क्या आपका शरीर Detox मांग रहा है? पहचानें संकेत और जानें उपाय

क्या आपका शरीर Detox मांग रहा है? पहचानें संकेत और जानें उपाय


Detox Your Body Tips: क्या आपका शरीर टॉक्सिन्स से भर गया है? हमारा शरीर खुद को साफ करता है, लेकिन खराब खानपान और प्रदूषण के कारण कभी-कभी इसे बाहर से भी मदद की जरूरत होती है. आइए जानते हैं वे संकेत जो बताते हैं कि आपके शरीर को डिटॉक्स की जरूरत है.

इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

सुबह उठते ही थकावट महसूस करना

क्या आप 8 घंटे की नींद के बाद भी थका हुआ महसूस करते हैं? बिना काम किए कमजोरी लगना शरीर में जमी गंदगी का बड़ा संकेत है. जब लिवर और पेट पर टॉक्सिन्स का दबाव बढ़ता है, तो शरीर की एनर्जी खत्म होने लगती है.

पेट का फूलना और लगातार गैस बनना

अगर आपका पेट हमेशा भारी रहता है, गैस बनती है या कब्ज की समस्या है, तो समझ लें कि आपका पाचन तंत्र खराब हो रहा है. लिवर में गंदगी जमा होने से खाना ठीक से नहीं पचता.

चेहरे पर अचानक दाने होना

महंगे फेस वॉश लगाने के बाद भी पिंपल्स, मुंहासे या डल स्किन की समस्या अगर दूर नहीं हो रही है तो यह संकेत है कि आपका  लिवर खून को साफ नहीं कर पा रहा है, और शरीर त्वचा के रास्ते गंदगी बाहर निकाल रहा है. चमकदार त्वचा के लिए पेट की सफाई जरूरी है.

डाइटिंग के बाद भी अगर वजन नहीं घट रहा

अगर आप कम खा रहे हैं और वर्कआउट भी कर रहे हैं, फिर भी वजन कम नहीं हो रहा, तो इसका कारण टॉक्सिन्स हो सकते हैं. ये शरीर के मेटाबॉलिज्म को धीमा कर देते हैं, जिससे फैट बर्न होना बंद हो जाता है.

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ये आसान घरेलू उपाय जो कर देंगे शरीर को साफ

शरीर को डिटॉक्स करना बहुत आसान है:

  • रोज सुबह खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू का रस और शहद मिलाकर पिएं. यह लिवर को तुरंत साफ करता है.
  • खीरा, पुदीना, धनिया और पालक का जूस हफ्ते में तीन बार पिएं. यह खून को साफ करता है.
  • कुछ दिनों के लिए पैकेट बंद खाना, ज्यादा मीठा और तली-भुनी चीजों से पूरी तरह दूरी बना लें.
  • दिन में कम से कम 3 से 4 लीटर पानी पिएं ताकि गंदगी यूरिन के रास्ते बाहर निकल जाए.

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20 से 40 की उम्र में थकान-झनझनाहट दे अलर्ट तो समझें गंभीर बीमारी का संकेत, एक्सपर्ट की चेतावनी

20 से 40 की उम्र में थकान-झनझनाहट दे अलर्ट तो समझें गंभीर बीमारी का संकेत, एक्सपर्ट की चेतावनी


Early Symptoms Of Multiple Sclerosis In Young Adults: कई बीमारियां ऐसी होती हैं जो अचानक तेज लक्षणों के साथ सामने आती हैं, इसलिए लोग उन्हें जल्दी पहचान लेते हैं. लेकिन कुछ बीमारियां चुपचाप शरीर में अपनी जगह बना लेती हैं और उनके शुरुआती संकेत इतने सामान्य लगते हैं कि लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. मल्टीपल स्क्लेरोसिस यानी एमएस ऐसी ही एक बीमारी है. भारत में आज भी इसके कई मामले समय पर पकड़ में नहीं आते, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षणों को अक्सर तनाव, कमजोरी, थकान या पोषण की कमी समझ लिया जाता है. यही वजह है कि कई मरीज सही बीमारी का पता चलने से पहले वर्षों तक भटकते रहते हैं.

क्या होते हैं मल्टीपल स्क्लेरोसिस के लक्षण?

हाथ या पैरों में झनझनाहट होना, कुछ दिनों तक धुंधला दिखाई देना, अचानक चक्कर आना या लगातार थकान महसूस होना ऐसे संकेत हैं जिन्हें लोग आम समस्या मान लेते हैं. कई बार ये लक्षण कुछ समय बाद अपने आप ठीक भी हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति को लगता है कि अब सब सामान्य है. लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि यही सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है. शरीर में दिखाई देने वाला यह छोटा बदलाव दिमाग और रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करने वाली गंभीर बीमारी का शुरुआती संकेत हो सकता है. 

क्यों इसके मामले देर से पता चलते हैं?

डॉ अंशु रस्तोगी बताती हैं कि भारत में मल्टीपल स्क्लेरोसिस के कई मामले इसलिए सामने नहीं आ पाते क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण बहुत हल्के और अस्थायी होते हैं. मरीजों को हाथ-पैरों में झनझनाहट, मांसपेशियों में जकड़न, सुन्नपन, कुछ समय के लिए धुंधला दिखना, चक्कर आना या बिना वजह थकान महसूस हो सकती है. कई बार ये समस्याएं कुछ दिनों या हफ्तों में कम हो जाती हैं, इसलिए लोग मान लेते हैं कि बीमारी खत्म हो गई. जबकि हकीकत में यह नसों को नुकसान पहुंचाने वाली प्रक्रिया का संकेत हो सकता है.

मल्टीपल स्क्लेरोसिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की इम्यून क्षमता गलती से नसों की सुरक्षा करने वाली परत पर हमला करने लगती है. इससे ब्रेन और शरीर के बाकी हिस्सों के बीच संदेश पहुंचाने की प्रक्रिया प्रभावित होती है. समस्या यह है कि हर मरीज में इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं. किसी को नजर से जुड़ी परेशानी हो सकती है, किसी को संतुलन बनाने में दिक्कत हो सकती है, जबकि कुछ लोगों में शरीर के किसी हिस्से में सुन्नपन या कमजोरी महसूस हो सकती है. यही कारण है कि बीमारी की पहचान करना कई बार मुश्किल हो जाता है.

किस उम्र के लोगों को होती है सबसे ज्यादा दिक्कत?

एक्सपर्ट के अनुसार 20 से 40 साल की उम्र के लोगों में यह बीमारी ज्यादा देखी जाती है और महिलाओं में इसके मामले पुरुषों की तुलना में अधिक पाए जाते हैं. लेकिन इस आयु वर्ग के लोगों में थकान, चक्कर, कमजोरी या मनोदशा में बदलाव जैसी समस्याओं को अक्सर काम के दबाव, चिंता या शरीर में पोषक तत्वों की कमी से जोड़ दिया जाता है. डॉ.  का कहना है कि कई मरीज कई बार बीमारी के दौर से गुजरने के बाद ही एक्सपर्ट चिकित्सक तक पहुंच पाते हैं. तब तक बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है. 

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भारत में क्या है इस बीमारी की स्थिति?

भारत में लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि मल्टीपल स्क्लेरोसिस बहुत कम लोगों को होने वाली बीमारी है। इसी सोच के कारण इसके प्रति जागरूकता भी सीमित रही. हालांकि अब जांच सुविधाओं और दिमाग से जुड़ी बीमारियों के उपचार में बढ़ोतरी के बाद पहले की तुलना में ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं. फिर भी छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में विशेषज्ञ चिकित्सकों और अच्छी जांच सुविधाओं की कमी के कारण मरीजों को सही इलाज तक पहुंचने में काफी समय लग जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मास्टरशेफ विनर पंकज भदौरिया को ब्रेस्ट कैंसर, 50 के पार महिलाओं में क्यों बढ़ जाता है खतरा?

मास्टरशेफ विनर पंकज भदौरिया को ब्रेस्ट कैंसर, 50 के पार महिलाओं में क्यों बढ़ जाता है खतरा?


MasterChef Winner Pankaj Bhadouria Breast Cancer: मास्टरशेफ इंडिया सीजन 1 की विजेता और मशहूर सेलिब्रिटी शेफ पंकज भदौरिया ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक इमोशनल पोस्ट शेयर कर बताया कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर का पता चला है. इस पोस्ट के सामने आने के बाद उनके फैंस में चिंता बढ़ गई है. पंकज भदौरिया ने लोगों से अपनी सेहत के लिए स्पोर्ट की अपील भी की है. 

ब्रेस्ट कैंसर दुनिया भर में महिलाओं में पाए जाने वाले सबसे आम कैंसरों में से एक है. हर साल लाखों महिलाएं इस बीमारी की चपेट में आती हैं, हालांकि यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन 50 साल की उम्र के बाद इसका खतरा काफी बढ़ जाता है. डॉक्टरों के अनुसार, उम्र बढ़ने के साथ शरीर में होने वाले हार्मोनल और जैविक बदलाव इसकी बड़ी वजह बनते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर ब्रेस्ट कैंसर क्या है, 50 साल के बाद महिलाओं में इसका खतरा ज्यादा क्यों हो जाता है और इसके शुरुआती लक्षण क्या हैं. 

क्या होता है ब्रेस्ट कैंसर?

ब्रेस्ट कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसमें ब्रेस्ट की कुछ कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं. समय के साथ ये कोशिकाएं एक गांठ या ट्यूमर का रूप ले सकती हैं. अगर समय रहते इसका इलाज न कराया जाए तो कैंसर कोशिकाएं शरीर के दूसरे हिस्सों तक भी फैल सकती हैं. यही वजह है कि डॉक्टर शुरुआती पहचान और समय पर इलाज को बेहद जरूरी मानते हैं. 

50  के बाद महिलाओं में इसका खतरा ज्यादा क्यों हो जाता है?

1. विशेषज्ञों के मुताबिक उम्र बढ़ने के साथ ब्रेस्ट कैंसर का जोखिम भी बढ़ता जाता है. खासतौर पर 50 वर्ष की उम्र के बाद महिलाओं के शरीर में कई ऐसे बदलाव होते हैं जो कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं. 

2.महिलाओं में एक उम्र के बाद पीरियड्स बंद हो जाते हैं, जिसे मेनोपॉज कहा जाता है. इस दौरान शरीर में हार्मोन का संतुलन बदलने लगता है. हार्मोन में होने वाले अंतर ब्रेस्ट के टिशू को प्रभावित कर सकते हैं और असामान्य कोशिकाओं के विकसित होने का खतरा बढ़ा सकते हैं. यही कारण है कि मेनोपॉज के बाद ब्रेस्ट कैंसर के मामले ज्यादा देखने को मिलते हैं.

3. हमारे शरीर की कोशिकाएं लगातार काम करती रहती हैं.बढ़ती उम्र के साथ डीएनए में छोटी-छोटी परेशानियां जमा होने लगती हैं.सामान्य परिस्थितियों में शरीर इनकी मरम्मत कर लेता है, लेकिन उम्र बढ़ने पर यह क्षमता कमजोर होने लगती है. इससे खराब कोशिकाओं के तेजी से बढ़ने और कैंसर में बदलने का खतरा बढ़ जाता है. 

4. 50 वर्ष के बाद महिलाओं में वजन बढ़ने की समस्या आम हो जाती है.विशेषज्ञों के अनुसार शरीर में अतिरिक्त चर्बी एस्ट्रोजन हार्मोन के स्तर को बढ़ा सकती है. जब शरीर में फैट ज्यादा होता है तो सूजन की स्थिति भी बनी रहती है, जो कैंसर कोशिकाओं के बढ़ने के लिए तैयार कर सकती है. 

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किन महिलाओं को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है?

कुछ महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा सामान्य से ज्यादा हो सकता है. जैसे परिवार में किसी को पहले ब्रेस्ट कैंसर रहा हो,  ज्यादा वजन या मोटापे की समस्या, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, देर से मेनोपॉज होना, अस्वस्थ खानपान और लाइफस्टाइल, धूम्रपान और शराब का सेवन इन स्थितियों में नियमित जांच कराना और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना जरूरी हो जाता है. 

ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती लक्षण क्या हैं?

ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती चरण में अक्सर दर्द नहीं होता, इसलिए कई महिलाएं इसके संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं. हालांकि कुछ लक्षण ऐसे हैं जिन्हें बिल्कुल भी हल्के में नहीं लेना चाहिए.  जैसे स्तन या बगल में गांठ, स्तन के आकार में बदलाव, स्किन में बदलाव, निप्पल में बदलाव, निप्पल से असामान्य डिसचार्ज. डॉक्टरों का कहना है कि ब्रेस्ट कैंसर का जितना जल्दी पता चल जाता है, उसका इलाज उतना ही आसान और सफल होता है. शुरुआती अवस्था में कैंसर आमतौर पर ब्रेस्ट तक ही सीमित रहता है. ऐसे में सर्जरी, दवाओं और अन्य ट्रीटमेंट से बचाव किया जा सकता है. 

यह भी पढ़ें – Best Sugar Options: वजन घटाने के लिए छोड़ रहे हैं शुगर, मीठे की जरूरत के लिए ये हैं हेल्दी ऑप्शन

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कुरकुरे के टुकड़े ने ली युवक की जान! Food Choking कितना खतरनाक, कैसे बचाई जा सकती है जान?

कुरकुरे के टुकड़े ने ली युवक की जान! Food Choking कितना खतरनाक, कैसे बचाई जा सकती है जान?


Food Choking: हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने सभी को झकझोर कर रख दिया है. यहां 28 वर्षीय युवक की मौत सिर्फ इसलिए हो गई, क्योंकि कुरकुरे का एक टुकड़ा उसकी सांस की नली में फंस गया था. इस हादसे के बाद न सिर्फ परिवार बल्कि पूरा गांव सदमे में है. एक्सपर्ट का कहना है कि खाने के दौरान की गई छोटी सी लापरवाही भी कई बार जानलेवा साबित हो सकती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि फूड चोकिंग कितना खतरनाक है और इससे कैसे जान बचाई जा सकती है. 

कुरकुरा खाते ही बिगड़ी थी तबीयत 

जानकारी के अनुसार, अर्की उपमंडल की घनागुघाट पंचायत के ताल गांव निवासी हेमंत शर्मा कसौली के एक निजी होटल में काम करते थे. परिजनों के अनुसार, वह घर पर कुरकुरे खा रहे थे, तभी उनका एक टुकड़ा गले में फंस गया. कुछ ही देर में उन्हें सांस लेने में परेशानी होने लगी और हालत गंभीर होती चली गई. परिवार के लोग तुरंत उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए पीजीआई चंडीगढ़ रेफर कर दिया. पीजीआई में डॉक्टरों ने इलाज किया लेकिन तमाम कोशिशें के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी. युवक की मौत की खबर मिलते ही गांव और आसपास के इलाकों में शोक की लहर दौड़ गई. 

क्या होता है फूड चोकिंग? 

एक्सपर्ट्स के अनुसार, जब कोई खाने का पदार्थ सांस की नली में फंस जाता है और फेफड़ों तक हवा पहुंचने का रास्ता बाधित कर देता है तो इस स्थिति को फूड चोकिंग कहा जाता है. यह एक मेडिकल इमरजेंसी हो सकती है, क्योंकि शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलने पर कुछ ही मिनट में गंभीर नुकसान हो सकता है. 

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गले में क्यों फंस जाता है खाना? 

डॉक्टर बताते हैं कि हमारे गले में एपिग्लॉटिस नाम का एक हिस्सा होता है, जो खाने और सांस की नली के बीच संतुलन बनाए रखना है. जब कोई व्यक्ति खाना खाते समय बात करता है, हंसता है या बहुत तेजी से निगलता है तो खाने का टुकड़ा गलत रास्ते में जाकर श्वास नली में फंस सकता है. ऐसी स्थिति में सांस लेने में कठिनाई शुरू हो जाती है. 

किसी के गले में खाना फंस जाए तो क्या करें?

एक्सपर्ट के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति के गले में खाना फंस जाए और वह खांस पा रहा है तो उसे लगातार खांसने के लिए कहना चाहिए. क्योंकि कई बार इससे फंसी हुई वस्तु बाहर निकल आ जाती है. अगर स्थिति गंभीर हो तो व्यक्ति को आगे की ओर झुकाकर पीठ के ऊपरी हिस्से पर जोरदार थपकी दी जा सकती है. इसके अलावा एक्सपर्ट व्यक्ति हेमलिच मैनूवर का इस्तेमाल भी कर सकता है. इस प्रक्रिया में पीड़ित के पीछे खड़े होकर पेट के ऊपरी हिस्से पर दबाव डाला जाता है, जिससे फेफड़ों में मौजूद हवा के दबाव से फंसी हुई वस्तु बाहर निकल सकती है.

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वजन घटाने के लिए छोड़ रहे हैं शुगर, मीठे की जरूरत के लिए ये हैं हेल्दी ऑप्शन

वजन घटाने के लिए छोड़ रहे हैं शुगर, मीठे की जरूरत के लिए ये हैं हेल्दी ऑप्शन


Best Sugar Options: आजकल की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में गलत खान-पान के कारण बढ़ता वजन एक गंभीर समस्या बन चुका है. ऐसे में वजन घटाने के क्रम में सबसे पहला और जरूरी कदम सफेद चीनी को अपनी डाइट से पूरी तरह बाहर करना होता है. इस शुगर को एम्प्टी कैलोरी कहा जाता है, क्योंकि इसमें कोई पोषक तत्व नहीं होते और यह शरीर में सीधे फैट के रूप में जमा होती है. 

जब हम अचानक चीनी छोड़ देते हैं तो शरीर में शुगर क्रेविंग्स यानी मीठा खाने की तीव्र इच्छा होने लगती है. इस स्थिति में खुद को रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है और कई लोग अपनी वेट लॉस जर्नी बीच में ही छोड़ देते हैं. यहां ये बात ध्यान देने वाली है कि वजन घटाने का मतलब मीठे से हमेशा के लिए नाता तोड़ना नहीं है, बल्कि समझदारी से सही और सेहतमंद ऑप्शन चुनना है. आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ नेचुरल और हेल्दी ऑप्शन्स के बारे में, जो बिना वजन बढ़ाए आपके इस स्वीट लव को पूरा करते हैं.

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1. स्टीविया- स्टीविया एक नेचरल प्लांट है, जिसकी पत्तियों से मीठा पाउडर या ड्रॉप्स तैयार की जाती हैं. यह चीनी से लगभग 200 गुना अधिक मीठा होता है, लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट बिल्कुल नहीं होते हैं. वहीं, यह ब्लड शुगर और इंसुलिन के लेवल को भी प्रभावित नहीं करता है. वजन घटाने वाले लोगों और डायबिटीज के मरीजों के लिए यह चीनी का सबसे सुरक्षित और बेहतरीन ऑप्शन है. इसे आप अपनी सुबह की चाय, कॉफी या नींबू पानी में आसानी से मिलाकर यूज कर सकते हैं. 

2. ताजे और मौसमी फल- जब भी दोपहर या शाम को मीठा खाने की तेज इच्छा हो, तो पेस्ट्री, चॉकलेट या बिस्कुट खाने के बजाय एक कटोरी ताजे फल खाएं. सेब, स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी, संतरा, अमरूद और पपीता जैसे फलों में नेचुरल स्वीट्नेस (फ्रुक्टोज) होती है. इसके साथ ही इनमें प्रचुर मात्रा में फाइबर, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं. फाइबर के कारण ये फल धीरे-धीरे पचते हैं, जिससे ब्लड शुगर अचानक नहीं बढ़ता और पेट लंबे समय तक भरा रहता है. 

3. खजूर- ये बात तो आप जानते ही होंगे कि खजूर को प्रकृति का अनमोल उपहार माना जाता है. यह न केवल मीठा होता है बल्कि फाइबर, पोटेशियम, मैग्नीशियम और आयरन का एक बेहतरीन सोर्स भी है. वजन घटाने के दौरान अगर आपको मीठे की तेज क्रेविंग हो, तो आप 1 या 2 खजूर खा सकते हैं. इसके अलावा, घर पर वजन घटाने वाली स्मूदी, ओट्स या हेल्दी शेक बनाते समय चीनी की जगह खजूर के पेस्ट का इस्तेमाल किया जा सकता है.  क्योंकि इसमें नेचुरल कैलोरी होती है, इसलिए इसका सेवन सीमित मात्रा में ही करना ठीक रहता है. 

4. कच्चा शहद- सीमित मात्रा में लिया गया शुद्ध या जैविक शहद चीनी का एक बहुत अच्छा ऑप्शन है. सफेद चीनी के उलट, शहद में कई प्रकार के एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं, जो शरीर को पाचन क्षमता को दुरुस्त करते हैं.  सुबह गुनगुने पानी में आधा चम्मच शहद और नींबू का रस मिलाकर पीने से शरीर के फैट को बर्न करने में मदद मिलती है. हालांकि, शहद में कैलोरी होती है, इसलिए इसका उपयोग केवल स्वाद बदलने के लिए कम मात्रा में ही करना चाहिए.

5. गुड़- सफेद चीनी के मुकाबले गुड़ एक बिना केमिकल प्रोसेस के तैयार किया गया बेहतर ऑप्शन है. वहीं, गुड़ में आयरन, फास्फोरस और पोटेशियम जैसे जरूरी मिनरल्स होते हैं जो पाचन तंत्र को मजबूत करते हैं. भोजन करने के बाद अक्सर लोगों को मीठा खाने की आदत होती है, ऐसे में चीनी की बनी मिठाई की जगह एक छोटा टुकड़ा गुड़ खाने से मीठे की इच्छा भी शांत होती है और खाना भी आसानी से पच जाता है. 

6. मेवे- बादाम, काजू और अखरोट जैसे मेवे प्रोटीन और हेल्दी फैट से भरपूर होते हैं ऐसे में इनका सेवन जरूर करना चाहिए साथ ही मीठे की तलब मिटाने के लिए मुट्ठी भर भुने हुए मेवों के साथ थोड़ी सी किशमिश मिलाकर खाने से काफी फायदा होता है. 

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इबोला का नया स्ट्रेन ग्लोबल इमरजेंसी घोषित, इससे भारत को कितना डरना चाहिए?

इबोला का नया स्ट्रेन ग्लोबल इमरजेंसी घोषित, इससे भारत को कितना डरना चाहिए?


Should India Be Worried About Ebola Virus: दुनिया एक बार फिर इबोला वायरस को लेकर सतर्क हो गई है. डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला के नए प्रकोप की पुष्टि हुई है और शुरुआती जेनेटिक जांच से संकेत मिले हैं कि यह वायरस कई हफ्तों, संभव है कई महीनों से चुपचाप फैल रहा था. सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस नए स्ट्रेन के व्यवहार और इसकी क्षमता को लेकर अभी भी कई सवालों के जवाब नहीं मिले हैं. ऐसे में दुनिया के कई देशों की तरह भारत में भी यह सवाल उठने लगा है कि क्या इस वायरस से डरने की जरूरत है. 

कैसे फैलता है इबोला वायरस?

एक्सपर्ट  के अनुसार इबोला उन वायरसों में शामिल नहीं है जो हवा के जरिए तेजी से फैलते हैं. यह वायरस शरीर में तभी प्रवेश करता है जब इंफेक्टेड व्यक्ति के खून, लार, मल, यूरिन या अन्य शारीरिक द्रव के सीधे संपर्क में आया जाए. लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के एक्सपर्ट डॉ. डेविड हेमन, जिन्होंने 1976 में पहली बार इबोला पर स्टडी किया था, बताते हैं कि यह वायरस व्यक्ति से व्यक्ति में मुख्य रूप से शारीरिक लिक्यूड के जरिए फैलता है. यही कारण है कि मरीजों की देखभाल करने वाले स्वास्थ्यकर्मी और परिवार के सदस्य सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं. 

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शरीर में कैसे फैलता है यह?

वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद सीधे इम्यून सिस्टम पर हमला करता है. जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ मेंज के वायरोलॉजी प्रोफेसर डॉ. बोडो प्लाख्टर के अनुसार वायरस पहले लसीका ग्लैंड में अपनी संख्या बढ़ाता है और फिर खून के जरिए शरीर के अलग-अलग अंगों तक पहुंच जाता है.  यह उन सेल्स को निशाना बनाता है जो सामान्य परिस्थितियों में शरीर को इंफेक्शन से बचाती हैं. जब यही इन्यून सिस्टम कमजोर पड़ जाता है तो वायरस तेजी से पूरे शरीर में फैलने लगता है.

पहचानना क्यों होता है मुश्किल?

इबोला की सबसे बड़ी चुनौती इसके शुरुआती लक्षण हैं. शुरुआत में मरीज को सामान्य बुखार, सर्दी, इंफेक्शन या मलेरिया जैसी परेशानी महसूस हो सकती है. कई बार मरीज को कुछ समय के लिए राहत भी महसूस होती है, लेकिन इसके बाद बीमारी गंभीर रूप ले सकती है. डॉ. डेविड हेमन के अनुसार बाद के चरण में शरीर के विभिन्न हिस्सों से ब्लड निकलने जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. यही वह समय होता है जब मरीज सबसे ज्यादा संक्रामक होता है और इंफेक्शन फैलने का खतरा बढ़ जाता है. 

भारत में क्या स्थिति है?

अब सवाल यह है कि भारत को कितना डरना चाहिए. मई 2026 तक भारत में इबोला का कोई पुष्ट मामला सामने नहीं आया है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट clinikk के एक्सपर्ट के आकलन के मुताबिक भारतीय आबादी के लिए फिलहाल सीधा खतरा कम है. देश के प्रमुख हवाई अड्डों पर निगरानी व्यवस्था, स्वास्थ्य जांच, बड़े अस्पतालों में त्वरित जांच सुविधाएं और वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की चेतावनी सिस्टम संभावित मामलों की पहचान में मदद कर रही हैं. हालांकि अफ्रीकी देशों के साथ यात्रा और व्यापारिक संबंधों को देखते हुए सतर्कता बनाए रखना जरूरी माना जा रहा है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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