अनियमित पीरियड्स और स्ट्रेस कितना खतरनाक, जानें PCOS कैसे बनता है रिश्ता टूटने की वजह?

अनियमित पीरियड्स और स्ट्रेस कितना खतरनाक, जानें PCOS कैसे बनता है रिश्ता टूटने की वजह?


आज भी बहुत से लोग PCOS का नाम सुनते ही डर जाते हैं. उन्हें लगता है कि यह कोई बहुत गंभीर या लाइलाज बीमारी है. असल में PCOS एक मैनेज होने वाली समस्या है, जिसे सही खान-पान, एक्सरसाइज़ और डॉक्टर की सलाह से कंट्रोल किया जा सकता है. जब पार्टनर या परिवार को इसकी सही जानकारी नहीं होती, तो डर और शक रिश्ते में कड़वाहट ला देते हैं.

PCOS में पीरियड्स का अनियमित होना आम बात है.लेकिन कई लोग इसे महिला की कमजोरी या बड़ी बीमारी समझ लेते हैं. बार-बार डॉक्टर के चक्कर, दवाइयां और शरीर में होने वाले बदलाव महिला को पहले ही परेशान कर देते हैं. ऊपर से अगर उसे जज किया जाए, तो मानसिक तनाव और बढ़ जाता है, जो रिश्ते पर सीधा असर डालता है.

PCOS में पीरियड्स का अनियमित होना आम बात है.लेकिन कई लोग इसे महिला की कमजोरी या बड़ी बीमारी समझ लेते हैं. बार-बार डॉक्टर के चक्कर, दवाइयां और शरीर में होने वाले बदलाव महिला को पहले ही परेशान कर देते हैं. ऊपर से अगर उसे जज किया जाए, तो मानसिक तनाव और बढ़ जाता है, जो रिश्ते पर सीधा असर डालता है.

Published at : 11 Jan 2026 10:53 AM (IST)

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सोते वक्त 32 पर्सेंट लोगों की सांसें रोकती है यह बीमारी, जानें कैसे करा सकते हैं इसकी पहचान?

सोते वक्त 32 पर्सेंट लोगों की सांसें रोकती है यह बीमारी, जानें कैसे करा सकते हैं इसकी पहचान?


Breathing Problems During Sleep: स्लीप एपनिया एक आम लेकिन गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जिसमें सोते समय बार-बार सांस रुकने लगती है. इसकी वजह से शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और दिल समेत कई अंगों पर बुरा असर पड़ता है. यह बीमारी दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है और हाई ब्लड प्रेशर, स्ट्रोक और हार्ट डिजीज जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ा देती है. इसके अलावा, यह दिमाग की काम करने की क्षमता को भी धीमा कर सकती है, कामकाज की क्षमता घटाती है और जीवन की क्वालिटी को प्रभावित करती है.

स्लीप एपनिया क्या है?

स्लीप एपनिया में नींद के दौरान बार-बार सांस रुकने या बहुत धीमी हो जाने की घटनाएं होती हैं. ये रुकावटें एक रात में सैकड़ों बार हो सकती हैं, जिससे फेफड़ों तक हवा का सही फ्लो नहीं हो पाता और शरीर में ऑक्सीजन का लेवल गिर जाता है. ऑक्सीजन की यह कमी हार्ट और अन्य अंगों पर दबाव डालती है और शरीर में सूजन को बढ़ावा देती है. साथ ही, सर्कैडियन रिदम भी टूट जाता है, जिससे याददाश्त, एकाग्रता और मेंटल क्लियरिटी पर निगेटिव असर पड़ता है.

स्लीप एपनिया के लक्षण

इस बीमारी की पहचान समय पर हो जाए तो इलाज आसान हो सकता है. इसके मुख्य लक्षण हैं

  • तेज खर्राटे लेना
  • दिन में जरूरत से ज्यादा नींद आना

इसके अलावा कुछ अन्य लक्षण भी हो सकते हैं, जैसे

  • सुबह सिरदर्द
  • याददाश्त कमजोर होना
  • दिनभर थकान या सुस्ती
  • नींद से उठते समय गला सूखा या खराश होना

कई बार स्लीप एपनिया गंभीर हाई ब्लड प्रेशर और दिल की धड़कन की गड़बड़ी का कारण भी बन सकता है, इसलिए इन स्थितियों में इसकी जांच कराना जरूरी माना जाता हैच

जांच और इलाज

स्लीप एपनिया की पुष्टि पॉलीसोमनोग्राफी  से की जाती है. यह जांच नींद के दौरान की जाती है, जिसमें शरीर पर लगे सेंसर नींद की गहराई, सांस में रुकावट और ऑक्सीजन लेवल को रिकॉर्ड करते हैं. इसके आधार पर बीमारी की गंभीरता तय की जाती है. आजकल घर पर होने वाली स्लीप स्टडी की सुविधा भी उपलब्ध है, जो कम खर्चीली और ज्यादा सुविधाजनक होती है. आप इसकी जांच 500 के आसपास में करव सकते हैं.  इलाज की बात करें तो सीपीएपी मशीन स्लीप एपनिया के इलाज में क्रांतिकारी साबित हुई हैच यह मशीन सांस की नली को खुला रखने में मदद करती है. इसके अलावा सर्जरी, ओरल डिवाइस और सबसे अहम वजन कम करना भी लंबे समय तक असरदार समाधान माना जाता है.

भोपाल में 32 प्रतिशत लोग इससे पीड़ित

हाल ही में एम्स भोपाल और आईसीएमआर की एक क्मबाइंड स्टडी में यह निकल कर सामने आया कि मध्य प्रदेश में स्लिप की दिक्कत से करीब 32 प्रतिशत लोग जूझ रहे हैं. इसमें1080 मरीजों पर यह रिसर्च हुआ था. जिसमें 15-60 साल उम्र के लोगों को शामिल थे.इसमें निकल कर आया कि 66 प्रतिशत लोग बीपी से पीडित थे. इसमें 50 साल वालों की संख्या सबसे ज्यादा थी. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

हाल ही में X और यूट्यूब पर साझा किए गए एक वीडियो में डॉ. सुधीर कुमार, एमडी (MD) वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट, अपोलो हॉस्पिटल्स, हैदराबाद ने खर्राटों की समस्या से जूझ रहे लोगों को एक आसान लेकिन असरदार सलाह दी है. उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को पीठ के बल सोने से बचना चाहिए. इसकी बजाय करवट लेकर, यानी साइड में सोना बेहतर होता है. इससे न सिर्फ खर्राटे कम हो सकते हैं, बल्कि हल्के से मध्यम स्तर के स्लीप एपनिया के लक्षणों में भी राहत मिल सकती है.

यह भी पढ़ें: ब्रश करते वक्त हो सकता है ये हादसा, दुनियाभर में ऐसे सिर्फ 10 मामले

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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इन फूड प्रिजर्वेटिव्स से बढ़ सकता है कैंसर और डायबिटीज का खतरा, नई स्टडी में हुआ खुलासा

इन फूड प्रिजर्वेटिव्स से बढ़ सकता है कैंसर और डायबिटीज का खतरा, नई स्टडी में हुआ खुलासा


आजकल हम में से बहुत लोग पैकेटबंद और तैयार खाने वाले उत्पादों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं. ये खाने में सुविधाजनक होते हैं और आसानी से उपलब्ध भी होते हैं, लेकिन हाल ही में हुए बड़े शोध से पता चला है कि कुछ फूड आइटम्स में यूज होने वाले कुछ सामान्य प्रिजर्वेटिव्स यानी रासायनिक संरक्षक हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं. फ्रांस में किए गए और ब्रिटिश मेडिकल जर्नल और नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित दो बड़े अध्ययनों में 2009 से 2023 के बीच 1 लाख से ज्यादा वयस्कों के डाइट और स्वास्थ्य डेटा का विश्लेषण किया गया. यह अध्ययन न्यूट्रीनेट-सैंट समूह के तहत किया गया था और इसका मकसद यह समझना था कि लंबे समय तक इन प्रिजर्वेटिव्स का सेवन करने से कैंसर और टाइप 2 डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ता है या नहीं. 

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स क्या हैं?

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स वे होते हैं जो फैक्ट्री में तैयार किए जाते हैं. इनमें आमतौर पर बहुत ज्यादा चीनी, नमक और अनहेल्दी फैट्स होती है, जबकि जरूरी पोषक तत्व जैसे विटामिन और मिनरल्स बहुत कम होते हैं. इन प्रोडक्ट में अक्सर प्रिजर्वेटिव्स, इमल्सीफायर और स्टेबिलाइजर जैसे एडिटिव्स भी शामिल होते हैं. ये ऐसे रसायन हैं जो सामान्य घर के खाने में शायद ही यूज  होते हैं. 

शोध से क्या मिला?

शोध में 17 आम प्रिजर्वेटिव्स की जांच की गई, जिनमें पोटेशियम सॉर्बेट, सोडियम नाइट्राइट और एसीटिक एसिड जैसे पदार्थ शामिल हैं. ये सभी भारत में बिकने वाले पैकेटबंद फूड में आमतौर पर पाए जाते हैं. पोटेशियम सॉर्बेट का ज्यादा सेवन करने पर समग्र कैंसर का खतरा 14 प्रतिशत और स्तन कैंसर का खतरा 26 प्रतिशत बढ़ सकता है. सल्फाइट्स समग्र कैंसर का खतरा 12 प्रतिशत बढ़ा. सोडियम नाइट्राइट से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा 32  प्रतिशत ज्यादा पाया गया. पोटैशियम नाइट्रेट और एसीटिक एसिड का सेवन समग्र कैंसर और स्तन कैंसर से जुड़ा. 

हालांकि शोधकर्ताओं ने साफ किया कि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन प्रिजर्वेटिव्स का सेवन सीधे तौर पर कैंसर का कारण है. इसके लिए और गहन अध्ययन की जरूरत है.लेकिन यह जरूर माना गया कि ये रसायन शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ा सकते हैं और आंत के माइक्रोबायोटा को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे कैंसर और अन्य रोगों का खतरा बढ़ सकता है. 

भारतीय प्रिजर्वेटिव्स

भारत में पैकेटबंद फूड का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि ये निष्कर्ष इस बात को और पुष्ट करते हैं कि आधुनिक डाइट पैटर्न, जो ज्यादातर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाने पर आधारित है, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है. विशेषज्ञ का कहना है कि इन परिणामों के आधार पर तुरंत नियामक समीक्षा और जनता में जागरूकता बढ़ाना जरूरी है. उनका कहना है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड पहले ही मेटाबॉलिज्म और मानसिक विकारों, असमय मृत्यु समेत लगभग 32 स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़े पाए जा चुके हैं. 

कैसे नुकसान पहुंचाते हैं प्रिजर्वेटिव्स?

फूड आइटम्स में प्रिजर्वेटिव्स मुख्य रूप से उन्हें खराब होने से रोकने और उनकी शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए मिलाए जाते हैं. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये खाने की प्राकृतिक संरचना को भी प्रभावित कर सकते हैं.जब यह संरचना खराब हो जाती है, तो स्वस्थ पोषक तत्व भी हानिकारक प्रभाव डाल सकते हैं. कई प्रिजर्वेटिव्स लंबे समय तक शरीर में कई स्तर की सूजन, ऑक्सीडेटिव तनाव और आंत के माइक्रोबायोटा में गड़बड़ी पैदा कर सकते हैं.

क्या किया जा सकता है?

शोधकर्ताओं का सुझाव है कि नियामकों को प्रिजर्वेटिव्स के यूज पर कड़ी निगरानी और नियम बनाने चाहिए. तब तक, उपभोक्ताओं को जितना संभव हो ताजा और कम प्रोसेस्ड फूड लेने की सलाह दी जाती है. दुनिया के कई देशों में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को लेकर नीतिगत कार्रवाई शुरू हो चुकी है. ब्रिटेन में बच्चों की सुरक्षा के लिए टीवी और ऑनलाइन विज्ञापन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. अमेरिका ने अपनी डाइट दिशानिर्देश अपडेट किए और लोगों से पैकेटबंद उत्पादों के बजाय ताजे और कम प्रोसेस्ड फूड को प्राथमिकता देने की सलाह दी. 

यह भी पढ़ें: बच्चों के जन्म के समय शरीर पर क्यों होता है जन्मदाग, इसको लेकर डॉक्टर्स क्या बताते हैं?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कार या गाड़ी में बैठते ही आने लगती है उल्टी, जानें किस बीमारी में होता है ऐसा?

कार या गाड़ी में बैठते ही आने लगती है उल्टी, जानें किस बीमारी में होता है ऐसा?


ट्रैवल करना किसी के लिए मजेदार होता है, लेकिन कई लोगों के लिए यह एक परेशानी का कारण भी बन जाता है.खासकर कार, बस, ट्रेन, जहाज या हवाई यात्रा के दौरान बहुत से लोग उल्टी, चक्कर या बेचैनी महसूस करते हैं. इसे मेडिकल भाषा में मोशन सिकनेस कहा जाता है. हर तीन में से एक व्यक्ति कभी न कभी इस समस्या का सामना करता है.

मोशन सिकनेस सिर्फ बच्चों या बुजुर्गों की समस्या नहीं है. यह किसी भी उम्र के इंसान को हो सकती है और सफर शुरू होते ही महसूस होने लगती है. कई लोग सोचते हैं कि बस मुझे ऐसा क्यों होता है. लेकिन इसके पीछे शरीर और दिमाग का असर छुपा होता है. तो आइए जानते हैं कि कार या गाड़ी में बैठते ही उल्टी क्यों आने लगती है और किस बीमारी में ऐसा होता है. 

मोशन सिकनेस क्या है?

मोशन सिकनेस एक ऐसी स्थिति है जिसमें सफर के दौरान आपको मतली, उल्टी, चक्कर, सिर दर्द या बेचैनी महसूस होती है. यह समस्या तब होती है जब दिमाग, आंखें और कान एक जैसी जानकारी नहीं भेजते हैं. जैसेअगर आप कार में बैठकर नीचे किताब पढ़ रहे हैं या मोबाइल देख रहे हैं, तो आपकी आंखें दिमाग को यह बताती हैं कि आप हिल नहीं रहे हैं. लेकिन आपके कान के अंदर बैलेंस बनाने वाला सिस्टम दिमाग को बताता है कि शरीर चल रहा है.इस तरह सिग्नल्स में विरोधाभास होने पर शरीर सोचता है कि कुछ गलत या जहरीली चीज अंदर चली गई है और इसका नतीजा उल्टी होता है. 

दिमाग और संतुलन का कैसे है संबंध
 
हमारे शरीर में ऐसे छोटे-छोटे सेंसर होते हैं जिन्हें रिसेप्टर्स कहा जाता है. ये सेंसर हमारे आंखों, कान और शरीर में मौजूद बदलावों को महसूस करते हैं और दिमाग को संदेश भेजते हैं. जब हम गाड़ी, ट्रेन या हवाई जहाज में सफर करते हैं, तो आंखें, कान और शरीर से मिलने वाली जानकारी एक जैसी नहीं होती है. इससे वेस्टिबुलर सिस्टम यानी संतुलन बनाने वाला सिस्टम परेशान हो जाता है. दिमाग का वह हिस्सा जो ब्रेन स्टेम और हाइपोथैलेमस कहलाता है, तेज हो जाता है. जिसके कारण मतली, चक्कर और कभी-कभी उल्टी आती है. इसलिए कहा जा सकता है कि मोशन सिकनेस संतुलन प्रणाली की गड़बड़ी का परिणाम है. 
 
सफर के दौरान उल्टी क्यों होती है?

सिर्फ गाड़ी में हिलना ही कारण नहीं है. पेट की स्थिति और सफर का तरीका भी बहुत मायने रखता है. खाली पेट सफर में पेट की वोसस नर्व ज्यादा सक्रिय हो जाती है. इससे चक्कर और बेचैनी महसूस होती है. इसके अलावा भारी खाना के बाद सफर यानी पेट भरा होने पर भी उल्टी की संभावना बढ़ जाती है. इसलिए सफर से पहले हल्का खाना ही लेना बेहतर है. साथ ही, ऊबड़-खाबड़ सड़कें, पहाड़ी रास्ते, गाड़ी के झटके, या गाड़ी में दुर्गंध जैसी चीजें भी मोशन सिकनेस बढ़ा सकती हैं. डॉक्टरों के अनुसार, जब हम गाड़ी में बैठते हैं, तो कान के अंदर का फ्लूइड हिलता है, जिससे गर्दन और खोपड़ी में कंपन पैदा होता है. यही कंपन दिमाग में संतुलन बिगाड़ता है और उल्टी या चक्कर का कारण बनता है. 

मोशन सिकनेस से बचने के आसान उपाय

1. भारी भोजन से बचें – सफर से पहले हल्का खाना ही खाएं. 

2. खाली पेट सफर न करें – हल्का स्नैक्स या फल ले सकते हैं. 

3. डॉक्टर की सलाह – दवा की जरूरत पड़े तो डॉक्टर की सलाह से लें. 

4. चलती गाड़ी में सोने से बचें – सोते समय संतुलन बिगड़ सकता है. 

5. गाड़ी रोकें – मतली महसूस होते ही गाड़ी रोकें. मोबाइल या किताब से ध्यान भटकाने से बचें. 

6. शरीर की स्थिति स्थिर रखें – सिर, कंधे, कमर और घुटनों की हलचल कम करें. 

7. आगे की सीट पर बैठे या खुद गाड़ी चलाएं – ऐसा करने से संतुलन बनाए रखना आसान होता है. निकोटीन और धूम्रपान से बचें. 

8. हल्का म्यूजिक सुनें – इससे दिमाग शांत होता है और मतली कम होती है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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