अच्छी डाइट के बावजूद शरीर में हो रही हीमोग्लोबिन की कमी, जानें कहां हो रही दिक्कत?

अच्छी डाइट के बावजूद शरीर में हो रही हीमोग्लोबिन की कमी, जानें कहां हो रही दिक्कत?


Hemoglobin Deficiency: काफी लोग अपनी सेहत को लेकर बहुत जागरूक होते हैं. वे हर काम समय के अनुसार करते हैं, अच्छी डाइट लेते हैं और नियमित रूप से एक्सरसाइज भी करते हैं। लेकिन इसके बावजूद उनके शरीर में खून की कमी की समस्या खत्म नहीं होती.हीमोग्लोबिन हमारे शरीर में ऑक्सीजन को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम करता है,ऐसे में खून की कमी से उन्हें जल्दी थकान होने लगती है, चक्कर आने लगते हैं और कई बार आंखों के सामने अंधेरा भी छाने लगता है.

 क्यों होती है यह समस्या?

यह स्थिति काफी हैरान करने वाली होती है कि इतना अच्छा खानपान और हेल्थ कॉन्शियस होने के बावजूद भी शरीर में खून की कमी क्यों हो रही है.ऐसे में आपके मन में यह सवाल जरूर आता होगा कि आखिर ऐसा क्यों होता है और क्या यह किसी नई बीमारी का संकेत तो नहीं है

 सही अवशोषण का महत्व

सबसे पहले यह समझना बहुत जरूरी है कि सिर्फ हेल्दी खाना खाना ही काफी नहीं होता, बल्कि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जो हम खा रहे हैं, उसका हमारे शरीर में सही तरीके से अवशोषण (Absorption) हो रहा है या नहीं.कई बार लोग आयरन से भरपूर चीजें जैसे हरी सब्जियां, दाल और फल तो खाते हैं, लेकिन शरीर उन्हें ठीक से अवशोषित नहीं कर पाता। यहीं से असली समस्या शुरू होती है और शरीर में खून की कमी होने लगती है.

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 विटामिन C की भूमिका

इसका एक कारण विटामिन C की कमी भी हो सकती है, क्योंकि यह आयरन को शरीर में अवशोषित करने में मदद करता है. इसलिए अगर आप आयरन ले रहे हैं, लेकिन साथ में विटामिन C युक्त चीजें जैसे नींबू, संतरा नहीं ले रहे हैं, तो शरीर आयरन का उपयोग नहीं कर पाता. 

 पाचन तंत्र का प्रभाव

अगर आपका डाइजेशन सही नहीं है, तो शरीर पोषक तत्वों को सही से नहीं ले पाता.जिसमें गैस, एसिडिटी  से जुड़ी समस्याएं हो सकती है जो हीमोग्लोबिन कम होने का कारण बन सकती हैं.

महिलाओं में अधिक समस्या

महिलाओं में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है, खासकर उनको जिनको पीरियड्स में ज्यादा ब्लीडिंग होती है इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान भी शरीर को ज्यादा आयरन की जरूरत होती है, और अगर इस दौरान सही ध्यान न रखा जाए तो हीमोग्लोबिन कम हो सकता है.

विटामिन B12 और फोलिक एसिड की कमी

इसके अलावा विटामिन  B12 और फोलिक एसिड की कमी भी हीमोग्लोबिन नहीं बढ़ने देती क्योंकि  ये दोनों Red Blood Cells के निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं वही अगर शरीर में इनकी ही कमी होने लगे तो शरीर में खून बनने कि प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ता है.

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लंच के बाद सवार हो जाती है सुस्ती और आने लगती है नींद, हल्के में न लीजिए ये लक्षण

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Why Do I Feel Very Sleepy After Lunch Every Day: दोपहर का खाना खाने के बाद सुस्ती आना और नींद लगना कई लोगों के लिए आम बात है. लंच के बाद आने वाली यह थकान अक्सर लोगों की कंसंट्रेशन को प्रभावित करती है और वे खुद को जागे रहने के लिए चाय या कॉफी का सहारा लेते हुए पाते हैं. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि अगर यह समस्या रोज होने लगे, तो इसे सिर्फ भारी खाना खाकर हुई थकान समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

भारत के जाने-माने डायबेटोलॉजिस्ट डॉ. वी मोहन ने इसको लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया. उन्होंने अपने पोस्ट में बताया कि खाने के बाद होने वाली थकान इस बात का संकेत हो सकती है कि हमारा शरीर भोजन को कैसे प्रोसेस कर रहा है, हार्मोन कैसे बैलेंस हो रहे हैं और ब्लड शुगर का स्तर किस तरह कंट्रोल हो रहा है. वे बताते हैं कि खाना खाने के बाद हल्की रिलैक्सेशन महसूस होना सामान्य है, लेकिन अगर हर दिन खाने के बाद बहुत ज्यादा नींद आने लगे, थकान महसूस हो या ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत हो, तो यह एक चेतावनी संकेत हो सकता हैय यह इस बात की ओर इशारा करता है कि शरीर में ब्लड शुगर सही तरीके से नियंत्रित नहीं हो रहा है. 

नींद आने के क्या होते हैं कारण?

खाना खाने के बाद नींद आने के पीछे एक नेचुरल कारण भी होता है. दरअसल, भोजन के बाद शरीर पाचन प्रक्रिया को तेज करने के लिए पेट और आंतों की ओर अधिक ब्लड भेजता है. ऐसे में कुछ समय के लिए ब्रेन तक पहुंचने वाला  ब्लड थोड़ा कम हो सकता है, जिससे हल्की सुस्ती महसूस होती है. डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि भारी भोजन के तुरंत बाद ज्यादा मेहनत वाला काम या व्यायाम करने से बचना चाहिए. खासकर दिल के मरीजों में इस दौरान ब्लड फ्लो में बदलाव के कारण सीने में दर्द की समस्या बढ़ सकती है.

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लाइफस्टाइल की अहम भूमिका

ज्यादा खाना या गलत तरह का खाना भी इस समस्या को बढ़ाता है. बड़ी मात्रा में भोजन करना, खासकर सफेद चावल, मिठाई या तले हुए खाद्य पदार्थ जैसे रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट से भरपूर चीजें खाने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है. इसके बाद शरीर इंसुलिन रिलीज करता है, जिससे शुगर लेवल अचानक गिरता है और व्यक्ति को थकान, कमजोरी या नींद महसूस होती है. अगर हर बार खाने के बाद ऐसा महसूस हो, तो यह प्रीडायबिटीज या डायबिटीज का शुरुआती संकेत भी हो सकता है. बार-बार एनर्जी का गिरना इस बात की ओर इशारा करता है कि शरीर में शुगर का स्तर स्थिर नहीं रह पा रहा है.

कैसे कर सकते हैं बचाव?

हालांकि, कुछ आसान लाइफस्टाइल बदलाव इस समस्या से बचने में मदद कर सकते हैं. कम मात्रा में भोजन करना, खाने में प्रोटीन और सब्जियों को शामिल करना और मीठे व रिफाइंड फूड को कम करना काफी फायदेमंद साबित हो सकता है. इसके अलावा, खाना खाने के बाद थोड़ी देर टहलना भी ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने में मदद करता है. नियमित रूप से सक्रिय रहना, पर्याप्त नींद लेना और स्वस्थ वजन बनाए रखना शरीर की ऊर्जा को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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स्टीकर लगे फल-सब्जियां खरीदने से पहले दो बार सोचना, बीमार हो सकते हैं आप; FSSAI ने दी चेतावनी

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Why You Should Remove Stickers From Fruits: खाने-पीने की चीजों को लेकर लापरवाही कभी-कभी भारी पड़ सकती है. हाल ही में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने फल और सब्जियों पर लगे स्टिकर को लेकर चेतावनी जारी की है. उनका कहना है कि इन स्टिकर के पीछे इस्तेमाल होने वाला चिपकने वाला पदार्थ खाने योग्य नहीं होता और यह स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

अक्सर हम बाजार से फल या सब्जियां खरीदते समय उन पर लगे स्टिकर को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही छोटी सी गलती समस्या बन सकती है. एक्सपर्ट के मुताबिक, इन स्टिकर में इस्तेमाल होने वाली गोंद, स्याही और अन्य रसायन शरीर के लिए सुरक्षित नहीं होते. इसलिए इन्हें खाने से पहले हटाना बेहद जरूरी है.

क्या होती है दिक्कत?

Dr Brunda ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि अगर गलती से कोई छोटा टुकड़ा शरीर में चला भी जाए तो आमतौर पर बड़ा नुकसान नहीं होता, लेकिन यह पूरी तरह सुरक्षित भी नहीं है. कुछ लोगों को इससे पेट में जलन, उलझन, हल्की मितली या पाचन से जुड़ी परेशानी हो सकती है. खासकर बच्चों और बुजुर्गों में कभी-कभी यह गले में अटकने का खतरा भी बढ़ा सकता है. एक्सपर्ट यह भी बताते हैं कि अगर लंबे समय तक ऐसे रसायनों का सेवन होता रहे, तो शरीर पर इसका असर धीरे-धीरे दिख सकता है. भले ही कुछ गोंद को फूड-ग्रेड कहा जाता हो, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि उसे सीधे खाया जा सकता है. इसलिए सावधानी बरतना ही सबसे बेहतर उपाय है.

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आपको क्या करना चाहिए?

इस जोखिम से बचने के लिए सबसे आसान तरीका है कि फल और सब्जियों को खाने से पहले अच्छे से धोया जाए और उन पर लगे सभी स्टिकर हटा दिए जाएं. जरूरत हो तो इन्हें छीलकर भी खाया जा सकता है, ताकि किसी भी तरह का अब्जॉर्व शरीर में न जाए. इसके अलावा, फल और सब्जियों को साफ रखने के लिए कुछ और बातों का ध्यान रखना जरूरी है. इन्हें घर लाने के बाद अलग जगह पर रखें, फिर साफ पानी से अच्छी तरह धोएं. हल्के गुनगुने पानी में थोड़ी मात्रा में क्लोरीन मिलाकर भी इन्हें साफ किया जा सकता है, लेकिन साबुन या किसी केमिकल क्लीनर का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

इस बात का रखें ध्यान

जिन फलों और सब्जियों को ठंडा रखने की जरूरत हो, उन्हें फ्रिज में रखें और बाकी को खुले टोकरे या रैक में रखें. खाने की चीजों को कार या बाहर खुले में रखने से बचें.जहां इन्हें धोया गया हो, उस जगह को भी साफ रखें. छोटी-छोटी सावधानियां ही आपको बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से बचा सकती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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वैज्ञानिकों ने लड़कों के लिए बनाई गर्भनिरोधक गोली, स्पर्म प्रोडक्शन पर ही लगा देती है ब्रेक

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How Male Birth Control Pill Works: दशकों से गर्भनिरोध की जिम्मेदारी ज्यादातर महिलाओं पर ही रही है, जबकि पुरुषों के पास सीमित विकल्प कंडोम या नसबंदी ही मौजूद थे. लेकिन अब विज्ञान की दुनिया से आई एक नई खोज इस सोच को बदल सकती है. हाल ही में पब्लिश एक स्टडी में साइंटिस्ट ने पुरुषों के लिए ऐसी गर्भनिरोधक दवा की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है, जो बिना हार्मोन के असर के काम कर सकती है और जिसका प्रभाव अस्थायी हो सकता है. 

क्या है यह नई खोज?

अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में बताया कि शरीर में एक खास प्रक्रिया को रोककर स्पर्म बनने की प्रक्रिया को अस्थायी रूप से बंद किया जा सकता है. सबसे खास बात यह है कि इससे शरीर को कोई स्थायी नुकसान नहीं होता और दवा बंद करने पर फिर से सामान्य स्थिति लौट सकती है.

इस रिसर्च में साइंटिस्ट ने मियोसिस नाम की एक अहम जैविक प्रक्रिया पर ध्यान दिया, जो स्पर्म बनने के लिए जरूरी होती है. प्रयोग के दौरान एक खास कंपाउंड का इस्तेमाल कर इस प्रक्रिया को चूहों में अस्थायी रूप से रोक दिया गया. इसका नतीजा यह हुआ कि स्पर्म बनना बंद हो गया, लेकिन जब दवा बंद की गई, तो उनकी प्रजनन क्षमता वापस लौट आई और वे स्वस्थ संतानों को जन्म देने में सक्षम रहे. 

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क्यों अहम है यह खोज?

यह खोज इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि अब तक पुरुष गर्भनिरोधक तरीकों में कई दिक्कतें सामने आती रही हैं. हार्मोन आधारित तरीकों से मूड में बदलाव और यौन इच्छा में कमी जैसी समस्याएं होती हैं, जबकि नसबंदी स्थायी समाधान है और इसे आसानी से वापस नहीं किया जा सकता. ऐसे में बिना हार्मोन वाला और अस्थायी तरीका एक बड़ी उम्मीद बनकर सामने आया है.

कैसे काम करती है यह तकनीक?

यह नई तकनीक स्पर्म के विकास के एक खास चरण को रोककर काम करती है. जब यह प्रक्रिया बाधित होती है, तो स्पर्म सही तरीके से विकसित नहीं हो पाते और प्रजनन क्षमता कुछ समय के लिए रुक जाती है. हालांकि, जैसे ही दवा का असर खत्म होता है, शरीर दोबारा सामान्य रूप से काम करने लगता है. हालांकि साइंटिस्ट ने यह भी साफ किया है कि अभी इस्तेमाल किया गया कंपाउंड इंसानों के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता. इसमें कुछ संभावित दुष्प्रभाव हो सकते हैं, इसलिए फिलहाल इसे एक शुरुआती कदम के तौर पर देखा जा रहा है.  इसका मकसद ऐसे सुरक्षित विकल्प विकसित करना है, जो इसी प्रक्रिया को निशाना बनाकर काम कर सकें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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थकान और जोड़ों के दर्द को न लें हल्के में, आंतों से शुरू हो सकती है ये बीमारी

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Can Fatigue And Bloating Be Signs Of Autoimmune Disease: अक्सर हम अपने शरीर के छोटे-छोटे संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं. थकान को तनाव समझ लेते हैं, पेट फूलने को खाने की गड़बड़ी मान लेते हैं और जोड़ों के दर्द को उम्र या काम का असर कहकर टाल देते हैं. लेकिन कई बार ये अलग-अलग समस्याएं नहीं होतीं, बल्कि एक बड़े कारण की ओर इशारा करती हैं कि इम्यून सिस्टम का असंतुलन, जिसकी शुरुआत गट से हो सकती है. 

कैसे होते हैं इसके संकेत?

दरअसल, ऑटोइम्यून बीमारियां शुरुआत में जोर से नहीं, बल्कि धीरे-धीरे संकेत देती हैं. शरीर इनको लेकर शोर नहीं मचाता, बल्कि हल्के-हल्के संकेत देता है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. कई मामलों में इसकी शुरुआत गट से होती है, जहां से इम्यून सिस्टम का बड़ा हिस्सा नियंत्रित होता है. गट सिर्फ पाचन का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह शरीर का एक बड़ा इम्यून सेंटर भी है. लगभग 70 प्रतिशत इम्यून गतिविधियां गट की परत में होती हैं. यहां मौजूद माइक्रोबायोम यानि बैक्टीरिया, वायरस और फंगस का एक संतुलित समूह इम्यून सिस्टम को सही तरीके से काम करने में मदद करता है. लेकिन जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो शरीर की इम्यून सिस्टम खुद ही भ्रमित होने लगती है.

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जब गट की परत कमजोर हो जाती है, जिसे आमतौर पर लीकी गट कहा जाता है, तो हानिकारक तत्व खून में पहुंच सकते हैं. इससे इम्यून सिस्टम बार-बार सक्रिय होता है और सूजन बढ़ने लगती है. समय के साथ यही स्थिति ऑटोइम्यून समस्याओं का कारण बन सकती है.

शुरुआती लक्षण क्या होते हैं?

इसके शुरुआती लक्षण बहुत सामान्य लगते हैं, जैसे लगातार थकान, बार-बार पेट फूलना, दिमाग में धुंधलापन, हल्का लेकिन बार-बार होने वाला जोड़ों का दर्द या त्वचा से जुड़ी समस्याएं. ये संकेत अकेले देखने पर गंभीर नहीं लगते, लेकिन अगर ये लंबे समय तक बने रहें या एक साथ दिखें, तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी का एक कारण मॉलिक्यूलर मिमिक्री भी हो सकता है. इसमें कुछ बैक्टीरिया शरीर के अपने टिश्यू जैसे दिखते हैं, जिससे इम्यून सिस्टम भ्रमित होकर शरीर के ही हिस्सों पर हमला करने लगता है. यही प्रक्रिया धीरे-धीरे ऑटोइम्यून बीमारियों को जन्म देती है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. अनिरुद्ध मसलेकर ने TOI को बताया कि ऑटोइम्यून बीमारियां हमेशा वहीं से शुरू नहीं होतीं जहां लक्षण दिखते हैं. कई मामलों में इसकी शुरुआत गट से जुड़े इम्यून असंतुलन से हो सकती हैं.  वे बताते हैं कि शुरुआती संकेत बहुत हल्के होते हैं, इसलिए लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे जांच में देरी हो जाती है.  डॉक्टरों का मानना है कि अगर थकान, पेट की समस्या और सूजन जैसे लक्षण एक साथ और लंबे समय तक बने रहें, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. समय रहते पहचान हो जाए, तो इन बीमारियों को बेहतर तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कमर दर्द के साथ दिखें ये बदलाव तो तुरंत कराएं जांच, हो सकती है किडनी फेल

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How Back Pain Can Indicate Kidney Disease: पीठ दर्द आमतौर पर एक सामान्य समस्या माना जाता है. लंबे समय तक बैठकर काम करना, गलत पोश्चर या ज्यादा एक्सरसाइज, इन वजहों को अक्सर इसका कारण मान लिया जाता है. ज्यादातर मामलों में यह सही भी होता है. लेकिन कई बार शरीर ऐसे संकेत देता है, जो सिर्फ मांसपेशियों तक सीमित नहीं होते. लगातार बना रहने वाला, अलग तरह का महसूस होने वाला दर्द किडनी से जुड़ी समस्या की ओर इशारा कर सकता है. 

मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, हर तरह का बैक पेन एक जैसा नहीं होता. मांसपेशियों से जुड़ा दर्द आमतौर पर मूवमेंट से बढ़ता है, आराम करने पर कम होता है और गर्म सिकाई या स्ट्रेचिंग से राहत मिलती है. लेकिन किडनी से जुड़ा दर्द अलग तरह का होता है कि यह गहराई में महसूस होता है, मूवमेंट से ज्यादा प्रभावित नहीं होता और आराम करने पर भी आसानी से नहीं जाता. यही फर्क इसे पहचानने में अहम बनाता है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. रतन झा ने TOI को बताया कि अक्सर बैक पेन को मसल्स की समस्या मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, खासकर जब यह धीरे-धीरे शुरू होता है. लेकिन किडनी से जुड़ा दर्द अलग व्यवहार करता है, जिसे समझना जरूरी है. 

क्या होते हैं किडनी दिक्कतें?

किडनी से जुड़ी समस्याएं शुरुआत में तेज लक्षणों के साथ नहीं आतीं। यह धीरे-धीरे बढ़ती हैं और सामान्य परेशानियों के पीछे छिप जाती हैं. पेशाब के पैटर्न में बदलाव, जलन, पेशाब का रंग गहरा होना या आंखों और पैरों के आसपास हल्की सूजन, ये सभी संकेत हो सकते हैं कि समस्या सिर्फ पीठ दर्द तक सीमित नहीं है. इसके अलावा लगातार थकान या शरीर में भारीपन महसूस होना भी एक संकेत हो सकता है.

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डॉ. हिमा दीप्ति अल्ला बताती हैं कि किडनी से जुड़ा दर्द हमेशा तेज नहीं होता. यह अक्सर कमर या साइड में हल्का लेकिन लगातार रहने वाला दर्द होता है, जिसे लोग पोश्चर या लंबे समय तक बैठने का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. 

शरीर देता है चेतावनी

कई बार शरीर छोटे-छोटे बदलावों के जरिए चेतावनी देता है.जैसे झागदार पेशाब, ऐसा महसूस होना कि ब्लैडर पूरी तरह खाली नहीं हुआ या ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव. ये लक्षण आमतौर पर लोग रोजमर्रा में नोटिस नहीं करते, लेकिन यही शुरुआती संकेत हो सकते हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के आंकड़ों के मुताबिक, क्रॉनिक किडनी डिजीज अक्सर शुरुआती स्टेज में इसलिए पकड़ में नहीं आती क्योंकि इसके लक्षण बहुत हल्के या अस्पष्ट होते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि हमारी रोज की आदतें भी किडनी हेल्थ पर बड़ा असर डालती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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