कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल होने के बाद भी हार्ट अटैक का खतरा, जानिए LDL-C और ApoB का फर्क?

कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल होने के बाद भी हार्ट अटैक का खतरा, जानिए LDL-C और ApoB का फर्क?


अक्सर लोग सोचते हैं कि अगर LDL कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड्स और बाकी लिपिड प्रोफाइल की रिपोर्ट सामान्य है, तो उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ लोगों में रिपोर्ट सामान्य होने के बाद भी धमनियों में नुकसान पहुंचाने वाले कण ज्यादा हो सकते हैं. यही वजह है कि कुछ लोगों को बिना किसी चेतावनी के हार्ट अटैक आ जाता है.

LDL-C यानी लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन कोलेस्ट्रॉल यह बताता है कि खून में मौजूद LDL कणों के अंदर कुल कितना कोलेस्ट्रॉल है. वहीं ApoB टेस्ट यह बताता है कि खून में ऐसे हानिकारक कणों की कुल संख्या कितनी है, जो धमनियों में प्लाक जमा कर सकते हैं. इनमें LDL, VLDL और IDL जैसे कण शामिल होते हैं.

LDL-C यानी लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन कोलेस्ट्रॉल यह बताता है कि खून में मौजूद LDL कणों के अंदर कुल कितना कोलेस्ट्रॉल है. वहीं ApoB टेस्ट यह बताता है कि खून में ऐसे हानिकारक कणों की कुल संख्या कितनी है, जो धमनियों में प्लाक जमा कर सकते हैं. इनमें LDL, VLDL और IDL जैसे कण शामिल होते हैं.

Published at : 14 Jun 2026 07:47 AM (IST)

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IIT मद्रास ने जारी किया इंसानी ब्रेनस्टेम का 3D एटलस, मेडिकल साइंस के लिए कितना खास?

IIT मद्रास ने जारी किया इंसानी ब्रेनस्टेम का 3D एटलस, मेडिकल साइंस के लिए कितना खास?


3D Atlas Human Brainstem : IIT मद्रास ने इंसानी दिमाग के ब्रेनस्टेम का एक खास 3D एटलस तैयार किया है, जिसकी मदद से वैज्ञानिक दिमाग के सबसे मुश्किल हिस्से को पहले से ज्यादा आसानी और गहराई से समझ सकेंगे. इस खास एटलस की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें ब्रेनस्टेम को सेल स्तर तक देखा जा सकता है यानी वैज्ञानिक अब यह जान पाएंगे कि दिमाग के इस हिस्से में कौन-से सेल्स कहां मौजूद हैं और उनका आपस में क्या संबंध है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज फ्यूचर पार्किंसन, अल्जाइमर और अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के इलाज और रिसर्च में नई संभावनाएं खोल सकती है. ऐसे में आइए जानते हैं कि IIT मद्रास ने जारी किया इंसानी ब्रेनस्टेम का 3D एटलस कितना खास है. 

क्या है ब्रेनस्टेम और क्यों है इतना जरूरी?

ब्रेनस्टेम दिमाग का वह हिस्सा होता है, जो दिमाग को रीढ़ की हड्डी से जोड़ता है. यह शरीर के कई जरूरी कामों को कंट्रोल करता है, जिनमें सांस लेना, दिल की धड़कन को कंट्रोल करना, ब्लड प्रेशर बनाए रखना, निगलने की प्रक्रिया और नींद-जागने का सर्कल शामिल है. अगर ब्रेनस्टेम में किसी तरह की चोट या गड़बड़ी हो जाए, तो इसका असर शरीर की कई जरूरी एक्टिवीटी पर पड़ सकता है. यही वजह है कि वैज्ञानिक लंबे समय से इस हिस्से को गहराई से समझने की कोशिश कर रहे थे. 

क्या है ANCHOR 3D एटलस?

IIT मद्रास के सुधा गोपालकृष्णन ब्रेन सेंटर (SGBC) के तैयार किए गए इस एटलस का नाम ANCHOR रखा गया है. इसका पूरा नाम Atlas of Neurochemical Characterization of the Human Brainstem with 3D Reconstruction है. यह इंसानी ब्रेनस्टेम का एक डिजिटल 3D नक्शा है, जिसे मॉर्डन तकनीकों की मदद से तैयार किया गया है. इसकी मदद से वैज्ञानिक ब्रेनस्टेम के स्ट्रक्चर को अलग-अलग कोणों से देख सकते हैं और उसकी सूक्ष्म बनावट को समझ सकते हैं. 

किन तकनीकों का इस्तेमाल किया गया?

इस 3D एटलस को तैयार करने के लिए कई तकनीकों का यूज किया गया है. इसमें MRI स्कैनिंग, हिस्टोलॉजी, न्यूरोकेमिकल मैपिंग और 3D रिकंस्ट्रक्शन तकनीक को एक साथ जोड़ा गया. इन सभी तकनीकों की मदद से वैज्ञानिकों ने इंसानी ब्रेनस्टेम का बेहद बड़ा और सटीक एटलस तैयार किया. इस एटलस की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सेल्स स्तर की जानकारी उपलब्ध कराता है. शोधकर्ताओं ने सैकड़ों सीरियल सेक्शनों का विश्लेषण करके ब्रेनस्टेम की 200 से ज्यादा संरचनाओं यानी न्यूक्लियाई और फाइबर ट्रैक्ट्स को 3D रूप में तैयार किया है. साथ ही 500 से ज्यादा सेक्शनों पर आठ अलग-अलग इम्यूनोस्टेन तकनीकों का इस्तेमाल किया गया, जिससे अलग-अलग प्रकार की न्यूरोकेमिकल सेल्स की पहचान की जा सकी. इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि दिमाग की कौन-सी कोशिकाएं कौन-सा काम करती हैं और बीमारियों के दौरान उनमें क्या बदलाव आते हैं. 

कौन-कौन सा डेट शामिल किया गया है?

ANCHOR एटलस में इंसानी जीवन के अलग-अलग चरणों को शामिल किया गया है. इसमें प्रेगनेंसी के दौरान विकसित हो रहा दिमाग,बचपन का ब्रेनस्टेम और एडल्ट्स अवस्था का ब्रेनस्टेम शामिल है. इससे वैज्ञानिक यह समझ पाएंगे कि उम्र बढ़ने के साथ दिमाग के इस हिस्से में किस तरह के बदलाव आते हैं. 

दुनियाभर के वैज्ञानिकों के लिए खुला होगा एटलस

IIT मद्रास ने इस 3D एटलस को केवल अपने संस्थान तक सीमित नहीं रखा है. इसे एक विशेष ऑनलाइन पोर्टल के जरिए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया गया है, जिससे दुनियाभर के वैज्ञानिक, डॉक्टर और शोधकर्ता इसका यूज कर सकें.इससे न्यूरोसाइंस के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. 

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BRICS Neuroscience Symposium में हुआ लॉन्च

इस एटलस का अनावरण IIT मद्रास में आयोजित तीसरे BRICS Neuroscience Symposium 2026 के दौरान किया गया. इस मौके पर भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार अजय कुमार सूद ने कहा कि यह एटलस ब्रेनस्टेम से जुड़ी चोटों और बीमारियों से प्रभावित सेल्स की पहचान करने में मदद कर सकता है. फ्यूचर में इसका इस्तेमाल क्लीनिकल रिसर्च और मरीजों के बेहतर इलाज में भी किया जा सकता है.

न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के इलाज में खुल सकते हैं नए रास्ते

विशेषज्ञों का मानना है कि यह एटलस न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में गेमचेंजर साबित हो सकता है. इसकी मदद से वैज्ञानिक पार्किंसन, अल्जाइमर, ब्रेनस्टेम डिजीज और अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे. इसके अलावा, यह नई दवाओं के विकास और ज्यादा सटीक ट्रीटमेंट तैयार करने में भी जरूरी रोल निभा सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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BCG, खसरा और MR वैक्सीन के दाम बढ़े, अब बच्चों का टीकाकरण होगा महंगा

BCG, खसरा और MR वैक्सीन के दाम बढ़े, अब बच्चों का टीकाकरण होगा महंगा


Vaccines Price Hike: सरकार ने बच्चों को लगाई जाने वाली कुछ जरूरी वैक्सीन की कीमतों में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है. राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने अपनी 147वीं बैठक में इन वैक्सीनों की कीमतों में संशोधन का फैसला किया. इनमें बीसीजी (BCG), खसरा (Measles) और एमआर (Measles- Rubella) वैक्सीन शामिल हैं. ये तीनों टीके बच्चों को गंभीर और जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम का जरूरी हिस्सा माने जाते हैं.

ऐसे में इनके दाम बढ़ने से पेरेंट्स की चिंता बढ़ गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि पेरेंट्स को कीमतों में बदलाव से घबराने की जरूरत नहीं है. ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर यह फैसला क्यों लिया गया और इसका लोगों पर क्या असर पड़ सकता है. 

किन वैक्सीन की कीमतों में हुई बढ़ोतरी?

राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने बीसीजी, खसरा और एमआर वैक्सीन की सीलिंग प्राइस में संशोधन को मंजूरी दी है. बीसीजी वैक्सीन बच्चों को टीबी जैसी गंभीर बीमारी से बचाने के लिए जन्म के बाद लगाई जाती है. वहीं खसरा और एमआर वैक्सीन बच्चों को खसरा और रूबेला संक्रमण से सुरक्षा देती हैं, जो कई बार गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकते हैं. 

बच्चों के लिए क्यों जरूरी हैं ये टीके?

1.BCG वैक्सीन – यह टीका न्यू बोर्न बेबी को टीबी के गंभीर रूपों से बचाने में मदद करता है. जन्म के तुरंत बाद या शुरुआती दिनों में इसे लगाया जाता है. 

2. खसरा (Measles) वैक्सीन – खसरा एक बेहद संक्रामक बीमारी है, जिससे तेज बुखार, दाने, निमोनिया और कई बार मेंटल हेल्थ संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं. ऐसे में समय पर टीकाकरण बच्चों को इससे सुरक्षित रखता है. 

3. MR (Measles- Rubella) वैक्सीन –  यह वैक्सीन खसरे के साथ- साथ रूबेला से भी सुरक्षा देती है. प्रेगनेंट महिलाओं में रूबेला संक्रमण होने पर जन्म लेने वाले बच्चे में गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए इसका टीकाकरण बेहद जरूरी माना जाता है. 

कीमतें क्यों बढ़ाई गईं?

एनपीपीए के मुताबिक, इन वैक्सीन का प्रोडक्शन करने वाली कंपनियों की संख्या सीमित है और लागत बढ़ने की वजह से इनके निर्माण और सप्लाई को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो रहा था. ऐसे में अगर कीमतों में संशोधन नहीं किया जाता, तो आगे इनकी उपलब्धता प्रभावित हो सकती थी. अथॉरिटी का कहना है कि कीमत बढ़ाने का उद्देश्य कंपनियों को फायदा पहुंचाना नहीं, बल्कि यह तय करना है कि देश में जरूरी वैक्सीन की सप्लाई बाधित न हो और बच्चों का टीकाकरण प्रभावित न पड़े. 

कैंसर की दो अहम दवाएं भी हुईं महंगी

बच्चों की वैक्सीन के अलावा एनपीपीए ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दो जरूरी कीमोथेरेपी दवाओं कार्बोप्लैटिन (Carboplatin) और सिस्प्लैटिन (Cisplatin) की सीलिंग प्राइस में भी 50 फीसदी तक बढ़ोतरी की मंजूरी दी है, अथॉरिटी के अनुसार, कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी और सप्लाई प्रभावित होने की आशंका को देखते हुए यह फैसला लिया गया है. कैंसर की दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल यानी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) की कीमतों में लगातार उतार- चढ़ाव और बढ़ोतरी देखी जा रही थी. 

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एंटी- टिटनेस इंजेक्शन भी हुआ महंगा

एंटी- टिटनेस इम्युनोग्लोबुलिन इंजेक्शन की कीमतों में भी 50 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है. 250 IU और 500 IU क्षमता वाले इन इंजेक्शनों को बनाने वाली कंपनियां काफी समय से कह रही थीं कि बढ़ती लागत की वजह से इनका उत्पादन करना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ रही बच्चे की लंबाई, जानें क्या करें?

उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ रही बच्चे की लंबाई, जानें क्या करें?


Child Height Growth Tips : हर पेरेंट्स यही चाहते हैं कि उनका बच्चा हेल्दी रहे और उसकी फिजिकल ग्रोथ के साथ ही लंबाई भी उम्र के अनुसार हो. ऐसे में जब आसपास के दूसरे बच्चों की तुलना में अपने बच्चे की लंबाई कम दिखाई देती है, तो पेरेंट्स परेशान हो जाते हैं. कई बार लोग यह सोचने लगते हैं कि कहीं बच्चे को कोई गंभीर बीमारी तो नहीं है या फिर उसके खान-पान में कोई बड़ी कमी तो नहीं रह गई.

दरअसल, हर बच्चे की बढ़ने की स्पीड अलग होती है. कुछ बच्चों की लंबाई तेजी से बढ़ती है, जबकि कुछ बच्चों की ग्रोथ धीरे-धीरे होती है. ऐसे में अगर आपको लगता है कि आपके बच्चे की लंबाई उसकी उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ रही है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि  जानते हैं कि उम्र के हिसाब से बच्चे की लंबाई नहीं बढ़ रही है तो क्या करें. 

बच्चे की लंबाई कम बढ़ने के कारण

1. जेनेटिक कारण – अगर पेरेंट्स या परिवार के ज्यादातर सदस्यों की लंबाई नॉर्मल से कम है, तो बच्चे की लंबाई भी उसी के अनुसार हो सकती है. यह पूरी तरह से नेचुरल प्रोसेस है और इसमें घबराने की जरूरत नहीं होती है,

2. गैर-जेनेटिक कारण – अगर परिवार में सभी की लंबाई सामान्य है, लेकिन बच्चे की ग्रोथ उसी तरीके से नहीं हो रही है, तो इसके पीछे दूसरे कारण हो सकते हैं, जैसे पोषण की कमी, बार-बार बीमार पड़ना, शरीर में किसी पोषक तत्व की कमी, हार्मोन संबंधी समस्याएं, पाचन तंत्र की दिक्कतें, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, पूरी नींद न लेना.

बार-बार बीमार पड़ना भी बन सकता है वजह
 
कई बच्चों को सर्दी-जुकाम, बुखार या संक्रमण जल्दी-जल्दी हो जाता है. ऐसे बच्चों का शरीर बीमारी से लड़ने में ज्यादा एनर्जी खर्च करता है, जिससे उनकी नॉर्मल ग्रोथ पर असर पड़ सकता है. अगर आपका बच्चा लगातार बीमार रहता है और उसकी लंबाई भी नहीं बढ़ रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. 

विशेषज्ञों के अनुसार ये कारण भी हैं ग्रोथ न होने की वजह 

विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे की लंबाई केवल जन्म के बाद मिलने वाले पोषण पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि प्रेगनेंसी के दौरान मां का स्वास्थ्य भी इसमें जरूरी भूमिका निभाता है. इन कारणों से भी बच्चे की ग्रोथ प्रभावित हो सकती है. प्रेगनेंसी में मां को पूरा पोषण न मिलना. जन्म के बाद बच्चे की सही देखभाल न होना. बच्चे का खेल-कूद में हिस्सा न लेना. लंबे समय तक मोबाइल, टीवी या वीडियो गेम में बिजी रहना. इसके अलावा बैठने, चलने और सोने का गलत तरीका, साथ ही धूप और फिजिकल एक्टिविटी की कमी भी शामिल है. 

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उम्र के हिसाब से बच्चे की लंबाई नहीं बढ़ रही है तो क्या करें

1. बैलेंस और हेल्दी डाइट लें – बच्चों की ग्रोथ के लिए सही डाइट सबसे जरूरी है. उनकी डाइट में दूध और दूध से बने प्रोडक्ट, दालें और राजमा, हरी पत्तेदार सब्जियां, मौसमी फल, अंडे और मछली, सूखे मेवे, साबुत अनाज शामिल करें. 

2. बाहर खेलना जरूरी है –  आजकल बच्चे ज्यादातर समय मोबाइल और वीडियो गेम में बिताने लगे हैं. लेकिन दौड़ना, कूदना, साइकिल चलाना और मैदान में खेलना उनकी हड्डियों और मांसपेशियों के ग्रोथ के लिए जरूरी है. रोजाना कम से कम एक घंटे की फिजिकल एक्टिविटी बच्चों के लिए फायदेमंद मानी जाती है. 

3. पूरी नींद – नींद के दौरान शरीर में ग्रोथ हार्मोन सक्रिय रूप से काम करते हैं. इसलिए बच्चों की उम्र के अनुसार पूरी नींद बेहद जरूरी है. 

 4. पाचन का ध्यान रखें – अगर बच्चे को कब्ज रहती है, पेट साफ नहीं होता या उसे पाचन संबंधी समस्याएं रहती हैं, तो शरीर को खाने से पूरा पोषण नहीं मिल पाता है, कुछ मामलों में लीवर या आंतों की समस्या भी बच्चों की ग्रोथ को प्रभावित कर सकती है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मिर्गी का दौरा पड़ने पर मोजे क्यों सुंघाते हैं, क्या इससे सच में ठीक हो जाता है मरीज?

मिर्गी का दौरा पड़ने पर मोजे क्यों सुंघाते हैं, क्या इससे सच में ठीक हो जाता है मरीज?


Epilepsy Attack Treatment Myth : अक्सर कई बार जब भी किसी को मिर्गी का दौरा पड़ता है तो लोग तुरंत जूता, चप्पल या मोजा सुंघाने लगते हैं. कुछ लोग मुंह में चम्मच डाल देते हैं, तो कुछ पानी पिलाने की कोशिश करते हैं. पुराने समय से चली आ रहे ये तरीके आज भी अपनाएं जाते हैं. लोग इन्हें इलाज का हिस्सा समझ लेते हैं. लेकिन ज्यादातर लोग इसे लेकर सवाल करते हैं कि क्या सच में मोजा या जूता सुंघाने से मिर्गी का दौरा रुक जाता है या फिर यह सिर्फ एक मिथक है. 

डॉक्टरों के मुताबिक, मिर्गी (Epilepsy) दिमाग से जुड़ी एक न्यूरोलॉजिकल समस्या है, जिसमें दिमाग की एक्टिविटी अचानक असामान्य हो जाती है. ऐसे में मरीज को झटके आ सकते हैं, वह बेहोश हो सकता है या कुछ सेकंड के लिए एकटक देखने लग सकता है. लेकिन सही इलाज से ज्यादातर मरीज ठीक हो सकते हैं ऐसे में आइए आज जानते हैं कि मिर्गी का दौरा पड़ने पर मोजे क्यों सुंघाते हैं और क्या इससे सच में मरीज ठीक हो जाता है. 

मिर्गी का दौरा पड़ने पर मोजे क्यों सुंघाते है?

पुराने समय से लोगों के बीच यह तरीका चलता आ रहा है कि मिर्गी का दौरा पड़ने पर मरीज को जूता, चप्पल या मोजा सुंघाने से उसे होश आ जाता है, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार, यह सिर्फ एक मिथक है और इसका इलाज से कोई वैज्ञानिक संबंध नहीं है. मिर्गी का दौरा ज्यादातर मामलों में कुछ सेकंड से लेकर 1-2 मिनट के अंदर अपने आप खत्म हो जाता है. ऐसे में अगर इसी दौरान किसी ने मरीज को जूता या मोजा सुंघा दिया और थोड़ी देर बाद मरीज सामान्य हो गया, तो लोग यह मान लेते हैं कि वह इसी वजह से ठीक हुआ है. जबकि मरीज दौरे का नेचुरल टाइम पूरा होने के कारण सामान्य होता है. 
 
क्या इससे सच में मरीज ठीक हो जाता है?

मिर्गी के दौरे में जूता, चप्पल या मोजा सुंघाने से मरीज ठीक नहीं होता है. मिर्गी (एपिलेप्सी) दिमाग से जुड़ी एक बीमारी है, जिसमें न्यूरॉन्स एक साथ जरूरत से ज्यादा इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजने लगती हैं. इससे दिमाग का सामान्य कामकाज कुछ समय के लिए रूक जाता है और व्यक्ति को दौरा पड़ सकता है.  मिर्गी का दौरा आमतौर पर कुछ सेकंड से लेकर 1-2 मिनट में अपने आप ठीक हो जाता है. दौरे के दौरान मरीज के हाथ-पैरों में तेज झटके आ सकते हैं, वह बेहोश होकर गिर सकता है, शरीर अकड़ सकता है या कुछ सेकंड तक बिना किसी प्रतिक्रिया के एक ही दिशा में देखता रह सकता है. यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है और इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. जैसे सिर पर गंभीर चोट लगना, तेज बुखार, स्ट्रोक, दिमाग में संक्रमण, ऑक्सीजन की कमी, ब्लड शुगर का बहुत कम या ज्यादा होना, ब्रेन ट्यूमर या कुछ मामलों में जेनेटिक कारण

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मिर्गी का दौरा पड़ने पर कौन-कौन से लक्षण दिखाई देते हैं?

हर मरीज में लक्षण अलग हो सकते हैं. आमतौर पर इनमें अचानक बेहोश हो जाना, हाथ-पैरों में तेज झटके आना, शरीर में अकड़न महसूस होना, मुंह से झाग निकलना, जबड़ा जकड़ जाना, कुछ सेकंड तक एकटक देखते रहना, चक्कर खाकर गिर जाना और दौरे के बाद भ्रम या थकान महसूस होना शामिल हैं. 

मिर्गी का दौरा पड़ने पर क्या करना चाहिए?

1. मरीज को करवट के बल लिटाएं – मरीज को सुरक्षित जगह पर एक करवट से लिटा दें. इससे मुंह में जमा लार या झाग आसानी से बाहर निकल सकेगा और सांस लेने में परेशानी नहीं होगी. 

2. आसपास की खतरनाक चीजें हटा दें – मरीज के आसपास रखी कुर्सी, मेज, नुकीली या धारदार चीजें दूर कर दें, जिससे उसे चोट न लगे. 

3. कपड़ों को ढीला करें – अगर शर्ट के ऊपरी बटन बंद हैं या कपड़े बहुत टाइट हैं, तो उन्हें थोड़ा ढीला कर दें. 

4. दौरे का समय नोट करें – ध्यान रखें कि दौरा कितनी देर तक चला. अगर दौरा 5 मिनट से ज्यादा समय तक जारी रहे, तो तुरंत अस्पताल ले जाएं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आंखों के नीचे सूजन और डार्क सर्कल बढ़ गए हैं? जानें इसकी वजह और बचाव

आंखों के नीचे सूजन और डार्क सर्कल बढ़ गए हैं? जानें इसकी वजह और बचाव


Eye Care Tips: गर्मियों का मौसम आते ही लोग स्किन पर टैनिंग, पिंपल्स, पसीना और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याओं की शिकायत करने लगते हैं, साथ ही तेज गर्मी का असर आपकी आंखों के आसपास की स्किन पर भी पड़ता है. कई लोगों की आंखों के नीचे सूजन आने लगती है, डार्क सर्कल गहरे दिखाई देने लगते हैं और चेहरा हमेशा थका-थका नजर आने लगता है. अक्सर लोग इसे सिर्फ नींद की कमी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि गर्मियों में बढ़ी हुई गर्मी, डिहाइड्रेशन, तेज धूप और लाइफस्टाइल की कुछ गलत आदतें भी इसके पीछे बड़ी वजह हो सकती हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार, अगर समय रहते सही कदम उठाए जाएं तो आंखों के नीचे की सूजन और डार्क सर्कल की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है. तो आइए जानते हैं कि गर्मियों में ऐसा क्यों होता है और इससे बचने के लिए आपको क्या करना चाहिए. 

गर्मियों में आंखों के नीचे सूजन क्यों आ जाती है?

आंखों के आसपास की स्किन बहुत पतली होती है. गर्म मौसम में शरीर ज्यादा पसीना छोड़ता है, जिससे डिहाइड्रेशन होने लगता है. इसके अलावा तेज धूप, प्रदूषण, ज्यादा नमक वाला खाना, पूरी नींद न लेना और लंबे समय तक मोबाइल या लैपटॉप स्क्रीन के सामने बैठे रहना भी आंखों के नीचे सूजन की वजह बन सकता है. डॉक्टरों के मुताबिक, इस स्थिति को पेरिऑर्बिटल पफीनेस (Periorbital Puffiness) कहा जाता है. इसमें आंखों के आसपास के ढीले टिशूज में पानी जमा होने लगता है, जिससे सूजन दिखाई देने लगती है. 

गर्मियों में डार्क सर्कल क्यों बढ़ जाते हैं?

डार्क सर्कल कई कारणों से हो सकते हैं. कुछ लोगों में यह स्किन के नीचे मौजूद ब्लड वेसल्स के ज्यादा दिखाई देने की वजह से होते हैं, जबकि कुछ में थकान, नींद की कमी और डिहाइड्रेशन इसकी वजह बनते हैं. कई बार धूप के ज्यादा संपर्क में रहने से आंखों के नीचे पिगमेंटेशन बढ़ जाता है, जिससे काले घेरे और ज्यादा गहरे दिखाई देने लगते हैं. शरीर में पानी की कमी होने पर आंखों के नीचे की स्किन बेजान और धंसी हुई भी नजर आ सकती है. 

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इससे बचने के लिए आपको क्या करना चाहिए

1. ठंडी सिकाई से मिलेगी राहत – अगर आंखों के नीचे सूजन है, तो ठंडी सिकाई काफी फायदेमंद हो सकती है. आप खीरे के ठंडे स्लाइस, फ्रिज में रखे हुए जेल आई मास्क, ठंडे चम्मच या ठंडी की हुई टी बैग्स को 10 से 15 मिनट तक बंद आंखों पर रख सकते हैं. इससे ब्लड वेसल्स सिकुड़ती हैं और सूजन कम होने में मदद मिलती है. 

2.टी बैग्स का इस्तेमाल भी कर सकते हैं – ग्रीन टी और ब्लैक टी बैग्स में कैफीन और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो आंखों के आसपास की सूजन को कुछ समय के लिए कम करने में मदद कर सकते हैं. हालांकि टी बैग्स को अच्छी तरह ठंडा करने के बाद ही इस्तेमाल करें. गर्म टी बैग्स आंखों की नाजुक स्किन को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

3. शरीर को हाइड्रेट रखें – गर्मियों में ज्यादा पसीना निकलने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है. इसका असर सबसे पहले चेहरे और आंखों के आसपास दिख सकता है. दिनभर पूरी मात्रा में पानी पिएं और खीरा, तरबूज, संतरा जैसे पानी से भरपूर फलों को अपनी डाइट में शामिल करें. इससे स्किन की नमी बनी रहती है और आंखों के नीचे की थकान कम नजर आती है. 

4. नमक का सेवन कम करें – बहुत ज्यादा नमक खाने से शरीर में पानी रुकने लगता है, जिससे आंखों की सूजन बढ़ सकती है. प्रोसेस्ड फूड, पैकेट वाले स्नैक्स और ज्यादा नमकीन चीजों का सेवन कम करें. इससे शरीर में फ्लूइड रिटेंशन कम होगा और आंखों की सूजन में राहत मिल सकती है. 

5. भरपूर नींद लेना जरूरी है – अगर आप रोजाना पूरी नींद नहीं लेते, तो डार्क सर्कल और पफीनेस दोनों ज्यादा नजर आने लगते हैं. रोजाना 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद लेने की कोशिश करें. इससे स्किन और ब्लड वेसल्स को रिकवर होने का समय मिलता है और चेहरा ज्यादा फ्रेश दिखाई देता है. 

6. धूप से आंखों की सुरक्षा करें – तेज धूप आंखों के नीचे पिगमेंटेशन बढ़ा सकती है और  स्किन की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को तेज कर सकती है. घर से बाहर निकलते समय UV प्रोटेक्शन वाले सनग्लासेस पहनें और चेहरे के लिए परफेक्ट सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें. इससे आंखों के आसपास की नाजुक स्किन सुरक्षित रहती है. 

कब डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है?

ज्यादातर मामलों में आंखों के नीचे हल्की सूजन और डार्क सर्कल अस्थायी होते हैं और सही देखभाल से ठीक हो जाते हैं, लेकिन अगर सूजन लगातार बनी रहे, आंखों में लालिमा, खुजली, दर्द हो या एक आंख में अचानक ज्यादा सूजन आ जाए, तो इसे नजरअंदाज न करें. ऐसे लक्षण एलर्जी, संक्रमण, थायराइड की समस्या या किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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