नियमित रूप से ब्लड और यूरिन टेस्ट कराना बेहद जरूरी है, भले ही वे खुद को पूरी तरह स्वस्थ महसूस कर रहे हों. हालांकि, कुछ किडनी से जुड़ी समस्याएं ऐसी भी हैं, जिनमें दर्द महसूस हो सकता है. किडनी स्टोन, इंफेक्शन या ट्यूमर जैसी स्थितियों में दर्द उभर सकता है. खास बात यह है कि यह दर्द हमेशा किडनी की जगह पर ही महसूस हो, ऐसा जरूरी नहीं.

शरीर के इन हिस्सों में हो सकता है दर्द

कई बार किडनी का दर्द शरीर के दूसरे हिस्सों में महसूस होता है, जिसे मेडिकल भाषा में “रिफर्ड पेन” कहा जाता है. उदाहरण के तौर पर, जब किडनी स्टोन या ट्यूमर की वजह से यूरेटर (किडनी से ब्लैडर तक जाने वाली नली) में रुकावट आती है, तो तेज दर्द पीठ से शुरू होकर पेट के निचले हिस्से, जांघ या प्राइवेट पार्ट तक फैल सकता है. इसे यूरेट्रिक कॉलिक कहा जाता है.

इन लक्षणों को नहीं करना चाहिए इग्नोर

किडनी से जुड़ा दर्द अक्सर पीठ के निचले हिस्से में महसूस होता है, जिसे लोग आमतौर पर मसल पेन समझकर टाल देते हैं. लेकिन अगर यह दर्द गहराई से हो, लंबे समय तक बना रहे और इसके साथ बुखार या यूरिन में बदलाव जैसे लक्षण हों, तो सतर्क हो जाना चाहिए. कुछ मामलों में पेट दर्द भी किडनी इंफेक्शन या एब्सेस का संकेत हो सकता है. वहीं, किडनी फेलियर की गंभीर अवस्था में दिल के आसपास सूजन आ सकती है, जिससे सीने में दर्द महसूस हो सकता है. डायबिटीज के मरीजों में पैरों में दर्द, जलन या सूजन भी किडनी की खराबी का संकेत हो सकता है.

डॉक्टरों का साफ कहना है कि किडनी की शुरुआती बीमारी में आमतौर पर दर्द नहीं होताच लेकिन जब दर्द दिखे, तो उसे हल्के में लेने की भूल न करें.जिन लोगों को किडनी रोग का खतरा है, उन्हें दर्द का इंतजार करने के बजाय समय-समय पर जांच करानी चाहिए. समय पर पहचान ही किडनी को गंभीर नुकसान से बचा सकती है.

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क्या होता है बाउल कैंसर? जानिए क्या हैं इसके शुरुआती लक्षण, जिसको लोग कर देते हैं इग्नोर

क्या होता है बाउल कैंसर? जानिए क्या हैं इसके शुरुआती लक्षण, जिसको लोग कर देते हैं इग्नोर


Bowel Cancer Without Symptoms: 44 वर्षीय मैट ईमर ने एक वीकेंड अपने परिवार और दोस्तों के साथ बारबेक्यू पार्टी में बिताया था. उसी दौरान उन्हें पेट में तेज और चुभने जैसा दर्द महसूस हुआ। मैट ने इसे हल्के में लेते हुए सोचा कि शायद पार्टी में खाया गया कोई खराब सॉसेज इसकी वजह होगा. उन्होंने दर्द की गोली ली और इसे नजरअंदाज कर दिया, लेकिन दर्द कम होने के बजाय लगातार बढ़ता चला गया.

यह दर्द उस समय और ज्यादा बढ़ गया, जब मैट अपने बेटे का दूसरा जन्मदिन मना रहे थे. पेट में ऐंठन और बेचैनी के बावजूद वह खुद को संभालने की कोशिश करते रहे, लेकिन उनकी हालत देखकर पत्नी सारा ने उन्हें तुरंत पास के अस्पताल ले जाने पर जोर दिया. ब्रिटेन के सरे स्थित अस्पताल में किए गए टेस्ट में डॉक्टरों को आंत में बड़ा ब्लॉकेज मिला, जो बाद में स्टेज-4 बाउल कैंसर निकला.

क्या होते हैं इस कैंसर के शुरुआती संकेत?

डॉक्टरों ने बताया कि पेट में होने वाला तेज, जकड़न जैसा दर्द बाउल कैंसर के शुरुआती चेतावनी संकेतों में से एक हो सकता है, जिसे अक्सर लोग गैस या सामान्य पेट दर्द समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. मैट की सर्जरी कर ट्यूमर निकाला गया और उन्हें छह महीने तक कीमोथेरेपी से गुजरना पड़ा. हालांकि, इलाज के दौरान यह भी सामने आया कि कैंसर लिवर और पेट की अंदरूनी परत (पेरिटोनियम) तक फैल चुका है.

डॉक्टरों ने बताया कि मैट के शरीर में बीआरएएफ म्यूटेशन पाया गया, जो एक जेनेटिक बदलाव है और इसकी वजह से कैंसर सेल्स बेहद तेजी से बढ़ती और फैलती हैं. हालात इतने गंभीर थे कि डॉक्टरों ने उन्हें कुछ महीनों का ही समय बताया. लेकिन बाद में उन्हें नई तरह की इम्यूनोथेरेपी दी गई, जिसमें सेटक्सिमैब इन्फ्यूजन और एंकोराफेनिब नाम की दवाएं शामिल थीं. इन दवाओं का असर चौंकाने वाला रहा और मैट की हालत में सुधार होने लगा.

कैसे शुरू होता है बाउल कैंसर?

बाउल कैंसर, जिसे कोलन कैंसर भी कहा जाता है, आमतौर पर आंत की अंदरूनी परत में बनने वाले छोटे पॉलिप्स से शुरू होता है. अगर समय रहते इन पॉलिप्स को हटाया न जाए, तो ये कैंसर में बदल सकते हैं और लिम्फ नोड्स या खून के जरिए शरीर के अन्य हिस्सों तक फैल सकते हैं. एक्सपर्ट के मुताबिक, कई बार बाउल कैंसर के शुरुआती लक्षण दिखाई ही नहीं देते. लेकिन लंबे समय तक पेट दर्द रहना, मल में खून आना, पेट फूलना, अचानक वजन कम होना, उल्टी, थकान और सांस फूलना जैसे संकेतों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

क्या कहते हैं डॉक्टर?

डॉक्टरों का कहना है कि धूम्रपान, शराब का सेवन, मोटापा, जंक फूड, रेड और प्रोसेस्ड मीट का ज्यादा सेवन और फिजिकल एक्टिविटी की कमी बाउल कैंसर के खतरे को बढ़ा सकती है. समय पर जांच और लाइफस्टाइल में सुधार इस गंभीर बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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30 की उम्र में हाई बीपी की समस्या, क्या यह नॉर्मल है या किसी बड़े खतरे का संकेत?

30 की उम्र में हाई बीपी की समस्या, क्या यह नॉर्मल है या किसी बड़े खतरे का संकेत?


हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन को पहले सिर्फ बुजुर्गों या अधेड़ उम्र के लोगों की बीमारी माना जाता था. लोगों को लगता था कि यह समस्या 50 या 60 की उम्र के बाद ही होती है. लेकिन आज के समय में यह सोच पूरी तरह बदल चुकी है. आज हैरान करने वाली सच्चाई यह है कि 20 से 30 साल की उम्र के युवा भी हाई ब्लड प्रेशर की चपेट में आ रहे हैं और सबसे खतरनाक बात यह है कि उनमें से कई लोगों को यह पता ही नहीं होता कि उनका ब्लड प्रेशर बढ़ चुका है.

हाई बीपी को साइलेंट किलर कहा जाता है, क्योंकि यह बिना किसी खास लक्षण के शरीर के अंदर धीरे-धीरे नुकसान करता रहता है. जब तक इसके संकेत साफ दिखाई देते हैं, तब तक यह दिल, किडनी, दिमाग और आंखों को नुकसान पहुंचा चुका होता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 30 की उम्र में हाई बीपी होना नॉर्मल है या यह किसी बड़ी और गंभीर बीमारी का संकेत है. 

हाई ब्लड प्रेशर क्या होता है?

जब हमारी धमनियों में बहने वाले खून का दबाव लगातार सामान्य से ज्यादा बना रहता है, तो इसे हाई ब्लड प्रेशर या हाइपरटेंशन कहा जाता है. ब्लड प्रेशर की रीडिंग दो नंबरों में होती है. जिसमें पहली सिस्टोलिक प्रेशर, जब दिल खून पंप करता है और दूसरा डायस्टोलिक प्रेशर, जब दिल आराम की अवस्था में होता है. अगर सिस्टोलिक बीपी 140 mmHg या उससे ज्यादा, या डायस्टोलिक बीपी 90 mmHg या उससे ज्यादा हो तो इसे हाई ब्लड प्रेशर माना जाता है. 

क्या 30 की उम्र में हाई बीपी नॉर्मल?

30 की उम्र में हाई बीपी को बिल्कुल भी नॉर्मल नहीं माना जाता है.  यह इस बात का संकेत है कि आपकी लाइफस्टाइल गलत दिशा में जा रही है. आपका शरीर अंदर से दबाव झेल रहा है. भविष्य में हार्ट अटैक, स्ट्रोक या किडनी की समस्या का खतरा बढ़ सकता है. ऐसे में 30 साल के बाद हर व्यक्ति को साल में कम से कम 1–2 बार बीपी जरूर चेक कराना चाहिए. अगर परिवार में हाई बीपी की हिस्ट्री है, तो और भी सतर्क रहना चाहिए. समय पर जांच से हार्ट अटैक, स्ट्रोक, किडनी फेल, आंखों की रोशनी जाने, समय से पहले बुढ़ापा जैसी गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है. 

30 की उम्र में क्यों हो रहा हाई बीपी?
 
आज की मॉडर्न लाइफस्टाइल इसकी सबसे बड़ी वजह है. डॉक्टरों और हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, युवाओं में हाई बीपी होने के पीछे कई कारण हैं. आजकल युवा घंटों मोबाइल और लैपटॉप देखते हैं, देर रात तक जागते हैं, पूरी नींद नहीं लेते, शारीरिक मेहनत बहुत कम करते हैं, यह सब चीजें ब्लड प्रेशर को बढ़ाने में मदद करती हैं. करियर का प्रेशर, नौकरी की चिंता, पैसों की टेंशन और रिश्तों की उलझन – लगातार तनाव में रहने से शरीर में ऐसे हार्मोन निकलते हैं जो बीपी बढ़ा देते हैं.

आज के खानपान में ज्यादा नमक, ज्यादा तेल, फास्ट फूड, पैकेज्ड स्नैक्स, मीठे ड्रिंक्स, इन सबका सेवन ब्लड प्रेशर को धीरे-धीरे बढ़ा देता है. वजन बढ़ने से दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे बीपी बढ़ता है. पेट की चर्बी हाई बीपी का बड़ा संकेत मानी जाती है. सिगरेट, तंबाकू और ज्यादा शराब धमनियों को सख्त कर देते हैं, दिल पर दबाव बढ़ाते हैं, इससे कम उम्र में ही बीपी बढ़ने लगता है. रोज 4–5 घंटे की नींद अब आम बात हो गई है. नींद पूरी न होने से शरीर ठीक से रिपेयर नहीं हो पाता और ब्लड प्रेशर प्रभावित होता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हर 5 में से 1 महिला को होती है PCOS की प्रॉब्लम, मूड स्विंग और वेट गेन समझने की न करना गलती

हर 5 में से 1 महिला को होती है PCOS की प्रॉब्लम, मूड स्विंग और वेट गेन समझने की न करना गलती


Polycystic Ovary Syndrome Symptoms: PCOS यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम एक ऐसी समस्या है, जो लाखों महिलाओं को प्रभावित करती है, लेकिन इस पर खुलकर बात बहुत कम होती है. भारत में करीब हर पांच में से एक महिला PCOS से जूझ रही है, फिर भी यह बीमारी कई सालों तक पहचान में नहीं आती. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर बहुत सामान्य लगते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि क्या होते हैं इसके लक्षण और क्यों इसको इग्नोर नहीं करना चाहिए. 

ज्यादातर महिलाएं इन लक्षणों को कर देती हैं इग्नोर 

वजन बढ़ना, मूड स्विंग्स, पीरियड्स का अनियमित होना, थकान, अधिकांश महिलाएं इन्हें तनाव, लाइफस्टाइल या उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर देती हैं. जबकि हकीकत में ये संकेत शरीर के हार्मोन और मेटाबॉलिज्म में चल रही गड़बड़ी की ओर इशारा कर सकते हैं. PCOS की एक चुनौती यह भी है कि यह हर महिला में एक जैसा नजर नहीं आता. कुछ महिलाओं का वजन अचानक बढ़ने लगता है, खासकर पेट के आसपास. कुछ को लंबे समय तक ठीक न होने वाला एक्ने परेशान करता है या फिर चेहरे और शरीर पर अनचाहे बाल उगने लगते हैं. कई महिलाओं को पीरियड्स समय पर नहीं आते या बहुत ज्यादा दर्द और ब्लीडिंग होती है.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

एक्सपर्ट के अनुसार, इस देरी की एक बड़ी वजह जागरूकता की कमी भी है. स्कूलों में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम पर बात नहीं होती. परिवार शुरुआती लक्षणों को प्यूबर्टी की समस्या या नॉर्मल वजन बढ़ना कहकर टाल देते हैं. खुद महिलाएं भी यह नहीं समझ पातीं कि मूड स्विंग्स, एक्ने या अनियमित पीरियड्स हार्मोनल डिसऑर्डर का संकेत हो सकते हैं. पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम आम जरूर है, लेकिन इसे नजरअंदाज करना जरूरी नहीं. अगर शरीर में कुछ बदलाव लंबे समय तक बने रहें और असामान्य लगें, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहद जरूरी है। जितनी जल्दी पहचान होगी, उतनी बेहतर तरीके से इसे कंट्रोल किया जा सकता है.

पीसीओएस से जुड़े मिथक, जिन पर भरोसा करना छोड़ दें

पटना स्थित मातृसेवा सुपरस्पेशलिटी की वरिष्ठ डॉक्टर शशि सिन्हा के मुताबिक, कई महिलाएं पीसीओएस के लक्षणों को सिर्फ लाइफस्टाइल या स्ट्रेस से जोड़ देती हैं. जबकि वजन, मूड, स्किन और पीरियड्स से जुड़े ये बदलाव हार्मोनल असंतुलन का नतीजा हो सकते हैं.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

बिना लाइफस्टाइल बदले वजन बढ़ना– PCOS में इंसुलिन ठीक से काम नहीं करता, जिससे पेट के आसपास फैट तेजी से जमा होने लगती है.

मूड का बार-बार बदलना– हार्मोनल असंतुलन की वजह से चिड़चिड़ापन, एंग्जायटी और उदासी महसूस हो सकती है.

पीरियड्स का अनियमित होना- PCOS में ओव्यूलेशन सही से न होने के कारण साइकिल बिगड़ जाती है या पीरियड्स मिस हो जाते हैं.

जिद्दी एक्ने और ऑयली स्किन– शरीर में मेल हार्मोन बढ़ने से चेहरे, जॉलाइन और पीठ पर गंभीर मुंहासे निकलते हैं.

बालों का झड़ना या पतले होना– ज्यादा एंड्रोजन हार्मोन सिर के आगे या क्राउन एरिया में बालों को कमजोर कर देता है.

चेहरे या शरीर पर अनचाहे बाल– हार्मोनल गड़बड़ी की वजह से चिन, चेहरे, छाती या पेट पर बाल बढ़ने लगते हैं.

लगातार थकान महसूस होना– हार्मोन और इंसुलिन की समस्या शरीर की एनर्जी को प्रभावित करती है, जिससे हर वक्त थकान रहती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सिगरेट से ज्यादा खतरनाक है लंबे समय तक बैठना, जानें किस अंग को पहुंचता है सबसे ज्यादा नुकसान?

सिगरेट से ज्यादा खतरनाक है लंबे समय तक बैठना, जानें किस अंग को पहुंचता है सबसे ज्यादा नुकसान?


आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम खुद को सुरक्षित समझते हैं क्योंकि न तो हम सिगरेट पीते हैं और न ही कोई नशा करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि बिना धूम्रपान किए भी आप कई गंभीर बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह लंबे समय तक लगातार बैठे रहना है. ऑफिस में घंटों कुर्सी पर बैठकर काम करना, सफर के दौरान बैठे रहना, घर आकर टीवी या मोबाइल पर समय बिताना, यह सब हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है.

पहली नजर में यह बिल्कुल सामान्य लगता है, लेकिन मेडिकल रिसर्च बता रही है कि लगातार बैठे रहना शरीर के लिए उतना ही खतरनाक हो सकता है जितना सिगरेट पीना. इसी वजह से आजकल हेल्थ एक्सपर्ट इसे नया स्मोकिंग कहने लगे हैं. यह आदत धीरे-धीरे शरीर को अंदर से कमजोर करती है और कई गंभीर बीमारियों को जन्म देती है. 

क्यों बढ़ रही है सिटिंग लाइफस्टाइल की समस्या?

तकनीक ने हमारी जिंदगी को आसान तो बना दिया है, लेकिन साथ ही हमें आलसी भी बना दिया है. आज ज्यादातर लोग 8 से 10 घंटे कंप्यूटर या लैपटॉप पर काम करते हैं, फोन पर स्क्रॉल करते रहते हैं, टीवी देखते हुए घंटों एक ही जगह बैठे रहते हैं. जब शरीर को लंबे समय तक हिलने-डुलने का मौका नहीं मिलता, तो इसका सीधा असर हमारे दिल, दिमाग, मांसपेशियों और पाचन तंत्र पर पड़ता है. 

लंबे समय तक बैठने से शरीर के इन अंग को पहुंचता है सबसे ज्यादा नुकसान?

1.  हार्ट और ब्लड सेल्स पर असर – ज्यादा देर तक बैठे रहने से ब्लड फ्लो धीमा हो जाता है. इससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है, खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) बढ़ता है, दिल का दौरा और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है. रिसर्च के अनुसार, दिन में 8 घंटे से ज्यादा बैठने वालों में हृदय रोग से मौत का खतरा काफी बढ़ जाता है. 

2.  डायबिटीज और इंसुलिन रेजिस्टेंस – जब शरीर एक्टिव नहीं रहता, तो मांसपेशियां शुगर को सही तरह से इस्तेमाल नहीं कर पातीं, इससे इंसुलिन ठीक से काम नहीं करता, टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है, यह समस्या दुबले-पतले लोगों में भी हो सकती है. 

3. मोटापा और धीमा मेटाबॉलिज्म – बैठे रहने पर कैलोरी बहुत कम बर्न होती है. जिसके कारण वजन तेजी से बढ़ता है, पेट और कमर के आसपास चर्बी जमा होती है, शरीर का मेटाबॉलिज्म सुस्त हो जाता है. 

4. पीठ, गर्दन और कंधों में दर्द – गलत तरीके से बैठकर काम करने से रीढ़ की हड्डी पर दबाव पड़ता है, गर्दन और कंधों में अकड़न होती है, लंबे समय तक चलने वाला कमर दर्द शुरू हो सकता है. 

5. दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य पर असर – कम फिजिकल एक्टिविटी से दिमाग तक ऑक्सीजन कम पहुंचती है, तनाव, चिंता और डिप्रेशन बढ़ सकता है, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी होती है. 

6. पाचन तंत्र कमजोर होता है – खाना खाने के बाद तुरंत बैठ जाने से पाचन धीमा हो जाता है. गैस, कब्ज और एसिडिटी की समस्या होती है. 

क्या सच में बैठना सिगरेट जितना खतरनाक है?

डॉक्टरों के अनुसार, बैठने और धूम्रपान से नुकसान अलग-अलग तरीकों से होता है, लेकिन दोनों ही आदतें धीरे-धीरे शरीर को बीमार बनाती हैं. कुछ स्टडीज बताती हैं कि लगातार 8 घंटे बैठना हफ्ते में 10–15 सिगरेट पीने जितना नुकसानदायक हो सकता है. लंबे समय तक बैठने से असमय मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है. 

लंबे समय तक बैठने से कैसे बचें?

1. हर 30 मिनट में उठें, काम के बीच 2–3 मिनट टहलें या स्ट्रेच करें. 

2. खड़े होकर काम करने की आदत डालें और अगर संभव हो तो स्टैंडिंग डेस्क का यूज करें. 

3. फोन कॉल पर चलते रहें, फोन पर बात करते समय कुर्सी पर न बैठें. 

4. रोजाना व्यायाम करें, तेज चलना, योग या साइक्लिंग बहुत फायदेमंद है. 

5. सही तरीके से बैठें, सीधी पीठ, ढीले कंधे और स्क्रीन आंखों के स्तर पर रखें. 
 
6. घर पर भी एक्टिव रहें, टीवी देखने के बीच उठकर टहलें या हल्के काम करें. 

ये भी पढ़ें- फैटी लिवर से जूझ रहा हर तीसरा भारतीय, रिसर्च का खुलासा, बिना दर्द बढ़ रही खामोश बीमारी

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भारतीयों को क्यों होता है हाई कोलेस्ट्रॉल और हार्ट अटैक का ज्यादा रिस्क? डॉक्टर्स से समझें

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Why Indians Get Heart Attacks Early: भारत में हार्ट की बीमारियां तेजी से एक गंभीर चिंता बनती जा रही हैं. बीते कुछ वर्षों में हार्ट अटैक के मामलों में तेज बढ़ोतरी देखी गई है और चौंकाने वाली बात यह है कि अब यह समस्या वेस्टर्न देशों की तुलना में कहीं कम उम्र के लोगों को भी अपनी चपेट में ले रही है. इसकी एक बड़ी वजह खून में बढ़ा हुआ खराब कोलेस्ट्रॉल, यानी LDL माना जा रहा है.

कार्डियोलॉजिस्ट बताते हैं कि भारतीयों में हार्ट से जुड़ी समस्याएं कम कोलेस्ट्रॉल स्तर पर ही शुरू हो सकती हैं. यानी जो कोलेस्ट्रॉल लेवल पश्चिमी देशों में मीडियम माना जाता है, वही भारत में खतरनाक साबित हो सकता है.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

एक्सपर्ट के अनुसार, इसके पीछे भारतीयों की जेनेटिक बनावट भी एक अहम कारण है. शरीर की संरचना, फैट और शुगर को प्रोसेस करने का तरीका और कुछ विरासत में मिले गुण भारतीयों को कम उम्र में ही हार्ट डिजीज के प्रति ज्यादा संवेदनशील बना देते हैं. यानी यह समस्या सिर्फ खान-पान तक सीमित नहीं है, बल्कि जीन भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं. इन्हीं जनेटिक कारणों की वजह से कई भारतीयों के आर्टरीज में ब्लॉकेज और दिल से जुड़ी बीमारियां पश्चिमी देशों के लोगों की तुलना में करीब 10 साल पहले ही विकसित हो जाती हैं.

लाइफस्टाइल भी होती है जिम्मेदार

हालांकि, खराब कोलेस्ट्रॉल के लिए सिर्फ जेनेटिक्स को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. लाइफस्टाइल भी इस जोखिम को और बढ़ा देता है. आज की तेज रफ्तार जिंदगी में जंक फूड, मीठे स्नैक्स और ज्यादा फैट वाला खाना आम हो गया है. इसके साथ ही शारीरिक गतिविधि की कमी, बढ़ता तनाव और वजन बढ़ना भी दिल की सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं. ये सभी कारण न सिर्फ एलडीएल यानी खराब कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाते हैं, बल्कि एचडीएल यानी अच्छे कोलेस्ट्रॉल को भी कम कर देते हैं. जबकि एचडीएल का काम आर्टरीज में जमा फैट को साफ करने में मदद करना होता है. जब खराब कोलेस्ट्रॉल ज्यादा और अच्छा कोलेस्ट्रॉल कम हो जाता है, तो हार्ट अटैक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

नहीं दिखते हैं लक्षण

कोलेस्ट्रॉल की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इसके लक्षण अक्सर सामने नहीं आते. ज्यादातर लोगों को तब तक पता नहीं चलता कि उन्हें हाई कोलेस्ट्रॉल है, जब तक सीने में दर्द, सांस फूलने जैसी समस्या या हार्ट अटैक नहीं हो जाता. यही वजह है कि नियमित हेल्थ चेक-अप बेहद जरूरी है, खासकर उन लोगों के लिए जिनकी उम्र 30 साल से ज्यादा है या जिनके परिवार में दिल की बीमारी का इतिहास रहा है.

इन चीजों से कर सकते हैं बचाव

हार्ट को स्वस्थ रखने के लिए रोजमर्रा की आदतों में छोटे-छोटे बदलाव बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. संतुलित और दिल-दोस्त आहार अपनाएं, जिसमें फल, सब्जियां, साबुत अनाज और लीन प्रोटीन शामिल हों. रोजाना थोड़ी-बहुत शारीरिक गतिविधि करें, चाहे वह 30 मिनट की वॉक ही क्यों न हो. प्रोसेस्ड फूड और मीठे पेय पदार्थों से दूरी बनाएं, वजन को कंट्रोल में रखें और तनाव को मैनेज करने की कोशिश करें. समय के साथ ये आदतें खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद करती हैं, जिससे हार्ट की बीमारी का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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