महिलाओं में साइलेंट किलर क्यों बन रहा टीबी, जानें यह बीमारी कितनी खतरनाक?

महिलाओं में साइलेंट किलर क्यों बन रहा टीबी, जानें यह बीमारी कितनी खतरनाक?


Why TB Is Becoming A Silent Killer In Women: टीबी अक्सर फेफड़ों की बीमारी माना जाता है, लेकिन यह सिर्फ वहीं तक सीमित नहीं है. खासकर महिलाओं में यह अब एक साइलेंट किलर के रूप में उभर रहा है, क्योंकि इसके लक्षण अक्सर साफ नजर नहीं आते और बीमारी लंबे समय तक छिपी रह जाती है. टीबी एक बैक्टीरियल इंफेक्शन है, जो हवा के जरिए फैलता है.  जब इंफेक्टेड व्यक्ति खांसता, छींकता या थूकता है, तो इसके बैक्टीरिया दूसरे लोगों तक पहुंच सकते हैं. हालांकि यह बीमारी पूरी तरह से ठीक हो सकती है, लेकिन समय पर पहचान और इलाज न मिलने पर यह जानलेवा भी साबित हो सकती है, 

महिलाओं में टीवी की बीमारी

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट cloudninecare की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं में टीबी का एक खास रूप होता है फीमेल जेनिटल टीबी, जो प्रजनन अंगों को प्रभावित करता है. यह बीमारी ज्यादा खतरनाक इसलिए मानी जाती है क्योंकि इसके लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं होते, कई बार महिलाओं को पता ही नहीं चलता कि वे इस इंफेक्शन की शिकार हैं, और जब तक पता चलता है, तब तक स्थिति गंभीर हो चुकी होती है. 

कौन से अंग होते हैं प्रभावित?

यह इंफेक्शन फेलोपियन ट्यूब, गर्भाशय, ओवरी और सर्विक्स जैसे अंगों को प्रभावित कर सकता है. सबसे ज्यादा असर फेलोपियन ट्यूब पर देखा जाता है, जिससे गर्भधारण में दिक्कतें आने लगती हैं. कई मामलों में यह बीमारी बांझपन का कारण भी बन जाती है, जो इसका सबसे बड़ा असर माना जाता है. इस बीमारी के लक्षण बहुत सामान्य हो सकते हैं, जैसे पेल्विक पेन, पीरियड्स में गड़बड़ी, ज्यादा या कम ब्लीडिंग, या असामान्य डिस्चार्ज, यही वजह है कि इसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है या किसी और समस्या समझ लिया जाता है. 

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क्या होते हैं इसके लक्षण?

टीबी के कुछ सामान्य लक्षण भी हो सकते हैं, जैसे बुखार, रात में पसीना आना, वजन कम होना और भूख न लगना. लेकिन क्योंकि ये लक्षण कई अन्य बीमारियों में भी दिखते हैं, इसलिए सही पहचान करना मुश्किल हो जाता है. इसका खतरा उन महिलाओं में ज्यादा होता है जो कमजोर इम्यूनिटी, डायबिटीज, HIV या खराब जीवन स्थितियों में रहती हैं, भीड़भाड़, पोषण की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी भी इसके फैलने का बड़ा कारण बनते हैं.  अगर समय रहते इलाज न मिले, तो यह बीमारी न सिर्फ प्रजनन क्षमता को प्रभावित करती है, बल्कि लाइफ क्वालिटी को भी खराब कर देती है. हालांकि अच्छी बात यह है कि एंटीबायोटिक्स के जरिए इसका इलाज संभव है, लेकिन इसके लिए पूरा कोर्स लेना जरूरी होता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! बिल्लियों से फैल रहा जानलेवा फंगल इंफेक्शन’, यहां मिला रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला

सावधान! बिल्लियों से फैल रहा जानलेवा फंगल इंफेक्शन’, यहां मिला रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला


How Does Sporothrix Brasiliensis Spread In Humans: उरुग्वे में सामने आया एक नया मामला एक बड़े खतरे का संकेत बन चुका है. स्पोरोथ्रिक्स ब्रासिलिएन्सिसनाम नाम का यह फंगस, जो स्किन इंफेक्शन का कारण बनता है, अब साउथ अमेरिका में तेजी से फैलता हुआ दिख रहा है. हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सिर्फ एक केस नहीं बल्कि एक ऐसे इंफेक्शन की शुरुआत है जिसे कंट्रोल करना आसान नहीं होगा. चलिए आपको बताते हैं कि यह कैसे फैलता है और इसको रोकने के लिए क्या किया जा सकता है. 

कैसे फैल रही है यह बीमारी?

न्यूज बेवसाइट earth की रिपोर्ट के अनुसार,  सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इसका मुख्य सोर्स बिल्लियां बन रही हैं. रिसर्च में पाया गया कि उरुग्वे के कई इलाकों में इंसानों और जानवरों में यह संक्रमण बिल्लियों के जरिए फैला. खास बात यह रही कि कई इंफेक्टेड बिल्लियों का आपस में कोई कनेक्शन नहीं था, जिससे साफ है कि यह फंगस अब लोकल स्तर पर फैल चुका है.

साइंटिस्ट के अनुसार, स्पोरोथ्रिक्स ब्रासिलिएन्सिसनाम एक इमर्जिंग फंगल थ्रेट है, जो पहले ब्राजील तक सीमित था लेकिन अब दूसरे देशों में भी तेजी से फैल रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण बिल्लियों के जरिए होने वाला ट्रासमिशन है. 

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क्या होते हैं इसके कारण?

इंफेक्टेड बिल्लियों के शरीर पर बने घाव इस फंगस का मुख्य केंद्र होते हैं. खासकर उनके चेहरे, नाक और पंजों के आसपास फंगस की मात्रा ज्यादा होती है. जब ये बिल्लियां किसी इंसान को खरोंचती या काटती हैं, तो फंगस सीधे त्वचा में प्रवेश कर जाता है और इंफेक्शन शुरू हो जाता हैच एक और वजह यह है कि सड़क पर रहने वाली बिल्लियां लगातार घूमती रहती हैं और आपस में लड़ती हैं. इससे संक्रमण एक जगह से दूसरी जगह फैलता रहता है और लोगों को इसकी भनक भी नहीं लगती. यह फंगस अपने रूप को भी बदल सकता है. बाहर यह धागे जैसा होता है, लेकिन शरीर के अंदर जाकर यह यीस्ट जैसे रूप में बदल जाता है, जिससे यह त्वचा के अंदर तेजी से बढ़ने लगता है.

कैसे होते हैं इसके लक्षण?

लक्षणों की बात करें तो यह इंफेक्शन आमतौर पर एक छोटे लाल दाने से शुरू होता है, जो बाद में घाव में बदल जाता है. कई बार ऐसे दाने एक लाइन में फैलते जाते हैं. वहीं बिल्लियों में यह घाव जल्दी ठीक नहीं होते और बाल झड़ने लगते हैं. डॉक्टर इस संक्रमण की पुष्टि लैब टेस्ट के जरिए करते हैं, लेकिन कई बार इसे सामान्य बैक्टीरियल इंफेक्शन समझ लिया जाता है, जिससे इलाज में देरी हो जाती है. हालांकि अच्छी बात यह है कि यह बीमारी ठीक हो सकती है, लेकिन समय पर सही इलाज जरूरी है.  खासकर बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों के लिए यह ज्यादा खतरनाक हो सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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नाक बंद और गले में खराश? इसे मामूली सर्दी समझने की गलती न करें, जानिए क्या है HMPV

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Symptoms Of Human Metapneumovirus: मौसम बदलने के साथ ही कुछ ऐसे वायरस भी सक्रिय हो जाता है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, लेकिन इसके लक्षण काफी हद तक फ्लू या आरएसवी जैसे ही होते हैं. इसी वजह से इसे पहचानना आसान नहीं होता. इस वायरस का नाम ह्यूमन मेटाप्न्यूमोवायरस है, जिसकी पहचान पहली बार साल 2001 में की गई थी. चलिए आपको बताते हैं कि यह कैसे फैलता है और इसके खतरे क्या- क्या हैं. 

कैसे फैलता है यह वायरस?

mensjournal की रिपोर्ट के अनुसार,  के मुताबिक, यह वायरस भी बाकी सांस से जुड़ी बीमारियों की तरह ही फैलता है. इंफेक्टेड व्यक्ति के खांसने या छींकने से निकलने वाली बूंदों के जरिए यह दूसरे लोगों तक पहुंच सकता है. इसके अलावा, किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आना, हाथ मिलाना या किसी इंफेक्टेड सतह को छूने के बाद चेहरे को छूना भी इंफेक्शन का कारण बन सकता है. इसलिए साफ-सफाई और सावधानी बेहद जरूरी हो जाती है.

कब दिखता है इसका असर?

दिलचस्प बात यह है कि यह वायरस आमतौर पर फ्लू के बाद अपना असर दिखाता है. जहां फ्लू का पीक सर्दियों में होता है, वहीं HMPV के मामले अक्सर मार्च के अंत से लेकर अप्रैल तक बढ़ते हैं. यानी जब लोग सोचते हैं कि फ्लू का खतरा टल गया, उसी समय यह वायरस धीरे-धीरे फैलने लगता है. फिलहाल, अमेरिका के वेस्ट कोस्ट, खासकर कैलिफोर्निया में इसके मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है. हालांकि यह वायरस दुनिया के अन्य हिस्सों में भी पाया जाता है, लेकिन हर साल इसके मामलों का ट्रेंड अलग हो सकता है.

क्या होती हैं दिक्कतें?

अगर जोखिम की बात करें, तो यह वायरस सभी को प्रभावित कर सकता है, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है. छोटे बच्चों, बुजुर्गों, कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों, लंबे समय से स्टेरॉयड ले रहे मरीजों, सांस से जुड़ी बीमारी वाले और कैंसर के मरीजों में इसके गंभीर लक्षण देखने को मिल सकते हैं. वहीं, स्वस्थ लोगों में इसके लक्षण हल्के भी हो सकते हैं. इसके लक्षण भी आम सर्दी-जुकाम जैसे ही होते हैं. जैसे खांसी, बुखार, नाक बंद होना, छाती में जकड़न और गले में खराश. यही वजह है कि कई बार लोग इसे सामान्य फ्लू समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.

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क्या है इलाज?

इलाज की बात करें तो फिलहाल इस वायरस के लिए कोई खास एंटीवायरल दवा मौजूद नहीं है. ऐसे में डॉक्टर आमतौर पर वही सलाह देते हैं जो सर्दी-जुकाम में दी जाती है कि ज्यादा से ज्यादा आराम करें, शरीर को हाइड्रेट रखें और जरूरत पड़ने पर ओवर-द-काउंटर दवाओं का इस्तेमाल करें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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थकान के बाद भी नहीं आती नींद? जानें इसके पीछे की वजह और आसान उपाय

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दिनभर की चिंता, काम का दबाव या निजी समस्याएं दिमाग को शांत नहीं होने देतीं, जब आप तनाव में होते हैं, तो शरीर में स्ट्रेस हार्मोन (कोर्टिसोल) बढ़ जाता है,जो आपको सतर्क रखता है., यही कारण है कि थके होने के बावजूद नींद नहीं आती है, ऐसे में सोने से पहले गहरी सांस लें, हल्का ध्यान (मेडिटेशन) करें और अपने विचार डायरी में लिखें.



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छिपा हुआ खतराः  क्या आप भी पी रहे हैं बीमारी? लिक्विड कैलोरी  धीरे-धीरे कर रहा शरीर को बर्बाद

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GLP-1 दवाएं कितनी खतरनाक? हेल्थ मिनिस्ट्री ने कहा- बिना डॉक्टर की सलाह दवा बेची तो खैर नहीं

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Risks Of Using GLP-1 Drugs Without Prescription: वजन घटाने वाली दवाओं को लेकर देश में बढ़ती चिंता के बीच केंद्र सरकार ने अब सख्त रुख अपना लिया है. GLP-1 आधारित वेट लॉस दवाओं की अनधिकृत बिक्री और प्रचार को रोकने के लिए ड्रग्स कंट्रोलर ऑफ इंडिया ने निगरानी और कड़ी कर दी है. सरकार का कहना है कि इस कदम का मकसद दवा सप्लाई चेन में ट्रांसपेरेंसी और एथिकल प्रैक्टिस को सुनिश्चित करना है. 

स्वास्थ्य मंत्रालय ने क्या कहा?

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, हाल के दिनों में इन दवाओं के कई जेनेरिक वर्जन बाजार में आ गए हैं, जिसके बाद इनकी उपलब्धता तेजी से बढ़ी है. अब ये दवाएं रिटेल मेडिकल स्टोर्स, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, होलसेलर्स और यहां तक कि वेलनेस क्लीनिक्स में भी आसानी से मिलने लगी हैं. मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि बिना डॉक्टर की निगरानी के इनका इस्तेमाल गंभीर साइड इफेक्ट्स और स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है. 

इसी स्थिति को देखते हुए ड्रग्स कंट्रोलर ने राज्य स्तर के नियामकों के साथ मिलकर कार्रवाई शुरू कर दी है. इसका उद्देश्य फार्मास्युटिकल सप्लाई चेन में किसी भी तरह की गड़बड़ी को रोकना और इन दवाओं की अवैध बिक्री पर लगाम लगाना है.

पहले जारी की गई थी एडवाइजरी

इससे पहले 10 मार्च को सरकार ने सभी दवा कंपनियों को एक विस्तृत एडवाइजरी भी जारी की थी, जिसमें साफ तौर पर कहा गया था कि किसी भी तरह के भ्रामक विज्ञापन या अप्रत्यक्ष प्रचार पर रोक लगाई जाए. खासतौर पर ऐसे प्रमोशन पर ध्यान दिया गया है, जो लोगों को बिना डॉक्टर की सलाह के दवा लेने के लिए प्रेरित कर सकते हैं. सरकार ने हाल के हफ्तों में अपनी कार्रवाई को और तेज कर दिया है. अलग-अलग राज्यों में करीब 49 जगहों पर निरीक्षण और ऑडिट किए गए हैं, जिनमें ऑनलाइन फार्मेसी के वेयरहाउस, दवा विक्रेता, होलसेलर और स्लिमिंग क्लीनिक्स शामिल हैं. इन जांचों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कहीं भी नियमों का उल्लंघन न हो रहा हो.

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लोगों के लिए भी सलाह

स्वास्थ्य मंत्रालय ने लोगों को भी सतर्क रहने की सलाह दी है. मंत्रालय के मुताबिक, बिना मेडिकल सुपरविजन के इन दवाओं का इस्तेमाल गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है. इसलिए जरूरी है कि इनका उपयोग सिर्फ योग्य डॉक्टर की सलाह से ही किया जाए. भारत में इन दवाओं को इस्तेमाल करने की अनुमति है, लेकिन इसके लिए सख्त शर्तें लागू हैं. इन्हें केवल एंडोक्राइनोलॉजिस्ट या इंटरनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट द्वारा ही प्रिस्क्राइब किया जा सकता है, और कुछ मामलों में कार्डियोलॉजिस्ट भी इसकी सलाह दे सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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