आपके चेहरे की चमक बिगाड़ रहे रोजमर्रा के ये 5 फूड्स, एक्सपर्ट्स ने किया चौंकाने वाला खुलासा

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सफेद ब्रेड देखने में भले ही खतरनाक न लगे, लेकिन यह स्किन के लिए सबसे बड़े दुश्मनों में से एक है. एक्सपर्ट्स के अनुसार व्हाइट ब्रेड का ग्लाइसेमिक इंडेक्स काफी ज्यादा होता है, जिससे ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है. इससे शरीर में इंसुलिन और सूजन बढ़ती है, जो पिंपल्स और समय से पहले झुर्रियों की वजह बन सकती है.

वहीं तेज मसाले वाले स्नैक्स स्वाद में भले ही मजेदार लगें, लेकिन चेहरे पर इनका असर साफ दिखता है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि ऐसे स्नैक्स में मौजूद केमिकल्स और खराब फैट्स शरीर में सूजन बढ़ाते हैं. यही सूजन चेहरे पर पफीनेस, ब्रेकआउट्स और जलन के रूप में नजर आती है.

वहीं तेज मसाले वाले स्नैक्स स्वाद में भले ही मजेदार लगें, लेकिन चेहरे पर इनका असर साफ दिखता है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि ऐसे स्नैक्स में मौजूद केमिकल्स और खराब फैट्स शरीर में सूजन बढ़ाते हैं. यही सूजन चेहरे पर पफीनेस, ब्रेकआउट्स और जलन के रूप में नजर आती है.

Published at : 06 Jan 2026 10:01 AM (IST)

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अगर उम्र बढ़ानी है और बीमारियों से बचना है मकसद, जरूर अपनाएं डॉक्टर्स की बताई ये 5 आदतें

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बिना सोचे-समझे मेडिकल स्टोर से ले आते हैं बुखार और दर्द की दवा, जानें यह कितना बड़ा खतरा?

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Taking Medicines Without Prescription: बुखार या हल्का दर्द होते ही मेडिकल स्टोर से दवा ले लेना भारत में आम बात हो गई है. बिना डॉक्टर की सलाह के लोग पेनकिलर, बुखार की दवा और खांसी की सिरप का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन हाल ही में सरकार द्वारा दर्द निवारक दवा निमेसुलाइड  के हाईडोज पर रोक लगाए जाने के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में है कि यह लापरवाही कितनी खतरनाक साबित हो सकती है.

दरअसल, इसको लेकर हेल्थ एक्सपर्ट बताते हैं कि एंटीबायोटिक और एसिड की दवाओं के अलावा भारत में सबसे ज्यादा गलत तरीके से इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं में पेन किलर, खांसी की सिरप और नींद की गोलियां शामिल हैं. इन दवाओं का जरूरत से ज्यादा या गलत तरीके से सेवन शरीर के कई अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है.

क्या होता है नुकसान?

दर्द, सूजन और बुखार में इस्तेमाल होने वाली दवाओं को नॉनस्टेरॉइडल कहा जाता है. इनमें पैरासिटामोल, आइबुप्रोफेन, डाइक्लोफेनाक और नेप्रोक्सेन जैसी दवाएं शामिल हैं. पैरासिटामोल को आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है, लेकिन इसकी अधिक मात्रा लीवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है. खासतौर पर शराब पीने वालों या पहले से लीवर की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए यह जानलेवा भी हो सकती है. डॉक्टर पीएन वेंकटेश ने संडे गार्जियन में अपने एक लेख में बताया कि पेनकिलर जैसे डाइक्लोफेनाक और केटोरोलैक लंबे समय तक लेने पर पेट में अल्सर, आंतरिक ब्लीडिंग, किडनी खराब होने, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ा देते हैं.  इसके बावजूद ये दवाएं कई जगह बिना पर्ची के आसानी से मिल जाती हैं.

लंबे समय से खुलकर हो रहा यूज

एक्सपर्ट बताते हैं कि सरकार द्वारा जिस निमेसुलाइड बैन पर रोक लगाई गई है, उसे लीवर के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है. यह दवा कई देशों में पहले ही प्रतिबंधित है और भारत में 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित है. इसके बाद भी लंबे समय तक इसका खुलेआम इस्तेमाल होता रहा. एक्सपर्ट यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि हर बुखार को सामान्य फ्लू मानना भारी भूल हो सकती है. डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड, निमोनिया, टीबी, यूरिन इंफेक्शन और मेनिन्जाइटिस जैसी गंभीर बीमारियों की शुरुआत भी बुखार से होती है. ऐसे में सिर्फ बुखार की दवा लेने से बीमारी दब जाती है और सही इलाज में देरी हो जाती है, जो जानलेवा साबित हो सकती है.

डॉक्टर से सलाह लेना क्यों जरूरी?

भारत में दवाओं को अलग-अलग शेड्यूल में रखा गया है. कई पेनकिलर शेड्यूल H के तहत आते हैं, यानी इन्हें केवल डॉक्टर की पर्ची पर बेचा जाना चाहिए. लेकिन ये दवाएं बिना पर्ची के भी मिल जाती हैं. इसके अलावा दवाओं के मिलते-जुलते ब्रांड नाम भी एक बड़ा खतरा हैं, जिससे गलत दवा मिलने का जोखिम बना रहता है. स्वास्थ्य जानकारों का कहना है कि खुद से दवा लेने की आदत से पेट में अल्सर, अंदरूनी ब्लीडिंग, लीवर फेलियर, किडनी डैमेज और हार्ट अटैक तक का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्टरों सलाह देते हैं कि बुखार या दर्द होने पर खुद से दवा लेने के बजाय डॉक्टर से परामर्श लिया जाए.

यह भी पढ़ें: ड्राइविंग के दौरान तेज संगीत सुनना कितना खतरनाक, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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युवाओं में तेजी से बढ़ रही बॉडी इमेज एंग्जायटी, AIIMS-ICMR ने किया चौंकाने वाला खुलासा

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लिवर कैंसर में कब बदल जाता है फैटी लिवर? दिक्कत बढ़ने से पहले समझें लक्षण

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How To Keep Liver Healthy: लिवर हमारे शरीर के सबसे ज़रूरी अंगों में से एक है. यह खून को साफ करने, जरूरी प्रोटीन बनाने, शरीर में ऊर्जा स्टोर करने और टॉक्सिन्स बाहर निकालने जैसे कई अहम काम करता है. इसके अलावा लिवर बाइल भी बनाता है, जो पाचन में मदद करता है. लेकिन जब लिवर की सेल्स असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं, तो यही स्थिति आगे चलकर लिवर कैंसर का रूप ले लेती है, जो सेहत के लिए बेहद गंभीर साबित हो सकती है.

लिवर कैंसर होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं. लंबे समय तक शराब का सेवन, हेपेटाइटिस B और C का इंफेक्शन, फैटी लिवर की समस्या, मोटापा या फिर परिवार में पहले किसी को कैंसर होना, ये सभी इसके जोखिम को बढ़ाते हैं. समय के साथ लिवर कैंसर शरीर की डिटॉक्स प्रक्रिया को प्रभावित करने लगता है, जिससे खून में ज़हरीले तत्व जमा होने लगते हैं, इसका असर थकान, बिना वजह वजन कम होना और पाचन संबंधी दिक्कतों के रूप में दिखाई दे सकता है.

कितने तरह के होते हैं लिवर कैंसर?

लिवर कैंसर मुख्य रूप से दो तरह का होता है. पहला है हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा, जो सबसे आम प्रकार है और सीधे लिवर की सेल्स से शुरू होता है. दूसरा है कोलैंजियोकार्सिनोमा, जो पित्त वेसल्स में विकसित होता है. लिवर कैंसर को खतरनाक इसलिए माना जाता है क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर हल्के होते हैं या लोग उन्हें नज़रअंदाज कर देते हैं। जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक यह काफी आगे बढ़ चुकी होती है। लिवर की कार्यक्षमता कम होने से शरीर के दूसरे अंगों पर भी असर पड़ता है और धीरे-धीरे शरीर कमजोर होने लगता है.

क्या होते हैं लक्षण?

लिवर कैंसर के शुरुआती लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं और कई बार इन्हें आम बीमारियों की तरह समझ लिया जाता है. शुरुआत में लगातार थकान महसूस होना, कमजोरी, भूख कम लगना, बिना किसी कारण वजन घटना या पेट के दाहिने हिस्से में दर्द या भारीपन महसूस होना शामिल है. कुछ लोगों में आंखों और त्वचा का पीला पड़ना यानी पीलिया, बार-बार मतली या उल्टी की शिकायत भी हो सकती है.

जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, पेट और पैरों में सूजन आ सकती है, शरीर की ताकत और कम होने लगती है और गंभीर मामलों में खून की उल्टी या ब्लीडिंग जैसी स्थिति भी बन सकती है. चूंकि ये लक्षण दूसरी बीमारियों जैसे लग सकते हैं, इसलिए समय रहते डॉक्टर से जांच कराना बहुत जरूरी है. सीटी स्कैन, एमआरआई और लिवर बायोप्सी जैसी जांचें सही डायग्नोसिस में मदद करती हैं. अगर बीमारी का पता शुरुआती दौर में चल जाए, तो इलाज के बेहतर नतीजे मिल सकते हैं और गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

दिलशाद गार्डन स्थित एक प्रतिष्ठित निजी क्लीनिक के गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. आशीष सचान बताते हैं कि “लिवर कैंसर के लक्षण धीरे-धीरे उभरते हैं और शुरुआत में इन्हें आम कमजोरी या पेट की समस्या समझकर लोग नज़रअंदाज कर देते हैं. उनके मुताबिक लगातार थकान रहना, भूख न लगना, बिना वजह वजन कम होना और पेट के दाहिने हिस्से में दर्द या भारीपन महसूस होना ऐसे संकेत हैं, जिन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए.”

ये भी पढ़ें-गर्भावस्था में बढ़ रहा है शुगर का खतरा, पहली एंटीनैटल विजिट में ही डायबिटीज स्क्रीनिंग अनिवार्य, जानें क्यों है जरूरी?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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गर्भावस्था में शुगर लेवल की अनदेखी पड़ सकती है भारी: जानें मां और बच्चे को कैसे रखें सुरक्षित?

गर्भावस्था में शुगर लेवल की अनदेखी पड़ सकती है भारी: जानें मां और बच्चे को कैसे रखें सुरक्षित?


How To Control Sugar During Pregnancy: अक्सर गर्भावस्था को खुशियों और उत्साह से भरा सफर माना जाता है, लेकिन इस दौरान कुछ छिपे हुए स्वास्थ्य जोखिम भी सामने आ सकते हैं. इन्हीं में से एक है जेस्टेशनल डायबिटीज, जो आजकल प्रेग्नेंसी के दौरान एक गंभीर समस्या के रूप में पहचानी जा रही है. भारत में डायबिटीज इन प्रेग्नेंसी स्टडी ग्रुप ऑफ इंडिया की गाइडलाइंस, जिन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय का समर्थन मिला है, सभी गर्भवती महिलाओं की जांच की सलाह देती हैं. इसका मकसद समय रहते बीमारी की पहचान करना है, ताकि मां और बच्चे दोनों को होने वाले खतरे कम किए जा सकें.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

जेस्टेशनल डायबिटीज अक्सर बिना किसी साफ लक्षण के बढ़ती है, इसलिए कई महिलाओं को तब तक पता नहीं चलता जब तक जांच में ब्लड शुगर ज्यादा न निकल आए. अगर इसका इलाज न हो, तो डिलीवरी के समय दिक्कतों बढ़ सकती हैं और आगे चलकर मां को टाइप-2 डायबिटीज होने का खतरा भी बढ़ जाता है. इसी वजह से समय पर जांच बेहद जरूरी मानी जाती है.

क्या  कहते हैं एक्सपर्ट?

स्वास्थ्य एक्सपर्ट और डब्ल्यूएचओ के अनुसार, गर्भावस्था के 24 से 28 हफ्तों के बीच ब्लड शुगर की जांच करानी चाहिए. हालांकि DIPSI की सलाह है कि यह जांच और भी पहले, यानी पहली एंटीनैटल विज़िट पर ही शुरू की जा सकती है, ताकि बीमारी को शुरुआती चरण में ही कंट्रोल किया जा सके. भले ही किसी महिला में डायबिटीज के सामान्य जोखिम न हों, फिर भी सभी की जांच करने से बीमारी जल्दी पकड़ में आ जाती है. इससे समय रहते खानपान में बदलाव, ब्लड शुगर मॉनिटरिंग और सुरक्षित शारीरिक गतिविधियों जैसी जरूरी सावधानियां अपनाई जा सकती हैं. DIPSI की 2023 की गाइडलाइंस के मुताबिक, बिना उपवास के 75 ग्राम ग्लूकोज वाला एक आसान टेस्ट किफायती और भरोसेमंद तरीका माना जाता है, जिसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी किया जा सकता है.

बच्चों पर पड़ता है इसका असर

प्रेग्नेंसी के दौरान अगर ब्लड शुगर कंट्रोल में न रहे, तो इसका असर बच्चे पर भी पड़ सकता है. ज्यादा शुगर की वजह से बच्चे का वजन जरूरत से ज्यादा बढ़ सकता है, जिससे डिलीवरी के समय दिक्कतें आ सकती हैं। कुछ नवजात बच्चों में जन्म के बाद ब्लड शुगर अचानक गिरने की समस्या हो सकती है और गंभीर मामलों में उन्हें NICU में भर्ती करना पड़ सकता है. इसलिए पूरी गर्भावस्था के दौरान सतर्क निगरानी जरूरी है. जेस्टेशनल डायबिटीज को मैनेज करने का मुख्य लक्ष्य मां के ब्लड शुगर लेवल को स्थिर रखना होता है. इसके लिए संतुलित डाइट बहुत जरूरी है, जिसमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा नियंत्रित हो और फाइबर से भरपूर भोजन शामिल हो. प्रोसेस्ड फूड और ज्यादा मीठी चीजों से दूरी रखने से ब्लड शुगर अचानक बढ़ने से बचती है और मां व बच्चे दोनों की सेहत बेहतर रहती है.

कैसे कर सकते हैं बचाव?

हल्की-फुल्की एक्सरसाइज, जैसे रोज़ टहलना या प्रेग्नेंसी के लिए सुरक्षित योग, इंसुलिन की संवेदनशीलता बढ़ाने में मदद करते हैं. अगर सिर्फ लाइफस्टाइल बदलाव से शुगर कंट्रोल न हो, तो डॉक्टर की निगरानी में इंसुलिन या दवाएं दी जाती हैं, ताकि मां और भ्रूण दोनों सुरक्षित रहें. डिलीवरी के बाद भी खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता। जिन महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज हो चुकी होती है, उनमें आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज या प्रीडायबिटीज का खतरा ज्यादा रहता है. इसलिए डिलीवरी के 4 से 12 हफ्तों के भीतर और फिर नियमित अंतराल पर ब्लड शुगर की जांच जरूरी मानी जाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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