सुबह-सुबह दिखने लगे ये लक्षण तो समझ जाएं आने वाला है स्ट्रोक, गलती से भी मत कर देना इग्नोर

सुबह-सुबह दिखने लगे ये लक्षण तो समझ जाएं आने वाला है स्ट्रोक, गलती से भी मत कर देना इग्नोर


Stroke Symptoms in Elderly People: स्ट्रोक एक मेडिकल इमरजेंसी है, जो तब होता है जब ब्रेन तक जाने वाला ब्लड फ्लो अचानक रुक जाता है या कम हो जाता है. इससे दिमाग को ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते. समय रहते इलाज न मिले तो ब्रेन डैमेज, पैरालिसिस और जान का खतरा भी हो सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं, खासकर जब ये सुबह उठते समय दिखें.

स्ट्रोक क्यों आता है?

स्ट्रोक मुख्य रूप से दो तरह का होता है. पहला इस्केमिक स्ट्रोक, जिसमें दिमाग की नस में खून का थक्का जम जाता है. दूसरा हेमरेजिक स्ट्रोक, जिसमें नस फट जाती है या लीक होने लगती है।.इसके अलावा मिनी स्ट्रोक या टीटीए भी होता है, जो भविष्य में बड़े स्ट्रोक की चेतावनी माना जाता है. हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, ज्यादा कोलेस्ट्रॉल, स्मोकिंग, मोटापा, दिल की बीमारी, शारीरिक गतिविधि की कमी और ज्यादा शराब पीना इसके बड़े कारण हैं.

सुबह दिखने वाले स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण

डॉक्टरों के मुताबिक, कई बार स्ट्रोक के संकेत सुबह उठते ही नजर आने लगते हैं. अगर चेहरे का एक हिस्सा ढीला या टेढ़ा लगे, मुस्कुराने पर चेहरा असमान दिखे तो सावधान हो जाएं. अचानक हाथ या पैर में कमजोरी, सुन्नपन या झनझनाहट, खासकर शरीर के एक तरफ, स्ट्रोक का बड़ा संकेत हो सकता है.

बोलने में अचानक दिक्कत होना भी खतरनाक संकेत है. शब्द साफ न निकलें, बात समझ में न आए या साधारण वाक्य दोहराने में परेशानी हो तो इसे हल्के में न लें. इसके अलावा अचानक आंखों से कम दिखना, डबल विज़न या एक आंख से बिल्कुल न दिखना भी स्ट्रोक की ओर इशारा करता है.

कुछ लोगों में सुबह-सुबह अचानक भ्रम की स्थिति, बात समझने में दिक्कत, संतुलन बिगड़ना या चलते समय लड़खड़ाना भी दिख सकता है. बुजुर्गों में ये लक्षण और भी हल्के हो सकते हैं, जैसे अचानक ज्यादा थकान, चुप्पी, व्यवहार में बदलाव या रोजमर्रा के काम करने में परेशानी.

FAST टेस्ट से पहचानें स्ट्रोक

डॉक्टर FAST टेस्ट अपनाने की सलाह देते हैं, इसमें- 
F – Face- चेहरा टेढ़ा दिख रहा है?
A – Arm- एक हाथ उठाने में कमजोरी है?
S – Speech- बोलने में दिक्कत या आवाज लड़खड़ा रही है?
T – Time- एक भी लक्षण दिखे तो तुरंत इमरजेंसी कॉल करें.

क्यों जरूरी है तुरंत एक्शन?

स्ट्रोक में हर सेकंड कीमती होता है. जितनी जल्दी मरीज को अस्पताल पहुंचाया जाए, उतना ज्यादा ब्रेन डैमेज से बचाव संभव है. डॉक्टरों का कहना है कि सुबह दिखने वाले इन संकेतों को थकान, नींद की कमी या सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. अगर आपको या घर में किसी को सुबह उठते ही ऐसे लक्षण दिखें, तो देर न करें. तुरंत मेडिकल मदद लें, क्योंकि सही समय पर उठाया गया कदम जान बचा सकता है.

यह भी पढ़ें: ड्राइविंग के दौरान तेज संगीत सुनना कितना खतरनाक, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पैदा होने के तुरंत बाद जरूर कराएं अपने बच्चे का NBS, वरना ताउम्र पछताएंगी आप

पैदा होने के तुरंत बाद जरूर कराएं अपने बच्चे का NBS, वरना ताउम्र पछताएंगी आप


पेरेंट्स बनना हर इंसान के जीवन का सबसे खूबसूरत एक्सपीरियंस होता है. जब घर में एक नन्हा सा मेहमान आता है, तो उसके साथ ढेर सारी खुशियां, सपने और जिम्मेदारियां भी आती हैं. हर माता-पिता यही चाहते हैं कि उनका बच्चा पूरी तरह स्वस्थ रहे, उसे किसी तरह की बीमारी या परेशानी न हो और वह बिना किसी रुकावट के अच्छा जीवन जिए. लेकिन कई बार कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं, जो बच्चे के जन्म के समय बाहर से दिखाई नहीं देतीं, बच्चा देखने में बिल्कुल सामान्य लगता है, लेकिन अंदर ही अंदर कोई गंभीर समस्या पनप रही होती है.

यही वजह है कि आज के समय में न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग टेस्ट (NBS) को बेहद जरूरी माना जाता है. यह एक साधारण लेकिन बहुत ही अहम जांच है, जो बच्चे के जन्म के तुरंत बाद की जाती है. इस टेस्ट की मदद से उन बीमारियों का पता लगाया जा सकता है, जिनके लक्षण शुरू में नजर नहीं आते, लेकिन अगर समय रहते इलाज न मिले तो आगे चलकर ये बच्चे की सेहत और ग्रोथ पर गहरा असर डाल सकती हैं. कई मामलों में पेरेंट्स को बाद में यह एहसास होता है कि काश उन्होंने समय पर यह टेस्ट करवा लिया होता. 

बच्चे के जन्म के शुरुआती घंटे क्यों होते हैं सबसे अहम?

बच्चे के जन्म के बाद के पहले 1,000 मिनट (करीब 16–17 घंटे) बहुत ही जरूरी होते हैं. इस समय के दौरान अगर न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग टेस्ट करवा लिया जाए, तो कई गंभीर बीमारियों को शुरुआत में ही पकड़ लिया जाता है. इससे डॉक्टर तुरंत इलाज शुरू कर सकते हैं और बच्चे को एक स्वस्थ भविष्य दिया जा सकता है. अफसोस की बात यह है कि जानकारी की कमी या लापरवाही के कारण कई पेरेंट्स इस टेस्ट को जरूरी नहीं समझते और बाद में उन्हें इसका पछतावा होता है. अगर दुनिया भर के आंकड़ों पर नजर डालें, तो यह समस्या और भी गंभीर नजर आती है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के अनुसार, हर दिन लगभग 6,500 नवजात बच्चों की मौत हो जाती है. पांच साल से कम उम्र के बच्चों की कुल मौतों में से करीब 47 प्रतिशत मौतें नवजात शिशुओं की होती हैं. ये आंकड़े साफ बताते हैं कि जन्म के तुरंत बाद बच्चों की सेहत पर खास ध्यान देना कितना जरूरी है. 

भारत में भी जरूरी है न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग

भारत में भी शिशु मृत्यु दर अब भी एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है. कई ऐसी बीमारियां हैं, जिन्हें अगर समय रहते पहचान लिया जाए, तो पूरी तरह कंट्रोल किया जा सकता है. ऐसे में नवजात शिशुओं की शुरुआती स्क्रीनिंग एक बहुत ही असरदार कदम है. इससे न सिर्फ बच्चे की जान बचाई जा सकती है, बल्कि उसे आगे चलकर होने वाली शारीरिक और मानसिक परेशानियों से भी बचाया जा सकता है. 

NBS टेस्ट से किन बीमारियों का चलता है पता?

न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग टेस्ट के जरिए जन्म के समय ही कई गंभीर बीमारियों की पहचान की जा सकती है, जैसे जन्मजात हाइपोथायरायडिज्म, जन्मजात एड्रेनल हाइपरप्लासिया (CAH), G6PD की कमी, गैलेक्टोसेमिया, बायोटिनिडेज की कमी, जन्म से सुनने में कमी, गंभीर जन्मजात हार्ट डिजीज. इन बीमारियों के लक्षण शुरुआत में नजर नहीं आते, लेकिन समय के साथ ये बच्चे के ग्रोथ में रुकावट डाल सकती हैं.  न्यू बॉर्न बेबी स्क्रीनिंग (NBS) टेस्ट को कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. यह टेस्ट बच्चे के जन्म के तुरंत बाद करवा लेना चाहिए, ताकि किसी भी छुपी हुई बीमारी का समय रहते पता लगाया जा सके. सही समय पर जांच और इलाज से बच्चे को एक स्वस्थ, सुरक्षित और बेहतर जीवन दिया जा सकता है. 

यह भी पढ़ें – Bronchial Asthma: सर्दियों में क्यों बढ़ जाती है सांस की तकलीफ? जानें ब्रोन्कियल अस्थमा के कारण और राहत पाने के असरदार घरेलू उपाय

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सर्दियों में क्यों बढ़ जाती है सांस की तकलीफ? जानें ब्रोन्कियल अस्थमा के कारण और राहत पाने के अस

सर्दियों में क्यों बढ़ जाती है सांस की तकलीफ? जानें ब्रोन्कियल अस्थमा के कारण और राहत पाने के अस


Why Asthma Gets Worse in Winter: ब्रोंकियल अस्थमा एक पुरानी सांस की बीमारी है, जिसमें सांस की नलियों में लगातार सूजन बनी रहती है. यह बीमारी फिर एक बार चर्चा में हैं, क्योंकि कांग्रेस नेता सोनिया गांधी को 5 जनवरी को सांस लेने में तकलीफ के बाद दिल्ली के श्री गंगा राम अस्पताल में भर्ती कराया गया. अस्पताल के चेयरमैन डॉ. अजय स्वरूप के मुताबिक, ठंड और प्रदूषण के असर से उनके ब्रोंकियल अस्थमा के लक्षण थोड़े बढ़ गए थे, इसलिए एहतियातन उन्हें अस्पताल में रखा गया. अस्पताल प्रशासन ने बताया कि उनकी हालत स्थिर है और इलाज का अच्छा असर हो रहा है.

सर्दियों में अस्थमा की दिक्कत

सर्दियों में अस्थमा के मरीजों की परेशानी बढ़ना कोई नई बात नहीं है.  उत्तर भारत में हर साल ठंड के मौसम के दौरान अस्थमा से जुड़ी इमरजेंसी और अस्पताल में भर्ती होने के मामले बढ़ जाते हैं. खासतौर पर बुजुर्ग, बच्चे और पहले से सांस की बीमारी से जूझ रहे लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं. 

क्या है ब्रोंकियल अस्थमा?

ब्रोंकियल अस्थमा में सांस की वेसल्स बाहरी कारणों के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाती हैं. ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा के अनुसार, अस्थमा के मुख्य लक्षणों में बार-बार घरघराहट, सांस फूलना, सीने में जकड़न और रात या सुबह के समय खांसी शामिल हैं. इस बीमारी में एयरवे संकरी हो जाती हैं, उनमें सूजन और ज्यादा बलगम बनने लगता है, जिससे फेफड़ों में हवा का आना-जाना मुश्किल हो जाता है. लक्षण कभी हल्के तो कभी गंभीर हो सकते हैं.

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन  के मुताबिक, दुनिया भर में करीब 26 करोड़ लोग अस्थमा से प्रभावित हैं और हर साल इससे साढ़े चार लाख से ज्यादा मौतें होती हैं, जिनमें से कई सही इलाज से रोकी जा सकती हैं.

सर्दियों में अस्थमा क्यों बिगड़ जाता है?

ठंडी और सूखी हवा सीधे सांस की नलियों को चुभती है, जिससे वे सिकुड़ जाती हैं और सांस लेने में दिक्कत बढ़ती है। सर्दियों में प्रदूषण भी चरम पर होता है. हवा में मौजूद PM2.5 और PM10 जैसे कण अस्थमा की सूजन को और बढ़ा देते हैं. इसके अलावा, इस मौसम में वायरल इंफेक्शन जैसे फ्लू और सर्दी-जुकाम ज्यादा फैलते हैं. ठंड में लोग ज्यादा समय घर के अंदर बिताते हैं, जहां धूल, फफूंद, पालतू जानवरों के बाल और खराब वेंटिलेशन भी अस्थमा को ट्रिगर कर सकते हैं.

बचाव के आसान उपाय

डॉक्टर सलाह देते हैं कि नियमित दवाएं और इनहेलर बंद न करें, बाहर निकलते समय नाक-मुंह ढकें, प्रदूषण ज्यादा होने पर बाहर जाने से बचें, फ्लू का टीका लगवाएं, घर को साफ और हवादार रखें और लक्षण बढ़ते ही डॉक्टर से संपर्क करें. समय पर पहचान, सही इलाज और सावधानी से अस्थमा के मरीज गंभीर हालात और अस्पताल में भर्ती होने से बच सकते हैं.

इसे भी पढ़ें- Nestle Baby Food: नेस्ले के इस प्रोडक्ट में मिला खतरनाक टॉक्सिन, बच्चों में उल्टी और पेट दर्द का खतरा, ऐसे करें चेक

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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भीषण ठंड से बचाव के लिए योग गुरु रामदेव ने दिए ये टिप्स, स्वदेशी अपनाने पर भी दिया जोर

भीषण ठंड से बचाव के लिए योग गुरु रामदेव ने दिए ये टिप्स, स्वदेशी अपनाने पर भी दिया जोर


हाल ही में एक फेसबुक लाइव सत्र के दौरान योग गुरु और पतंजलि के संस्थापक स्वामी रामदेव ने देश के विभिन्न हिस्सों में पड़ रही भीषण ठंड पर चिंता व्यक्त की. उन्होंने न केवल इस मौसम में शरीर को सुरक्षित रखने के उपाय बताए, बल्कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य को राष्ट्रहित और ‘स्वदेशी’ अभियान से भी जोड़ा.

ठंड से बचाव और स्वास्थ्य सुरक्षा

रामदेव ने बताया कि अत्यधिक ठंड के लंबे समय तक संपर्क में रहने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) कमजोर हो जाती है. इसके कारण खांसी, जुकाम और जोड़ों में दर्द जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं. उन्होंने सुझाव दिया कि सर्दियों में केवल दवाइयों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी जीवनशैली और खान-पान में समय रहते बदलाव करना चाहिए.

उन्होंने शरीर की गर्माहट बनाए रखने के लिए संतुलित आहार, गर्म तरल पदार्थों के सेवन और नियमित शारीरिक व्यायाम पर जोर दिया. रामदेव के अनुसार, सर्दियों में रक्त संचार को सक्रिय रखना बेहद जरूरी है. इसके लिए उन्होंने विशेष रूप से प्राणायाम और सांस से जुड़े योगाभ्यास की सलाह दी, जो श्वसन तंत्र को मजबूत बनाते हैं.

सेहत के साथ स्वदेशी का संकल्प

स्वास्थ्य चर्चा को आगे बढ़ाते हुए रामदेव ने इसे ‘स्वदेशी’ जीवनशैली से जोड़ा. उन्होंने कहा कि भारतीय उत्पादों का चयन करना केवल एक आर्थिक निर्णय नहीं है, बल्कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है. उनके अनुसार, जब हम स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करते हैं, तो हम देश में रोजगार सृजन और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की मजबूती में योगदान देते हैं.

पतंजलि की भूमिका और राष्ट्र सेवा

सत्र के दौरान उन्होंने पतंजलि के मेगास्टोर और बढ़ते रिटेल नेटवर्क का उल्लेख करते हुए बताया कि ये पहल आयुर्वेद और पारंपरिक भारतीय ज्ञान को आम जनता तक सुलभ बनाने का प्रयास है. उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य और राष्ट्र सेवा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.

सत्र के अंत में रामदेव ने लोगों से अपील की कि वे बीमारियों के प्रति सक्रिय होने के बजाय निवारक दृष्टिकोण अपनाएं. उन्होंने स्पष्ट किया कि एक स्वस्थ नागरिक ही एक सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण कर सकता है.

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नेस्ले के इस प्रोडक्ट में मिला खतरनाक टॉक्सिन, बच्चों में उल्टी और पेट दर्द का खतरा, ऐसे करें च

नेस्ले के इस प्रोडक्ट में मिला खतरनाक टॉक्सिन, बच्चों में उल्टी और पेट दर्द का खतरा, ऐसे करें च


Nestle NAN Baby Formula Recall: फूड और बेवरेज सेक्टर की दिग्गज कंपनी नेस्ले ने मंगलवार को अपने कुछ प्रमुख बेबी न्यूट्रिशन प्रोडक्ट्स को वापस मंगाने का ऐलान किया. कंपनी ने बताया कि इन प्रोडक्ट्स में एक ऐसे टॉक्सिन के होने की आशंका है, जिससे बच्चों में उल्टी और मतली जैसी दिक्कतें हो सकती हैं.

जिन प्रोडक्ट्स को रिकॉल किया गया है, उसमें  SMA, BEBA और NAN ब्रांड के इन्फैंट और फॉलो-ऑन फॉर्मूला शामिल हैं. ये प्रोडेक्ट मुख्य रूप से यूरोप में बेचे जाते हैं, हालांकि BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, नेस्ले अधिकारियों ने इसे दुनियाभर में जहां भी बेचा जाता है, वहां से वापस मंगाया है.

कंपनी ने क्या कहा?

कंपनी की तरफ से Reuters को बताया गया कि एक बड़े सप्लायर से मिले एक इंग्रीडिएंट में क्वालिटी से जुड़ी समस्या सामने आने के बाद यह फैसला लिया गया. इसके बाद नेस्ले ने अपने सभी प्रभावित इन्फैंट न्यूट्रिशन प्रोडक्ट्स में इस्तेमाल होने वाले एराकिडोनिक एसिड ऑयल और उससे जुड़े ऑयल मिक्स की जांच शुरू की.  

नेस्ले ने साफ किया है कि अब तक किसी भी रिकॉल किए गए प्रोडक्ट से जुड़ी बीमारी या लक्षण की पुष्टि नहीं हुई है. कंपनी ने यह भी बताया कि दिसंबर में सीमित स्तर पर शुरू हुआ यह रिकॉल अब बड़े स्तर पर किया जा रहा है. ऑस्ट्रिया के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इस रिकॉल से नेस्ले की 10 से ज्यादा फैक्ट्रियों में बने 800 से अधिक प्रोडक्ट्स प्रभावित हुए हैं. इसे कंपनी के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा प्रोडक्ट रिकॉल बताया जा रहा है.

 

 प्रभावित बैच की पहचान कैसे करें?

नेस्ले ने अलग-अलग देशों में बिकने वाले उन बैच नंबरों की सूची जारी की है, जिनका सेवन नहीं किया जाना चाहिए. कंपनी ने कहा है कि वह सप्लाई में होने वाली किसी भी रुकावट को कम करने के लिए काम कर रही है.

ग्राहकों को सलाह दी गई है कि पाउडर फॉर्मूला के लिए डिब्बे या पैक के नीचे लिखे कोड को देखें, जबकि रेडी-टू-फीड फॉर्मूला के लिए बाहरी बॉक्स और कंटेनर के साइड या ऊपर दिए गए कोड की जांच करें.

क्यों किया गया रिकॉल?

नेस्ले ने ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, आयरलैंड, इटली, नॉर्वे, स्विट्ज़रलैंड और ब्रिटेन में इन प्रोडक्ट्स को रिकॉल किया है. वजह बताई गई है सेर्यूलाइड नामक टॉक्सिन की संभावित मौजूदगी, जोबैसिलस सेरेस बैक्टीरिया के कुछ स्ट्रेन से बनता है.

ब्रिटेन की फूड स्टेंडर्ड एजेंसी के अनुसार, यह टॉक्सिन पकाने, उबालने या दूध तैयार करने की प्रक्रिया में नष्ट नहीं होता. अगर इसका सेवन हो जाए, तो जल्दी ही उल्टी, मतली और पेट में ऐंठन जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं. वहीं, नॉर्वे की फूड सेफ्टी एजेंसी ने कहा है कि इससे कोई तुरंत गंभीर स्वास्थ्य जोखिम नहीं है.

ये भी पढ़ें-कैसे काम करती है जोमैटो के दीपेंदर हुड्डा की टेंपल डिवाइस, एम्स के डॉक्टर ने क्यों जताई चिंता?

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कैसे होती है वर्चुअल अटॉप्सी, नॉर्मल पोस्टमॉर्टम से यह कितनी अलग?

कैसे होती है वर्चुअल अटॉप्सी, नॉर्मल पोस्टमॉर्टम से यह कितनी अलग?


भोपाल जल्द ही देश के उन शहरों में शामिल हो सकता है, जहां बिना चीर फाड़ के पोस्टमॉर्टम किया जाएगा. जापान और विकसित देशों की तर्ज पर भोपाल में वर्चुअल अटॉप्सी की शुरुआत की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है. एम्स भोपाल में बिना चीर फाड़ के पोस्टमॉर्टम की यह आधुनिक तकनीक लागू करने को सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है. इसके तहत शव को नुकसान पहुंचाए बिना मौत के कारणों की जांच की जाएगी और पूरी प्रक्रिया महज आधे घंटे में पूरी हो सकेगी. दरअसल एम्स भोपाल प्रबंधन ने वर्चुअल अटॉप्सी सेंटर स्थापित करने का प्रस्ताव भारत सरकार की स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी के सामने रखा है. इससे पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक रूप से मंजूरी दे चुका है. अब इसे वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधियों के सामने प्रस्तुत किया गया है जिसके बाद इस प्रस्ताव को लेकर प्रतिक्रिया सकारात्मक रही है और जल्द फंड जारी होने की उम्मीद जताई जा रही है. मंजूरी मिलने पर एम्स भोपाल मध्य प्रदेश का पहला हॉस्पिटल होगा, जहां वर्चुअल अटॉप्सी की सुविधा शुरू होगी. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि वर्चुअल अटॉप्सी कैसे होती है और यह नॉर्मल पोस्टमॉर्टम से कितनी अलग है.

क्या होती है वर्चुअल अटॉप्सी?

वर्चुअल अटॉप्सी को वर्चुअल पोस्टमॉर्टम भी कहा जाता है. वहीं आमतौर पर पोस्टमॉर्टम में शरीर में कई कट लगाकर अंदरूनी हिस्सों की की जांच की जाती है, लेकिन वर्चुअल पोस्टमॉर्टम में ऐसा नहीं होता है. इसमें टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है. जिससे इसमें बॉडी को चीरने या काटने की जरूरत नहीं होती है. डॉक्टर इस टेक्नोलॉजी से ही सीटी स्कैन, एमआरआई, एक्स रे और डिजिटल इमेजिंग की मदद से शरीर के अंदरूनी हिस्सों की जांच करते हैं. यह एक तरह की रेडियोलॉजिकल जांच होती है, जिससे अंदरूनी चोट, खून के थक्के, फ्रैक्चर या अंगों में आई गड़बड़ी का पता लगाया जाता है.

वर्चुअल अटॉप्सी की रिपोर्ट होती है पूरी तरह डिजिटल

वर्चुअल अटॉप्सी से मिलने वाली रिपोर्ट पूरी तरह डिजिटल होती है, जिसे लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. अगर मौत का कारण किसी नस में ब्लॉकेज है तो रिपोर्ट में उस नस की 3डी इमेज होती है. इसमें पहले पूरे शरीर की इमेज फिर बॉडी पार्ट और लास्ट में उस नस की क्लोजअप इमेज होती है. वर्चुअल अटॉप्सी के ऐसे डिजिटल सबूत अदालत में भी मजबूत प्रमाण के तौर पर पेश किए जा सकते हैं.

नॉर्मल पोस्टमॉर्टम से कितनी अलग है यह टेक्नोलॉजी ?

नॉर्मल पोस्टमॉर्टम में शरीर को काटकर अंदरूनी अंगों की जांच की जाती है, जबकि वर्चुअल अटॉप्सी पूरी तरह टेक्नोलॉजी पर आधारित होती है. एक्सपर्ट्स के अनुसार इसकी रिपोर्ट उतनी ही सटीक होती है जितनी नॉर्मल पोस्टमॉर्टम की. लेकिन इसमें समय कम लगता है और खर्च भी कम आता है. भारत में वर्चुअल अटॉप्सी की शुरुआत सबसे पहले 2021 में एम्स दिल्ली में हुई थी. इसके बाद शिलॉन्ग स्थित एनईआईजीआरआईएचएमएस में भी यह सुविधा शुरू की गई. इसके अलावा एम्स ऋषिकेश में भी इस टेक्नोलॉजी को लागू करने की मंजूरी दी जा चुकी है.

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