तनाव से चाहिए तुरंत मुक्ति? भ्रामरी प्राणायाम की एक ‘गुनगुनाहट’ शांत कर देगी मन का सारा शोर

तनाव से चाहिए तुरंत मुक्ति? भ्रामरी प्राणायाम की एक ‘गुनगुनाहट’ शांत कर देगी मन का सारा शोर


भ्रामरी प्राणायाम एक जाना-माना योग अभ्यास है, जिसमें मधुमक्खी जैसी गुनगुनाहट की आवाज़ के जरिये मन को शांत किया जाता है. आमतौर पर लोग इसे सिर्फ सांस लेकर गुनगुनाने और छोड़ने तक सीमित समझते हैं, लेकिन असल में भ्रामरी इससे कहीं ज्यादा व्यापक अभ्यास है. इसमें सही बॉडी पोस्चर, सांस पर नियंत्रण, हाथों की स्थिति और पूरी एकाग्रता का अहम रोल होता है. दुर्भाग्य से, भ्रामरी को अक्सर अधूरे तरीके से सिखाया जाता है, जबकि शरीर की सही मुद्रा सांस को दिशा देने में मदद करती है और हाथों की स्थिति नर्वस सिस्टम पर असर डालती है. ये सभी पहलू मिलकर दिमाग और नर्वस सिस्टम पर इसके प्रभाव को गहराई देते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

योग और ध्यान का लंबे समय से अभ्यास कर चुके योग एक्सपर्ट हिमालयन सिद्धा अक्षर ने Health Shots से बातचीत में बताया कि भ्रामरी सिर्फ रिलैक्सेशन का तरीका नहीं है, बल्कि यह हमारे मूड और ऊर्जा को भी बदल सकती है. उनका कहना है कि जब उन्होंने पहली बार भ्रामरी की, तो यह बिखरे हुए विचारों को शांत कर वर्तमान क्षण में ले आई. यह अभ्यास अंदरूनी बेचैनी को कम कर मन को स्थिर करता है.

नर्वस सिस्टम के साथ इंटरैक्ट करती है

भ्रामरी प्राणायाम में ध्वनि को जीवन का मूल तत्व माना गया है. इतिहास गवाह है कि कई संस्कृतियों ने ध्वनि को एक ऐसी शक्ति माना है, जो सूक्ष्म कणों से लेकर पूरे ब्रह्मांड तक को आकार देती है. सिद्ध परंपरा में ब्रह्मांड को अलग-अलग फ्रीक्वेंसीज़ की एक मुश्किल लय माना जाता है, जहां पदार्थ, ऊर्जा और चेतना व्यवस्थित कंपन से जन्म लेते हैं. आधुनिक विज्ञान जहां ध्वनि को सीमित नजरिए से देखता है, वहीं भ्रामरी इसे शरीर पर असर डालने वाला एक वास्तविक और मापने योग्य तत्व मानती है. इस अभ्यास में अपनी ही सांस से पैदा होने वाली कंपन शरीर के भीतर फैलती है और नर्वस सिस्टम के साथ इंटरैक्ट करती है.

सेहत के लिए फायदेमंद

Is Bhramari Pranayama Good For Stress: गुनगुनाने की यह प्रक्रिया सेहत के लिए भी फायदेमंद मानी जाती है. सिद्धों ने यह समझा कि कंपन हमारे टिश्यूज़, शरीर के तरल प्रवाह और नर्वस सिस्टम को प्रभावित करती है. जब आप भ्रामरी करते हैं, तो यह कंपन खोपड़ी और साइनस के जरिये फैलती है, जिससे आसपास के टिश्यूज़ को फायदा मिलता है. हालिया रिसर्च बताती है कि लयबद्ध कंपन दिमाग के रास्तों को सिंक्रोनाइज़ कर सकती है, वेगल टोन को बेहतर बनाती है और पैरासिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम को एक्टिव करती है, जिसे शरीर का “रेस्ट एंड डाइजेस्ट” मोड कहा जाता है. इससे हार्ट रेट स्थिर होती है और स्ट्रेस हार्मोन का स्तर घटता है.

भ्रामरी कैसे करें?

किसी शांत जगह पर आराम से बैठें, रीढ़ सीधी रखें और आंखें बंद करें. नाक से गहरी सांस लें और सांस छोड़ते समय होंठ बंद रखते हुए मधुमक्खी जैसी गुनगुनाहट करें. कंपन को सिर और चेहरे में महसूस करें. इसे 6 से 10 बार दोहराएं और अंत में कुछ देर शांत बैठकर अनुभव को महसूस करें. नियमित अभ्यास से तनाव में कमी, मन की स्पष्टता और भावनात्मक संतुलन बेहतर होता है. जैसा कि एक्सपर्ट कहते हैं, भ्रामरी सिर्फ बाहर के शोर को शांत नहीं करती, बल्कि अंदर एक स्थिर और संतुलित अवस्था बनाने में मदद करती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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फैटी लिवर को न समझें मामूली, सिरोसिस से लेकर कैंसर तक का है खतरा; एक्सपर्ट से जानें बचाव

फैटी लिवर को न समझें मामूली, सिरोसिस से लेकर कैंसर तक का है खतरा; एक्सपर्ट से जानें बचाव


Can Fatty Liver Turn Into Cancer: दिल्ली के डॉक्टरों ने एक बुज़ुर्ग मरीज में लिवर कैंसर का सफल इलाज कर एक अहम मिसाल पेश की है. 72 वर्षीय इस मरीज का इलाज बिना किसी ओपन सर्जरी या जनरल एनेस्थीसिया के, सिर्फ एक मिनिमली इनवेसिव, नॉन-सर्जिकल एंजियोग्राफिक प्रोसीजर के जरिए किया गया. डॉक्टरों के अनुसार, मरीज की लिवर की स्थिति काफी खराब थी, जिस वजह से उसे हाई-रिस्क माना गया और सर्जरी के लिए अयोग्य घोषित किया गया था।

श्रीनगर से दिल्ली पहुंचे इस मरीज को शुरुआती स्टेज के हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा, यानी लिवर कैंसर का पता चला था. जांच में सामने आया कि लिवर में करीब 8 सेंटीमीटर का बड़ा ट्यूमर मौजूद था और साथ ही उसे एडवांस्ड लिवर सिरोसिस भी था. डॉक्टरों ने पुष्टि की कि यह कैंसर लंबे समय से चली आ रही फैटी लिवर डिजीज की वजह से विकसित हुआ, जो अक्सर शुरुआती दौर में बिना किसी लक्षण के आगे बढ़ती रहती है.

मरीज को नहीं होता अंदाजा

डॉक्टरों ने बताया कि मरीज शराब का सेवन नहीं करता था और उम्र के हिसाब से फिट भी था. हालांकि, वर्षों तक असंतुलित खानपान, जिसमें जंक फूड और अनप्रोसेस्ड भोजन का अधिक सेवन शामिल था, जिसने फैटी लिवर की समस्या को जन्म दिया. समय के साथ यह स्थिति गंभीर होती चली गई और लिवर को स्थायी नुकसान पहुंचाते हुए आखिरकार कैंसर में बदल गई.

लक्षण नजरअंदाज करना खतरनाक

करीब तीन घंटे चली इस संयुक्त प्रक्रिया के बाद मरीज को तीन दिन के भीतर अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. उसने ने कहा कि उसे कभी अंदाजा नहीं था कि फैटी लिवर कैंसर में बदल सकता है. बिना सर्जरी मिले इस इलाज ने उसे नई जिंदगी दी है. डॉक्टरों के मुताबिक, लिवर एक “साइलेंट ऑर्गन” है, जो तब तक संकेत नहीं देता जब तक नुकसान गंभीर न हो जाए। इसलिए लिवर से जुड़ी समस्याओं को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है और समय पर जांच ही जान बचाने का सबसे बड़ा तरीका है.

 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

डॉ. संकेत मेहता सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट एसएसओ कैंसर सेंटर ने अपने वीडियो में बताया कि “फैटी लिवर को अक्सर लोग हल्के में ले लेते हैं, लेकिन जब यह बढ़ता है तो लिवर को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है और कैंसर का कारण भी बन सकता है. इस केस ने दिखाया कि सिर्फ लाइफस्टाइल से जुड़ी फैटी लिवर बीमारी भी सिरोसिस और कैंसर तक पहुंच सकती है.” वे बताते हैं कि इसके मामले लगातार भारत में तेजी से बढ़ रहे हैं, क्योंकि डायबिटीज,मोटापा और खानपान को लेकर हम इतना ध्यान नहीं देते. वे बताते हैं कि अगर इसका पता शुरुआत में चल जाए, तो इसको रोका जा सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बीपी से लेकर सीढ़ियां चढ़ने तक, ये 4 तरीके बताएंगे कैसा है आपके दिल और आर्टरीज का हाल

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Is Breathlessness A Sign Of Heart Disease: अगर आपको अक्सर यह चिंता रहती है कि कहीं आपकी आर्टरीज में ब्लॉकेज तो नहीं बन रहा, तो अच्छी बात यह है कि कुछ सिंपल होम चेक्स के जरिए आप शुरुआती संकेतों को पहचान सकते हैं. भले ही घर पर बैठकर आर्टरीज में जमी प्लाक को सीधे देखा नहीं जा सकता, लेकिन शरीर कुछ ऐसे संकेत देता है, जो खतरे की ओर इशारा कर सकते हैं.

ब्लड प्रेशर की नियमित जांच

सबसे पहला और आसान तरीका है ब्लड प्रेशर की नियमित जांच. इसके लिए अपर आर्म वाला ऑटोमैटिक डिजिटल बीपी मॉनिटर सबसे भरोसेमंद माना जाता है. बीपी मापने से पहले कम से कम पांच मिनट तक शांति से बैठें. पैरों को जमीन पर टिकाकर रखें और पीठ को सहारा दें. इसके बाद सुबह और रात, दोनों समय दो-दो रीडिंग लें. ऐसा लगातार एक हफ्ते तक करें और फिर सभी रीडिंग का औसत निकालें. अगर आपका ब्लड प्रेशर बार-बार सामान्य से ज्यादा आता है, तो यह संकेत हो सकता है कि आपकी धमनियों पर दबाव बढ़ रहा है. आमतौर पर 120/80 mmHg के आसपास का ब्लड प्रेशर सही माना जाता है.

एंकल ब्रैकियल इंडेक्स

दूसरा अहम टेस्ट है एंकल ब्रैकियल इंडेक्स. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट Mayoclinic के अनुसार, यह टेस्ट पैरों और हाथों के ब्लड प्रेशर की तुलना करता है और खासतौर पर पेरिफेरल आर्टरी डिज़ीज़ के जोखिम को पहचानने में मदद करता है. इसे करने के लिए या तो दो कफ की जरूरत होती है या फिर एक ही मशीन से बारी-बारी से माप लिया जा सकता है. अगर एंकल और आर्म प्रेशर का अनुपात 0.90 से कम आता है, तो यह पैरों की आर्टरीज में सिकुड़ना और हार्ट  से जुड़ी बीमारियों के  बढ़े हुए खतरे का संकेत हो सकता है. यह तरीका भरोसेमंद माना जाता है और शुरुआती स्क्रीनिंग में मदद करता है.

लिपिड प्रोफाइल टेस्ट

तीसरा जरूरी कदम है लिपिड प्रोफाइल टेस्ट. आजकल कई लैब्स घर से सैंपल कलेक्शन की सुविधा देती हैं. इस टेस्ट में टोटल कोलेस्ट्रॉल, एलडीएल, एचडीएल और ट्राइग्लिसराइड्स की जांच होती है. खासतौर पर ज्यादा एलडीएल कोलेस्ट्रॉल आर्टरीज में प्लाक जमने के खतरे को बढ़ाता है. आमतौर पर टेस्ट से पहले 12 घंटे का फास्ट जरूरी होता है, जब तक डॉक्टर कुछ और न कहें. रिपोर्ट ऑनलाइन मिल जाती है, जिससे ट्रैक करना आसान होता है.

सीढ़ियां चढ़ते समय दिक्कत

चार मंजिल सीढ़ियां एक समान रफ्तार से चढ़ें. अगर इस दौरान सीने में दबाव महसूस हो, सांस जरूरत से ज्यादा फूलने लगे, जबड़े या बांह में दर्द हो, या चक्कर आए, तो तुरंत रुक जाएं. यह भी नोट करें कि लक्षण कितनी देर में आए और किस वजह से बढ़े. मेहनत करने पर दिखने वाले ऐसे लक्षण दिल की आर्टरीज से जुड़ी बीमारी के खतरे की ओर इशारा कर सकते हैं.

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आखिर दो साल में AIIMS दिल्ली में क्यों तेजी से बढ़ी मरीजों की संख्या, क्या है इसकी वजह?

आखिर दो साल में AIIMS दिल्ली में क्यों तेजी से बढ़ी मरीजों की संख्या, क्या है इसकी वजह?


देश के सबसे प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल AIIMS दिल्ली ने मरीजों के इलाज के मामले में नया इतिहास रच दिया है. पिछले एक साल के आंकड़े बताते हैं कि यहां इलाज के लिए पहुंचने वालों की संख्या ने अब तक के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. सिर्फ मरीजों की संख्या ही नहीं, बल्कि बेड्स और एडमिशन में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की कहानी बयां करती है.

OPD में 48 लाख से ज्यादा मरीजों का इलाज, आंकड़ों ने बनाया नया रिकॉर्ड

AIIMS दिल्ली के ताजा आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2024-25 के दौरान 48,43,572 मरीजों ने ओपीडी सेवाओं का लाभ उठाया. यह संख्या अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है. अस्पताल प्रशासन के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी अहम है क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर मरीजों को संभालना किसी भी संस्थान के लिए बड़ी चुनौती होती है.

IPD में भी उछाल, 3.61 लाख मरीज हुए भर्ती

केवल ओपीडी ही नहीं, बल्कि भर्ती होकर इलाज कराने वाले मरीजों की संख्या में भी जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है. वर्ष 2024-25 में 3,61,236 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कर उपचार दिया गया. यह दर्शाता है कि गंभीर मामलों में भी AIIMS पर लोगों का भरोसा लगातार बढ़ रहा है.

दो साल में 332 नए बेड्स जुड़े, ढांचे का हुआ विस्तार

पिछले तीन वर्षों की रिपोर्ट पर नजर डालें तो अस्पताल की आधारभूत संरचना में लगातार सुधार हुआ है. वर्ष 2024-25 तक कुल बेड्स की संख्या बढ़कर 3,657 हो गई है. दो साल के भीतर 332 नए बेड जोड़े गए, जो बढ़ती मरीज संख्या के मद्देनजर अहम कदम माना जा रहा है.

दो साल में 13.81 प्रतिशत बढ़ा ओपीडी लोड

अगर वर्ष 2022-23 की तुलना 2024-25 से की जाए तो ओपीडी में 5,87,771 अतिरिक्त मरीजों का इलाज किया गया. यह करीब 13.81 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है. इतने कम समय में इस स्तर की बढ़ोतरी स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती मांग और संस्थान की क्षमता दोनों को दर्शाती है.

भर्ती मरीजों में करीब 29 प्रतिशत की छलांग

भर्ती होकर इलाज कराने वाले मरीजों की संख्या में तो और भी तेज उछाल दर्ज हुआ है. वर्ष 2022-23 में जहां 2,80,770 मरीज IPD में भर्ती हुए थे, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा बढ़कर 3,61,236 तक पहुंच गया. यानी दो साल में 80,466 मरीजों की बढ़ोतरी, जो लगभग 28.65 प्रतिशत की वृद्धि है. यह बढ़ोतरी एक तिहाई के करीब मानी जा रही है.

क्यों देशभर में AIIMS मॉडल बना भरोसे की मिसाल?

आज देश के अलग-अलग हिस्सों में करीब 22 AIIMS संस्थान संचालित हो रहे हैं. दिल्ली स्थित AIIMS की कार्यशैली और भरोसेमंद सेवाओं ने इसे एक मानक संस्थान बना दिया है. देश के कोने-कोने से लोग यहां उपचार की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं. खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए यह संस्थान अंतिम सहारा माना जाता है. लोगों को लगता है कि समय पर AIIMS से इलाज मिलने पर मरीज ठीक हो सकता है. यही भरोसा और उम्मीद यहां के डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को लगातार बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करती है. जिसका परिणाम लोगों को बेहतर इलाज के रूप में मिलता है और यही कारण है कि मरीजों एवं उनके परिजनों का AIIMS की तरफ ज्यादा झुकाव देखने को मिलता है.

ये भी पढ़ें: अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड लोगों को बना रहा शुगर का मरीज, नेपाल में शुरू हुई रिसर्च बनेगी गेम-चेंजर

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ब्रश न करना दांतों के लिए ही नहीं, दिल के लिए भी ‘रेड फ्लैग’, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

ब्रश न करना दांतों के लिए ही नहीं, दिल के लिए भी ‘रेड फ्लैग’, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?


Does Not Brushing At Night Affect Heart Health: ओरल हाइजीन भले ही रोजमर्रा की एक छोटी आदत लगे, लेकिन इसे नजरअंदाज़ करना सिर्फ कैविटी तक ही सीमित नहीं रहता, इसके असर कहीं ज्यादा गंभीर हो सकते हैं. कंटेंट क्रिएटर और एनेस्थीसियोलॉजी व इंटरवेंशनल पेन मेडिसिन के डॉक्टर कुणाल सूद ने हाल ही में इंस्टाग्राम पर बताया कि रात में ब्रश न करना दिल की सेहत पर भी बुरा असर डाल सकता है.

एक कंटेंट क्रिएटर के इस दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए कि “अगर आप सोने से पहले दांत ब्रश नहीं करते हैं, तो आपको हार्ट रोग का खतरा ज्यादा हो सकता है”, डॉ. सूद ने सहमति जताई. उन्होंने जोर देकर कहा कि ओरल हाइजीन न सिर्फ जरूरी है, बल्कि यह दिल की सेहत के लिए भी डिफेंसिव भूमिका निभाती है. उन्होंने चेतावनी दी कि “अगर आप रात में दांत ब्रश करना छोड़ देते हैं, तो आप सिर्फ कैविटी का ही जोखिम नहीं उठा रहे होते.” 2023 की एक स्टडी का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि खराब ओरल हाइजीन का संबंध हार्ट रोग और हार्ट फेलियर के बढ़े हुए खतरे से पाया गया है. इसलिए सही समय पर ब्रश करना बेहद अहम है.

 

समय के साथ हमारे हार्ट पर असर पड़ता है

डॉ. सूद के मुताबिक, “थ्योरी यह है कि मुंह में मौजूद बैक्टीरिया खून के जरिए शरीर में पहुंच जाते हैं, जिससे सूजन पैदा होती है और समय के साथ इसका असर हार्ट पर पड़ता है.” उन्होंने यह भी साफ किया कि ब्रश न करना सीधे तौर पर हार्ट की बीमारी का कारण नहीं बनता, लेकिन खराब ओरल हाइजीन उन कई जोखिम कारकों में से एक है, जो हार्ट संबंधी समस्याओं में योगदान दे सकता है.

ज्यादा ब्रश करने वालों को क्या फायदा?

उनका कहना है कि जो लोग ज्यादा बार ब्रश करते हैं, उनका दिल आमतौर पर ज़्यादा स्वस्थ रहता है. उन्होंने आगे कहा कि “दरअसल, दिन में कम से कम तीन बार ब्रश करना और नियमित डेंटल क्लीनिंग कराने से हार्ट रोग का खतरा कम देखा गया है. इससे मसूड़ों की बीमारी और दांत गिरने जैसी समस्याओं की संभावना भी घटती है. ओरल हाइजीन दिल की सेहत को सपोर्ट करने के सबसे आसान तरीकों में से एक है.”

इसका दिल पर क्या असर पड़ता है?

एक्सपर्ट बताते हैं कि जब हम रात में ब्रश करना छोड़ देते हैं, तो मुंह में प्लाक और बैक्टीरिया जमा होने लगते हैं. ये बैक्टीरिया ऐसे टॉक्सिन छोड़ते हैं, जो खून में पहुंचकर पूरे शरीर में सूजन की प्रतिक्रिया शुरू कर सकते हैं. लंबे समय तक बनी रहने वाली यह सूजन ब्लड वेसल्स की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचा सकती है. इससे आर्टरीज में प्लाक जमने लगता है और हार्ट संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. हालांकि हर खराब ओरल हाइजीन वाला व्यक्ति हार्ट की बीमारी का शिकार हो, ऐसा जरूरी नहीं है, लेकिन मुंह की सफाई बनाए रखना सूजन को कम करने और हार्ट की सेहत को बेहतर रखने का एक अहम तरीका है.

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क्या एक-दूसरे को किस करने से कम हो जाता है स्ट्रेस, जानें कैसे काम करता है यह?

क्या एक-दूसरे को किस करने से कम हो जाता है स्ट्रेस, जानें कैसे काम करता है यह?


फरवरी का महीना आते ही प्यार का मौसम भी शुरू हो जाता है. कपल्स पूरे हफ्ते को बड़े उत्साह के साथ सेलिब्रेट करते हैं, जिसे हम वैलेंटाइन वीक के नाम से जानते हैं. इस हफ्ते का हर दिन अपने आप में खास होता है, लेकिन 13 फरवरी को मनाया जाने वाला Kiss Day सबसे ज्यादा रोमांटिक माना जाता है.  इस दिन कपल्स एक-दूसरे को किस करके अपने प्यार का इजहार करते हैं और रिश्ते को और भी गहरा बनाते हैं.

अक्सर लोग किस को सिर्फ प्यार जताने का तरीका मानते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि किस करना स्ट्रेस से लेकर हमारे दिल, दिमाग और शरीर को भी कई तरह के फायदे देता है.  यह बात सुनने में थोड़ी अलग लग सकती है, लेकिन कई रिसर्च में पाया गया है कि एक सच्चा और प्यार भरा किस तनाव कम करने से लेकर दिल की सेहत सुधारने तक में मददगार हो सकता है. तो आइए जानते हैं कि क्या एक-दूसरे को किस करने से स्ट्रेस कम हो जाता है और यह कैसे काम करता है?

क्या सच में किस करने से स्ट्रेस कम होता है?

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी तरह के तनाव से जूझ रहा है. काम का दबाव, जिम्मेदारियां और निजी जीवन की परेशानियां दिमाग पर असर डालती हैं. ऐसे में एक प्यारा सा किस भी तनाव कम करने में मदद कर सकता है. जब हम अपने पार्टनर को किस करते हैं, तो हमारे दिमाग में कुछ खास हार्मोन रिलीज होते हैं.  जैसे ऑक्सीटोसिन, इसे लव हार्मोन भी कहा जाता है. यह अपनापन और जुड़ाव बढ़ाता है. दूसरा डोपामाइन, यह खुशी और उत्साह का एहसास कराता है औप तीसरा सेरोटोनिन, यह मूड को बेहतर बनाता है. इन हार्मोन्स के बढ़ने से शरीर में मौजूद स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर कम होने लगता है यानी अगर आपका दिन थकान और तनाव से भरा रहा हो, तो एक सच्चा और प्यार भरा किस आपके मन को शांत कर सकता है

यह कैसे काम करता है?

कुछ स्टडीज के अनुसार, किस करने से ब्लड वेसल्स थोड़ी फैल जाती हैं, जिससे ब्लड फ्लो बेहतर होता है. इससे ब्लड प्रेशर नियंत्रित रखने में मदद मिलती है, उनमें दिल से जुड़ी समस्याओं का खतरा थोड़ा कम देखा गया है. साथ ही सिरदर्द में भी राहत मिल सकती है. किस करने से दिमाग को सिग्नल मिलते हैं. दिमाग में सिग्नल को पाकर रिवॉर्ड सिस्टम को सक्रिय कर देता है, जिससे हमें अच्छा महसूस होता है. लव और हैप्पी हार्मोन रिलीज होते हैं, साथ ही जब खुशी वाले हार्मोन बढ़ते हैं, तो शरीर में मौजूद तनाव वाला हार्मोन कोर्टिसोल कम होने लगता है. कोर्टिसोल ज्यादा होने पर तनाव, चिड़चिड़ापन और थकान महसूस होती है. लेकिन किस के दौरान इसका स्तर घटता है, जिससे मन हल्का और शांत हो जाता है. 

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