यह विटामिन खत्म कर देगा कैंसर होने की टेंशन! इस स्टडी से मिल रही गुड न्यूज

यह विटामिन खत्म कर देगा कैंसर होने की टेंशन! इस स्टडी से मिल रही गुड न्यूज


Vitamin D Benefits: पहले कैंसर का खतरा बड़े लोगों में ही देखने को मिलता था, लेकिन आज के समय में हर कोई चाहे बच्चे हो, जवान हो, सब ही इसके चपेट में आ रहे हैं. वहीं, कीमोथेरेपी कैंसर के लिए एक कॉमन इलाज है, लेकिन इसका परिणाम हर मरीज में एक जैसा नहीं होता है. इसी बीच एक नई स्टडी ने उम्मीद की किरण दिखाई है. रिसर्च में सामने आया है कि एक खास विटामिन की डोज से कैंसर से मौत का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है. खास बात यह है कि यह कीमोथेरेपी जैसे महंगा नहीं है, बल्कि आसानी से मिलने वाला विटामिन D है. वैज्ञानिकों का मानना है कि विटामिन D सही मात्रा में लेने से शरीर में इम्युनिटी मजबूत होती है, जिससे कैंसर जैसी बीमारी के इलाज में बेहतर रिजल्ट मिल सकता है.

ब्राजील की रिसर्च में हुआ बड़ा खुलासा

इसे लेकर ब्राजील की sao paulo state university में एक रिसर्च की गई. इस रिसर्च में ब्लड कैंसर से पीड़ित 45 साल से ज्यादा उम्र की 80 महिलाओं को शामिल किया गया था, जिनकी कीमोथेरेपी होने वाली थी. रिसर्च के लिए महिलाओं को 2 ग्रुप में बांट दिया गया, जिसमें एक ग्रुप को रोजाना विटामिन D की 2,000 IU दी गई थी. वहीं, दूसरी तरफ दूसरे ग्रुप को प्लेसीबो गोली दी गई, यानी बिना असरदार वाली गोलियां. 6 महीने की इस प्रक्रिया के बाद, जो रिजल्ट आया, उसने सभी वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया.

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विटामिन D लेने वाली महिलाओं में दिखा बेहतर असर

उन्होंने इस स्टडी में पाया कि जिन महिलाओं को विटामिन D की गोली दी गई थी, उनमें से 43 प्रतिशत महिलाओं में कीमोथेरेपी के बाद कैंसर के लक्षण न के बराबर थे. वहीं, दूसरे ग्रुप की महिलाओं का आंकड़ा केवल 24 प्रतिशत ही था. इससे यह पता चला कि विटामिन D कैंसर के उपचार में सहायक भूमिका निभा सकता है.

शरीर में विटामिन D बढ़ने से बेहतर हुए नतीजे

रिसर्च के दौरान यह भी पता चला कि जिन महिलाओं को विटामिन D की गोलियां दी गई थीं, उनके शरीर में पहले से ही विटामिन D की कमी थी. वहीं, उपचार के दौरान जैसे-जैसे उनके शरीर में विटामिन D का स्तर बढ़ा, वैसे उनके नतीजे भी बेहतर होने लगे. ऐसे में ये कहना गलत नहीं हो सकता है कि विटामिन D सिर्फ कैंसर के मरीजों के लिए ही नहीं, बल्कि हर आदमी के लिए जरूरी होता है. साथ ही, सुरक्षा का भी ध्यान रखना जरूरी है. इसको ज्यादा मात्रा में लेना भी नुकसान हो सकता है. इसको ज्यादा मात्रा में लेने से उल्टी, कमजोरी, और गुर्दे की समस्या जैसी परेशानी हो सकती है. ऐसे में बिना डॉक्टर की सलाह लिए इसका अधिक मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए.

अभी और रिसर्च की है जरूरत

इस अध्ययन से पता चलता है कि विटामिन D, कीमोथेरेपी को बेहतर तरीके से काम करने में मदद कर सकता है और यह एक सस्ता व आसान तरीका हो सकता है, लेकिन अभी इसे पूरी तरह साबित इलाज नहीं माना गया है. ऐसे में इस पर और रिसर्च की जरूरत है. वैज्ञानिकों का मानना है कि शुरुआती नतीजे अच्छे हैं, लेकिन अभी यह साफ नहीं है कि सिर्फ विटामिन D की वजह से ही फायदा हुआ. इसके पीछे दूसरे कारण भी हो सकते हैं. आगे की रिसर्च में यह समझने की कोशिश की जाएगी कि विटामिन D, कीमोथेरेपी के साथ मिलकर कैसे असर करता है.

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मोबाइल की लत से बच्चे बन रहे डफर, एम्स में की स्टडी में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

मोबाइल की लत से बच्चे बन रहे डफर, एम्स में की स्टडी में हुआ चौंकाने वाला खुलासा


Can Mobile Addiction Affect Children Brain Development: आज के समय में छोटे बच्चों के हाथ में मोबाइल देना आम बात हो गई है. खाना खिलाना हो, बच्चे को चुप कराना हो या खुद थोड़ा समय निकालना हो, कई माता-पिता बच्चों को मोबाइल पकड़ा देते हैं. लेकिन अब एम्स की एक नई स्टडी ने इसे लेकर बड़ा खतरा बताया है. रिसर्च में सामने आया है कि बहुत कम उम्र से मोबाइल और स्क्रीन के संपर्क में आने वाले बच्चों में सीखने की क्षमता कमजोर हो सकती है और उनमें ऑटिज्म जैसी समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एम्स के पेडियाट्रिक न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. शेफाली गुलाटी के अनुसार “एक साल की उम्र में ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों में तीन साल की उम्र तक ऑटिज्म के लक्षण ज्यादा देखने को मिले.”  यह असर लड़कों में ज्यादा दिखाई दिया, हालांकि लड़कियों में भी इसके संकेत मिले हैं. 

क्या हैं इसके कारण?

एक्सपर्ट का कहना है कि छोटे बच्चों का दिमाग शुरुआती वर्षों में तेजी से विकसित होता है. इस दौरान उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है माता-पिता के साथ बातचीत, चेहरे के हावभाव समझने और आसपास की चीजों से जुड़ने की. लेकिन जब बच्चा लगातार मोबाइल स्क्रीन में उलझा रहता है, तो उसका सामाजिक और मानसिक विकास प्रभावित होने लगता है. 

डॉ. शेफाली गुलाटी के मुताबिक बच्चों के साथ व्यक्तिगत रूप से समय बिताना बेहद जरूरी है. बच्चा माता-पिता के चेहरे को देखकर, उनकी आवाज सुनकर और उनके व्यवहार को समझकर सीखता है. यही चीजें उसके दिमाग के विकास में सबसे अहम भूमिका निभाती हैं. 

 

क्या होता है ऑटिज्म?

ऑटिज्म एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चे का दिमाग सामान्य तरीके से सामाजिक व्यवहार और भाषा को समझ नहीं पाता.  ऐसे बच्चों को लोगों से घुलने-मिलने, बातचीत करने और भावनाएं समझने में परेशानी हो सकती है. कुछ बच्चे बार-बार एक जैसी हरकतें करते हैं, कुछ अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं और कई बार उन्हें तेज आवाज या बदलाव से भी परेशानी होने लगती है. 

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किन चीजों को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज?

एक्सपर्ट के अनुसार अगर बच्चा नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया नहीं देता, आंखों में कम देखता है, बोलने में देरी हो रही है या दूसरों के साथ खेलने से बचता है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. समय रहते जांच और सही मदद मिलने से स्थिति को बेहतर बनाया जा सकता है. 

18 महीने से कम उम्र के बच्चों पर ध्यान

एम्स के एक्सपर्ट का कहना है कि छोटे बच्चों की स्क्रीन की आदत धीरे-धीरे कम करनी चाहिए. अचानक मोबाइल छीन लेने से बच्चा चिड़चिड़ा हो सकता है. सबसे जरूरी बात यह है कि 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से जितना दूर रखा जाए, उतना बेहतर माना जाता है. एक्सपर्ट मानते हैं कि बच्चों के बेहतर मानसिक विकास के लिए मोबाइल नहीं, बल्कि माता-पिता का साथ सबसे ज्यादा जरूरी है, बच्चे को जितना ज्यादा वास्तविक दुनिया और परिवार के साथ समय मिलेगा, उसका मानसिक और सामाजिक विकास उतना ही बेहतर होगा.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या अब कैंसर का इलाज हुआ और आसान? जेनेटिक टेस्ट से महिला को मिला जीवनदान

क्या अब कैंसर का इलाज हुआ और आसान? जेनेटिक टेस्ट से महिला को मिला जीवनदान


How Genetic Testing Helps In Cancer Treatment: बेंगलुरु की करीब पचास वर्ष की एक महिला कई महीनों तक शरीर में हो रहे छोटे-छोटे बदलावों को नजरअंदाज करती रही. पेट जल्दी भर जाना, सूजन महसूस होना और लगातार थकान जैसी समस्याएं धीरे-धीरे बढ़ती गईं. जब हालत ज्यादा बिगड़ी तो जांच में पता चला कि उन्हें ओवरी का कैंसर है और बीमारी शरीर में फैल चुकी है. सर्जरी के जरिए दिखाई देने वाली गांठों को हटा दिया गया, लेकिन असली बदलाव उसके बाद हुई एक खास जांच से आया 

बेंगलुरु के एस्टर अस्पताल के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. अश्विन केआर के मुताबिक महिला के ट्यूमर की गहराई से जांच की गई. इस जांच में पता चला कि कैंसर सेल्स शरीर के क्षतिग्रस्त जेनेटिक पदार्थ को ठीक करने में सक्षम नहीं थीं. यही जानकारी आगे के इलाज में सबसे अहम साबित हुई. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एक्सपर्ट के अनुसार कैंसर तब शुरू होता है जब शरीर की सेल्स के भीतर मौजूद जेनेटिक संरचना में बदलाव होने लगते हैं. लेकिन हर मरीज में यह बदलाव एक जैसे नहीं होते. कुछ बदलाव समय के साथ पैदा होते हैं, जबकि कुछ परिवार से विरासत में मिल सकते हैं. यही वजह है कि हर कैंसर मरीज का इलाज एक जैसा असर नहीं दिखाता. डॉ. अश्विन केआर बताते हैं कि इस तरह की जेनेटिक जांच से यह समझने में मदद मिलती है कि आखिर कैंसर को बढ़ाने वाला मुख्य कारण क्या है. कई बार ऐसी जानकारी मिलने के बाद मरीज को वही दवा दी जाती है, जो उसकी बीमारी पर सबसे ज्यादा असर कर सके. इससे इलाज पर समय और शरीर दोनों की बर्बादी कम होती है. 

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इस केस में क्या देखने को मिला?

महिला के मामले में भी यही हुआ.  जांच में ऐसा संकेत मिला जिससे डॉक्टरों को एक खास प्रकार की टारगेटेड दवा देने का रास्ता मिला. यह दवा उन कैंसर सेल्स पर असर करती है जो खुद को ठीक नहीं कर पातीं. इलाज शुरू होने के बाद ट्यूमर छोटा होने लगा और अब महिला सामान्य जीवन जी रही है, हालांकि उनकी लगातार निगरानी की जा रही है. एक्सपर्ट का कहना है कि पहले कैंसर के इलाज में सामान्य तौर पर सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरपी पर ही निर्भर रहना पड़ता था. लेकिन अब जेनेटिक जांच की मदद से इलाज को मरीज के शरीर और बीमारी के अनुसार तय किया जा रहा है. इससे इलाज ज्यादा सटीक और प्रभावी बनता जा रहा है.

लगातार बढ़ रहे हैं कैंसर के मामले

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के नेशनल कैंसर पंजीकरण कार्यक्रम के अनुसार देश में कैंसर के मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है. अनुमान है कि आने वाले वर्षों में मरीजों की संख्या और तेजी से बढ़ सकती है. ऐसे में एक्सपर्ट मानते हैं कि समय पर जांच और सही इलाज के साथ जेनेटिक परीक्षण मरीजों के लिए नई उम्मीद बन सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आपके घर में भी हैं चूहे? जानलेवा ‘हंता वायरस’ को लेकर डॉक्टरों ने क्या कहा?

क्या आपके घर में भी हैं चूहे? जानलेवा ‘हंता वायरस’ को लेकर डॉक्टरों ने क्या कहा?


Can Hantavirus Spread From Person To Person: हाल ही में एक रेयर इंफेक्शन ने पूरी दुनिया में चिंता बढ़ा दी है. एक जहाज पर कई लोगों की मौत के बाद यह बीमारी फिर चर्चा में आ गई. जांच में पता चला कि यह इंफेक्शन चूहों से फैलने वाले एक खास प्रकार के वायरस हंता वायरस से जुड़ा है. हालांकि एक्सपर्ट मानते हैं कि आम लोगों के लिए इसका खतरा बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन लापरवाही करना भी ठीक नहीं माना जा रहा. 

कैसे फैलती है यह बीमारी?

यह इंफेक्शन नया नहीं है. कई दशकों से अलग-अलग देशों में इसके मामले सामने आते रहे हैं, लेकिन ज्यादातर समय यह बीमारी सामान्य चर्चा से दूर रही. अब जब इसके मामले बढ़ने लगे हैं, तो लोग इसके बारे में ज्यादा जानना चाहते हैं. यह बीमारी मुख्य रूप से चूहों के मल, पेशाब और लार से फैलती है. जब बंद पड़े कमरे, गोदाम या धूलभरी जगहों की सफाई की जाती है, तब हवा में मौजूद इंफेक्शन कण सांस के जरिए शरीर में पहुंच सकते हैं. यही वजह है कि लंबे समय से बंद घरों या स्टोर रूम की सफाई के दौरान खतरा बढ़ जाता है. 

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क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

हैदराबाद के सीनियर डॉक्टर के. सी. मिश्रा ने TOI को बताया कि लोगों में सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि यह बीमारी सामान्य बुखार की तरह तेजी से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलती है. जबकि अधिकांश मामलों में ऐसा नहीं होता. उनका कहना है कि असली खतरा इंफेक्टेड वातावरण से होता है, न कि किसी इंफेक्टेड व्यक्ति के पास बैठने से. बेंगलुरु के इंफेक्शन रोग एक्सपर्ट सुब्रमण्यम स्वामीनाथन के मुताबिक, कई लोग मानते हैं कि यह बीमारी सिर्फ जंगलों या दूरदराज इलाकों तक सीमित है, जबकि सच्चाई यह है कि जहां चूहे मौजूद हैं, वहां खतरा हो सकता है. चाहे वह घर का स्टोर रूम हो, पुराना गोदाम या लंबे समय से बंद पड़ा कमरा. 

क्या होते हैं इस बीमारी के लक्षण?

इस बीमारी की शुरुआत बेहद सामान्य लक्षणों से होती है, तेज बुखार, शरीर दर्द, कमजोरी और थकान जैसी दिक्कतें शुरू में साधारण वायरल इंफेक्शन जैसी लगती हैं. यही कारण है कि कई लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते. लेकिन कुछ मामलों में अचानक सांस लेने में परेशानी, लंग्स में पानी भरना और शरीर के जरूरी अंगों पर असर जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है. एक्सपर्ट का कहना है कि इस इंफेक्शन का कोई निश्चित इलाज या टीका फिलहाल उपलब्ध नहीं है. इसलिए समय पर अस्पताल पहुंचना और सही देखभाल सबसे जरूरी मानी जाती है. जल्दी इलाज मिलने से मरीज की जान बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ऑफिस की चाय-कॉफी और AC की हवा आपको कर रही बीमार, बढ़ रहा किडनी खराब होने का खतरा

ऑफिस की चाय-कॉफी और AC की हवा आपको कर रही बीमार, बढ़ रहा किडनी खराब होने का खतरा


Why Office Workers Get Dehydrated In AC Rooms: पहली नजर में यही लगता है कि तेज धूप में काम करने वाले लोग ही सबसे ज्यादा डिहाइड्रेशन का शिकार होते होंगे. लेकिन असल तस्वीर कुछ अलग है. कई बार पूरे दिन एसी में बैठे ऑफिस जाने वाले लोग दिन के अंत तक ज्यादा डिहाइड्रेटेड मिलते हैं, बस फर्क इतना है कि यह समस्या धीरे-धीरे और चुपचाप बढ़ती है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

केयर हॉस्पिटल्स, हैदराबाद के नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. पी. विक्रांत रेड्डी ने TOI को बताया कि यह अब उनके लिए नई बात नहीं रही. उनके अनुसार, ऐसा लगता है कि बाहर काम करने वाले लोग ज्यादा डिहाइड्रेट होंगे, लेकिन व्यवहार में अक्सर ऑफिस में बैठे लोग ही कम पानी पीते हैं.” इसकी वजह आलस नहीं, बल्कि हमारा काम करने का तरीका और माहौल है.

एयर कंडीशनर का क्या होता है असर?

एयर कंडीशनर में बैठने से शरीर के संकेत कमजोर पड़ जाते हैं. आमतौर पर प्यास हमें पानी पीने का संकेत देती है, लेकिन जब न पसीना आता है, न गर्मी लगती है, तो यह संकेत धीरे-धीरे नजरअंदाज हो जाता है. ऐसे में घंटों निकल जाते हैं और हमें एहसास भी नहीं होता कि शरीर पानी खो रहा है. डॉ. रेड्डी बताते हैं कि ठंडी हवा आराम जरूर देती है, लेकिन वह सूखापन भी बढ़ाती है. शरीर त्वचा और सांस के जरिए लगातार पानी खोता रहता है, बस यह नजर नहीं आता. यही कारण है कि एसी में बैठने वाले लोग बिना महसूस किए डिहाइड्रेशन की तरफ बढ़ जाते हैं.

चाय और कॉफी भी नुकसानदायक

ऑफिस में चाय और कॉफी का चलन भी इस समस्या को बढ़ाता है. दिनभर लोग कई कप चाय या कॉफी पीते रहते हैं और मान लेते हैं कि उन्होंने पर्याप्त तरल ले लिया है. लेकिन हकीकत यह है कि ये ड्रिंक्स पानी की जगह ले लेती हैं, उसे बढ़ाती नहीं हैं. डॉ. रेड्डी के मुताबिक, लोगों को लगता है कि वे दिनभर कुछ न कुछ पीते रहे हैं, लेकिन असल में उनका शरीर उतना हाइड्रेट नहीं होता जितना होना चाहिए. यही वजह है कि दिन के अंत तक थकान और भारीपन महसूस होता है.

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क्या होते हैं इसके लक्षण?

डिहाइड्रेशन के लक्षण भी बहुत सामान्य लगते हैं कि जैसे हल्का सिरदर्द, ध्यान में कमी या शाम तक थकावट. लोग इन्हें काम का दबाव या नींद की कमी समझ लेते हैं, जबकि कई बार असली कारण पानी की कमी होता है. लंबे समय तक बैठे रहने से यह समस्या और बढ़ जाती है. जब हम घंटों एक जगह बैठकर काम करते हैं, तो शरीर के संकेतों पर ध्यान ही नहीं जाता. न उठने का मौका मिलता है, न पानी पीने का ध्यान आता है.

क्या हो सकती है दिक्कत?

डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि अगर लंबे समय तक पानी की कमी बनी रहे, तो इससे किडनी स्टोन या यूरिन इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है. ये असर तुरंत नहीं दिखते, लेकिन धीरे-धीरे गंभीर हो सकते हैं. अच्छी बात यह है कि इसका समाधान बहुत मुश्किल नहीं है. बस दिनभर थोड़ा-थोड़ा पानी पीने की आदत डालनी होगी, चाय-कॉफी पर निर्भरता कम करनी होगी और बीच-बीच में उठकर ब्रेक लेना होगा.

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क्या कमजोरी दूर करने के लिए कलेजी खाना है सही? खाने से पहले जान लें ये सच

क्या कमजोरी दूर करने के लिए कलेजी खाना है सही? खाने से पहले जान लें ये सच


Does Eating Liver Increase Blood In The Body: हममे से ज्यादातर लोगों ने बचपन से यह बात जरूर सुनी होगी कि कलेजी खाने से शरीर में खून बढ़ता है और कमजोरी दूर होती है. खासकर गर्भवती महिलाओं या शरीर में खून की कमी वाले लोगों को इसे खाने की सलाह दी जाती रही है. यही वजह है कि बकरी या मुर्गे की कलेजी बहुत से लोग स्वाद और सेहत दोनों के लिए खाते हैं. लेकिन क्या सच में यह शरीर के लिए इतनी फायदेमंद होती है, और क्या इसे खाने से इंसानी जिगर मजबूत हो सकता है?. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट के अनुसार, हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक कलेजी पोषक तत्वों से भरपूर मानी जाती है. इसमें शरीर के लिए जरूरी लौह तत्व, प्रोटीन और कई तरह के विटामिन पाए जाते हैं. खासतौर पर इसमें मौजूद ऐसा लौह तत्व शरीर आसानी से सोख लेता है, जिससे खून की कमी दूर करने में मदद मिल सकती है. यही कारण है कि कमजोरी या खून की कमी वाले लोगों को सीमित मात्रा में इसे खाने की सलाह दी जाती है.

क्यों जरूरी है यह?

एक्सपर्ट बताते हैं कि इसमें मौजूद विटामिन शरीर में रेड ब्लड सेल्स के निर्माण, दिमागी विकास और याददाश्त के लिए भी जरूरी माना जाता है. इसके साथ ही इसमें अच्छी गुणवत्ता वाला प्रोटीन पाया जाता है, जो मांसपेशियों की मरम्मत और बीमारी के बाद शरीर को दोबारा ताकत देने में मदद कर सकता है. इसके अलावा इसमें मौजूद एक खास विटामिन शरीर की इम्यून सिस्टम क्षमता मजबूत करने में मदद करता है. यह आंखों की रोशनी, त्वचा और शरीर के अंदर की झिल्लियों को स्वस्थ बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाता है. 

किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?

हालांकि एक्सपर्ट यह भी चेतावनी देते हैं कि किसी भी चीज की अधिकता नुकसान पहुंचा सकती है. कलेजी में कुछ विटामिन बहुत ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं, इसलिए इसका जरूरत से ज्यादा सेवन शरीर पर उल्टा असर डाल सकता है. खासतौर पर गर्भवती महिलाओं को इसे सीमित मात्रा में खाने की सलाह दी जाती है, क्योंकि अधिक मात्रा गर्भ में पल रहे शिशु के लिए नुकसानदायक मानी जाती है. 

बच्चों के लिए ध्यान

बच्चों के लिए भी इसे संतुलित मात्रा में ही देना चाहिए. न्यूट्रिशन एक्सपर्ट का कहना है कि कम उम्र के बच्चों को बहुत ज्यादा कलेजी नहीं खिलानी चाहिए. इसके साथ ही इसे ज्यादा तेल में तलने के बजाय हल्के मसालों में पकाकर देना बेहतर माना जाता है, ताकि इसके पोषक तत्व सुरक्षित रह सकें. वहीं जिन लोगों को कोलेस्ट्रॉल की समस्या है, उन्हें भी सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है. अधिक मात्रा में सेवन करने से शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.  

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इस बात का रखें ध्यान

सबसे जरूरी बात यह है कि जानवरों की कलेजी खाने से इंसानी लिवर की बीमारी ठीक नहीं होती. एक्सपर्ट का साफ कहते हैं कि इस धारणा का कोई साइंटफिक आधार नहीं है. शरीर को स्वस्थ रखने के लिए संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम और अच्छी नींद ही सबसे ज्यादा जरूरी मानी जाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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