हर में 6 में से 1 कपल है इंफर्टिलिटी से परेशान, जानें डाइट से कैसे होगा सुधार?

हर में 6 में से 1 कपल है इंफर्टिलिटी से परेशान, जानें डाइट से कैसे होगा सुधार?


How Lifestyle Affects Male Fertility: दुनियाभर में फर्टिलिटी रेट लगातार गिर रहा है. आज स्थिति यह है कि दुनिया के लगभग दो-तिहाई देशों में यह रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे चला गया है. सोरबोन यूनिवर्सिटी के फैकल्टी ऑफ मेडिसिन में डेवलपमेंटल और रिप्रोडक्टिव बायोलॉजी की प्रोफेसर रैचेल लेवी के अनुसार, “फर्टिलिटी अब सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि एक पब्लिक हेल्थ इश्यू बन चुकी है. हर 6 में से 1 व्यक्ति इंफर्टिलिटी से जूझ रहा है.”

लाइफस्टाइल का अहम रोल

पिछले 50 वर्षों में पुरुषों में स्पर्म कंसंट्रेशन लगभग आधा रह गया है. इसके पीछे पर्यावरण से जुड़े कारणों के साथ-साथ लाइफस्टाइल फैक्टर्स भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं, जिनमें मोटापा और खराब खानपान प्रमुख हैं. 31 जनवरी 2025 को पेरिस में आयोजित इंस्टिट्यूट बेंजामिन डेलसेर्ट के वार्षिक कार्यक्रम में रैचेल लेवी ने बताया कि किस तरह बदली जा सकने वाली आदतें इंफर्टिलिटी को प्रभावित करती हैं और सही पोषण से फर्टिलिटी में सुधार की कितनी संभावना है.

रिसर्च में यह साफ हुआ है कि बॉडी मास इंडेक्स (BMI), डाइट और स्पर्म क्वालिटी के बीच गहरा संबंध है. दुनियाभर में BMI बढ़ने के साथ-साथ फर्टिलिटी रेट में गिरावट देखी जा रही है. मेडिकल असिस्टेड प्रजनन प्रक्रिया से गुजर रहे पुरुषों में ओवरवेट और मोटापा ओलिगोजोस्पर्मिया और एजोस्पर्मिया का खतरा बढ़ा देता है, जिससे गर्भधारण और लाइव बर्थ की संभावना कम हो जाती है.

कैसी रखें डाइट?

डाइट सीधे तौर पर स्पर्म बनने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है. कई स्टडीज में यह सामने आया है कि मेडिटेरेनियन डाइट अपनाने से स्पर्म की गुणवत्ता और फर्टिलिटी में सुधार होता है. इतना ही नहीं, गर्भधारण से पहले पिता की डाइट स्पर्म के डीएनए मिथाइलेशन को भी प्रभावित कर सकती है, जिसका असर भ्रूण के विकास पर पड़ता है.

हार्मोनल असंतुलन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, सूजन और एपिजेनेटिक बदलाव जोखिम भी पैदा करते हैं और सुधार का मौका भी देते हैं. अच्छी बात यह है कि कुछ मामलों में ये असर उलटे भी जा सकते हैं. एक स्टडी में पाया गया कि गर्भधारण से पहले नियमित फिजिकल एक्टिविटी और संतुलित आहार अपनाने से मेटाबॉलिक और हार्मोनल स्थिति सुधरी, स्पर्म डीएनए डैमेज कम हुआ और सीमन की एंटीऑक्सीडेंट क्षमता बेहतर हुई.

फर्टिलिटी बढ़ाने के लिए क्या खाएं?

मेडिटेरेनियन डाइट को रिप्रोडक्टिव हेल्थ के लिए सबसे ज्यादा स्टडी किया गया है. इसमें हरी पत्तेदार सब्जियां, साबुत अनाज, लीन प्रोटीन और हेल्दी फैट शामिल होते हैं. पालक, केल जैसी सब्जियां, क्विनोआ और ओट्स, मछली-अंडे, दालें, एवोकाडो, नट्स और ऑलिव ऑयल फर्टिलिटी के लिए फायदेमंद माने जाते हैं.

किन चीजों से बचें?

ज्यादा प्रोसेस्ड फूड, रिफाइंड शुगर, अत्यधिक कैफीन और शराब हार्मोनल संतुलन बिगाड़ सकते हैं. ट्रांस फैट और बहुत ज्यादा तले-भुने खाने से भी सूजन बढ़ती है.

एक्सपर्ट्स की सलाह

पोषण के साथ-साथ पर्याप्त पानी, नियमित हल्का व्यायाम और तनाव कम करना भी जरूरी है. अगर लंबे समय से गर्भधारण में परेशानी हो रही है या PCOS, थायरॉइड जैसी समस्या है, तो फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट और न्यूट्रिशनिस्ट से सलाह लेना फायदेमंद हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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शरीर के इन 4 बदलावों को न करें नजरअंदाज, हो सकते हैं कैंसर के खतरे के संकेत

शरीर के इन 4 बदलावों को न करें नजरअंदाज, हो सकते हैं कैंसर के खतरे के संकेत


Early Symptoms Of Liver Cancer You Should Not Ignore: आजकल हमारी डाइट में तले-भुने और प्रोसेस्ड फूड की मात्रा तेजी से बढ़ रही है. इसके साथ ही शारीरिक गतिविधि भी पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है, जिसका सीधा असर लिवर पर पड़ता है. अनहेल्दी लाइफस्टाइल, गलत खानपान और हेपेटाइटिस जैसे इंफेक्शन  के कारण लिवर कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं.  सबसे बड़ी परेशानी यह है कि लिवर कैंसर के शुरुआती लक्षण अक्सर लोग सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. जब तक बीमारी गंभीर रूप लेती है, तब तक इसका पता चल पाता है. इसलिए जरूरी है कि लिवर कैंसर के संकेतों को समय रहते पहचाना जाए. चलिए आपको बताते हैं कि इसके प्रमुख लक्षण कौन से हैं. 

क्या होते हैं लक्षण?

Mayo Clinic के अनुसार, लिवर कैंसर के कई लक्षण हो सकते हैंय. इनमें से चार संकेतों के बारे में आपको बताते हैं, जिन्हें पहचानना बेहद जरूरी है. ये लक्षण- 

दर्द और सूजन

अगर पेट के दाहिने हिस्से में, खासकर पसलियों के नीचे, लगातार हल्का दर्द, खिंचाव, दबाव या सूजन महसूस हो रही है, तो इसे गैस या एसिडिटी समझकर नजरअंदाज न करें. यह दर्द तब होता है जब ट्यूमर के कारण लिवर का आकार बढ़ने लगता है और आसपास के टिश्यू पर दबाव पड़ता है. कई बार पेट में पानी भरने से भी भारीपन और फूला हुआ महसूस हो सकता है.

वजन घटना- भूख न लगना

अगर बिना डाइट या एक्सरसाइज के आपका वजन तेजी से कम हो रहा है और खाने की इच्छा भी घटती जा रही है, तो यह खतरे का संकेत हो सकता है. लिवर कैंसर शरीर के मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है. लिवर पाचन में अहम भूमिका निभाता है, लेकिन कैंसर की वजह से यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है. ऐसे में व्यक्ति जल्दी भरा-भरा महसूस करता है, भूख कम लगती है और शरीर जरूरी पोषक तत्वों को ठीक से अब्जॉर्व नहीं कर पाता, जिससे वजन घटने लगता है.

जॉन्डिस

पीलिया लिवर कैंसर का एक अहम लक्षण माना जाता है. इसमें त्वचा, आंखों का सफेद हिस्सा और नाखून पीले पड़ने लगते हैं. ऐसा तब होता है जब लिवर ठीक से काम नहीं कर पाता और खून में बिलिरुबिन की मात्रा बढ़ जाती है. इसके साथ यूरिन का रंग गहरा पीला या भूरा होना और मल का रंग हल्का पड़ना भी पीलिया से जुड़े अहम संकेत हैं. ऐसे लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

लगातार थकान और कमजोरी

अगर हल्का काम करने के बाद भी आपको लगातार थकान और कमजोरी महसूस होती है और आराम करने के बाद भी यह ठीक नहीं होती, तो इसे गंभीरता से लें. लिवर कैंसर शरीर की ऊर्जा बनाने की क्षमता को प्रभावित करता है. इसके अलावा एनीमिया भी इस थकान का एक कारण हो सकता है, क्योंकि लिवर रेड ब्लड सेल्स के निर्माण से जुड़ी प्रक्रिया को प्रभावित करता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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50 के बाद ‘लेडी डॉक्टर’ से नहीं मिलती हैं कई महिलाएं, इससे होती है कैंसर की शुरुआत; जानें कैसे?

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हर घूंट पानी के बाद यूरिन क्यों आता है? जानिए क्या है इसका कारण और शरीर का पूरा साइंस

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हम सभी को बचपन से यही सिखाया जाता है कि दिन भर में खूब पानी पीना चाहिए. डॉक्टर भी सलाह देते हैं कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए रोजाना 7 से 8 गिलास पानी जरूरी है. पानी पीने से शरीर डिहाइड्रेशन से बचता है, टॉक्सिन बाहर निकलते हैं और किडनी सही से काम करती है, लेकिन कई लोगों की एक आम शिकायत होती है जैसे ही पानी पीते हैं, तुरंत यूरिन लगने लगती है. कुछ लोगों को तो हर 10–15 मिनट में वॉशरूम जाना पड़ता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह सामान्य है या फिर किसी बीमारी का संकेत है. अगर आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो घबराने की जरूरत नहीं है. आइए आज हम आपको बताते हैं कि हर घूंट पानी के बाद यूरिन क्यों आता है, इसके पीछे शरीर का क्या साइंस है और इससे कैसे बचा जा सकता है. 

पानी पीने के बाद बार-बार यूरिन आने का क्या कारण है?

1. ओवर एक्टिव ब्लैडर (Overactive Bladder) – यह बार-बार यूरिन आने की सबसे आम वजह मानी जाती है. इस स्थिति में ब्लैडर की मांसपेशियां जरूरत से ज्यादा एक्टिव हो जाती हैं. ब्लैडर पूरा भरा न होने पर भी दिमाग को बार-बार यूरिन का सिग्नल भेजता है, जिससे अचानक और तेज यूरिन की इच्छा होती है. इसी कारण थोड़ी-सी मात्रा में पानी पीते ही वॉशरूम भागना पड़ता है. 

2. मूत्र मार्ग में संक्रमण (UTI) – अगर यूरिन करते समय जलन, दर्द, बदबू या बार-बार यूरिन लगे तो यह यूटीआई का संकेत हो सकता है. इसमें ब्लैडर ज्यादा सेंसिटिव हो जाता है. 

3. ज्यादा चाय, कॉफी या शराब का सेवन – चाय, कॉफी और शराब में कैफीन होता है, जो यूरिन बढ़ाने का काम करता है, ब्लैडर में जलन पैदा करता है, जिससे बार-बार यूरिन की इच्छा होती है. 

4.  शुगर (डायबिटीज) का कंट्रोल में न होना – अगर ब्लड शुगर लेवल ज्यादा रहता है तो शरीर अतिरिक्त शुगर को यूरिन के जरिए बाहर निकालने की कोशिश करता है, जिससे यूरिन ज्यादा आता है साथ में प्यास भी ज्यादा लगती है. 

5. तनाव और चिंता – मानसिक तनाव या एंग्जायटी भी इस समस्या को बढ़ा सकती है. नर्वस सिस्टम ब्लैडर को गलत सिग्नल भेजने लगता है, जिससे बार-बार यूरिन लगता है. 

बार-बार यूरिन आने से बचने के लिए क्या करें?

1. पानी पीने का सही तरीका अपनाएं – एक साथ बहुत ज्यादा पानी न पिएं, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पूरे दिन पानी पिएं. बहुत तेजी से पानी पीने से बचें. 

2. कैफीन और फिजी ड्रिंक्स कम करें – चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक, एनर्जी ड्रिंक्स इनका सेवन कम करने से ब्लैडर को राहत मिलती है. 

3. बार-बार बाथरूम जाने की आदत न डालें – हर 10–15 मिनट में वॉशरूम जाने से ब्लैडर कमजोर हो सकता है. यूरिन रोकने की क्षमता कम हो जाती है. कोशिश करें कि तय समय के अंतराल में ही बाथरूम जाएं. 

4. पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज करें – पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज (जैसे केगल एक्सरसाइज), ब्लैडर की मांसपेशियों को मजबूत बनाती हैं, यूरिन को कंट्रोल करने में मदद करती हैं. 

5.  जरूरत पड़े तो डॉक्टर से सलाह लें – अगर समस्या लंबे समय तक बनी रहे. जलन या दर्द हो या नींद में बार-बार यूरिन आए तो डॉक्टर से जांच कराना बेहद जरूरी है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ये हैं मौत से पहले के 12 संकेत जिन्हें देखकर डॉक्टर भी कर देते हैं हाथ खड़े, जानिए कैसे आखिर…

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मृत्यु जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है, लेकिन इसके बारे में बात करना आज भी लोगों को असहज कर देता है.  जब कोई अपना गंभीर रूप से बीमार होता है और उसका शरीर जवाब देने लगता है, तब परिवार के मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि अब क्या होने वाला है. डॉक्टर, नर्स और हॉस्पिस केयर में काम करने वाले लोग अक्सर कुछ ऐसे शारीरिक और मानसिक बदलाव पहचान लेते हैं, जो बताते हैं कि इंसान अपने जीवन के अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है. ये संकेत डराने के लिए नहीं होते, बल्कि इसलिए जरूरी हैं ताकि मरीज को कम से कम दर्द, ज्यादा से ज्यादा आराम के साथ ध्यान रखा जा सके. तो आइए आज हम आपको वे 12 संकेत बताते हैं, जो आमतौर पर मौत से पहले दिखाई देते हैं. 

ये हैं मौत से पहले के 12 संकेत

1. लगातार थकान और कमजोरी – मरीज दिन का ज्यादातर समय सोते हुए बिताने लगता है. थोड़ा सा बोलना या हिलना-डुलना भी उसे थका देता है. यह आलस नहीं, बल्कि शरीर की एनर्जी खत्म होने का संकेत होता है. 

2. भूख और प्यास का कम हो जाना – अंतिम समय में शरीर को ज्यादा खाना या पानी की जरूरत नहीं रहती, मरीज खुद खाने-पीने से मना कर सकता है. यह स्वाभाविक प्रक्रिया है. 

3. सांस लेने में तकलीफ – सांस फूलना, तेज या बहुत धीमी सांसें चलना आम बात है. कभी-कभी बिना किसी मेहनत के भी सांस लेने में परेशानी होती है. इस समय ऑक्सीजन, दवाइयां और शांत वातावरण मदद करता है. 

4. दर्द का बढ़ना या बदलना – हर मरीज को दर्द एक-सा नहीं होता, कुछ को ज्यादा, कुछ को कम, कैंसर, फेफड़ों की बीमारी या मानसिक तनाव दर्द को बढ़ा सकता है. डॉक्टर अक्सर दवाइयां देकर दर्द को काबू में रखते हैं. 

5. चिंता और बेचैनी – मरीज बेचैन हो सकता है, बार-बार करवट बदलता है, पसीना आता है. नींद नहीं आती या डर महसूस होता है. यह मौत के डर या मानसिक थकान की वजह से हो सकता है. इस समय प्यार भरी बातों और दवाओं से राहत मिलती है. 

6. मतली और उल्टी – अंतिम समय में पेट ठीक से काम नहीं करता, कभी दवाओं से, कभी कब्ज से मतली हो सकती है. हल्का खाना, ताजी हवा और डॉक्टर की दवाइयां मददगार होती हैं. 

7. कब्ज  – कम खाना, कम पानी पीना और दर्द की दवाइयां कब्ज पैदा करती हैं. यह तकलीफदेह हो सकता है. डॉक्टर दवाएं या इंजेक्शन देकर राहत दिलाते हैं. 

8. अकेलापन और लोगों से दूरी – मरीज धीरे-धीरे कम बोलने लगता है, मिलना-जुलना कम कर देता है, यहां तक कि अपनों से भी, यह उदासी नहीं, बल्कि अंदर की तैयारी होती है. ऐसे में बस पास बैठकर हाथ पकड़ना भी बहुत सुकून देता है. 

9. पेशाब और मल पर नियंत्रण न रहना – शरीर की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं. मरीज को पेशाब या शौच पर नियंत्रण नहीं रहता, इस समय साफ-सफाई बहुत जरूरी होती है ताकि संक्रमण न हो. 

10. हाथ-पैर ठंडे पड़ना और त्वचा का रंग बदलना – खून का बहाव कम होने लगता है. हाथ-पैर ठंडे, त्वचा पर नीले या बैंगनी धब्बे दिख सकते हैं. होंठ और नाखून नीले पड़ सकते हैं. यह साफ संकेत है कि शरीर धीरे-धीरे बंद हो रहा है. 

11. भ्रम और प्रलाप (Delirium) –  मरीज ऐसी बातें कर सकता है जो समझ में न आएं. कभी किसी को देखना या सुनना जो मौजूद न हो. यह ऑक्सीजन की कमी, दवाओं या किडनी फेल होने की वजह से होता है. 

12. डेथ रेटल यानी मौत की घरघराहट – यह आखिरी और सबसे साफ संकेत होता है. सांस लेते समय घरघराहट या घड़घड़ाहट की आवाज आती है. असल में मरीज को दर्द नहीं होता, लेकिन आवाज सुनकर घबरा जाता है. ऐसे में करवट बदलना और सिर ऊंचा रखना मदद करता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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घर में रहने वालों को भी बीमार कर रहा पीएम2.5, जानें इनडोर पॉल्यूशन कितना खतरनाक?

घर में रहने वालों को भी बीमार कर रहा पीएम2.5, जानें इनडोर पॉल्यूशन कितना खतरनाक?


हम अक्सर यह सोचते हैं कि घर हमारे लिए सबसे सुरक्षित जगह है. दरवाजे बंद कर के, खिड़कियां बंद कर के हम यह मान लेते हैं कि हमारे परिवार को कोई नुकसान नहीं होगा. लेकिन सच यह है कि हमारे घर के अंदर हवा कई बार बाहरी हवा से भी ज्यादा दूषित हो सकती है. धूल, धुएं, फर्नीचर से निकलने वाले रसायन, खाना पकाने के दौरान बनने वाले छोटे कण, सफाई से निकलने वाले हानिकारक गैस ये सब धीरे-धीरे हमारी हेल्थ को नुकसान पहुंचाते हैं. 

भारत जैसे देश में, जहां अक्सर घरों में वेंटिलेशन यानी हवा का अच्छा प्रवाह नहीं होता, इन प्रदूषकों का असर और भी गंभीर हो जाता है. साथ ही पीएम 2.5 घर में रहने वालों को भी बीमार कर रहा है. लंबे समय तक इनसे संपर्क में रहने से बच्चों में एलर्जी और अस्थमा, वयस्कों में फेफड़ों की बीमारियां और यहां तक कि हार्ट डिजीज और मस्तिष्क संबंधी समस्याएं भी विकसित हो सकती हैं. 

घर में रहने वालों को भी बीमार कर रहा पीएम 2.5

1. खाना पकाने से धुएं और कण की वजह से – जब हम तलते या ग्रिल करते हैं, तब छोटे छोटे धूल और धुएं के कण (PM2.5) हवा में फैलते हैं. ये कण इतने छोटे होते हैं कि वे फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं और रक्त में भी प्रवेश कर सकते हैं. 
 
2. फर्नीचर और निर्माण सामग्री से निकलने वाले रसायन – पार्टिकल बोर्ड, प्लाईवुड और कुछ पेंट्स से फॉर्मेल्डिहाइड जैसी हानिकारक गैसें निकलती रहती हैं. ये रसायन गंधहीन होने के कारण हम अक्सर इसका एहसास नहीं कर पाते है.

3. सफाई उत्पाद और एअर फ्रेशनर – सामान्य घरेलू क्लीनर, एयर फ्रेशनर और सौंदर्य प्रसाधन वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) छोड़ते हैं. लंबे समय तक संपर्क में रहने से सिरदर्द, आंखों में जलन, एलर्जी और यहां तक कि कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है. 

4. नमी और फफूंद – घर के अंदर ज्यादा नमी होने पर फफूंद पनप जाती है. फफूंद और इसके माइकोटॉक्सिन आपके श्वसन तंत्र और प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर सकते हैं. 

5. पालतू जानवर और धूल – पालतू जानवरों के बाल, रूसी और मूत्र में मौजूद प्रोटीन हवा में एलर्जी कारक बन जाते हैं. सूक्ष्म धूल और मृत त्वचा कोशिकाओं से भी एलर्जी और अस्थमा का खतरा बढ़ता है. 

6. कार्बन मोनोऑक्साइड और रेडॉन – ये दोनों रंगहीन, गंधहीन और बेहद खतरनाक गैसें हैं. कम मात्रा में भी सिरदर्द, थकान और चक्कर ला सकती हैं. ज्यादा मात्रा में ये जानलेवा हो सकती हैं. 

इनडोर पॉल्यूशन कितना खतरनाक?

घर के अंदर की खराब हवा धीरे-धीरे हमारे शरीर पर असर डालती है. इससे लगातार सिरदर्द, थकान और नींद में कमी, आंखों, नाक और गले में जलन, बार-बार खांसी, छींक या एलर्जी, त्वचा पर चकत्ते या जलन, बच्चों में नई एलर्जी या अस्थमा का बढ़ना, मानसिक थकान, याददाश्त में कमी और एकाग्रता में कमी, अगर ये लक्षण केवल घर के अंदर होते हैं और बाहर जाने पर कम हो जाते हैं, तो यह सिक बिल्डिंग सिंड्रोम यानी घर के अंदर की हवा से जुड़ी बीमारी का संकेत हो सकता है. 

घर की हवा को सुरक्षित बनाने के उपाय

1. रोजाना 15–20 मिनट के लिए खिड़कियां खोलें.

2. खाना बनाते समय एग्जॉस्ट फैन का यूज करें.

3. HEPA फिल्टर वाला एयर प्यूरीफायर लगाएं.

4. घर की नमी 50 प्रतिशत से कम रखें. 

5. फर्नीचर और पेंट में से निकलने वाले रसायनों से बचें. 

6. सुगंधित क्लीनर और एयर फ्रेशनर के बजाय नेचुरल ऑप्शन अपनाएं, पौधों का यूज करें, कुछ पौधे हवा से प्रदूषक सोख सकते हैं. 

7. एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग ऐप्स से हवा की क्वालिटी पर नजर रखें. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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