ग्रीन-टी का जमाना गया! अब वजन घटाने के लिए सेलिब्रिटीज क्यों पी रहे हैं हरी ‘माचा चाय’?

ग्रीन-टी का जमाना गया! अब वजन घटाने के लिए सेलिब्रिटीज क्यों पी रहे हैं हरी ‘माचा चाय’?


Benefits Of Matcha Tea: आज के समय में हरे रंग की चाय सोशल मीडिया पर एक अलग ही ट्रेंड बन गई है, जिसे सभी लोग माचा टी के नाम से जान रहे हैं. इस अचानक से आए ट्रेंड को देखकर हर किसी के दिमाग में यही सवाल आ रहा है कि आखिर यह नए प्रकार की चाय होती कैसी है. ऐसे में आपको बता दें कि यह असल में ग्रीन-टी का ही एक खास रूप है, लेकिन इसे बनाने का तरीका अलग होता है. सादी ग्रीन-टी में सिर्फ पानी में पत्तियां उबाली जाती हैं, जबकि माचा में पूरी पत्ती का पाउडर पानी में घोलकर पिया जाता है. यही वजह है कि माचा को ग्रीन-टी के मुकाबले ज्यादा फायदेमंद माना जा रहा है.

सेलिब्रिटीज को माचा इतनी क्यों पसंद आ रही है?

ऐसे ही अचानक से माचा सोशल मीडिया पर ट्रेंड नहीं आ गई है. इसे चर्चा में लाने में सबसे बड़ा हाथ आजकल के सेलिब्रिटीज और कंटेंट क्रिएटर्स का है. वे अपने रोज के रूटीन में माचा को शामिल कर रहे हैं.  इसके पीछे की वजह है कि माचा में कैटेचिन नाम का एक एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है, खासकर EGCG नाम का तत्व, जो शरीर की चर्बी घटाने में मदद करता है.  कई रिपोर्ट्स के मुताबिक माचा हमारे शरीर की कैलोरी बर्न करने की क्षमता को भी बढ़ाता है. इसके अलावा माचा में कैफीन और एल-थियेनिन के तत्व भी पाए जाते हैं, जो दिमाग को शांत रखते हैं और ऊर्जा देते हैं. यही कारण है कि अब चाय और कॉफी की जगह कई लोग सुबह माचा पीना पसंद कर रहे हैं.

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क्या सच में माचा से वजन कम होता है?

इस जानकारी के बाद अक्सर हर किसी के दिमाग में यही सवाल आता है कि क्या किया जा रहा दावा वाकई में उतना सच्चा है? क्या सच में माचा वजन कम करने में मदद करता है? तो इसके जवाब में बता दें कि माचा कोई जादुई या चमत्कारी ड्रिंक नहीं है, जो अचानक से अकेले ही वजन घटा देगा. विशेषज्ञों के अनुसार, चाहे वे माचा पिएं या फिर कोई भी वजन कम करने वाली अद्भुत ड्रिंक, ये सभी केवल वजन कम करने में मदद कर सकती हैं.  इनका असर इतना नहीं होता कि केवल इन्हें पीने से वजन कम हो जाए.  यानी बिना खान-पान पर ध्यान दिए, बिना एक्सरसाइज किए केवल इन ड्रिंक्स के भरोसे बैठने से वजन पर कोई असर नहीं पड़ता. 

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पेट को कभी बूढ़ा नहीं होने देगी ये नई ‘गैस्ट्रो-शील्ड’ डाइट, 40 की उम्र के बाद है जरूरी 

पेट को कभी बूढ़ा नहीं होने देगी ये नई ‘गैस्ट्रो-शील्ड’ डाइट, 40 की उम्र के बाद है जरूरी 


Gastro Shield Diet: बढ़ती उम्र के हर आदमी की एक ही समस्या होती है कि उनके पेट की आंतों की कार्यक्षमता कम हो जाती है. इसका कारण यह है कि 40 की उम्र के बाद उनके शरीर में एंजाइम बनने की प्रक्रिया कम हो जाती है. यही वजह है कि उनके खाना पचाने की क्षमता पहले जैसी नहीं रहती है. ऐसे में बहुत से लोगों को समझ नहीं आता कि वे अपनी डाइट किस तरह की रखें. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि 40 की उम्र के बाद उनकी पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, जिस पर वे गैस्ट्रो-शील्ड पर विश्वास करते हैं. बता दें कि गैस्ट्रो-शील्ड एक ऐसा तरीका है, जो पेट की परत यानी गट लाइनिंग को मजबूत बनाकर रखता है. साथ ही यह पेट में सूजन होने से भी बचाता है.

गैस्ट्रो-शील्ड डाइट में क्या-क्या खाना चाहिए?

विशेषज्ञों के अनुसार इस डाइट का मुख्य आधार फाइबर से भरपूर खाना है, जैसे साबुत अनाज, दाल, हरी सब्जियां और फल, जो सेहत के साथ-साथ पेट के लिए भी बहुत फायदेमंद साबित होते हैं. इसके साथ ही दही, छाछ, इडली-डोसा जैसे पदार्थ भी डाइट में शामिल करने चाहिए, क्योंकि माना जाता है कि इनमें प्राकृतिक रूप से अच्छे बैक्टीरिया पाए जाते हैं. बात बस यहीं तक खत्म नहीं होती है, बहुत समय पहले से विशेषज्ञ इस तरह की डाइट के अलावा रोजाना पर्याप्त पानी पीते रहने की सलाह भी देते आ रहे हैं. ऐसा करने से यह आपके पाचन तंत्र को सही ढंग से काम करने में मदद करता है. 

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किन चीजों से बचना चाहिए

अच्छी डाइट के अलावा अगर उन चीजों की बात करें, जिनसे विशेषज्ञ दूर रहने की सलाह देते हैं, तो उनमें सबसे जरूरी बात है कि बहुत ज्यादा तेल-भुना, मसालेदार और प्रोसेस्ड खाना खाने से बचें. इससे पेट की परत को नुकसान पहुंचता है. इसके अलावा ज्यादा चीनी और मैदे से बनी चीजें भी अच्छे बैक्टीरिया के लिए नुकसानदेह मानी जाती हैं. और सबसे जरूरी बात, बार-बार बिना जरूरत के दर्द निवारक दवाइयां लेने से भी पेट की परत कमजोर हो जाती है. इसलिए किसी भी दवाई का सेवन करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

यह भी पढ़ेंः  Oxytocin Health Risks: RML में सब-स्टैंडर्ड ऑक्सीटोसिन की 2700 वायल फेल, जानें क्यों है यह दवा आपके लिए जानलेवा?

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RML में सब-स्टैंडर्ड ऑक्सीटोसिन की 2700 वायल फेल, जानें क्यों है यह दवा आपके लिए जानलेवा?

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Postpartum Hemorrhage Treatment: ऑक्सीटोसिन की 2700 वायल गुणवत्ता जांच में फेल होने के बाद इस दवा की सुरक्षा को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं, ऑक्सीटोसिन का इस्तेमाल प्रसव के दौरान लेबर शुरू कराने और डिलीवरी के बाद ज्यादा ब्लीडिंग को रोकने के लिए किया जाता है, ऐसे में जब इसकी गुणवत्ता पर सवाल खड़े हों, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि खराब या मानक के अनुरूप न होने वाली ऑक्सीटोसिन मरीजों की सेहत पर कितना असर डाल सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं. 

क्यों जरूरी है यह दवा?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट Medicinenet ऑक्सीटोसिन शरीर में बनने वाला एक प्राकृतिक हार्मोन है, जिसे दवा के रूप में भी तैयार किया जाता है. अस्पतालों में इसका उपयोग गर्भाशय के संकुचन बढ़ाने, प्रसव को आगे बढ़ाने और डिलीवरी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है. औषधि एक्सपर्ट और फार्माकोलॉजिस्ट डॉ. वी. उदय किरण के अनुसार, के अनुसार यह एक महत्वपूर्ण और जीवनरक्षक दवा है, लेकिन इसकी क्वालिटी और सही मात्रा दोनों का सुरक्षित होना बेहद जरूरी है. 

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महिलाओं की मौत के बाद सवाल

राजस्थान के कोटा में सी-सेक्शन के बाद पांच महिलाओं की मौत के मामले में भी ऑक्सीटोसिन को लेकर सवाल उठे थे. जांच के दौरान जिस बैच की जांच की गई, उसमें ऑक्सीटोसिन का एक्टिव इंग्रीडिएंट नहीं मिला,. इसके बाद दवा निर्माता और वितरक के खिलाफ नियामक एजेंसियों ने कार्रवाई की और विश्व स्वास्थ्य संगठन  ने भी इस मामले में भारत सरकार से जानकारी मांगी. हालांकि, बाद में राजस्थान सरकार की आठ सदस्यीय एक्सपर्ट समिति और एम्स, नई दिल्ली की छह सदस्यीय टीम की रिपोर्ट में कहा गया कि इन मौतों का सीधा कारण केवल खराब ऑक्सीटोसिन को नहीं माना जा सकता. समिति के अनुसार सभी महिलाओं की चिकित्सीय स्थिति अलग-अलग थी और किसी एक वजह को जिम्मेदार ठहराने के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले. 

जांच में यह जरूर सामने आया कि अस्पतालों में कई स्तर पर गंभीर कमियां थीं। हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं की पर्याप्त निगरानी नहीं की गई। कई मरीजों के ब्लड प्रेशर, पल्स रेट, यूरिन आउटपुट, लिवर फंक्शन टेस्ट और दवाओं से जुड़े रिकॉर्ड अधूरे पाए गए। कुछ मामलों में पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया, जिससे मौत के वास्तविक कारण की पुष्टि करना मुश्किल हो गया।

इससे क्या होती है दिक्कत?

Medicinenet के अनुसार, ऑक्सीटोसिन के दुष्प्रभाव की बात है, तो इसके इस्तेमाल के दौरान कुछ मरीजों में मतली, उल्टी, एलर्जी, असामान्य हार्ट रेट,ब्लड प्रेशर में बदलाव और दुर्लभ मामलों में गर्भाशय फटने जैसी गंभीर जटिलताएं भी हो सकती हैं. इसलिए यह दवा केवल डॉक्टर की निगरानी में ही दी जाती है. इसकी मात्रा मरीज की स्थिति के अनुसार तय की जाती है और इसे स्वयं इस्तेमाल करना या बिना मेडिकल सलाह के लेना खतरनाक हो सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि किसी भी दवा की गुणवत्ता में कमी चिंता का विषय है, लेकिन हर गंभीर घटना का कारण केवल दवा नहीं होती. सुरक्षित इलाज के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली दवा, सही चिकित्सकीय निगरानी, समय पर इलाज और अस्पतालों में तय प्रोटोकॉल का पालन, सभी समान रूप से जरूरी हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पैर में बार-बार आ रही सूजन कर ही इस गंभीर बीमारी का इशारा, तुरंत भागें डॉक्टर के पास

पैर में बार-बार आ रही सूजन कर ही इस गंभीर बीमारी का इशारा, तुरंत भागें डॉक्टर के पास


पैरों में सूजन जिसे मेडिकल भाषा में एडिमा कहा जाता है जिसका मतलब है कि आपके शरीर के ऊतकों में अतिरिक्त तरल पदार्थ जमा हो गया है. जब शरीर का परिसंचरण तंत्र या अंग ठीक से काम नहीं कर रहे होते, तो यह तरल पदार्थ नीचे की ओर गुरुत्वाकर्षण के कारण पैरों और टखनों में इकट्ठा होने लगता है. यह शरीर का एक रक्षात्मक तरीका हो सकता है जिससे वह आपको सचेत करता है कि कुछ तो गलत है.

इस सूजन के पीछे सबसे गंभीर कारणों में से एक हृदय रोग हो सकता है. जब आपका दिल शरीर में रक्त को पूरी क्षमता से पंप नहीं कर पाता, तो रक्त वापस नसों में जमा होने लगता है, जिससे पैरों में सूजन आती है.  अगर सूजन के साथ आपको सांस लेने में तकलीफ, थकान या सीने में दर्द महसूस हो, तो इसे आपातकालीन स्थिति मानकर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

इस सूजन के पीछे सबसे गंभीर कारणों में से एक हृदय रोग हो सकता है. जब आपका दिल शरीर में रक्त को पूरी क्षमता से पंप नहीं कर पाता, तो रक्त वापस नसों में जमा होने लगता है, जिससे पैरों में सूजन आती है. अगर सूजन के साथ आपको सांस लेने में तकलीफ, थकान या सीने में दर्द महसूस हो, तो इसे आपातकालीन स्थिति मानकर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

एक और प्रमुख कारण किडनी की बीमारी है. हमारी किडनी शरीर से अतिरिक्त पानी और नमक को बाहर निकालने का काम करती है. अगर किडनी ठीक से काम नहीं कर रही है, तो शरीर में सोडियम और पानी का स्तर बढ़ जाता है, जिससे पैरों, टखनों और आंखों के नीचे सूजन आ सकती है. अगर आपको पेशाब की आदतों में बदलाव महसूस हो, तो यह किडनी की जांच कराने का स्पष्ट संकेत है.

एक और प्रमुख कारण किडनी की बीमारी है. हमारी किडनी शरीर से अतिरिक्त पानी और नमक को बाहर निकालने का काम करती है. अगर किडनी ठीक से काम नहीं कर रही है, तो शरीर में सोडियम और पानी का स्तर बढ़ जाता है, जिससे पैरों, टखनों और आंखों के नीचे सूजन आ सकती है. अगर आपको पेशाब की आदतों में बदलाव महसूस हो, तो यह किडनी की जांच कराने का स्पष्ट संकेत है.

लिवर से जुड़ी समस्याएं भी पैरों में सूजन का कारण बन सकती हैं. लिवर एल्ब्यूमिन नाम का एक प्रोटीन बनाता है, जो रक्त वाहिकाओं से तरल पदार्थ को बाहर लीक होने से रोकता है. जब लिवर सिरोसिस या अन्य समस्याओं से ग्रस्त होता है, तो एल्ब्यूमिन का स्तर गिर जाता है, जिससे तरल पदार्थ आसपास के ऊतकों में रिसने लगता है और पैरों में सूजन पैदा करता है. इसे हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है.

लिवर से जुड़ी समस्याएं भी पैरों में सूजन का कारण बन सकती हैं. लिवर एल्ब्यूमिन नाम का एक प्रोटीन बनाता है, जो रक्त वाहिकाओं से तरल पदार्थ को बाहर लीक होने से रोकता है. जब लिवर सिरोसिस या अन्य समस्याओं से ग्रस्त होता है, तो एल्ब्यूमिन का स्तर गिर जाता है, जिससे तरल पदार्थ आसपास के ऊतकों में रिसने लगता है और पैरों में सूजन पैदा करता है. इसे हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है.

इसके अलावा नसों से जुड़ी बीमारी जैसे डीप वेन थ्रोम्बोसिस भी बहुत खतरनाक हो सकती है. इसमें पैरों की गहरी नसों में खून का थक्का जम जाता है. अगर केवल एक पैर में अचानक तेज सूजन, दर्द या लालिमा दिखाई दे, तो तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए. यह थक्का अगर टूटकर फेफड़ों तक पहुंच जाए, तो यह जानलेवा साबित हो सकता है.

इसके अलावा नसों से जुड़ी बीमारी जैसे डीप वेन थ्रोम्बोसिस भी बहुत खतरनाक हो सकती है. इसमें पैरों की गहरी नसों में खून का थक्का जम जाता है. अगर केवल एक पैर में अचानक तेज सूजन, दर्द या लालिमा दिखाई दे, तो तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए. यह थक्का अगर टूटकर फेफड़ों तक पहुंच जाए, तो यह जानलेवा साबित हो सकता है.

वहीं अगर सूजन के साथ दर्द, सांस फूलना, पेशाब में कमी या एक ही पैर में भारी सूजन जैसे लक्षण हैं, तो घरेलू नुस्खों के बजाय तुरंत डॉक्टर के पास जाएं. समय रहते की गई जांच और इलाज न केवल आपकी समस्या को दूर कर सकते हैं, बल्कि भविष्य में होने वाली बड़ी स्वास्थ्य जटिलताओं से भी आपको बचा सकते हैं.

वहीं अगर सूजन के साथ दर्द, सांस फूलना, पेशाब में कमी या एक ही पैर में भारी सूजन जैसे लक्षण हैं, तो घरेलू नुस्खों के बजाय तुरंत डॉक्टर के पास जाएं. समय रहते की गई जांच और इलाज न केवल आपकी समस्या को दूर कर सकते हैं, बल्कि भविष्य में होने वाली बड़ी स्वास्थ्य जटिलताओं से भी आपको बचा सकते हैं.

Published at : 08 Jul 2026 10:09 AM (IST)

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प्रेग्नेंसी किट कैसे पता कर लेती है आप प्रेग्नेंट हैं या नहीं? समझिए इसके पीछे का साइंस

प्रेग्नेंसी किट कैसे पता कर लेती है आप प्रेग्नेंट हैं या नहीं? समझिए इसके पीछे का साइंस


Pregnancy Test Kit: प्रेग्नेंसी का समय हर महिला के लिए एक बहुत खास समय होता है. एक महिला प्रेग्नेंट है या नहीं, यह पता करने के लिए हर महिला प्रेग्नेंसी किट पर भरोसा करती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा जिस प्रेग्नेंसी किट पर महिला आंख बंद करके भरोसा कर लेती हैं, वह किट यह चीज तय कैसे करती है कि महिला प्रेग्नेंट है.

इसके जवाब में बता दें कि जब कोई महिला प्रेग्नेंट होती है, तो उसके शरीर में एक खास हार्मोन बनना शुरू हो जाता है, जिसका नाम  hCG होता है, यानी ह्यूमन कोरियोनिक गोनाडोट्रोपिन (Human Chorionic Gonadotropin). यह हार्मोन आमतौर पर मां बनने के 8 से 12 दिन में बनना शुरू हो जाता है. जैसे-जैसे प्रेग्नेंसी आगे बढ़ती है, यह हार्मोन शरीर में बढ़ता जाता है. यही एचसीजी हार्मोन प्रेग्नेंसी किट की पूरी टेस्टिंग के लिए काम आता है. यह हार्मोन खून के साथ-साथ पेशाब में भी पहुंच जाता है, और इसी वजह से पेशाब से टेस्ट करना मुमकिन हो पाता है.

किट के अंदर क्या होता है?

प्रेग्नेंसी किट के अंदर एक खास तरह की पट्टी लगी होती है, जिस पर एंटीबॉडी नाम के छोटे-छोटे कण चिपके होते हैं. ये एंटीबॉडी सिर्फ एचसीजी हार्मोन को ही पहचानते हैं, बाकी किसी चीज को नहीं. जब पेशाब को किट पर डाला जाता है, तो अगर पेशाब में एचसीजी हार्मोन मौजूद है, तो यह एंटीबॉडी से जुड़ जाता है. यह जुड़ाव एक केमिकल रिएक्शन शुरू करता है, जिससे रंग बदलने लगता है. यही वजह है कि किट में सिर्फ पेशाब का इस्तेमाल होता है, खून का नहीं.

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दो लाइन का मतलब क्या होता है?

ज्यादातर प्रेग्नेंसी किट में दो जगह लाइन दिखाने का इंतजाम होता है. एक लाइन कंट्रोल लाइन कहलाती है, जो यह बताती है कि किट सही तरीके से काम कर रही है. दूसरी लाइन टेस्ट लाइन होती है, जो सिर्फ तभी दिखती है जब पेशाब में एचसीजी हार्मोन मौजूद होता है. अगर दोनों लाइन दिखें, तो इसका मतलब है कि महिला प्रेग्नेंट है. अगर सिर्फ एक लाइन दिखे तो इसका मतलब है कि प्रेग्नेंसी नहीं है.

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हर साल जरूर कराएं ये 5 बॉडी टेस्ट, गंभीर बीमारी का टल जाएगा खतरा, यहां जानिए

हर साल जरूर कराएं ये 5 बॉडी टेस्ट, गंभीर बीमारी का टल जाएगा खतरा, यहां जानिए


विशेषज्ञों के अनुसार हर व्यक्ति को साल में एक बार ब्लड प्रेशर की जांच जरूर करानी चाहिए. हाई ब्लड प्रेशर अक्सर बिना किसी लक्षण के बढ़ता है और धीरे-धीरे दिल, किडनी और दिमाग को नुकसान पहुंचा सकता है. इसके साथ ही फास्टिंग ब्लड शुगर और HbA1c टेस्ट से डायबिटीज और प्री-डायबिटीज का शुरुआती चरण में पता लगाया जा सकता है. वहीं CBC (कम्प्लीट ब्लड काउंट) टेस्ट से शरीर में खून की कमी, संक्रमण और कई अन्य समस्याओं की जानकारी मिलती है.

डॉक्टरों का कहना है कि लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT), किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT), थायरॉयड प्रोफाइल, हीमोग्लोबिन, विटामिन D और विटामिन B12 की जांच भी साल में एक बार करानी चाहिए. इन टेस्ट से फैटी लिवर, किडनी की कार्यक्षमता, थायराइड की गड़बड़ी, एनीमिया और शरीर में जरूरी विटामिन की कमी का समय रहते पता लगाया जा सकता है. खासतौर पर शहरों में रहने वाले लोगों में विटामिन D और B12 की कमी काफी आम मानी जाती है.

डॉक्टरों का कहना है कि लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT), किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT), थायरॉयड प्रोफाइल, हीमोग्लोबिन, विटामिन D और विटामिन B12 की जांच भी साल में एक बार करानी चाहिए. इन टेस्ट से फैटी लिवर, किडनी की कार्यक्षमता, थायराइड की गड़बड़ी, एनीमिया और शरीर में जरूरी विटामिन की कमी का समय रहते पता लगाया जा सकता है. खासतौर पर शहरों में रहने वाले लोगों में विटामिन D और B12 की कमी काफी आम मानी जाती है.

ब्लड टेस्ट के अलावा चेस्ट का एक्स-रे और पेट का अल्ट्रासाउंड भी उपयोगी जांच माने जाते हैं. अल्ट्रासाउंड के जरिए पेट के अंदर मौजूद अंगों की स्थिति का पता चलता है और फैटी लिवर जैसी समस्या की पहचान भी हो सकती है. वहीं जिन लोगों का वजन ज्यादा है, उन्हें नियमित जांच कराते रहना चाहिए क्योंकि मोटापा कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है. हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज के मरीजों को भी समय-समय पर अपने टेस्ट कराते रहना चाहिए.

ब्लड टेस्ट के अलावा चेस्ट का एक्स-रे और पेट का अल्ट्रासाउंड भी उपयोगी जांच माने जाते हैं. अल्ट्रासाउंड के जरिए पेट के अंदर मौजूद अंगों की स्थिति का पता चलता है और फैटी लिवर जैसी समस्या की पहचान भी हो सकती है. वहीं जिन लोगों का वजन ज्यादा है, उन्हें नियमित जांच कराते रहना चाहिए क्योंकि मोटापा कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है. हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज के मरीजों को भी समय-समय पर अपने टेस्ट कराते रहना चाहिए.

विशेषज्ञों के अनुसार, जिन लोगों में दिल की बीमारी का खतरा ज्यादा है, उन्हें 40 साल की उम्र से और सामान्य जोखिम वाले लोगों को 50 साल की उम्र से हर पांच साल में CT कोरोनरी एंजियोग्राफी और CT कैल्शियम स्कोर टेस्ट कराने पर विचार करना चाहिए. इसके अलावा 40 साल की उम्र के बाद ECG, इकोकार्डियोग्राफी और स्ट्रेस टेस्ट भी कराए जा सकते हैं जिससे दिल से जुड़ी समस्याओं का समय रहते पता चल सके.

विशेषज्ञों के अनुसार, जिन लोगों में दिल की बीमारी का खतरा ज्यादा है, उन्हें 40 साल की उम्र से और सामान्य जोखिम वाले लोगों को 50 साल की उम्र से हर पांच साल में CT कोरोनरी एंजियोग्राफी और CT कैल्शियम स्कोर टेस्ट कराने पर विचार करना चाहिए. इसके अलावा 40 साल की उम्र के बाद ECG, इकोकार्डियोग्राफी और स्ट्रेस टेस्ट भी कराए जा सकते हैं जिससे दिल से जुड़ी समस्याओं का समय रहते पता चल सके.

महिलाओं में सर्विक्स कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए हर तीन साल में पैप स्मीयर टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है. वहीं 40 साल की उम्र के बाद हर साल मैमोग्राफी करानी चाहिए. जिससे ब्रेस्ट कैंसर का शुरुआती चरण में पता लगाया जा सके. जिन महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा ज्यादा है, उन्हें 50 साल की उम्र के बाद DEXA बोन डेंसिटी स्कैन भी कराना चाहिए.

महिलाओं में सर्विक्स कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए हर तीन साल में पैप स्मीयर टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है. वहीं 40 साल की उम्र के बाद हर साल मैमोग्राफी करानी चाहिए. जिससे ब्रेस्ट कैंसर का शुरुआती चरण में पता लगाया जा सके. जिन महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा ज्यादा है, उन्हें 50 साल की उम्र के बाद DEXA बोन डेंसिटी स्कैन भी कराना चाहिए.

विशेषज्ञों के मुताबिक, पूरे शरीर की सामान्य जांच के लिए CT स्कैन नहीं कराया जाता है. इसमें एक्स-रे रेडिएशन का यूज होता है. इसका यूज मुख्य रूप से दिल की धमनियों और फेफड़ों की जांच के लिए किया जाता है, वहीं MRI में किसी तरह का रेडिएशन नहीं होता है. बिना लक्षण वाले कुछ लोगों में, खासकर जिनमें कैंसर का खतरा ज्यादा हो, पूरे शरीर का MRI स्कैन शुरुआती कैंसर की पहचान के लिए कराया जा सकता है. अगर किसी भी हेल्थ चेकअप में कोई गड़बड़ी सामने आती है, तो आगे की जांच और इलाज के लिए डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए.

विशेषज्ञों के मुताबिक, पूरे शरीर की सामान्य जांच के लिए CT स्कैन नहीं कराया जाता है. इसमें एक्स-रे रेडिएशन का यूज होता है. इसका यूज मुख्य रूप से दिल की धमनियों और फेफड़ों की जांच के लिए किया जाता है, वहीं MRI में किसी तरह का रेडिएशन नहीं होता है. बिना लक्षण वाले कुछ लोगों में, खासकर जिनमें कैंसर का खतरा ज्यादा हो, पूरे शरीर का MRI स्कैन शुरुआती कैंसर की पहचान के लिए कराया जा सकता है. अगर किसी भी हेल्थ चेकअप में कोई गड़बड़ी सामने आती है, तो आगे की जांच और इलाज के लिए डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए.

Published at : 08 Jul 2026 03:05 AM (IST)

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