दिनभर च्विंगम चबाते हैं तो हो जाएं सावधान, पापा बनने में आ सकती है दिक्कत

दिनभर च्विंगम चबाते हैं तो हो जाएं सावधान, पापा बनने में आ सकती है दिक्कत


Does Chewing Gum Affect Male Fertility: ऑफिस जाते समय कॉफी लेना, दिनभर च्युइंग गम चबाना या जिम वियर पहनना, ये सब हमारी रोजमर्रा की आदतें हैं. लेकिन अब एक्सपर्ट चेतावनी दे रहे हैं कि ये छोटी-छोटी चीजें आपकी फर्टिलिटी पर असर डाल सकती हैं. खासकर च्युइंग गम, जो देखने में बिल्कुल सामान्य लगता है, अंदर ही अंदर बड़ा खतरा बन सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि ये कैसे आपके फर्टिलिटी को प्रभावित करते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

फर्टिलिटी एक्सपर्ट Dr Phoebe Howells के मुताबिक, इसके पीछे वजह है माइक्रोप्लास्टिक्स. ये बेहद छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, जो हमारे आसपास की चीजों, जैसे पैकेजिंग, कपड़े, और यहां तक कि च्युइंग गम से निकलकर शरीर में पहुंच जाते हैं. हालिया रिसर्च में यह सामने आया है कि एक च्युइंग गम चबाने से सैकड़ों माइक्रोप्लास्टिक कण शरीर में जा सकते हैं, जिनमें से ज्यादातर पहले कुछ मिनटों में ही रिलीज हो जाते हैं. यही कण धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर हार्मोनल सिस्टम को प्रभावित करते हैं. 

पुरुषों और महिलाओं पर क्या होता है प्रभाव?

डॉ. हॉवेल्स बताती हैं कि माइक्रोप्लास्टिक्स में मौजूद केमिकल्सस जैसे BPA, फ्थेलेट्स और PFAS शरीर के हार्मोन को डिस्टर्ब कर सकते हैं. पुरुषों में यह स्पर्म काउंट, क्वालिटी और मूवमेंट पर असर डाल सकते हैं, जबकि महिलाओं में ओव्यूलेशन और पीरियड साइकल पर असर पड़ सकता है.

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क्या निकला रिसर्च में

यूरोपियन सोसाइटी ऑफ ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड एम्ब्रियोलॉजी में पेश एक 2025 की स्टडी में पाया गया कि फर्टिलिटी ट्रीटमेंट करा रही महिलाओं के 69 प्रतिशत सैंपल और पुरुषों के 55 प्रतिशत सैंपल में माइक्रोप्लास्टिक्स मौजूद थे.  वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मेक्सिको की 2024 की रिसर्च में मानव टेस्टिकल टिशू में भी माइक्रोप्लास्टिक्स पाए गए. 

किन चीजों से होती है दिक्कत?

समस्या सिर्फ च्युइंग गम तक सीमित नहीं है। चाय के टी-बैग, टेकअवे कॉफी कप, प्लास्टिक कंटेनर और सिंथेटिक कपड़े, ये सभी माइक्रोप्लास्टिक्स के बड़े सोर्स हैं. खासकर गर्म चीजों के संपर्क में आने पर इनसे ज्यादा कण निकलते हैं, जो सीधे शरीर में पहुंच जाते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि प्लास्टिक को पूरी तरह से जीवन से हटाना संभव नहीं है, क्योंकि यह हर जगह मौजूद है. लेकिन छोटे-छोटे बदलाव करके इसके असर को कम किया जा सकता है. जैसे प्लास्टिक की जगह ग्लास या सिरेमिक का इस्तेमाल करना, ढीले-ढाले और नेचुरल फैब्रिक पहनना और च्युइंग गम की जगह नेचुरल विकल्प चुनना.

फर्टिलिटी सिर्फ उम्र या खानपान पर निर्भर नहीं करती, बल्कि हमारे आसपास का माहौल भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है. अगर आप भविष्य में पैरेंट बनने की योजना बना रहे हैं, तो इन छोटी आदतों पर ध्यान देना जरूरी है. क्योंकि कई बार जो चीजें हमें सबसे सामान्य लगती हैं, वही लंबे समय में सबसे ज्यादा असर डालती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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इस छोटे-से ब्लड टेस्ट से ही पता लग जाएंगे कई कैंसर, बीमार होने से पहले ही करा सकेंगे इलाज

इस छोटे-से ब्लड टेस्ट से ही पता लग जाएंगे कई कैंसर, बीमार होने से पहले ही करा सकेंगे इलाज


How MethylScan Blood Test Detects Cancer Early: मेडिकल साइंस तेजी से ऐसे दौर में पहुंच रही है, जहां एक साधारण ब्लड टेस्ट कई बड़ी बीमारियों का संकेत दे सकता है. इसी दिशा में एक अहम कदम कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजिल्स के रिसर्चर ने उठाया है, जिन्होंने एक नया टेस्ट विकसित किया है, जो कैंसर समेत कई बीमारियों का शुरुआती स्तर पर पता लगाने में मदद कर सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि रिसर्च में क्या निकला है. 

क्या निकला रिसर्च में?

यह रिसर्च प्रतिष्ठित जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में प्रकाशित हुई है, जिसमें बताया गया है कि सिर्फ एक ब्लड सैंपल के जरिए शरीर के पूरे सेहत का आकलन किया जा सकता है. मेडिकल फील्ड में शुरुआती पहचान सबसे बड़ी चुनौती रही है. कैंसर जैसी बीमारियां अगर समय रहते पकड़ में आ जाएं, तो उनका इलाज काफी आसान हो जाता है. लेकिन अभी तक जो टेस्ट मौजूद हैं, वे अक्सर किसी एक बीमारी पर फोकस करते हैं और कई बार महंगे या असुविधाजनक भी होते हैं.

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इस तकनीक को क्या नाम दिया गया?

इस नई तकनीक को “MethylScan” नाम दिया गया है. यह टेस्ट खून में मौजूद डीएनए के छोटे-छोटे टुकड़ों का एनालिसिस करता है. ये डीएनए शरीर की अलग-अलग सेल्स से आते हैं और जब सेल्स नष्ट होती हैं, तो वे अपनी जानकारी खून में छोड़ देती हैं. इस टेस्ट की खासियत यह है कि यह डीएनए में मौजूद मिथाइलेशन पैटर्न को पढ़ता है. ये ऐसे केमिकल मार्कर होते हैं, जो सेल्स की स्थिति के हिसाब से बदलते रहते हैं. यानी स्वस्थ और बीमार सेल्स के मिथाइलेशन पैटर्न अलग होते हैं, जिन्हें पहचानकर बीमारी का संकेत मिल सकता है.

मुश्किलों से निपटने के लिए क्या किया गया?

ब्लड-बेस्ड टेस्टिंग में एक बड़ी समस्या यह होती है कि खून में ज्यादातर डीएनए सामान्य सेल्स का होता है, जिससे असली बीमारी के संकेत ढूंढना मुश्किल हो जाता है. इसे बैकग्राउंड नॉइज कहा जाता है. इस चुनौती से निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने एक नई तकनीक अपनाई, जिससे अनावश्यक डीएनए को हटाकर केवल जरूरी और जानकारी देने वाले डीएनए पर फोकस किया गया. इससे टेस्ट की सटीकता बढ़ी और लागत भी कम हुई. इस स्टडी में 1000 से ज्यादा लोगों पर परीक्षण किया गया, जिनमें कैंसर मरीज, लिवर डिजीज से पीड़ित लोग और स्वस्थ व्यक्ति शामिल थे. एडवांस कंप्यूटर एनालिसिस की मदद से डेटा को समझा गया. 

क्या निकला रिजल्ट?

परिणाम काफी उत्साहजनक रहे. टेस्ट ने कुल मिलाकर लगभग 63 प्रतिशत कैंसर मामलों की पहचान की और शुरुआती स्टेज के आधे से ज्यादा मामलों को भी पकड़ लिया. खासकर लिवर कैंसर के मामलों में, हाई-रिस्क ग्रुप में इसकी पहचान दर करीब 80 प्रतिशत तक रही. इसकी एक और बड़ी खासियत यह है कि यह टेस्ट यह भी बता सकता है कि शरीर का कौन सा अंग प्रभावित है. इससे डॉक्टरों को सही दिशा में आगे की जांच करने में मदद मिलती है. हालांकि, अभी यह तकनीक शुरुआती चरण में है और इसे आम इस्तेमाल में लाने से पहले बड़े स्तर पर और परीक्षण की जरूरत है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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भारत में पहली डेंगू वैक्सीन को मिली हरी झंडी, जानें किसे और कैसे लगेगी ये डोज?

भारत में पहली डेंगू वैक्सीन को मिली हरी झंडी, जानें किसे और कैसे लगेगी ये डोज?


What Is Qdenga Dengue Vaccine In India: भारत में डेंगू का खतरा हर साल बढ़ता जा रहा है, खासकर मानसून के दौरान जब अस्पतालों में मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ती है. ऐसे में अब एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है कि देश को अपना पहला डेंगू वैक्सीन मिल गया है. यह कदम सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि रोकथाम की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे यह देश के लिए राहत भरी खबर है. 

डेंगू से जुड़े मामले 

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में डेंगू के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हुई है. जहां 2020 में करीब 44 हजार केस सामने आए थे, वहीं 2023 और 2024 में यह संख्या 2.3 लाख के पार पहुंच गई. 2025 में भी नवंबर तक 1.13 लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए जा चुके हैं.  एक्सपर्ट का मानना है कि असल आंकड़े इससे भी ज्यादा हो सकते हैं, क्योंकि कई केस रिपोर्ट ही नहीं हो पाते. 

टीके को मंजूरी

अब भारत में TAK-003 वैक्सीन, जिसे Qdenga नाम से जाना जाता है, को मंजूरी मिल चुकी है.  इसे ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया के तहत एक्सपर्ट कमेटी ने 4 से 60 साल के लोगों के लिए उपयोग की अनुमति दी है.  यह वैक्सीन जापान की टाकेडा फार्मास्युटिकल कंपनी लिमिटेड ने विकसित किया है. इस वैक्सीन की सबसे खास बात यह है कि इसे पहले डेंगू हो चुका है या नहीं, इससे फर्क नहीं पड़ता. पहले की वैक्सीन में यह बड़ी चुनौती थी. Qdenga चारों प्रकार के डेंगू वायरस सेरोटाइप से सुरक्षा देने के लिए बनाई गई है, जिससे यह ज्यादा व्यापक सुरक्षा प्रदान करती है.

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कैसे करता है काम?

इसे दो डोज में दिया जाता है, जिनके बीच तीन महीने का अंतर होता है. क्लीनिकल ट्रायल्स में पाया गया है कि यह वैक्सीन चार साल से ज्यादा समय तक सुरक्षा दे सकती है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने भी इसे उन क्षेत्रों में उपयोगी माना है जहां डेंगू का खतरा ज्यादा रहता है. Dr Archana Pate ने TOI बताया कि भारत दुनिया की लगभग एक-तिहाई आबादी का हिस्सा है जो डेंगू के जोखिम में है. ऐसे में यह वैक्सीन सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक अहम कदम साबित हो सकती है.

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यह कोई जादुई समाधान नहीं है. वैक्सीन डेंगू के खतरे को कम जरूर करेगी, लेकिन इसे पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती. डेंगू की गंभीरता अक्सर शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया पर निर्भर करती है, खासकर दूसरी बार इंफेक्शन होने पर. एक और अच्छी खबर यह है कि इस वैक्सीन का उत्पादन भारत में ही किया जाएगा. इसके लिए Takeda ने हैदराबाद की बायोलॉजिकल ई. लिमिटेड के साथ साझेदारी की है, जिससे आने वाले समय में इसकी उपलब्धता और कीमत दोनों बेहतर हो सकती हैं. डॉक्टरों का कहना साफ है कि सिर्फ वैक्सीन से काम नहीं चलेगा. मच्छरों को पनपने से रोकना, साफ-सफाई रखना, समय पर जांच और सही इलाज ये सभी कदम उतने ही जरूरी हैं.

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स्लीप एपनिया कर रहा परेशान तो हो जाएं अलर्ट, वरना चुपके-चुपके दबोच लेगी मौत

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How Sleep Apnea Increases Heart Disease Risk: नींद को अक्सर हम शरीर के आराम और रिकवरी का समय मानते हैं. लेकिन दुनिया भर में लाखों लोग ऐसे हैं जिनके लिए नींद उतनी सुकूनभरी नहीं होती जितनी होनी चाहिए. एक आम लेकिन नजरअंदाज की जाने वाली समस्या है ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया, जो सोते समय सांस लेने की प्रक्रिया को बार-बार बाधित करती है. चलिए आपको बताते हैं कि यह कितना खतरनाक साबित हो सकता है आपके लिए और इसको लेकर रिसर्च में क्या निकला है. 

क्या निकला रिसर्च में?

हाल ही में यूरोपियन कांग्रेस ऑन ओबेसिटी 2026 में पेश की जाने वाली एक बड़ी स्टडी ने इस समस्या को लेकर गंभीर संकेत दिए हैं. इसमें पाया गया कि स्लीप एपनिया से जूझ रहे लोगों में दिल से जुड़ी बीमारियों या मौत का खतरा 71 प्रतिशत तक ज्यादा हो सकता है. यह रिसर्च लंदन के इंपीरियल कॉलेज हेल्थ पार्टनर्स और इम्पीरियल कॉलेज हेल्थकेयर एनएचएस ट्रस्ट के साइंटिस्ट ने की, जिसे एली-लिली एंड कंपनी का भी सपोर्ट मिला.

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स्लीप एपनिया क्या होता है?

स्लीप एपनिया तब होता है जब सोते समय बार-बार एयरवे ब्लॉक हो जाता है, जिससे सांस कुछ समय के लिए रुक जाती है. शरीर तुरंत प्रतिक्रिया देता है और व्यक्ति हल्के से जागता है, ताकि सांस दोबारा शुरू हो सके. यह प्रक्रिया रात में कई बार दोहराई जाती है, जिससे नींद की क्वालिटी खराब होती है और शरीर में ऑक्सीजन का स्तर गिरता है. लंबे समय तक ऐसा होने से दिल और ब्लड वेसल्स पर दबाव बढ़ता है. इससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है, हार्ट रिदम बिगड़ सकती है और शरीर में सूजन बढ़ सकती है. यही वजह है कि स्लीप एपनिया को दिल की बीमारियों से जोड़कर देखा जाता है. 

मोटापे से क्या है कनेक्शन?

इस समस्या का मोटापे से भी गहरा संबंध है। लगभग 40 से 70 प्रतिशत स्लीप एपनिया के मरीज ओवरवेट या मोटापे से ग्रस्त होते हैं. गर्दन के आसपास जमा फैट एयरवे को संकरा कर देता है, जिससे सांस लेने में रुकावट बढ़ती है. वहीं स्लीप एपनिया खुद वजन कम करना मुश्किल बना देता है, जिससे एक खतरनाक चक्र बन जाता है. इस स्टडी में करीब 29 लाख लोगों के हेल्थ रिकॉर्ड का एनालिसिस किया गया. इनमें 20,000 से ज्यादा स्लीप एपनिया के मरीजों की तुलना लगभग 1 लाख ऐसे लोगों से की गई, जिन्हें यह समस्या नहीं थी. चार साल तक इन लोगों की निगरानी की गई. 

क्या निकला रिजल्ट?

नतीजे काफी चिंताजनक रहे. स्लीप एपनिया वाले लगभग 26 प्रतिशत लोगों को हार्ट अटैक, स्ट्रोक या मौत जैसी गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ा, जबकि बिना एपनिया वाले लोगों में यह आंकड़ा करीब 17 प्रतिशत था. सिर्फ हार्ट की बीमारी ही नहीं, बल्कि स्लीप एपनिया से जुड़े लोगों में डायबिटीज, मोटापा, जोड़ों की समस्याएं और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दिक्कतें भी ज्यादा देखी गईं. इसके साथ ही, ऐसे लोग हेल्थकेयर सेवाओं का ज्यादा उपयोग करते हैं.

हालांकि इसके इलाज मौजूद हैं, जैसे CPAP मशीन, जो सोते समय एयरवे को खुला रखती है. लेकिन कई लोग या तो इस बीमारी से अनजान रहते हैं या सही इलाज नहीं ले पाते, जिससे खतरा और बढ़ जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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30 की उम्र में ही दिल पर मंडराने लगता है खतरा, महिलाओं को जरूर रहना चाहिए अलर्ट

30 की उम्र में ही दिल पर मंडराने लगता है खतरा, महिलाओं को जरूर रहना चाहिए अलर्ट


हार्ट अटैक दिन-प्रतिदिन सामान्य होते जा रहे हैं. यह सुनने में अजीब तो लग रहा होगा, लेकिन यह डरावना सत्य हमें सतर्क करने के लिए काफी है. फिर भी लोग इस बात को काफी नजरअंदाज कर रहे हैं, जैसे कि यह कोई समस्या ही नहीं है. अगर बात करें महिलाओं की, तो 30 से 40 साल की उम्र के बीच की महिलाओं को यह खतरा कुछ ज्यादा ही तेजी से घेरता जा रहा है. महिलाएं ज्यादातर शुरुआती चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं, जिससे सही समय पर जांच नहीं हो पाती और जब होती है, तब तक काफी देर हो जाती है.

हाल की कहानी

साउथ मुंबई में रहने वाली 35 साल की वर्किंग प्रोफेशनल ऋचा कुमार दो बच्चों की मां हैं. उन्होंने हमेशा अपने आप को फिट समझा. वह हमेशा थोड़ी सी थकान और छाती में हल्के दर्द जैसे इशारों को काम के लोड के कारण होने वाली तकलीफ समझकर नजरअंदाज करती रहीं. जनवरी 2026 में अचानक सीने में तेज दर्द होने के कारण उन्हें हार्ट अटैक आया. आगे जांच करने पर पता चला कि यह जेनेटिकली जुड़ा हुआ है, क्योंकि उनके पापा को भी उनकी 35 की उम्र में यह दिक्कतें आई थीं. ऋचा ने समय रहते एंजियोप्लास्टी करवाई और चौथे दिन ही 80 प्रतिशत ब्लॉकेज से राहत पा ली.

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एक्सपर्ट की राय

Dr. Bipeenchandra Bhaame के अनुसार, “ऐसे बहुत मरीज हैं जो कम उम्र में ही दिल से जुड़ी बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं.” आगे बताते हुए उन्होंने कहा, “हम युवा महिलाओं, खासकर 30 से 40 के बीच की महिलाओं में ये लक्षण ज्यादा देख रहे हैं. जेनेटिक्स इसमें एक अहम भूमिका निभाता है. बहुत से लोगों को मोटापे की दिक्कत या तंबाकू की लत नहीं होती, फिर भी वे अपने पारिवारिक इतिहास के कारण इसका शिकार बन जाते हैं. महिलाएं समय के अभाव के कारण हल्के सीने के दर्द और सांस फूलने जैसी परेशानियों को नजरअंदाज कर देती हैं. इन सब से लड़ने के लिए संतुलित आहार, रोजाना व्यायाम, तनाव प्रबंधन और ध्यान काफी मददगार साबित होते हैं.”

Dr. Sonamm Tiwari के अनुसार, “महिलाओं की हृदय से जुड़ी सेहत उनकी जिम्मेदारियों के कारण नजरअंदाज कर दी जाती है, क्योंकि महिलाओं में पुरुषों जैसे लक्षण नहीं दिखते. हार्मोनल बदलाव और गर्भावस्था से जुड़ी समस्याएं उनके दिल पर असर डाल सकती हैं. महिलाओं में थकावट, पीठ का दर्द, जबड़े का दर्द जैसे संकेत देखने को मिलते हैं. समय पर जांच एक अहम भूमिका निभाती है, इसलिए इसे नजरअंदाज न करें.”

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वयस्कों में अकेलापन से दिल की बीमारी का खतरा, चौंका देगी यह स्टडी

वयस्कों में अकेलापन से दिल की बीमारी का खतरा, चौंका देगी यह स्टडी


Loneliness Heart Disease Risks : आजकल बहुत से लोग भीड़ में रहकर भी खुद को अकेला महसूस करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह अकेलापन सिर्फ मानसिक स्थिति नहीं, बल्कि शरीर की गंभीर बीमारियों का कारण भी बन सकता है. हाल ही में एक बड़ी और चौंकाने वाली रिसर्च में यह सामने आया है कि जो लोग खुद को ज्यादा अकेला महसूस करते हैं, उनमें दिल के वाल्व (Heart Valve) की बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है. यह अध्ययन Journal of the American Heart Association में प्रकाशित हुआ है. ऐसे में आइए जानते हैं कि वयस्कों में अकेलापन से दिल की बीमारी का खतरा क्यों होता है और स्टडी में क्या पाया गया. 

वयस्कों में अकेलापन से दिल की कौन सी बीमारी का खतरा होता है

वयस्कों में अकेलापन से दिल के वाल्व (Heart Valve) की बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है. दिल में चार मुख्य वाल्व होते हैं, जो खून के सही बहाव को कंट्रोल करते हैं. जब इनमें से कोई भी वाल्व सही से काम नहीं करता, तो इसे वाल्वुलर हार्ट डिजीज (Valvular Heart Disease) कहा जाता है.  इस बीमारी में दिल से खून का बहाव सही तरीके से नहीं हो पाता है. दिल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, धीरे-धीरे दिल कमजोर हो सकता है और गंभीर स्थिति में सर्जरी तक की जरूरत पड़ सकती है. 
 
स्टडी में क्या पाया गया?

इस रिसर्च में लगभग 4.63 लाख लोगों को शामिल किया गया, जो UK Biobank से जुड़े थे. इन लोगों की सेहत को लगभग 14 साल तक ट्रैक किया गया.  जो लोग ज्यादा अकेलापन महसूस करते हैं, उनमें दिल की वाल्व बीमारी का खतरा 19 प्रतिशत ज्यादा पाया गया. वहीं जिसमें Aortic valve stenosis का खतरा 21 प्रतिशत बढ़ा और Mitral valve regurgitation का खतरा 23  प्रतिशत बढ़ा पाया गया. 

वयस्कों में अकेलापन से दिल की बीमारी का खतरा क्यों होता है

स्टडी में बहुत दिलचस्प बात सामने आई कि जब व्यक्ति अंदर से खुद को अकेला महसूस करता है तब व्यक्ति दूसरों से कम मिलता-जुलता है. रिसर्च में पाया गया कि सिर्फ अकेलापन महसूस करना दिल की बीमारी से जुड़ा है, लेकिन अकेले रहना सीधे तौर पर इतना बड़ा कारण नहीं पाया गया. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्टडी ऑब्जर्वेशनल (observational) है. इससे यह साबित नहीं होता कि अकेलापन सीधे बीमारी पैदा करता है, लेकिन दोनों के बीच एक मजबूत संबंध जरूर दिखाई देता है. 

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कौन सी आदतें बढ़ाती हैं दिल की बीमारी खतरा

स्टडी में यह भी पाया गया कि अकेलेपन से जुड़ी कुछ आदतें इस बीमारी को और बढ़ा सकती हैं, जैसे धूम्रपान करना, शराब का ज्यादा सेवन, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और खराब नींद ये सभी चीजें मिलकर दिल की सेहत को कमजोर करती हैं. 

एक्सपर्ट्स की राय क्या है?

विशेषज्ञों का कहना है कि अकेलापन सिर्फ इमोशनल समस्या नहीं है, यह शरीर को भी प्रभावित करता है. इसे गंभीरता से लेना चाहिए और मरीजों से डॉक्टरों को मानसिक स्थिति के बारे में भी बात करनी चाहिए विशेषज्ञ के अनुसार अगर अकेलेपन को कम किया जाए, तो दिल की बीमारी की गति धीमी हो सकती है और कई मामलों में सर्जरी की जरूरत भी टल सकती है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ता है. साथ ही अकेलापन भी बढ़ने लगता है. इसलिए बुजुर्ग लोगों में यह जोखिम और भी ज्यादा हो सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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