सर्दियों में लगती है बार-बार भूख, जानें चिप्स या पॉपकॉर्न में से आपके लिए क्या है बेहतर?

सर्दियों में लगती है बार-बार भूख, जानें चिप्स या पॉपकॉर्न में से आपके लिए क्या है बेहतर?


सर्दियों के मौसम में डाइजेस्टिव फायर तेज होने की वजह से भूख बार-बार और जल्दी लगती है. खाना खाने के कुछ घंटों बाद ही तीखा और मसालेदार खाने का मन करता है. ऐसे में लोग भूख को शांत करने के लिए चाय के साथ चिप्स, नमकीन और तले-भुने फूड आइटम्स का सहारा लेते हैं, जो पाचन सिस्टम से लेकर हार्ट को भी नुकसान पहुंचाते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसे मौकों पर चिप्स खाना ज्यादा बेहतर होगा या पॉपकॉर्न खाना?

कितना बेहतर होता है पॉपकॉर्न?

पॉपकॉर्न स्नैक के लिए बेहतर ऑप्शन है, क्योंकि यह चिप्स की तुलना में तला और मसालेदार नहीं होता है. दूसरा, चिप्स को पैकेट के अंदर ताजा बनाए रखने के लिए केमिकल का भी इस्तेमाल किया जाता है, जिसका सेवन सेहत के लिए खतरनाक होता है. दरअसल, पॉपकॉर्न एक साबुत अनाज है, जिसे बनाने में बहुत कम तेल और मसालों का इस्तेमाल होता है और इसे कम मेहनत में आसानी से घर पर भी बनाया जा सकता है. इसे खाने से भूख भी संतुलित रहती है और ओवरईटिंग की समस्या भी नहीं रहती है.

पॉपकॉर्न में कौन-से पोषक तत्व?

पॉपकॉर्न में बाकी सभी स्नैक्स की तुलना में अधिक मात्रा में पोषक तत्व होते हैं. इसमें कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, प्रोटीन, फैट, आयरन, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं. सर्दियों में शरीर में वात दोष बढ़ता है. पॉपकॉर्न रुक्ष तासीर की वजह से शरीर में वात की वृद्धि को संतुलित रखता है और इस खाने से कैलोरी भी नहीं बढ़ती है. कुल मिलाकर पॉपकॉर्न का सेवन आपके वजन को भी नियंत्रित रखने में भी मदद करता है.

तली-भुनी चीजें कितनी खतरनाक?

तली-भुनी और मसालेदार चीजों के सेवन से शरीर में कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है, जो सीधा हृदय और रक्तवाहिनी को प्रभावित करता है, लेकिन पॉपकॉर्न के अंदर कोलेस्ट्रॉल को घटाने के गुण होते हैं. ये रक्त वाहिकाओं पर पड़ने वाले दबाव को कम करता है. इसके अलावा, अगर सीमित मात्रा में खाया जाए तो पॉपकॉर्न पेट के स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर है, लेकिन अगर गैस बनने या अपच की परेशानी होती है तो इसे खाने से बचें.

कैसे खाना चाहिए पॉपकॉर्न?

अब सवाल है कि पॉपकॉर्न का सेवन कैसे करना फायदेमंद होगा? पॉपकॉर्न को हमेशा काला नमक, देसी घी और जीरा पाउडर के साथ मिलाकर बनाना चाहिए. इससे पॉपकॉर्न का स्वाद भी बढ़ जाता है और पेट के लिए भी फायदेमंद होता है.

ये भी पढ़ें: Heart Attack After Stent: स्टेंट डलवाने के बाद भी क्यों ब्लॉक हो जाती हैं दिल की नसें? डॉक्टर से समझें

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कोल्ड ड्रिंक-च्विंगम खाते हैं तो हो जाइए सावधान, ट्रिगर हो सकता है माइग्रेन और ब्लड शुगर

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स्टीम्ड मोमो बेहतर या फ्राईड मोमो या दोनों नहीं, जानें किससे कितना हो सकता है नुकसान?

स्टीम्ड मोमो बेहतर या फ्राईड मोमो या दोनों नहीं, जानें किससे कितना हो सकता है नुकसान?


Steamed Momos Or Fried Momos Which Is Better: मोमो अगर सही तरीके से बने हों तो ये स्ट्रीट फूड में सबसे बेहतर विकल्पों में गिने जा सकते हैं. बांस की टोकरियों में रखे गरमागरम मोमो, ढक्कन उठाते ही उठती मसालों की खुशबू. आजकल हर गली में लोगों का पसंदीदा कंफर्ट फूड बन चुके हैं. इसके बावजूद इन्हें सेहत के लिए खतरनाक मानते हैं. लेकिन सच यह है कि ठीक ढंग से तैयार किए गए मोमो न सिर्फ हल्के होते हैं, बल्कि पोषण के लिहाज़ से भी बेहतर साबित हो सकते हैं. चलिए आपको इनके बारे में बताते हैं कि मोमा आपके लिए कितना हेल्दी और खतरनाक हैं.

ज्यादातर क्लासिक मोमो भाप में पकते हैं, तेल में नहीं डूबते यही बात उन्हें समोसे, पकौड़े या रोल से हल्का बनाती है. स्टीमिंग से पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं और ट्रांस फैट का सवाल ही नहीं उठता, कैलोरी गिनने वालों के लिए भी राहत एक प्लेट वेज मोमो आमतौर पर 250 कैलोरी के आसपास रहती है, जो बर्गर या काठी रोल से कम है. पेट भी भरता है और भारीपन भी नहीं आता. हर मोमो अपने आप में एक मिनी मील है. रैपर से कार्बोहाइड्रेट, फिलिंग से प्रोटीन और फाइबर, और तिल के तेल या पनीर से थोड़ी-सी अच्छी फैट सब कुछ संतुलित. यह ऐसा स्नैक नहीं जो ब्लड शुगर बढ़ाकर तुरंत गिरा देच ऊपर से अगर क्लियर सूप मिल जाए, जो नार्थ-ईस्ट में मिलता है, तो बिना डीप-फ्राइड साइड्स के ही पूरा, हल्का और पोषक भोजन बन जाता है.

हेल्दी विकल्प

स्ट्रीट मोमो सिर्फ आटे की पोटली नहीं होते. इनमें पत्ता गोभी, गाजर, प्याज, स्प्रिंग अनियन या सोया चंक्स जैसी चीजें होती हैं, जो फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर हैं. चिकन या पनीर वेरिएंट बिना ज़्यादा फैट के प्रोटीन देते हैं. चाउमीन जैसे स्ट्रीट फूड के मुकाबले मोमो में खाली कैलोरी कम और पोषण ज्यादा मिलता है,खासतौर पर जब फिलिंग ताजा कटी हो और स्टीम्ड हो. भाप में पके होने की वजह से मोमो पेट पर भारी नहीं पड़ते. हल्का बाहरी आवरण और नमी वाली फिलिंग इन्हें तले-भुने, तीखे विकल्पों से ज्यादा पचने लायक बनाती है.

कौन कितना खतरनाक?

स्ट्रीट-स्टाइल मोमो आमतौर पर ब्लीच किए हुए रिफाइंड आटे से बनाए जाते हैं, जिसमें फाइबर लगभग नहीं होता और यह बहुत जल्दी पच जाता है. इसका नतीजा यह होता है कि मोमो खाने के बाद ब्लड शुगर अचानक तेजी से बढ़ती है. बार-बार ऐसा होने पर शरीर के लिए फैट स्टोर करना आसान हो जाता है.वहीं, फ्राई मोमो बड़ी मात्रा में तेल सोख लेते हैं. इससे कैलोरी तो काफी बढ़ जाती है, लेकिन पेट ज्यादा देर तक भरा हुआ महसूस नहीं होता. अगर मोमो हफ्ते में कई बार स्नैक के तौर पर खाने की आदत बन जाए, तो यह धीरे-धीरे आपकी कुल कैलोरी इनटेक बढ़ा देता है, जिससे वजन बढ़ने लगता है और शरीर की इंसुलिन को कंट्रोल करने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है.

कैसे बढ़ता है खतरा?

मोमो का ज्यादा सेवन पेट और इम्युनिटी दोनों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है और इसकी एक बड़ी वजह है खाने की साफ-सफाई से जुड़ा खतरा, जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं. स्ट्रीट मोमो भले ही स्वादिष्ट हों, लेकिन उनकी तैयारी और हैंडलिंग कई बार सेहत के लिए जोखिम बन जाती है. दिल्ली के स्ट्रीट फूड वेंडर्स पर किए गए एक माइक्रोबायोलॉजिकल सर्वे में वेज मोमो में चिंताजनक स्तर पर बैक्टीरिया पाए गए थे, जिनमें कोलीफॉर्म बैक्टीरिया और ई. कोलाई शामिल थे. International Journal of Current Microbiology and Applied Sciences में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, कई विक्रेता बिना दस्ताने सीधे हाथों से खाना बनाते हैं, बर्तन साफ करने के लिए वही गंदे कपड़े बार-बार इस्तेमाल करते हैं और भोजन को सही स्वच्छ स्थितियों में स्टोर नहीं करते.

साफ-सफाई पर ध्यान 

इस तरह की गंदी आदतों के कारण स्टैफाइलोकोकस ऑरियस, साल्मोनेला और अन्य खतरनाक बैक्टीरिया से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है, जो फूड पॉयजनिंग और पेट से जुड़ी गंभीर समस्याओं का कारण बन सकते हैं. खासतौर पर नमी और मानसून के मौसम में, जब बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं, यह जोखिम और भी ज्यादा बढ़ जाता है. कई स्ट्रीट वेंडर बिना सही सफ़ाई के नंगे हाथों से खाना तैयार और परोसते हैं, गलत तरीके से स्टोर किया गया खाना और खुला रहने से बैक्टीरिया का खतरा बढ़ जाता है. इस तरह असुरक्षित हैंडलिंग और पर्यावरणीय हालात फूड-बोर्न बीमारियों की आशंका को कई गुना बढ़ा देते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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अब सैलून में नहीं होगा हेयर ट्रांसप्लांट, सिर्फ एक्सपर्ट को मिलेगी इजाजत, जल्द आएंगे नए नियम

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Hair Transplant Regulation In India: हेयर ट्रांसप्लांट से जुड़ी गलत प्रक्रियाओं और शिकायतों के बढ़ते मामलों को देखते हुए केंद्र सरकार बड़ा बदलाव करने जा रही है. सरकार अब हेयर ट्रांसप्लांट को “कॉस्मेटिक सैलून” की कैटेगरी से निकालकर “सर्जिकल प्रक्रिया” के रूप में मान्यता देने की तैयारी में है. इससे इस तेजी से बढ़ते उद्योग में लापरवाही पर रोक लगाई जा सकेगी. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं कि आखिर मामला क्या है. 

क्यों लिया गया फैसला?

सैलून में आमतौर पर बाल कटवाना या स्टाइलिंग जैसी साधारण सेवाएं दी जाती हैं, जबकि हेयर ट्रांसप्लांट एक मेडिकल प्रक्रिया है. इसमें सुई, एनेस्थीसिया, साफ-सुथरा ऑपरेशन थिएटर और एक्सपर्ट डॉक्टर की जरूरत होती है. नेशनल काउंसिल फॉर क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स ने हेयर ट्रांसप्लांट सेंटर्स के लिए न्यूनतम मानकों का ड्राफ्ट तैयार किया है। इसके मुताबिक अब केवल योग्य डॉक्टर और खासकर डर्मेटोलॉजिस्ट और प्लास्टिक सर्जन ही हेयर ट्रांसप्लांट कर सकेंगे. बिना मेडिकल डिग्री वाले लोग यह काम नहीं कर पाएंगे.

क्या किया गया बदलाव?

मिंट की रिपोर्ट के अनुसार यह जानकारी तीन सरकारी अधिकारियों के आधार पर सामने आई है, जिसमें से एक सरकारी अधिकारी ने बताया कि “नए नियमों का मकसद फर्जी और गैरकानूनी क्लीनिकों को बंद करना है, हेयर ट्रांसप्लांट को अक्सर सैलून की सामान्य सेवा की तरह दिखाया जाता है. अब सिर्फ एक्सपर्ट डॉक्टर खासकर डर्मेटोलॉजिस्ट और प्लास्टिक सर्जन ही करेंगे.”

कोर्ट के फैसले के बाद उठाया कदम

यह फैसला दिल्ली हाई कोर्ट के मई 2022 के आदेश के बाद लिया जा रहा है. कोर्ट ने कहा था कि हेयर ट्रांसप्लांट एक मेडिकल सर्जरी है और इसे केवल एक्सपर्ट डॉक्टर ही मरीज की सहमति से कर सकते हैं. हालांकि, स्वास्थ्य मंत्रालय इन नियमों को तब तक लागू नहीं करेगा, जब तक हाई कोर्ट में चल रहे एक जुड़े मामले पर फैसला नहीं आ जाता.

भारत में बड़ा बाजार

मार्केट रिसर्च एजेंसी IMARC Group के मुताबिक, भारत में हेयर ट्रांसप्लांट का बाजार अभी करीब 252 मिलियन डॉलर का है, जो 2033 तक बढ़कर 1.7 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. कई फील्ड में कई बड़ी कंपनियां काम कर रही हैं. फॉलिक्युलर यूनिट एक्सट्रैक्शन और डायरेक्ट हेयर इम्प्लांटेशन जैसी नई तकनीकों के कारण इस इंडस्ट्री की लगभग 80 प्रतिशत कमाई पुरुषों से होती है. देश में हर साल करीब 3.5 लाख हेयर ट्रांसप्लांट होते हैं, जिसमें साल 2016 से अब तक कम से कम छह लोगों की मौत गलत इलाज और लापरवाही के कारण हो चुकी है. इनमें एनेस्थीसिया की ज्यादा डोज, एलर्जी शॉक, गंदगी से फैला इंफेक्शन और टिश्यू खराब होने जैसी वजहें सामने आई हैं. एक अन्य अधिकारी ने कहा ने बताया कि “कई सस्ते क्लीनिकों में न तो इमरजेंसी सुविधाएं हैं और न ही प्रशिक्षित स्टाफ. सरकार चाहती है कि ऐसे सेंटरों पर सख्त नियम लागू हों, ताकि मरीजों की जान सुरक्षित रह सके.”

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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एक ही मसल की एक्सरसाइज करना कितना खतरनाक, रीढ़ की हड्डी पर कितना पड़ता है असर?

एक ही मसल की एक्सरसाइज करना कितना खतरनाक, रीढ़ की हड्डी पर कितना पड़ता है असर?


What Happens If You Train One Muscle Only: पिछले 300 से ज्यादा दिनों से एक शख्स, जो खुद को “द क्रूक्ड मैन” कहता है, ऐसा काम कर रहा है जिसे ज्यादातर फिटनेस ट्रेनर गलत मानेंगे. वह अपने शरीर के बाकी हिस्सों को लगभग नजरअंदाज करते हुए सिर्फ एक ट्रैपेज़ियस मसल की एक्सरसाइज कर रहा है. नतीजा बेहद चौंकाने वाला है, एक कंधा और ऊपरी पीठ की मसल असामान्य रूप से बड़ी हो गई है, जबकि दूसरी तरफ का हिस्सा लगभग वैसा ही है. उसका कहना है कि यही उसका मकसद था.

सोशल मीडिया पर टिप्स

यह शख्स सोशल मीडिया पर अपने इस एक्सपेरिमेंट को लगातार शेयर कर रहा है. वह इसे TikTok पर चल रहे “लुक्समैक्सिंग” ट्रेंड के खिलाफ प्रतिक्रिया बताता है, जहां लोग अपनी शक्ल-सूरत को परफेक्ट बनाने में लगे रहते हैं. उसकी सोच इसके उलट है, जिसे वह “लुक्स मिनिमाइजिंग” कहता है. एक वीडियो में अपनी सोच समझाते हुए द क्रूक्ड मैन ने कहा कि यह आइडिया उसे सोशल मीडिया स्क्रॉल करते वक्त आया. “लोग पूछते हैं कि कोई एक ही ट्रैप क्यों ट्रेन करता है? बात सीधी है” उसने कहा कि “मैं अपनी फेरारी में TikTok स्क्रॉल कर रहा था और बार-बार लुक्समैक्सिंग वाले वीडियो आ रहे थे. वे कह रहे थे कि ये करो, वो करो, ज्यादा अट्रैक्टिव बन जाओ, ज्यादा महिलाएं मिलेंगी. और मैं सोच रहा था कि लोगों को ये समस्या होती है? मुझे तो उलटी समस्या है.”

 

लुक्स मिनिमाइज 

उसका समाधान था जानबूझकर शरीर को असंतुलित बनाना. उसने कहा, “लुक्स मिनिमाइज करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है? खुद को ज्यादा असिमेट्रिकल बनाना. एक ही ट्रैप की एक्सरसाइज करो और सच कहूं तो यह कमाल का काम कर गया.” तब से वह रोजाना सिर्फ एक तरफ की ट्रैपेजियस मसल को ट्रेन कर रहा है. लगभग एक साल बाद फर्क साफ दिखता है. एक कंधा साफ तौर पर ऊंचा और मोटा नजर आता है, जबकि दूसरा अपेक्षाकृत कमजोर है. एक्सपेरिमेंट से पहले की तस्वीरों में उसका शरीर संतुलित दिखता है, लेकिन अब उसका ऊपरी शरीर फिट होने के बावजूद बाईं तरफ कहीं ज्यादा उभरा हुआ नजर आता है. यह दिखाता है कि लगातार टार्गेटेड ट्रेनिंग से मसल्स कितनी तेजी से बदल सकती हैं.

क्या लेता है डाइट में?

उसने अपनी डेली डाइट भी शेयर की है, जिसमें प्रोटीन की मात्रा काफी ज्यादा है. वह सार्डिन मछली, बकरी का दही, प्रोटीन पाउडर, ग्राउंड बीफ और अंडे खाता है, ताकि जिस मसल को वह ट्रेन कर रहा है, उसकी ग्रोथ तेजी से हो सके.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

हालांकि, डॉक्टर इस तरह की ट्रेनिंग को लेकर गंभीर चेतावनी दे रहे हैं. पहले LADbible से बात करते हुए डॉक्टर सुहैल हुसैन ने कहा कि जो थोड़े-बहुत फायदे दिख रहे हैं, वे लंबे समय के नुकसान के आगे कुछ भी नहीं हैं. उनके मुताबिक “शॉर्ट टर्म में कुछ पॉजिटिव असर हो सकता है, लेकिन इस शख्स के शरीर में साफ तौर पर मस्कुलोस्केलेटल असंतुलन पैदा हो रहा है” डॉ. हुसैन ने चेताया कि एकतरफा एक्सरसाइज से रीढ़ की हड्डी का असंतुलन, जोड़ों पर दबाव, आसपास की मसल्स में चोट और लंबे समय तक रहने वाला दर्द हो सकता है. उन्होंने कहा, “शरीर संतुलन और समानता के लिए बना है. इसे इस तरह बिगाड़ना लंबे समय में गंभीर ऑर्थोपेडिक समस्याएं पैदा कर सकता है.”
 
कोई असली फायदा नहीं

हालांकि उन्होंने माना कि एक मसल को ज्यादा ट्रेन करने से उसमें ताकत बढ़ सकती है, लेकिन उनका कहना था कि इसका कोई असली फायदा नहीं है. “ट्रैपेज़ियस मसल का काम सपोर्ट और स्टेबिलिटी देना होता है, न कि अकेले ताकत दिखाना. सिर्फ साइज बढ़ाने का कोई फंक्शनल फायदा नहीं है.” 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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