डाइट और एक्सरसाइज के बावजूद नहीं घट रहा वजन? आप भी तो नहीं कर रहे ये 5 बड़ी गलतियां

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दिमाग नहीं, दिल बीमार है? जानें कैसे ब्रेन फॉग हो सकता है हार्ट डिजीज का शुरुआती संकेत

दिमाग नहीं, दिल बीमार है? जानें कैसे ब्रेन फॉग हो सकता है हार्ट डिजीज का शुरुआती संकेत


अगर आपको बार बार ध्यान लगाने में परेशानी हो रही है, नाम भूलने लगे हैं या दिमाग हमेशा भारी महसूस रहता है तो इसे सिर्फ मानसिक थकान समझकर नजरअंदाज करना सही नहीं है. डॉक्टरों के अनुसार कई बार ये लक्षण दिमाग की नहीं, बल्कि दिल की बीमारी की ओर इशारा करते हैं. वहीं हार्ट डिजीज हमेशा सीने में दर्द या सांस फूलने जैसे आम संकेतों से ही सामने आए ऐसा जरूरी नहीं है.  

 जब दिमाग के लक्षण बताते हैं दिल की परेशानी

कई डॉक्टरों के अनुसार वह अक्सर ऐसे मरीज देखते हैं जो मेमोरी लॉस या ब्रेन फॉग की शिकायत लेकर आते हैं. लेकिन उन्हें पता ही नहीं होता है कि इसके पीछे दिल से जुड़ी समस्या छिपी होती है. उनके अनुसार कई रिसर्च लगातार यह साबित कर रही है कि दिमाग की सेहत सीधे तौर पर दिल की सेहत पर निर्भर करती है.

ब्रेन फॉग भी हो सकता है हार्ट का लक्षण

डॉक्टर बताते हैं कि कई लोग उनके पास शिकायत लेकर आते हैं कि वह मीटिंग में लोगों के नाम भूलने लगे हैं और दिमाग पहले जैसा तेज नहीं रहा. उन्हें न तो सीने में दर्द था और नहीं सांस फूलने की दिक्कत, लेकिन जांच के दौरान सामने आया कि उनके शरीर में ब्लड सर्कुलेशन से जुड़े कुछ जरूरी लक्षण गड़बड़ थे. वहीं दिल से दिमाग तक पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं पहुंच पा रही थी, जिसका असर सीधे उसकी सोचने समझने की क्षमता पड़ रहा था.

कम ब्लड फ्लो और कमजोर मेमोरी

एक्सपर्ट्स के अनुसार कई रिसर्च बताती है कि दिल के कार्य क्षमता में हल्की सी कमी भी दिमाग तक पहुंचने वाले ब्लड सर्कुलेशन को घटा सकती है. इससे मेमोरी, फोकस और कॉग्निटिव फंक्शन पर असर पड़ता है. वहीं जनरल ऑफ सेरेब्रल ब्लड फ्लो एंड मेटाबॉलिज्म 2024 में पब्लिश एक रिसर्च में भी सामने आया था कि हल्का कार्डियोवैस्कुलर इंपेयरमेंट दिमागी कार्य क्षमता को प्रभावित कर सकता है.

शुरुआती संकेतों को पहचानना क्यों है जरूरी?

इसके अलावा एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि ब्रेन फॉग या याददाश्त में कमी को सिर्फ उम्र या तनाव से जोड़कर नहीं देखना चाहिए. दरअसल फंक्शनल मेडिसिन का मकसद यही है की बड़ी बीमारी बनने से पहले शरीर के छोटे-छोटे संकेत को पहचाना जाए. वहीं अगर समय रहते इन लक्षणों पर ध्यान दिया जाए, तो दिल से जुड़ी गंभीर समस्याओं को बढ़ने से रोका जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.l

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फल या फल का रस, कौन देता है ज्यादा हेल्थ बेनिफिट्स? जानिए एक्सपर्ट की राय

फल या फल का रस, कौन देता है ज्यादा हेल्थ बेनिफिट्स? जानिए एक्सपर्ट की राय


आजकल सेहत को लेकर लोग पहले से ज्यादा सजग हो गए हैं. खासतौर पर डायबिटीज जैसी बीमारी में यह समझना बहुत जरूरी हो जाता है कि क्या खाना सही है और क्या नहीं, अक्सर लोग सोचते हैं कि फल का जूस पीना ज्यादा हेल्दी होता है, क्योंकि वह फल से ही बना होता है. लेकिन क्या सच में जूस उतना ही फायदेमंद है जितना पूरा फल. डाइटीशियन के अनुसार, डायबिटीज के मरीज हो या बिल्कुल हेल्दी लोग, दोनों के लिए फल खाना जूस पीने से कहीं ज्यादा बेहतर और सुरक्षित ऑप्शन है. ऐसे में आइए जानते हैं कि फल और फल के जूस में क्या फर्क है, जूस क्यों नुकसान कर सकता है और फल क्यों सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद माने जाते हैं. 

फल का जूस क्यों नहीं है हमेशा सही?

1. ब्लड शुगर तेजी से बढ़ा सकता है – जब फल को जूस बना दिया जाता है, तो उसमें मौजूद नेचुरल शुगर बहुत जल्दी शरीर में पहुंच जाती है. खासकर बाजार में मिलने वाले पैक्ड जूस या ज्यादा मीठे जूस ब्लड शुगर को अचानक बढ़ा सकते हैं. यह डायबिटीज के मरीजों के लिए खतरनाक हो सकता है. 

2. फाइबर खत्म हो जाता है – फल का सबसे बड़ा फायदा उसका फाइबर होता है. लेकिन जूस बनाते समय यह फाइबर लगभग निकल जाता है. फाइबर न होने की वजह से शुगर सीधे ब्लड में जाती है और शुगर लेवल तेजी से बढ़ता है. 

3. कैलोरी और चीनी ज्यादा मिलती है – एक गिलास जूस में कई फलों की मात्रा होती है. इससे शरीर को जरूरत से ज्यादा कैलोरी और शुगर मिल जाती है, जो वजन बढ़ाने और शुगर कंट्रोल बिगाड़ने का कारण बन सकती है. 

4. एक्सपर्ट की सलाह – डाइटीशियन मुस्कान कुमारी बताती हैं कि अगर डायबिटीज का मरीज जूस लेना ही चाहता है, तो वह भी सिर्फ घर का बना ताजा जूस, बहुत कम मात्रा में पैक्ड जूस और बहुत मीठे जूस से पूरी तरह बचना चाहिए.

फल खाना क्यों है ज्यादा फायदेमंद?

1. फाइबर से शुगर रहती है कंट्रोल में – पूरा फल खाने से शरीर को भरपूर फाइबर मिलता है. यह फाइबर शुगर को धीरे-धीरे ब्लड में पहुंचने में मदद करता है, जिससे ब्लड शुगर लेवल अचानक नहीं बढ़ता. 

2. विटामिन्स और मिनरल्स से भरपूर – फल खाने से शरीर को जरूरी विटामिन्स और मिनरल्स मिलते हैं, जो इम्यूनिटी मजबूत करते हैं और शरीर को बीमारियों से बचाते हैं.

 3. प्राकृतिक मिठास होती है सुरक्षित – फलों में मौजूद मिठास प्राकृतिक होती है. सही मात्रा में फल खाने से यह मिठास शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि एनर्जी देती है.

4. हेल्दी स्नैक का बेस्ट ऑप्शन – भूख लगने पर फल खाना एक बेहतरीन स्नैक ऑप्शन है. यह पेट भी भरता है और अनहेल्दी चीजें खाने से बचाता है.

डायबिटीज और नॉर्मल लोगों के लिए सही विकल्प क्या?

डायबिटीज के मरीजों के साथ-साथ नॉर्मल लोगों को भी रोजाना फल खाने की आदत डालनी चाहिए. फल न सिर्फ शुगर कंट्रोल में मदद करते हैं, बल्कि पूरे शरीर को स्वस्थ रखते हैं. अगर आपके आसपास कोई डायबिटीज से पीड़ित है, तो यह जानकारी उनके लिए बहुत जरूरी है. और अगर नहीं है, तब भी अपनी सेहत के लिए फल को जूस से ऊपर रखें.

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यह लापरवाही बरतना लड़कियों के लिए खतरनाक, डॉक्टर से जानें लक्षण और कौन से बदलाव बेहद जरूरी?

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Common Health Problems In Adolescent Girls: माता-पिता अक्सर अपने बच्चों को लेकर कहते हैं कि “अभी तो बच्ची है, अपने आप ठीक हो जाएगी.” यह सोच स्वाभाविक लग सकती है, लेकिन हकीकत यह है कि बचपन और किशोरावस्था सेहत के लिहाज से बेहद अहम दौर होते हैं. इसी उम्र में शरीर और दिमाग में होने वाले बदलाव आगे की पूरी जिंदगी को प्रभावित करते हैं. दुनिया में सबसे ज्यादा किशोर भारत में हैं. दुनियाभर में किशोर आबादी कुल जनसंख्या का करीब 16 प्रतिशत है, यानी लगभग 1.2 अरब लोग. भारत में ही 25.3 करोड़ किशोर रहते हैं, जो देश की आबादी का करीब 20.9 प्रतिशत हैं.

बचपन में हो सकती है तमाम दिक्कत

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, बचपन से वयस्कता में जाने का यह दौर शारीरिक, मानसिक, हार्मोनल और सामाजिक स्तर पर बड़े बदलावों से भरा होता है. जहां यह उम्र विकास के कई मौके देती है, वहीं सेहत से जुड़े जोखिम भी इसी दौरान बढ़ते हैं. आम धारणा के विपरीत, किशोरावस्था कोई “बीमारी-मुक्त” उम्र नहीं है. इस दौरान पोषण की कमी, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं, कम उम्र में गर्भधारण, एचआईवी और यौन संचारित रोग, अन्य इंफेक्शन, हिंसा, दुर्घटनाएं और नशे जैसी कई स्वास्थ्य समस्याएं सामने आती हैं.

पीआईबी की एक रिपोर्ट के अनुसार, कई गंभीर बीमारियों की जड़ें किशोरावस्था में ही होती हैं. इस उम्र में होने वाली कई मौतें रोकी जा सकती हैं या उनका इलाज संभव होता है. बावजूद इसके, कई किशोर जीवनभर चलने वाली बीमारियों या विकलांगता से जूझते रह जाते हैं. डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के मुताबिक, हर साल करीब 13 लाख किशोर ऐसी बीमारियों से जान गंवाते हैं, जिनका इलाज या बचाव संभव है.

लड़कियों में बढ़ रही तेजी से समस्या

लड़कियों की सेहत को आज गंभीरता से लेने का मतलब है, आने वाले कल की कई परेशानियों को रोकना.  TOI से बात करते हुए डॉ. नीरज के. दीपक ने बताया कि, आज की किशोर लड़कियों में मोटापा, कुपोषण, कम उम्र में मेटाबॉलिक बीमारियां और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं. बैठकर रहने वाली जीवनशैली, अनहेल्दी खान-पान, पढ़ाई का दबाव और जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम इसके बड़े कारण हैं. डॉक्टरों को अब कम उम्र में प्यूबर्टी शुरू होने और हार्मोनल गड़बड़ियों के मामले भी देखने को मिल रहे हैं, जो आगे चलकर गंभीर समस्याओं का रूप ले सकते हैं.

सही डाइट की कमी बीमारी की सबसे बड़ी वजह

पोषण को लेकर डॉक्टर बताते हैं कि सही डाइट की कमी इस समस्या की बड़ी वजह है. ज्यादा प्रोसेस्ड फूड, शक्कर और कार्बोहाइड्रेट, जबकि फल-सब्जियों और प्रोटीन की कमी से मोटापा, एनीमिया और कमजोर इम्युनिटी जैसी दिक्कतें होती हैं. समय पर भोजन न करना और अनियमित खान-पान शरीर के मेटाबॉलिज्म और हार्मोन पर भी असर डालता है. डॉक्टरों का कहना है कि बचपन में शारीरिक गतिविधियों की कमी आगे चलकर मोटापा, कमजोर हड्डियां, दिल और किडनी से जुड़ी बीमारियों, डायबिटीज और आर्थराइटिस जैसी समस्याओं का कारण बन सकती है. इसलिए बच्चों के लिए रोजाना एक्सरसाइज और खेलकूद बेहद जरूरी है.

एक्सपर्ट बताते हैं   कि अगर बचपन से ही सही खान-पान, पर्याप्त नींद, नियमित एक्सरसाइज और सीमित स्क्रीन टाइम जैसी आदतें अपनाई जाएं, तो लड़कियों को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है. शुरुआती सावधानियां ही आगे की जिंदगी को बेहतर और सुरक्षित बना सकती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पुरुषों का ‘साइलेंट किलर’ है बिना आहट आने वाला यह कैंसर, 50 की उम्र के बाद सबसे ज्यादा खतरा

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Early Signs Of Prostate Cancer: प्रोस्टेट कैंसर पुरुषों में होने वाला एक ऐसा कैंसर है, जो प्रोस्टेट ग्रंथि में शुरू होता है. प्रोस्टेट एक छोटी-सी ग्रंथि होती है, जो स्पर्म बनाने में मदद करती है. इस बीमारी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआती दौर में इसके लक्षण अक्सर नजर नहीं आते. कई पुरुषों को शुरुआत में कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती, क्योंकि शुरुआती प्रोस्टेट कैंसर चुपचाप बढ़ता रहता है. कई बार यह बीमारी सालों तक धीरे-धीरे बढ़ती रहती है और तब जाकर सामने आती है, जब यह काफी आगे बढ़ चुकी होती है. यही वजह है कि यह कैंसर लोगों को बिना चेतावनी दिए पकड़ लेता है.

भारत में गंभीर समस्या

भारत में प्रोस्टेट कैंसर पुरुषों में होने वाले कैंसरों में तीसरे स्थान पर है. इससे पहले लंग्स और मुंह का कैंसर आता है. दुनियाभर में हर साल करीब 15 लाख नए मामले सामने आते हैं और बढ़ती उम्र के साथ इसके मामलों में लगातार इजाफा होने की आशंका है. इंडियन जर्नल ऑफ यूरोलॉजी में 2024 में आई एक स्टडी के मुताबिक, प्रोस्टेट कैंसर के मामले 50 साल की उम्र के बाद तेजी से बढ़ने लगते हैं और 64 साल के बाद इनमें और तेजी देखी जाती है. चिंता की बात यह है कि करीब 43 प्रतिशत मामलों में कैंसर का पता तब चलता है, जब वह शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल चुका होता है.

भारत में अवेयरनेस की कमी

इतनी आम बीमारी होने के बावजूद भारत में प्रोस्टेट कैंसर को लेकर जागरूकता काफी कम है. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि शुरुआती लक्षण बहुत सामान्य लगते हैं. रात में बार-बार यूरिन आना या यूरिन की धार कमजोर होना जैसी समस्याओं को ज्यादातर पुरुष बढ़ती उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं या इसे प्रोस्टेट बढ़ने की आम समस्या समझ लेते हैं. लक्षण इतने हल्के होते हैं कि लोग यह सोचते ही नहीं कि डॉक्टर को दिखाने की जरूरत है.

शुरुआत में नहीं दिखते हैं लक्षण

मायो क्लिनिक के मुताबिक, प्रोस्टेट कैंसर के शुरुआती चरण में अक्सर कोई लक्षण नहीं होते. हालांकि, कुछ संकेत ऐसे हो सकते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इनमें यूरिन में खून आना, जिससे यूरिन का रंग गुलाबी या लाल दिख सकता है, स्पर्म में खून आना, बार-बार यूरिन लगना, यूरिन शुरू करने में दिक्कत और रात में बार-बार यूरिन के लिए उठना शामिल है. अगर कैंसर आगे बढ़ जाए, तो यूरिन का रिसाव, पीठ या हड्डियों में दर्द, इरेक्शन में दिक्कत, अत्यधिक थकान, बिना वजह वजन कम होना और हाथ-पैरों में कमजोरी जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं.

कैसे होते हैं इसके लक्षण?

सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. अरुण कुमार गोयल ने TOI को बताया कि उम्र बढ़ने के साथ कई पुरुषों में बेनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया की समस्या हो जाती है. इसके लक्षणों में यूरिन की धार कमजोर होना, ब्लैडर पूरी तरह खाली न होना और रात में दो बार से ज्यादा यूरिन के लिए उठना शामिल है. बीपीएच के लक्षण आमतौर पर धीरे-धीरे बढ़ते हैं, जबकि प्रोस्टेट कैंसर में लक्षण तेजी से बढ़ सकते हैं और इसके साथ यूरिन या स्पर्म में खून, लगातार हड्डियों या पीठ में दर्द और अचानक वजन कम होना जैसे संकेत दिखाई दे सकते हैं.

डॉक्टरों के मुताबिक, आमतौर पर 50 साल की उम्र के बाद प्रोस्टेट कैंसर की नियमित जांच शुरू की जाती है. जिन पुरुषों के परिवार में पहले किसी को प्रोस्टेट कैंसर रहा हो, उन्हें 40 से 45 साल की उम्र से ही पीएसए टेस्ट और डिजिटल रेक्टल एग्जामिनेशन कराना चाहिए. समय पर जांच और लक्षणों को गंभीरता से लेने से प्रोस्टेट कैंसर को शुरुआती स्टेज में पकड़ा जा सकता है, जहां इलाज के सफल होने की संभावना काफी ज्यादा होती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दिनभर में कितना पसीना बहाना बेहद जरूरी, जानें किन बीमारियों से मिलती है राहत?

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Is Sweating Good For Health: पसीना आना शरीर की एक बेहद जरूरी प्रक्रिया है, जो शरीर के तापमान को नियंत्रित करने और सेहत बनाए रखने में मदद करती है. अक्सर ज्यादा पसीना आने पर लोग चिंता करने लगते हैं, लेकिन यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि सामान्य पसीना कितना होता है और कब यह सेहत का संकेत देता है. पसीना ग्लैंड्स से निकलने वाला नमक-युक्त तरल होता है, जो त्वचा से वाष्पित होकर शरीर को ठंडा करता है. कितना पसीना आएगा, यह कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे फिजिकल एक्टिविटी, मौसम, तनाव का स्तर और व्यक्ति की शारीरिक बनावट.  चलिए आपको बताते हैं कि इससे किन बीमारियों से राहत मिलती है. 

पसीना क्यों आता है?

पसीना आना, जिसे परसीपरेशन भी कहा जाता है, शरीर का तापमान संतुलित रखने का तरीका है. जब शरीर के अंदर या बाहर का तापमान बढ़ता है, तो ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम पसीना ग्लैंड्स  को सक्रिय करता है. ये ग्लैंड्स  त्वचा के जरिए तरल छोड़ती हैं और जब यह तरल सूखता है, तो शरीर ठंडा होने लगता है. नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश एक रिसर्च के अनुसार, पसीना आने की मात्रा हर व्यक्ति में अलग होती है और एक ही व्यक्ति में भी अलग-अलग दिनों में यह बदल सकती है. खासकर एंड्योरेंस ट्रेनिंग करने वाले एथलीट्स में एक्सरसाइज की तीव्रता, मौसम और शारीरिक स्थितियों के कारण दिनभर में निकलने वाले पसीने की मात्रा में काफी फर्क देखा गया है. इसी वजह से हाइड्रेशन और तरल पदार्थों की सही पूर्ति बेहद जरूरी मानी जाती है.

पसीने में ज्यादातर पानी होता है, जबकि करीब एक प्रतिशत हिस्सा नमक और फैट का होता है. गर्म मौसम या शारीरिक मेहनत के दौरान शरीर को ठंडा रखने के लिए यह प्रक्रिया बेहद जरूरी होती है. इसके अलावा चिंता, तनाव या घबराहट जैसी भावनाएं भी पसीना बढ़ा सकती हैं.

कितना पसीना सामान्य माना जाता है?

पसीने की सामान्य मात्रा हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकती है.आमतौर पर एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों में दिनभर में लगभग 0.5 से 2 लीटर तक पसीना निकाल सकता है. पसीना इन स्थितियों में ज्यादा आता है गर्मी या ज्यादा नमी वाले मौसम में, शारीरिक मेहनत या एक्सरसाइज के दौरान, मानसिक तनाव या घबराहट में, मसालेदार खाना, कैफीन या शराब लेने पर, और हार्मोनल बदलाव जैसे मेनोपॉज के समय. इसके अलावा मेटाबॉलिज्म, फिटनेस लेवल और जेनेटिक कारणों से भी पसीने की मात्रा प्रभावित होती है.

कब पसीना जरूरत से ज्यादा हो जाता है?

जरूरत से ज्यादा पसीना आना हाइपरहाइड्रोसिस कहलाता है. इसमें पसीना शरीर को ठंडा रखने की जरूरत से ज्यादा निकलता है. इसके लक्षणों में बिना मेहनत या गर्मी के पसीना आना, सिर्फ हथेलियों, पैरों या बगल जैसे हिस्सों में ज्यादा पसीना आना, रोजमर्रा के कामों में परेशानी और पसीने वाले हिस्सों में बार-बार स्किन इंफेक्शन शामिल हैं. हाइपरहाइड्रोसिस दो तरह का हो सकता है. प्राइमरी हाइपरहाइड्रोसिस में पसीना ग्रंथियां ज्यादा सक्रिय हो जाती हैं, जबकि सेकेंडरी हाइपरहाइड्रोसिस डायबिटीज, थायरॉइड, इंफेक्शन, मेनोपॉज या कुछ दवाओं के कारण हो सकता है.

कम पसीना आना भी हो सकता है खतरनाक?

पसीना कम आना या बिल्कुल न आना, जिसे हाइपोहाइड्रोसिस कहा जाता है, भी जोखिम भरा हो सकता है. जब शरीर पर्याप्त पसीना नहीं निकाल पाता, तो वह ठीक से ठंडा नहीं हो पाता, जिससे हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ जाता है. अगर गर्मी या एक्सरसाइज के बावजूद पसीना न आए, चक्कर, बेहोशी या गर्मी सहन न होने जैसी दिक्कतें हों, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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