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डॉक्टर के मुताबिक, ग्लूकोमा की जांच में इंट्राओक्यूलर प्रेशर यानी आंखों के अंदर का दबाव बेहद अहम होता है. यही वजह है कि हर विजिट पर इस प्रेशर को मापा जाता है, ताकि बीमारी की स्थिति और इलाज का असर समझा जा सके.



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डायबिटीज की दवा क्या कैंसर से लड़ने में भी है मददगार, जानें क्या कहती है रिसर्च?

डायबिटीज की दवा क्या कैंसर से लड़ने में भी है मददगार, जानें क्या कहती है रिसर्च?


Does Metformin Reduce Cancer Risk: डायबिटीज एक लंबे समय तक चलने वाली बीमारी है, इससे दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित हैं. इसमें ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखना बहुत जरूरी होता है, ताकि आगे चलकर गंभीर समस्याएं न हों. टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों को दी जाने वाली दवा मेटफॉर्मिन सालों से ब्लड शुगर कंट्रोल करने में असरदार मानी जाती है. अब हाल के कुछ शोधों में यह भी देखा गया है कि मेटफॉर्मिन का कैंसर पर भी असर हो सकता है, खासकर कोलन, लिवर और ब्रेस्ट कैंसर जैसे मामलों में. हालांकि, इसे कैंसर की दवा समझ लेना सही नहीं होगा. चलिए आपको बताते हैं इसके बारे में.

डायबिटीज की दवा और कैंसर पर रिसर्च

रिसर्च के मुताबिक, मेटफॉर्मिन शरीर में इंसुलिन की संवेदनशीलता बढ़ाती है और लिवर में बनने वाली शुगर को कम करती है. यही वजह है कि यह टाइप-2 डायबिटीज की पहली पसंद की दवा रही है. ब्लड शुगर कंट्रोल के अलावा, साइंटिस्ट अब इसके कुछ दूसरे ऑर्गेनिक असर भी समझने की कोशिश कर रहे हैं. लैब स्टडी और कुछ आब्जर्वेशनल रिसर्च में संकेत मिले हैं कि मेटफॉर्मिन कैंसर के खतरे को कम करने में सहायक हो सकती है.

डायबिटीज और कैंसर का कनेक्शन

टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों में कुछ कैंसर का खतरा ज्यादा देखा गया है, जैसे लिवर, पैंक्रियाज, कोलन और ब्रेस्ट कैंसर. इसकी वजह इंसुलिन रेजिस्टेंस, शरीर में सूजन और मोटापा मानी जाती है. जब शरीर में इंसुलिन ज्यादा रहता है, तो यह सेल्स की असामान्य ग्रोथ को बढ़ावा दे सकता है. मेटफॉर्मिन इंसुलिन लेवल को कम करने में मदद करती है, जिससे यह खतरा कुछ हद तक घट सकता है.

कैंसर सेल्स पर मेटफॉर्मिन कैसे असर डालती है?

कुछ नई रिसर्च बताती हैं कि मेटफॉर्मिन कैंसर की कोशिकाओं पर अलग-अलग तरीकों से असर डाल सकती है. यह उन रास्तों को धीमा कर सकती है, जिनसे कैंसर सेल्स तेजी से बढ़ती हैं. साथ ही, यह सेल्स के मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल कर सकती है और सूजन को कम करने में भी मदद कर सकती है. इन सब वजहों से कैंसर सेल्स की ग्रोथ रुक सकती है या धीमी हो सकती है.

सावधानी क्यों जरूरी है?

2025 में हुई एक मल्टी-सेंटर स्टडी में यह देखा गया कि जो डायबिटीज मरीज लंबे समय से मेटफॉर्मिन ले रहे थे, उनमें कोलन और लिवर कैंसर के मामले कुछ कम थे. लेकिन यह सिर्फ एक संबंध दिखाता है, पक्का सबूत नहीं. अभी इस पर और क्लिनिकल ट्रायल चल रहे हैं, ताकि साफ तौर पर समझा जा सके कि मेटफॉर्मिन कैंसर में कितनी कारगर है.

खुद से दवा लेना क्यों गलत है?

एक्सपर्ट साफ कहते हैं कि कैंसर से बचाव के लिए खुद से मेटफॉर्मिन लेना ठीक नहीं है. इस दवा के कुछ साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं, जैसे मतली, दस्त और कुछ मामलों में गंभीर समस्या. डायबिटीज और कैंसर दोनों से बचाव के लिए सबसे जरूरी है संतुलित खानपान, नियमित व्यायाम, अच्छी नींद और समय-समय पर हेल्थ चेक-अप कराएं.  दवाएं हमेशा डॉक्टर की सलाह से ही लेनी चाहिए. 

इसे भी पढ़ें- Oversleeping Side Effects: कहीं जरूरत से ज्यादा तो नहीं सो रहे आप? हो सकती है यह गंभीर समस्या, एक्सपर्ट ने दी चेतावनी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! सिर्फ जेनेटिक्स नहीं, अब आपकी लाइफस्टाइल भी दे रही है ब्रेस्ट कैंसर को न्योता

सावधान! सिर्फ जेनेटिक्स नहीं, अब आपकी लाइफस्टाइल भी दे रही है ब्रेस्ट कैंसर को न्योता


Rising Breast Cancer Cases in Women: भारत में महिलाओं के बीच ब्रेस्ट कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और यह रफ्तार चिंता बढ़ाने वाली है. हालिया आंकड़ों के मुताबिक, देश में हर साल ब्रेस्ट कैंसर के मामलों में करीब 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है. Indian Council of Medical Research (ICMR) से जुड़े स्टडी में सामने आया है कि इसकी बड़ी वजह खराब नींद, लगातार बना रहने वाला तनाव और पेट के आसपास बढ़ता मोटापा है. इसका असर यह हो रहा है कि अब कम उम्र की महिलाएं भी इस बीमारी की चपेट में आने लगी हैं.

Dr Shubham Garg ने  TOI को बताया कि ब्रेस्ट कैंसर का खतरा अब सिर्फ उम्र या पारिवारिक हिस्ट्री तक सीमित नहीं रही. बदलती लाइफस्टाइल और मेटाबॉलिक समस्याएं इस बीमारी के जोखिम को तेजी से बढ़ा रही हैं, खासकर शहरी महिलाओं में,

नींद और ब्रेस्ट कैंसर का कनेक्शन

डॉक्टर बताते हैं कि नींद की गड़बड़ी और शरीर की सर्कैडियन रिदम में बदलाव ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं. खराब नींद से मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर प्रभावित होता है, जिससे एस्ट्रोजन का संतुलन बिगड़ता है. इसके अलावा इम्यून सिस्टम और डीएनए रिपेयर की प्रक्रिया भी कमजोर पड़ती है. अकेले नींद की कमी कैंसर की वजह नहीं बनती, लेकिन जब यह मोटापा, तनाव और सुस्त जीवनशैली के साथ जुड़ती है, तो खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

क्या खराब नींद उम्र और जेनेटिक्स जितना बड़ा खतरा है?

डॉ. गर्ग के अनुसार, उम्र और जेनेटिक फैक्टर अभी भी सबसे मजबूत जोखिम कारक हैं, लेकिन खराब नींद अब एक अहम मॉडिफाएबल रिस्क फैक्टर के तौर पर उभर रही है. कई ऐसी महिलाएं सामने आ रही हैं, जिनके परिवार में कैंसर का कोई हिस्ट्री  नहीं है, लेकिन लंबे समय तक नींद की कमी, नाइट शिफ्ट और ज्यादा तनाव के चलते उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हो गया.

पेट का मोटापा क्यों ज्यादा खतरनाक?

सिर्फ वजन बढ़ना ही नहीं, बल्कि पेट के आसपास जमा चर्बी ज्यादा खतरनाक मानी जाती है. यह फैट शरीर में सूजन पैदा करने वाले तत्व, इंसुलिन रेजिस्टेंस और एस्ट्रोजन के स्तर को बढ़ाता है. मेनोपॉज के बाद तो शरीर में एस्ट्रोजन का मुख्य सोर्स यही फैट बन जाता है, जो हार्मोन-सेंसिटिव ब्रेस्ट कैंसर को बढ़ावा दे सकता है.

क्या लाइफस्टाइल बदलने से खतरा कम हो सकता है?

एक्सपर्ट का कहना है कि लाइफस्टाइल में सुधार से ब्रेस्ट कैंसर का खतरा पूरी तरह खत्म तो नहीं होता, लेकिन इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है. अच्छी नींद, तनाव नियंत्रण, नियमित एक्सरसाइज और पेट के मोटापे को कम करना हार्मोनल बैलेंस सुधारता है और शरीर की इम्यून ताकत बढ़ाता है. इससे इलाज के बाद दोबारा कैंसर होने का खतरा भी घटता है.

कम उम्र में क्यों बढ़ रहे हैं मामले?

भारत में 35 से 50 साल की उम्र की महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के केस बढ़ रहे हैं. इसकी वजहें पश्चिमी देशों जैसी ही हैं बैठे रहने वाली लाइफस्टाइल, देर से मां बनना, कम ब्रेस्टफीडिंग, नींद की कमी और लगातार तनाव. इसके साथ ही भारत में देर से बीमारी का पता चलना भी एक बड़ी समस्या हैय

स्क्रीनिंग कब शुरू होनी चाहिए?

डॉक्टरों की राय है कि जिन महिलाओं में मोटापा, नींद की समस्या और ज्यादा तनाव जैसे जोखिम कारक हैं, उनके लिए जल्दी और व्यक्तिगत स्क्रीनिंग जरूरी हो सकती है. ऐसे मामलों में 30 की उम्र के बाद ही क्लिनिकल ब्रेस्ट एग्जाम, अल्ट्रासाउंड या जरूरत पड़ने पर मैमोग्राफी पर विचार किया जा सकता है.

ये भी पढ़ें: Liver Cancer: लिवर कैंसर में कब बदल जाता है फैटी लिवर? दिक्कत बढ़ने से पहले समझें लक्षण

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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चेहरे पर ये 7 लक्षण दिखते ही हो जाएंगे अलर्ट, फैटी लिवर का बताते हैं पता

चेहरे पर ये 7 लक्षण दिखते ही हो जाएंगे अलर्ट, फैटी लिवर का बताते हैं पता


Face And Liver Connection: हमारे शरीर के अंग हमारी सेहत के बारे में बहुत कुछ हमें पहले से बता देते हैं कि शरीर में क्या ठीक चल रहा है और क्या नहीं चल रहा है. आंखों के नीचे काले घेरे हों या गालों पर लालिमा ये छोटे-छोटे बदलाव लिवर से जुड़ी अंदरूनी परेशानियों की ओर इशारा कर सकते हैं. गु डॉ. राजेश पधान ने TN को बताया कि चेहरे पर दिखने वाले ये बदलाव लिवर की समस्या का संकेत कैसे हो सकते हैं और इन्हें नजरअंदाज करना क्यों खतरनाक है. चलिए आपको बताते हैं कि उन्होंने इसको लेकर क्या कहा है. 

आंखों के नीचे काले घेरे- लिवर की सफाई कमजोर होने का संकेत

अगर पूरी नींद लेने के बाद भी डार्क सर्कल्स कम नहीं हो रहे, तो वजह लिवर हो सकता है. डॉ बताते हैं कि लिवर शरीर से टॉक्सिन्स निकालने का काम करता है. जब लिवर ठीक से काम नहीं करता, तो गंदगी जमा होने लगती है, थकान बढ़ती है और ब्लड सर्कुलेशन पर असर पड़ता है. जिसका असर आंखों के नीचे काले घेरों के रूप में दिख सकता है.

गालों पर लालिमा-  हार्मोनल बदलाव का इशारा

गालों पर अचानक या असामान्य लालपन सिर्फ ब्लश नहीं होता. डॉ. पधान के मुताबिक, लिवर ठीक से काम न करे तो एस्ट्रोजन हार्मोन बढ़ सकता है, जिससे गाल लाल दिखने लगते हैं. यह समस्या अक्सर अल्कोहॉलिक फैटी लिवर में देखी जाती है.

 रूखे और खुजली वाले पैच- त्वचा नहीं, लिवर की परेशानी

चेहरे पर सूखे या खुजली वाले धब्बे दिखें तो इसे सिर्फ स्किन प्रॉब्लम न समझें. डॉ बताते हैं कि यह त्वचा के नीचे बाइल सॉल्ट जमा होने या जरूरी पोषक तत्वों की कमी के कारण हो सकता है कि जो लिवर की गड़बड़ी का संकेत है.

 पीलिया- पीला पड़ता रंग, साफ चेतावनी

त्वचा या आंखों में पीलापन आना लिवर की सबसे पहचानी जाने वाली समस्या है. यह बिलीरुबिन नाम के वेस्ट प्रोडक्ट के जमा होने से होता है, जिसे लिवर प्रोसेस करता है. पीलिया फैटी लिवर या दूसरी गंभीर लिवर बीमारियों की ओर इशारा करता है.

 चेहरे पर सूजन- शरीर में पानी जमा होना

अगर चेहरे पर सूजन या फुलाव दिखे, तो यह लिवर की गंभीर परेशानी का संकेत हो सकता है. जब लिवर शरीर में तरल संतुलन नहीं बना पाता, तो पानी जमा होने लगता है कि जिसका असर चेहरे पर सूजन के रूप में दिखता है.

 मुंहासे- सिर्फ स्किन के कारण नहीं

जबड़े और गालों के आसपास बार-बार मुंहासे निकलना लिवर से जुड़ा हो सकता है. डॉ. पधान बताते हैं कि लिवर के कमजोर होने से हार्मोन असंतुलन और टॉक्सिन्स का जमाव होता है, जिससे एक्ने बढ़ सकता है.

फीकी या बेजान त्वचा- फैटी लिवर का संकेत

अगर चेहरा बेजान या फीका लगने लगे, तो यह भी फैटी लिवर की ओर इशारा कर सकता है. लिवर जब ठीक से डिटॉक्स और मेटाबॉलिज्म नहीं कर पाता, तो त्वचा की नेचुरल चमक कम हो जाती है.

कब डॉक्टर से मिलें?

डॉक्टर  के अनुसार, चेहरे पर दिखने वाले ये संकेत अक्सर पेट में असहजता, ज्यादा थकान या कमजोरी के साथ नजर आते हैं. ऐसे में तुरंत डॉक्टर से सलाह लें. सही समय पर जांच, संतुलित डाइट और नियमित एक्सरसाइज से आगे की जटिलताओं से बचा जा सकता है. आपरको हमेशा एक बात याद रखना है कि चेहरे हमेशा सिर्फ आपके इमोशन को ही नहीं दिखाते, वह आपकी अंदरूनी सेहत का आईना भी है. इन संकेतों पर ध्यान दें और लिवर की सेहत को प्राथमिकता दें, ताकि लंबे समय की परेशानियों से बचा जा सके.

यह भी पढ़ें: Fatty Liver Disease: चेहरा दे रहा है फैटी लिवर का अलर्ट? नजरअंदाज करने से पहले जान लें ये 5 संकेत

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या शुगर फ्री बिस्किट से भी हो जाती है डायबिटीज, डॉक्टर से जानें क्या है सच?

क्या शुगर फ्री बिस्किट से भी हो जाती है डायबिटीज, डॉक्टर से जानें क्या है सच?


आज के समय में डायबिटीज एक आम लेकिन गंभीर बीमारी बनती जा रही है. जैसे ही किसी व्यक्ति को डायबिटीज होने का पता चलता है, उसे तुरंत कई तरह के परहेज बता दिए जाते हैं. सबसे पहले चीनी बंद, फिर मीठी चीजें, बिस्किट, नमकीन, आलू, मैदे से बनी चीजें और यहां तक कि गेहूं के आटे पर भी सवाल उठने लगते हैं. ऐसे में लोगों को लगता है कि अब वे क्या खाएं और क्या नहीं.  इसी परेशानी का फायदा उठाकर बाजार में शुगर फ्री प्रोडक्ट्स की भरमार हो गई है. बिस्किट, चॉकलेट, आइसक्रीम, मिठाइयां लगभग हर चीज शुगर फ्री नाम से मिलने लगी है.

डायबिटीज के मरीज यह सोचकर इन्हें बिना झिझक खा लेते हैं कि जब इसमें चीनी नहीं है तो इससे शुगर लेवल कैसे बढ़ेगा. लेकिन डॉक्टर बताते हैं कि शुगर फ्री शब्द कई बार लोगों को भ्रम में डाल देता है. खासकर शुगर फ्री बिस्किट को लोग बिल्कुल हेल्दी मानकर रोज खाने लगते हैं, जबकि सच्चाई कुछ और है. तो आइए जानते हैं कि क्या शुगर फ्री बिस्किट से भी डायबिटीज हो जाती है. 

क्या शुगर फ्री बिस्किट से भी डायबिटीज हो जाती है?

ज्यादातर शुगर फ्री बिस्किट मैदे से बने होते हैं. भले ही इनमें सफेद चीनी न हो, लेकिन मैदा खुद ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ाने का काम करता है. इसके अलावा इनमें रिफाइंड ऑयल या ट्रांस फैट भी मिलाया जाता है, जो सेहत के लिए बिल्कुल अच्छा नहीं होता है. मैदा खाने से शरीर में इंसुलिन का स्तर अचानक बढ़ता है, जिससे ब्लड शुगर स्पाइक कर सकता है. यही वजह है कि शुगर फ्री बिस्किट को रोजाना और ज्यादा मात्रा में खाना डायबिटीज के मरीजों के लिए नुकसानदायक हो सकता है.यहां तक कि जो लोग डायबिटिक नहीं हैं, उनमें भी भविष्य में डायबिटीज होने का खतरा बढ़ सकता है. 

कितनी मात्रा में खा सकते हैं? शुगर फ्री बिस्किट

अगर आप शुगर फ्री बिस्किट खाते हैं तो यह समझना जरूरी है कि इसे फ्री समझकर ज्यादा न खाएं. डॉक्टर की सलाह है कि दिन में 1–2 बिस्किट से ज्यादा न खाएं और वह भी कभी-कभी, रोजाना चाय के साथ बिस्किट खाने की आदत से बचना चाहिए. 

बिस्किट खरीदते समय क्या देखें?

शुगर फ्री बिस्किट खरीदते समय पैकेट का लेबल जरूर पढ़ें. देखें कि बिस्किट मैदे से बना है या होल व्हीट (साबुत गेहूं) से, इसमें फाइबर की मात्रा अच्छी होनी चाहिए, माल्टोडेक्सट्रिन जैसे तत्व न हों, क्योंकि यह भी ब्लड शुगर बढ़ा सकता है. किस तरह का आर्टिफिशियल स्वीटनर इस्तेमाल किया गया है, यह भी चेक करें. अगर लेबल साफ नहीं है या ज्यादा केमिकल्स लिखे हैं, तो ऐसे बिस्किट से दूरी बनाना ही बेहतर है. 

अगर आपको चाय के साथ कुछ खाने की आदत है तो बिस्किट की जगह हेल्दी ऑप्शन चुनें. जैसे रोस्टेड मखाना, मूंगफली, काजू या बादाम (सीमित मात्रा में), अलसी, चिया सीड्स, कद्दू के बीज, ओट्स से बनी चीजें. इसके अलावा ज्वार, बाजरा और रागी जैसे मोटे अनाज से बनी चीजें डायबिटीज के मरीजों के लिए ज्यादा फायदेमंद होती हैं. अगर आपको बिस्किट खाना ही है, तो घर पर बने आटे के बिस्किट सबसे अच्छा ऑप्शन हैं. इनमें आप चीनी की मात्रा कंट्रोल कर सकते हैं और मैदे व रिफाइंड ऑयल से बच सकते हैं. 

यह भी पढ़ें: Health Risks of Aluminium Foil: क्या खाना रखने के लिए आप भी इस्तेमाल करती हैं एल्यूमीनियम फॉयल, जानें अपने परिवार को किस खतरे में डाल रहीं आप?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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