घर पर नॉर्मल और डॉक्टर के सामने हाई क्यों हो जाता है ब्लड प्रेशर, चौंका देगी वजह

घर पर नॉर्मल और डॉक्टर के सामने हाई क्यों हो जाता है ब्लड प्रेशर, चौंका देगी वजह


कई लोगों के साथ ऐसा होता है कि जब वे घर पर अपना ब्लड प्रेशर नापते हैं तो रिपोर्ट बिल्कुल सामान्य आती है, लेकिन जैसे ही अस्पताल या क्लिनिक में डॉक्टर के सामने जांच कराते हैं, ब्लड प्रेशर अचानक बढ़ा हुआ दिखता है. यह देखकर लोग घबरा जाते हैं और सोचने लगते हैं कि कहीं उन्हें कोई गंभीर बीमारी तो नहीं हो गई.

यह समस्या आज के समय में बहुत आम हो गई है और इसके पीछे एक खास मेडिकल वजह होती है, जिसे डॉक्टर व्हाइट कोट हाइपरटेंशन कहते हैं. यह कोई गंभीर बीमारी नहीं है, लेकिन इसे हल्के में भी नहीं लेना चाहिए. तो आइए जानते हैं कि घर पर नॉर्मल और डॉक्टर के सामने हाई ब्लड प्रेशर क्यों हो जाता है.

क्या है व्हाइट कोट हाइपरटेंशन?

विशेषज्ञ बताते हैं कि जब किसी व्यक्ति का ब्लड प्रेशर घर पर सामान्य रहता है, लेकिन डॉक्टर या अस्पताल में जांच के समय बढ़ जाता है, तो इस स्थिति को व्हाइट कोट हाइपरटेंशन कहा जाता है. डॉक्टर के अनुसार, अस्पताल का माहौल, सफेद कोट पहने डॉक्टर, मेडिकल मशीनें और जांच की चिंता ये सभी चीजें व्यक्ति को अनजाने में तनाव में डाल देती हैं. इसी तनाव की वजह से ब्लड प्रेशर कुछ समय के लिए बढ़ जाता है.

अस्पताल में जाते ही ब्लड प्रेशर क्यों बढ़ जाता है?

अस्पताल जाते समय लोग अक्सर घबराए हुए होते हैं. किसी को बीमारी का डर होता है, तो किसी को रिपोर्ट खराब आने की चिंता, कई बार लोग जल्दी-जल्दी अस्पताल पहुंचते हैं, सीढ़ियां चढ़ते हैं या लंबा इंतजार करते हैं. ये सभी बातें ब्लड प्रेशर को अस्थायी रूप से बढ़ा सकती हैं. इसके अलावा नींद पूरी न होना, चाय या कॉफी पीकर जांच कराना, जांच के दौरान बात करना, धूम्रपान करना, मानसिक तनाव या बेचैनी भी ब्लड प्रेशर बढ़ने की वजह बन सकते हैं.

स्ट्रेस हार्मोन कैसे बढ़ाते हैं ब्लड प्रेशर?

डॉक्टरों के अनुसार, जब हम तनाव में होते हैं तो शरीर में कुछ खास हार्मोन निकलते हैं. ये हार्मोन दिल की धड़कन तेज कर देते हैं और खून की नलियों को कम्प्रेस कर देते हैं. इसका सीधा असर ब्लड प्रेशर पर पड़ता है और वह अचानक बढ़ जाता है. उनका कहना है कि परीक्षा का डर, डॉक्टर से मिलने की चिंता या पहले की कोई खराब मेडिकल याद, ये सब तनाव को बढ़ाते हैं और ब्लड प्रेशर कुछ समय के लिए ऊपर चला जाता है. 

क्या व्हाइट कोट हाइपरटेंशन खतरनाक है?

डॉक्टरों का कहना है कि हर बार अस्पताल में हाई ब्लड प्रेशर आना हमेशा खतरनाक नहीं होता, लेकिन इसे नजरअंदाज भी नहीं करना चाहिए. कुछ लोगों में यह आगे चलकर असली हाई ब्लड प्रेशर में बदल सकता है, जो दिल, किडनी, दिमाग और आंखों को नुकसान पहुंचा सकता है. हालांकि, सही तरीके से जांच और रिपोर्ट को समझ लिया जाए, तो बेवजह दवाइयां खाने से बचा जा सकता है. 

आपको क्या करना चाहिए?

घर पर डिजिटल बीपी मशीन से नियमित जांच करें, बीपी नापने से पहले कम से कम 5 मिनट शांति से बैठें. जांच से 30 मिनट पहले चाय, कॉफी, सिगरेट या एक्सरसाइज से बचें. रोज की रीडिंग एक डायरी में लिखें. डॉक्टर को घर पर नापी गई सभी रीडिंग दिखाएं. कुछ मामलों में डॉक्टर 24 घंटे की एम्बूलेटरी ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग की सलाह भी दे सकते हैं, जिससे पूरे दिन का सही औसत ब्लड प्रेशर पता चल सके. 

यह भी पढ़ें: भीषण ठंड से बचाव के लिए योग गुरु रामदेव ने दिए ये टिप्स, स्वदेशी अपनाने पर भी दिया जोर

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

काली-पीली और नीली… कितनी तरह की होती है हल्दी और किन बीमारियों में आती है काम?

काली-पीली और नीली… कितनी तरह की होती है हल्दी और किन बीमारियों में आती है काम?


Turmeric Types and Uses: हल्दी अपने सूजन-रोधी और एंटीऑक्सीडेंट गुणों के लिए जानी जाती है. इसका नियमित सेवन जोड़ों की सेहत को बेहतर बनाता है, पाचन सुधारता है और इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है. यह त्वचा के लिए भी हल्दी फायदेमंद है और मुंहासों को कम करने और पिग्मेंटेशन घटाने में मदद करती है. चाहे आप हल्दी को खाने में इस्तेमाल करें या घरेलू नुस्खों में, यह आपकी सेहत को कई तरह से फायदा पहुंचाती है.

यह कई तरह की होती है और हर तरह की हल्दी का अपना अलग महत्व है. कोई स्वाद के लिए खास है, तो कोई त्वचा और दवाइयों के लिए. अगर आप जानते हैं कि कौन-सी हल्दी किस काम की है, तो आप इसे सही तरीके से अपनी डाइट और लाइफस्टाइल में शामिल कर सकते हैं. सेहत सुधारनी हो, त्वचा निखारनी हो या खाने में सुनहरा रंग जोड़ना हो, हल्दी हर रूप में काम की है.

सामान्य हल्दी

सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली हल्दी यही है, जो आमतौर पर पाउडर के रूप में हर घर में मिल जाती है. यही वह पीली हल्दी है जो करी, सब्जी और दाल में रंग व स्वाद देती है. इसमें मौजूद कर्क्यूमिन इसे चमकीला रंग देता है और यही तत्व सूजन कम करने व शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों से बचाने में मदद करता है. खाना बनाने में यह स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ सेहत के लिए भी फायदेमंद होती है.

सफेद हल्दी

सफेद हल्दी आम हल्दी की तुलना में कम पाई जाती है. इसका रंग पीला नहीं होता और स्वाद भी हल्का होता है. आयुर्वेद में इसे पाचन सुधारने और सूजन कम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. कई एशियाई व्यंजनों, खासकर अचार और मसाला मिश्रण में इसका हल्का फ्लेवर देने के लिए उपयोग होता है.

जंगली हल्दी

जंगली हल्दी की खुशबू तेज होती है और इसका स्वाद भी सामान्य हल्दी से थोड़ा अलग होता है. इसका इस्तेमाल खाने में कम और आयुर्वेद व स्किन केयर में ज्यादा होता है. इसके पाउडर से फेस पैक बनाए जाते हैं, जो त्वचा की रंगत निखारने और दाग-धब्बे कम करने में मदद करते हैं.

काली हल्दी

काली हल्दी बहुत रेयर होती है और अंदर से इसका रंग गहरा, लगभग काला होता है। यह आमतौर पर रोज़मर्रा के खाने में इस्तेमाल नहीं की जाती. आयुर्वेद में इसे दर्द, सूजन, जोड़ों की परेशानी और सांस से जुड़ी दिक्कतों में उपयोगी माना जाता है.

एलेप्पी हल्दी

भारत के एलेप्पी शहर के नाम पर जानी जाने वाली यह हल्दी कर्क्यूमिन से भरपूर होती है. इसका रंग गहरा पीला और स्वाद तेज होता है. इसमें कर्क्यूमिन की मात्रा ज्यादा होने की वजह से इसे सेहत के लिहाज से बेहद असरदार माना जाता है. यही कारण है कि यह अच्छी क्वालिटी के मसालों और सप्लीमेंट्स में ज्यादा इस्तेमाल की जाती है.

इसे भी पढ़ें- Fatty Liver Disease: चेहरा दे रहा है फैटी लिवर का अलर्ट? नजरअंदाज करने से पहले जान लें ये 5 संकेत

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

कड़ाके की ठंड में भी शरीर रहेगा एकदम गरम, बाबा रामदेव के ये 5 टिप्स देंगे बंपर फायदा

कड़ाके की ठंड में भी शरीर रहेगा एकदम गरम, बाबा रामदेव के ये 5 टिप्स देंगे बंपर फायदा



Baba Ramdev Winter Tips: कड़ाके की ठंड में भी शरीर रहेगा एकदम गरम, बाबा रामदेव के ये 5 टिप्स देंगे बंपर फायदा



Source link

क्या खाना रखने के लिए आप भी इस्तेमाल करती हैं एल्यूमीनियम फॉयल, जानें अपने परिवार को किस खतरे म

क्या खाना रखने के लिए आप भी इस्तेमाल करती हैं एल्यूमीनियम फॉयल, जानें अपने परिवार को किस खतरे म


Is Aluminium Foil Safe for Food Storage: क्या आप भी पका हुआ खाना एल्युमिनियम फॉयल या एल्युमिनियम के डिब्बों में रख देते हैं?. ज्यादातर घरों में बची हुई रोटियां लपेटने, सब्ज़ी ढकने या टिफिन पैक करने के लिए एल्युमिनियम फॉयल का इस्तेमाल आम बात है. यह आसान, हल्का और तुरंत काम आने वाला तरीका लगता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह आदत आपकी सेहत के लिए कितनी सुरक्षित है?. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं. 

इससे क्या होता है नुकसान?

दिसंबर 2024 में Food Bioscience जर्नल में छपी एक स्टडी के मुताबिक, जब मछली को एल्युमिनियम फॉयल में तेज तापमान पर रोस्ट किया गया, तो फॉयल से धातु मछली के अंदर चली गई. रिसर्चर ने पाया कि जितना ज्यादा फॉयल इस्तेमाल हुआ, उतनी ही ज्यादा मात्रा में धातु खाने में मिली.

एक दूसरी स्टडी में यह देखा गया कि बेकिंग के दौरान एल्युमिनियम फॉयल से खाना कितनी मात्रा में प्रभावित होता है. इसमें पाया गया कि सैल्मन, मैकेरल, चिकन, पोर्क, टमाटर और चीज़ जैसे कई फूड आइटम्स में एल्युमिनियम की मात्रा 40 गुना तक बढ़ गई.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

इस मामले में डॉक्टर्स का कहना है कि एल्युमिनियम फॉयल और कंटेनर का गलत इस्तेमाल सेहत के लिए खतरा बन सकता है. एक्सपर्ट के अनुसार, एल्युमिनियम खासतौर पर खट्टे, नमकीन और मसालेदार खाने जैसे टमाटर, नींबू, सिरका, अचार और ग्रेवी के साथ रिएक्ट करता है. जब ऐसा खाना फॉयल या एल्युमिनियम के बर्तन में रखा या पकाया जाता है, तो धातु खाने में मिल सकती है.

डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि लंबे समय तक ज्यादा एल्युमिनियम शरीर में जाने से हड्डियों की समस्या, किडनी पर दबाव और नसों से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं.  किडनी के मरीजों में यह खतरा और ज्यादा बढ़ जाता है. 

रायपुर के जाने-माने ऑन्कोलॉजिस्ट और कैंसर सर्जन Dr Jayesh Sharma ने  सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा कर इस मुद्दे पर ध्यान दिलाया था. उन्होंने वीडियो के कैप्शन में उन्होंने लिखा, “गरम रोटी को एल्युमिनियम फॉयल में लपेटना कितना सुरक्षित है और कितना नुकसानदेह? हम रोजाना लंच पैक करने और खाना स्टोर करने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं. लेकिन यह भी चर्चा में है कि जब एल्युमिनियम को गर्म किया जाता है, तो क्या वह खाने में मिलकर किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है.”

 

कैसे रखें खाना सुरक्षित?

एक्सपर्ट के अनुसार,  रोजाना खाना पकाने या लंबे समय तक स्टोर करने के लिए एल्युमिनियम फॉयल या कंटेनर से बचें. इसके लिए खट्टा, नमकीन और मसालेदार खाना फॉयल में न रखें, पका हुआ खाना स्टील, कांच या सिरेमिक के बर्तनों में रखें और अगर बेकिंग या ग्रिलिंग में फॉयल इस्तेमाल करें, तो खाने और फॉयल के बीच बटर पेपर या बेकिंग पेपर लगाएं. इसके अलावा डिस्पोज़ेबल एल्युमिनियम कंटेनर दोबारा इस्तेमाल न करें. 

एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि सोशल मीडिया पर दिखने वाले ट्रेंड्स के चक्कर में आकर खाना स्टोर करने के गलत तरीके न अपनाएं. सेहत से जुड़े मामलों में काफी सावधानी रखने की जरूरत होती  है. सही जानकारी और एक्सपर्ट की सलाह से ही अपने और परिवार के लिए सुरक्षित विकल्प चुनें.

इसे भी पढ़ें- Nestle Baby Food: नेस्ले के इस प्रोडक्ट में मिला खतरनाक टॉक्सिन, बच्चों में उल्टी और पेट दर्द का खतरा, ऐसे करें चेक

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator





Source link

सुबह-सुबह दिखने लगे ये लक्षण तो समझ जाएं आने वाला है स्ट्रोक, गलती से भी मत कर देना इग्नोर

सुबह-सुबह दिखने लगे ये लक्षण तो समझ जाएं आने वाला है स्ट्रोक, गलती से भी मत कर देना इग्नोर


Stroke Symptoms in Elderly People: स्ट्रोक एक मेडिकल इमरजेंसी है, जो तब होता है जब ब्रेन तक जाने वाला ब्लड फ्लो अचानक रुक जाता है या कम हो जाता है. इससे दिमाग को ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते. समय रहते इलाज न मिले तो ब्रेन डैमेज, पैरालिसिस और जान का खतरा भी हो सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं, खासकर जब ये सुबह उठते समय दिखें.

स्ट्रोक क्यों आता है?

स्ट्रोक मुख्य रूप से दो तरह का होता है. पहला इस्केमिक स्ट्रोक, जिसमें दिमाग की नस में खून का थक्का जम जाता है. दूसरा हेमरेजिक स्ट्रोक, जिसमें नस फट जाती है या लीक होने लगती है।.इसके अलावा मिनी स्ट्रोक या टीटीए भी होता है, जो भविष्य में बड़े स्ट्रोक की चेतावनी माना जाता है. हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, ज्यादा कोलेस्ट्रॉल, स्मोकिंग, मोटापा, दिल की बीमारी, शारीरिक गतिविधि की कमी और ज्यादा शराब पीना इसके बड़े कारण हैं.

सुबह दिखने वाले स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण

डॉक्टरों के मुताबिक, कई बार स्ट्रोक के संकेत सुबह उठते ही नजर आने लगते हैं. अगर चेहरे का एक हिस्सा ढीला या टेढ़ा लगे, मुस्कुराने पर चेहरा असमान दिखे तो सावधान हो जाएं. अचानक हाथ या पैर में कमजोरी, सुन्नपन या झनझनाहट, खासकर शरीर के एक तरफ, स्ट्रोक का बड़ा संकेत हो सकता है.

बोलने में अचानक दिक्कत होना भी खतरनाक संकेत है. शब्द साफ न निकलें, बात समझ में न आए या साधारण वाक्य दोहराने में परेशानी हो तो इसे हल्के में न लें. इसके अलावा अचानक आंखों से कम दिखना, डबल विज़न या एक आंख से बिल्कुल न दिखना भी स्ट्रोक की ओर इशारा करता है.

कुछ लोगों में सुबह-सुबह अचानक भ्रम की स्थिति, बात समझने में दिक्कत, संतुलन बिगड़ना या चलते समय लड़खड़ाना भी दिख सकता है. बुजुर्गों में ये लक्षण और भी हल्के हो सकते हैं, जैसे अचानक ज्यादा थकान, चुप्पी, व्यवहार में बदलाव या रोजमर्रा के काम करने में परेशानी.

FAST टेस्ट से पहचानें स्ट्रोक

डॉक्टर FAST टेस्ट अपनाने की सलाह देते हैं, इसमें- 
F – Face- चेहरा टेढ़ा दिख रहा है?
A – Arm- एक हाथ उठाने में कमजोरी है?
S – Speech- बोलने में दिक्कत या आवाज लड़खड़ा रही है?
T – Time- एक भी लक्षण दिखे तो तुरंत इमरजेंसी कॉल करें.

क्यों जरूरी है तुरंत एक्शन?

स्ट्रोक में हर सेकंड कीमती होता है. जितनी जल्दी मरीज को अस्पताल पहुंचाया जाए, उतना ज्यादा ब्रेन डैमेज से बचाव संभव है. डॉक्टरों का कहना है कि सुबह दिखने वाले इन संकेतों को थकान, नींद की कमी या सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. अगर आपको या घर में किसी को सुबह उठते ही ऐसे लक्षण दिखें, तो देर न करें. तुरंत मेडिकल मदद लें, क्योंकि सही समय पर उठाया गया कदम जान बचा सकता है.

यह भी पढ़ें: ड्राइविंग के दौरान तेज संगीत सुनना कितना खतरनाक, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

पैदा होने के तुरंत बाद जरूर कराएं अपने बच्चे का NBS, वरना ताउम्र पछताएंगी आप

पैदा होने के तुरंत बाद जरूर कराएं अपने बच्चे का NBS, वरना ताउम्र पछताएंगी आप


पेरेंट्स बनना हर इंसान के जीवन का सबसे खूबसूरत एक्सपीरियंस होता है. जब घर में एक नन्हा सा मेहमान आता है, तो उसके साथ ढेर सारी खुशियां, सपने और जिम्मेदारियां भी आती हैं. हर माता-पिता यही चाहते हैं कि उनका बच्चा पूरी तरह स्वस्थ रहे, उसे किसी तरह की बीमारी या परेशानी न हो और वह बिना किसी रुकावट के अच्छा जीवन जिए. लेकिन कई बार कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं, जो बच्चे के जन्म के समय बाहर से दिखाई नहीं देतीं, बच्चा देखने में बिल्कुल सामान्य लगता है, लेकिन अंदर ही अंदर कोई गंभीर समस्या पनप रही होती है.

यही वजह है कि आज के समय में न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग टेस्ट (NBS) को बेहद जरूरी माना जाता है. यह एक साधारण लेकिन बहुत ही अहम जांच है, जो बच्चे के जन्म के तुरंत बाद की जाती है. इस टेस्ट की मदद से उन बीमारियों का पता लगाया जा सकता है, जिनके लक्षण शुरू में नजर नहीं आते, लेकिन अगर समय रहते इलाज न मिले तो आगे चलकर ये बच्चे की सेहत और ग्रोथ पर गहरा असर डाल सकती हैं. कई मामलों में पेरेंट्स को बाद में यह एहसास होता है कि काश उन्होंने समय पर यह टेस्ट करवा लिया होता. 

बच्चे के जन्म के शुरुआती घंटे क्यों होते हैं सबसे अहम?

बच्चे के जन्म के बाद के पहले 1,000 मिनट (करीब 16–17 घंटे) बहुत ही जरूरी होते हैं. इस समय के दौरान अगर न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग टेस्ट करवा लिया जाए, तो कई गंभीर बीमारियों को शुरुआत में ही पकड़ लिया जाता है. इससे डॉक्टर तुरंत इलाज शुरू कर सकते हैं और बच्चे को एक स्वस्थ भविष्य दिया जा सकता है. अफसोस की बात यह है कि जानकारी की कमी या लापरवाही के कारण कई पेरेंट्स इस टेस्ट को जरूरी नहीं समझते और बाद में उन्हें इसका पछतावा होता है. अगर दुनिया भर के आंकड़ों पर नजर डालें, तो यह समस्या और भी गंभीर नजर आती है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के अनुसार, हर दिन लगभग 6,500 नवजात बच्चों की मौत हो जाती है. पांच साल से कम उम्र के बच्चों की कुल मौतों में से करीब 47 प्रतिशत मौतें नवजात शिशुओं की होती हैं. ये आंकड़े साफ बताते हैं कि जन्म के तुरंत बाद बच्चों की सेहत पर खास ध्यान देना कितना जरूरी है. 

भारत में भी जरूरी है न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग

भारत में भी शिशु मृत्यु दर अब भी एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है. कई ऐसी बीमारियां हैं, जिन्हें अगर समय रहते पहचान लिया जाए, तो पूरी तरह कंट्रोल किया जा सकता है. ऐसे में नवजात शिशुओं की शुरुआती स्क्रीनिंग एक बहुत ही असरदार कदम है. इससे न सिर्फ बच्चे की जान बचाई जा सकती है, बल्कि उसे आगे चलकर होने वाली शारीरिक और मानसिक परेशानियों से भी बचाया जा सकता है. 

NBS टेस्ट से किन बीमारियों का चलता है पता?

न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग टेस्ट के जरिए जन्म के समय ही कई गंभीर बीमारियों की पहचान की जा सकती है, जैसे जन्मजात हाइपोथायरायडिज्म, जन्मजात एड्रेनल हाइपरप्लासिया (CAH), G6PD की कमी, गैलेक्टोसेमिया, बायोटिनिडेज की कमी, जन्म से सुनने में कमी, गंभीर जन्मजात हार्ट डिजीज. इन बीमारियों के लक्षण शुरुआत में नजर नहीं आते, लेकिन समय के साथ ये बच्चे के ग्रोथ में रुकावट डाल सकती हैं.  न्यू बॉर्न बेबी स्क्रीनिंग (NBS) टेस्ट को कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. यह टेस्ट बच्चे के जन्म के तुरंत बाद करवा लेना चाहिए, ताकि किसी भी छुपी हुई बीमारी का समय रहते पता लगाया जा सके. सही समय पर जांच और इलाज से बच्चे को एक स्वस्थ, सुरक्षित और बेहतर जीवन दिया जा सकता है. 

यह भी पढ़ें – Bronchial Asthma: सर्दियों में क्यों बढ़ जाती है सांस की तकलीफ? जानें ब्रोन्कियल अस्थमा के कारण और राहत पाने के असरदार घरेलू उपाय

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

YouTube
Instagram
WhatsApp