ECG की नॉर्मल रिपोर्ट के भरोसे बैठे हैं तो हो जाएं सावधान, ध्यान नहीं दिया तो हो सकती है मौत

ECG की नॉर्मल रिपोर्ट के भरोसे बैठे हैं तो हो जाएं सावधान, ध्यान नहीं दिया तो हो सकती है मौत


ECG Normal Still Heart Attack: ईसीजी यानी इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम दिल की जांच के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला टेस्ट है. इसमें हार्ट की धड़कन को कंट्रोल करने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल रिकॉर्ड किए जाते हैं. इससे हार्ट रिदम की गड़बड़ी या पुराने हार्ट अटैक के संकेत सामने आ सकते हैं. टेस्ट जल्दी हो जाता है, दर्द नहीं होता और खर्च भी कम होता है इसलिए जब रिपोर्ट नॉर्मल आती है, तो ज्यादातर लोग राहत महसूस करते हैं.

लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि नॉर्मल ईसीजी का मतलब यह नहीं होता कि हार्ट पूरी तरह स्वस्थ है. कई बार दिल से जुड़ी गंभीर समस्याएं ईसीजी में पकड़ में ही नहीं आतीं. सिर्फ इसी रिपोर्ट पर भरोसा करने से झूठी तसल्ली मिल सकती है, जो आगे चलकर खतरनाक साबित हो सकती है.

क्यों सिर्फ ईसीजी से दिल की पूरी सेहत नहीं पता चलती?

दरअसल, दिल तीन अहम सिस्टम पर काम करता है. पहला, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, जिसे ईसीजी जांचता है यह बताता है कि दिल की धड़कन सही रिदम में है या नहीं. दूसरा, मस्क्युलर सिस्टम, यानी दिल की मांसपेशियों की ताकत, जिसे आमतौर पर 2D इको से देखा जाता है. तीसरा, ब्लड फ्लो सिस्टम, जो यह दर्शाता है कि आर्टरीज में खून सही तरीके से बह रहा है या नहीं, इसके लिए एंजियोग्राफी की जाती है.

National Institutes of Health में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, आराम की स्थिति में की गई ईसीजी जांच के आधार पर केवल करीब 62 फीसदी मरीजों में ही कोरोनरी आर्टरी डिजीज की पहचान हो पाई. यानी बड़ी संख्या में ऐसे मरीज होते हैं, जिनकी ईसीजी नॉर्मल होती है, लेकिन हार्ट की धमनियों में ब्लॉकेज मौजूद रहता है. एक्सपर्ट बताते हैं कि अगर सीने में दर्द, सांस फूलना, अचानक थकान, पसीना या चक्कर जैसे लक्षण दिखें, तो सिर्फ ईसीजी पर निर्भर न रहें. जरूरत पड़ने पर इको, स्ट्रेस टेस्ट या एंजियोग्राफी जैसी जांच भी करानी चाहिए, ताकि दिल की बीमारी समय रहते पकड़ी जा सके.

उम्र के साथ कैसे आपको अपनी सेहत का ध्यान रखना चाहिए

जैसे-जैसे इंसान का उम्र बढ़ता है, वैसे-वैसे, हृदय की मांसपेशियों में स्वाभाविक परिवर्तन आते हैं, जिन्हें ईसीजी के माध्यम से ट्रैक किया जा सकता है. इसको लेकर डॉक्टर नरेश त्रेहान चेयरमैन मेडिसिटी मेदान्ता हॉस्पिटल ने कुछ हेल्थ के मंत्र सुझाए हैं, जिन्हें अगर हम अपनी लाइफ में फॉलो करते हैं, तो हम एक बेहतर जिंदगी जी सकते हैं. वे बताते हैं कि

सबसे पहले आपको ध्यान रखना है कि आपको प्यास लगे न लगे पानी पीते रहना है. कम से कम दो लीटर पानी दिन में पीना जरूरी है.

दूसरी बात यह है कि ज्यादा से ज्यादा काम करते रहिए, हमेशा लेटे या फिर लेजी बॉय की तरह मत रहिए. चलिए, फिरिए काम करते रहिए. अगर आप एक्सरसाइज करते हैं, तो शरीर एक्टिव रहता है.

तीसरी सबसे जरूरी बात, खाना कम खाइए. जितना शरीर के लिए जरूरी हो, उतना ही खाना खाने की कोशिश कीजिए. इसमें भी आपको पौष्टिक भोजन खाना है. रात में कार्बोहाइट्रेट खाना बंद कर दीजिए.

चौथा मंत्र यह है कि वाहन का प्रयोग कम करना चाहिए. अगर आपको एक सीमित दूरी तक जाना है, तो कोशिश करिए कि पैदल जाना चाहिए, इससे शरीर में एनर्जी बर्न होती है. कोशिश करिए कि वाहन, लिफ्ट का प्रयोग कम हो.

पांचवा और सबसे जरूरी बात कि गुस्से पर आपको कंट्रोल करना है. इसके लिए आपको कम बोलना है, बोलने से पहले सोचिए कि आपको क्या बोलना है और क्या नहीं बोलना है.

छठा मंत्र यह है कि आपको धन का मोह छोड़ देना चाहिए, एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि उतना ही धन कमाना जरूरी है, जितना जीने के लिए जरूरी हो.

 

सातवां मंत्र यह है कि आपको अगर लाइफ में जो चाहिए वह नहीं मिल रहा है, तो निराश नहीं होना है. इसको साइड में रखकर अपनी लाइफ इंजॉय करना चाहिए.

आठवां यह है कि आपको अहंकार और इगो को त्यागकर अपनी लाइफ को अच्छे से जीना चाहिए. सबसे साथ मिलकर हंसी-खुशी से लाइफ जीना चाहिए.

नौवां मंत्र यह है कि अगर आपके बाल सफेद हो जाते हैं, तो यह मत सोचिए कि आपको इसको काला करना है. जिंदगी को स्मृतियों में जिए और यात्रा करिए और जिंदगी का आनंद लीजिए.

दसवां मंत्र यह है कि अपने छोटों से प्यार करिए, उनके साथ सहानुभूति रखिए और मिल-जुलकर उनके साथ रहिए, क्योंकि कभी-कभी वे आपको बहुत कुछ सिखा सकते हैं.

इसे भी पढ़ें: Oversleeping Side Effects: कहीं जरूरत से ज्यादा तो नहीं सो रहे आप? हो सकती है यह गंभीर समस्या, एक्सपर्ट ने दी चेतावनी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पानी कम पीने से शरीर में हो सकते हैं ये 5 गंभीर बदलाव, तुरंत ध्यान दें

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जब हम पर्याप्त पानी नहीं पीते हैं, तो हमारे मुंह की नमी कम हो जाती है. इससे मुंह में बैक्टीरिया बढ़ने लगते हैं और सांसों में बदबू आने लगती है. पानी पीने से मुंह साफ और फ्रेश रहता है. इसलिए अगर आप अक्सर मुंह से दुर्गंध महसूस कर रहे हैं, तो यह शरीर में पानी की कमी का संकेत हो सकता है.

पानी हमारे शरीर के लिए जरूरी है क्योंकि यह स्कैल्प और बालों की जड़ों तक पोषण पहुंचाता है. अगर शरीर में पानी की कमी होती है तो स्कैल्प ड्राई हो जाता है और बाल कमजोर होकर जल्दी झड़ने लगते हैं. बिना किसी और कारण के अगर आपके बाल अचानक ज्यादा गिरने लगें तो इसे अनदेखा न करें.

पानी हमारे शरीर के लिए जरूरी है क्योंकि यह स्कैल्प और बालों की जड़ों तक पोषण पहुंचाता है. अगर शरीर में पानी की कमी होती है तो स्कैल्प ड्राई हो जाता है और बाल कमजोर होकर जल्दी झड़ने लगते हैं. बिना किसी और कारण के अगर आपके बाल अचानक ज्यादा गिरने लगें तो इसे अनदेखा न करें.

Published at : 09 Jan 2026 09:04 AM (IST)

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नॉनवेज नहीं खाते? फिर भी बढ़ा सकते हैं Vitamin B12, जानें कौन से 5 देसी शाकाहारी फूड्स फायदेमंद

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एक गिलास गाय के दूध में करीब 1.1 माइक्रोग्राम विटामिन B12 होता है,जो रोजाना की जरूरत का लगभग 45 प्रतिशत पूरा कर देता है. दूध भारतीय घरों में चाय, शेक या डायरेक्ट रोजाना इस्तेमाल होता है, जिससे इसे डाइट में शामिल करना आसान हो जाता है. रिसर्च के अनुसार दूध में मौजूद B12 शरीर आसानी से एब्जॉर्ब कर लेता है. हल्दी वाला दूध पीने से इसके एंटीइंफ्लेमेटरी फायदे भी मिलते हैं.

एक कटोरी सादे दही में 0.6 से 1.0 माइक्रोग्राम तक विटामिन B12 होता है. दही में मौजूद लाइव बैक्टीरिया आंतों की सेहत सुधारते हैं, जिससे B12 का एब्जॉर्प्शन बेहतर होता है. वहीं भारतीय खाने में दही आमतौर पर रोजाना शामिल किया जाता है. कई रिसर्च में सामने आया है कि नियमित रूप से दही खाने वाले वेजिटेरियन लोगों में B12 का लेवल बेहतर रहता है.

एक कटोरी सादे दही में 0.6 से 1.0 माइक्रोग्राम तक विटामिन B12 होता है. दही में मौजूद लाइव बैक्टीरिया आंतों की सेहत सुधारते हैं, जिससे B12 का एब्जॉर्प्शन बेहतर होता है. वहीं भारतीय खाने में दही आमतौर पर रोजाना शामिल किया जाता है. कई रिसर्च में सामने आया है कि नियमित रूप से दही खाने वाले वेजिटेरियन लोगों में B12 का लेवल बेहतर रहता है.

Published at : 09 Jan 2026 07:04 AM (IST)

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कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल से लेकर स्किन-हेयर तक, जानिए अलसी पाउडर के 7 चौंकाने वाले हेल्थ बेनिफिट्स

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अलसी पाउडर में मौजूद ओमेगा 3 फैटी एसिड खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है. इससे ब्लड वेसल्स रिलैक्स होती है और दिल की बीमारियों का खतरा कम होता है. रिसर्च के अनुसार अलसी पाउडर के नियमित सेवन से कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स के लेवल में कमी देखी गई है. इसमें मौजूद लिग्नान्स सूजन कम करने और धमनियों में प्लाक बनने से भी बचाते हैं.

वहीं अलसी पाउडर में फाइबर की मात्रा ज्यादा होती है, जो कार्बोहाइड्रेट के पाचन को धीमा करता है. इससे ब्लड शुगर तेजी से नहीं बढ़ता है. टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों में इसके नियमित सेवन से फास्टिंग शुगर लेवल में सुधार होता है.

वहीं अलसी पाउडर में फाइबर की मात्रा ज्यादा होती है, जो कार्बोहाइड्रेट के पाचन को धीमा करता है. इससे ब्लड शुगर तेजी से नहीं बढ़ता है. टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों में इसके नियमित सेवन से फास्टिंग शुगर लेवल में सुधार होता है.

Published at : 08 Jan 2026 08:03 PM (IST)

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इम्यूनिटी सिर्फ काढ़े में नहीं, आपके शरीर के इन 7 खास अंगों में होती है छिपी, जानें सारे फैक्ट

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Immune Response Explained: हमारी इम्यून सिस्टम शरीर की एक मजबूत सुरक्षा व्यवस्था है, जो इंफेक्शन फैलाने वाले कीटाणुओं से हमें बचाती है. इसमें कई अंग, सेल्स और प्रोटीन मिलकर काम करते हैं. जब भी कोई बैक्टीरिया, वायरस या फंगस शरीर में घुसता है, तो इम्यून सिस्टम उससे लड़ता है और उसे खत्म करता है. खास बात यह है कि इम्यून सिस्टम उन कीटाणुओं को याद भी रखता है, जिन्हें वह पहले हरा चुका होता है. यह काम कुछ खास सफेद व्हाइट ब्लड सेल्स करती हैं, जिन्हें मेमोरी सेल्स कहा जाता है. इसी वजह से अगर वही कीटाणु दोबारा शरीर में आएं, तो इम्यून सिस्टम उन्हें जल्दी पहचानकर नष्ट कर देता है, इससे हमें बीमार होने का मौका नहीं मिलता.

हालांकि हर बीमारी में ऐसा नहीं होता। जैसे सर्दी-जुकाम और फ्लू. ये बार-बार इसलिए होते हैं क्योंकि इनके वायरस के कई प्रकार होते हैं. एक बार सर्दी या फ्लू होने से दूसरे वायरस के खिलाफ इम्यूनिटी नहीं बनती, इसलिए इंसान इन्हें कई बार झेलता है.

इम्यून सिस्टम के मुख्य हिस्से

इम्यून सिस्टम कई जरूरी हिस्सों से मिलकर बना होता है. Betterhealth के अनुसार इसमें व्हाइट ब्लड सेल्स , एंटीबॉडी, कॉम्प्लीमेंट सिस्टम, लिम्फैटिक सिस्टम,स्प्लीन, बोन मैरो और थाइमस ग्रंथि शामिल हैं. ये सभी मिलकर शरीर को इंफेक्शन से बचाने का काम करते हैं. 

व्हाइट ब्लड सेल्स

व्हाइट ब्लड सेल्स हमारी इम्यून सिस्टम की सबसे अहम ताकत होती हैं. ये बोन मैरो में बनती हैं और लिम्फैटिक सिस्टम का हिस्सा होती हैं. ये सेल्स पूरे शरीर में खून और टिश्यू के जरिए घूमती रहती हैं और बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी और फंगस जैसे बाहरी कीटाणुओं की तलाश करती हैं. जैसे ही इन्हें कोई कीटाणु मिलता है, ये तुरंत उस पर हमला कर देती हैं. व्हाइट व्लड सेल्स में लिम्फोसाइट्स शामिल होते हैं, जैसे B-सेल्स, T-सेल्स और नेचुरल किलर सेल्स, इसके अलावा इम्यून सिस्टम की कई दूसरी सेल्स भी होती हैं.

एंटीबॉडी

एंटीबॉडी शरीर को कीटाणुओं और उनके द्वारा बनाए गए जहरीले तत्वों से लड़ने में मदद करती हैं. ये कीटाणुओं की सतह पर मौजूद खास तत्वों को पहचान लेती हैं, जिन्हें एंटीजन कहा जाता है. एंटीबॉडी इन एंटीजन को बाहरी मानकर चिन्हित कर देती हैं, ताकि इम्यून सिस्टम उन्हें नष्ट कर सके. इस पूरी प्रक्रिया में कई तरह की सेल्स, प्रोटीन और रसायन मिलकर काम करते हैं.

कॉम्प्लीमेंट सिस्टम

कॉम्प्लीमेंट सिस्टम प्रोटीन का एक समूह होता है, जो एंटीबॉडी के काम को और ज्यादा प्रभावी बनाता है. यह सिस्टम एंटीबॉडी की मदद से कीटाणुओं को खत्म करने की प्रक्रिया को तेज करता है.

लिम्फैटिक सिस्टम

लिम्फैटिक सिस्टम शरीर में फैली पतली वेसल्स का एक जाल होता है. इसका काम शरीर में तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखना, बैक्टीरिया पर प्रतिक्रिया करना, कैंसर सेल्स से निपटना और ऐसे गंदे पदार्थों को हटाना है जो बीमारी का कारण बन सकते हैं. इसके अलावा यह आंतों से कुछ वसा को शरीर में एब्जॉर्ब करने में भी मदद करता है. लिम्फैटिक सिस्टम में लिम्फ नोड्स होते हैं, जो कीटाणुओं को फंसाते हैं, लिम्फ वेसल्स होती हैं जो लिम्फ नामक तरल को ढोती हैं और इसमें व्हाइट ब्लड सेल्स भी शामिल होती हैं.

स्प्लीन

स्प्लीन एक ऐसा अंग है जो खून को साफ करता है. यह शरीर से कीटाणुओं को हटाता है और पुराने या खराब हो चुके रेड ब्लड सेल्स को नष्ट करता है. इसके साथ ही यह इम्यून सिस्टम के लिए जरूरी एंटीबॉडी और लिम्फोसाइट्स भी बनाता है.

बोन मैरो

बोन मैरो हड्डियों के अंदर मौजूद मुलायम टिश्यू होता है. यहीं पर रेड ब्लड सेल्स बनती हैं, जो शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाती हैं. इसी जगह से व्हाइट ब्लड सेल्स भी बनती हैं, जो इंफेक्शन से लड़ती हैं, और प्लेटलेट्स भी यहीं बनते हैं, जो खून को जमाने में मदद करते हैं.

थाइमस

थाइमस ग्रंथि खून की निगरानी और फिल्टरिंग का काम करती है. यह खास तरह की व्हाइट ब्लड सेल्स बनाती है, जिन्हें T-लिम्फोसाइट्स कहा जाता है. ये सेल्स इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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