2050 तक दुनिया में 3.5 मिलियन होंगे ब्रेस्ट कैंसर के केस, बेहद डरावनी है यह स्टडी

2050 तक दुनिया में 3.5 मिलियन होंगे ब्रेस्ट कैंसर के केस, बेहद डरावनी है यह स्टडी


भारत समेत दुनियाभर में लगातार कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है. इस सिलसिले में ब्रेस्ट कैंसर को लेकर एक गंभीर चेतावनी भी सामने आई है. दरअसल मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित एक नई रिपोर्ट के अनुसार समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले सालों में ब्रेस्ट कैंसर वैश्विक स्तर की व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि 2050 तक महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के नए मामलों की संख्या 3.56 मिलियन तक पहुंच सकती है. वही अनुमानित आंकड़े 2.29 मिलियन से 4.83 मिलियन के बीच बताए गए हैं. सिर्फ मामले ही नहीं बल्कि मौतों के आंकड़े भी चिंताजनक है, रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक ब्रेस्ट कैंसर से होने वाली वैश्विक मौतें 1.37 मिलियन तक पहुंच सकती है. यह अनुमान 8.41 लाख से लेकर 20.2 लाख तक के दायरे में है. वहीं मौजूदा समय में हर साल करीब 7.64 लाख मौतें हो रही है जो आने वाले 25 साल में 44 प्रतिशत तक बढ़ सकती है.

अगले 25 साल में 44 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं मौतें

इस रिसर्च में बताया गया है कि अगर ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम, स्क्रीनिंग और इलाज की व्यवस्था मजबूत नहीं की गई तो 2050 तक सालाना मौतों की संख्या लगभग 14 लाख तक पहुंच सकती है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि मेडिकल साइंस में प्रगति के बाद भी कई देश बढ़ते मामलों से निपटने के लिए तैयार नहीं है. वहीं कमजोर स्वास्थ्य ढांचे वाले देशों में स्थिति और खतरनाक हो सकती है.

भारत में 1990 के बाद बढ़े मामले

रिपोर्ट में भारत की स्थिति पर भी चिंता जताई गई है. भारत में पिछले 3 दशकों में देश में ब्रेस्ट कैंसर का बोझ 5 गुना बढ़ा है. बदलती लाइफस्टाइल, शहरीकरण, देश में मातृत्व, ब्रेस्टफीडिंग में कमी, मोटापे और शुरुआती जांच की कमी को इसके प्रमुख कारणों में गिना गया है. वहीं भारत में अब यह कैंसर महिलाओं में सबसे आम कैंसर में से एक बन चुका है, खासकर शहरी इलाकों में. इसे लेकर डॉक्टरों का कहना है कि बड़ी संख्या में महिलाओं की पहचान बीमारी के लास्ट स्टेज में होती है, जिससे इलाज कठिन हो जाता है और मृत्यु दर बढ़ जाती है.

अमीर और गरीब देशों के बीच भी साफ अंतर

वहीं इस रिपोर्ट में यह भी साफ बताया गया है कि हाई आय वाले देशों में नए मामलों की दर स्थिर है और मृत्यु दर में कमी आई है. इसका कारण बेहतर स्क्रीनिंग, समय पर जांच और आधुनिक उपचार व्यवस्थाएं हैं. वहीं कम और मिडिल आय वाले देशों में नए मामलों और मौतों दोनों में बढ़ोतरी देखी जा रही है. इन देशों में रेडियोथेरेपी मशीनों की कमी, कीमोथेरेपी दवाइयों तक सीमित पहुंच और इलाज का ज्यादा खर्च बड़ी समस्या है. वहीं वैश्विक स्तर पर नए मामलों में इन देशों की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत है, लेकिन ब्रेस्ट कैंसर से जुड़ी कुल बीमारियों और समय से पहले मौतों में इनकी हिस्सेदारी 45 प्रतिशत से ज्यादा है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कितनी खतरनाक कंडीशन है प्री-डायबिटिक होना, इससे बचने के क्या हैं तरीके?

कितनी खतरनाक कंडीशन है प्री-डायबिटिक होना, इससे बचने के क्या हैं तरीके?


What Is Prediabetes And Why Is It Dangerous: प्रीडायबिटीज वह स्थिति होती है जब किसी व्यक्ति का ब्लड शुगर स्तर सामान्य से ज्यादा होता है, लेकिन इतना अधिक नहीं होता कि उसे टाइप-2 डायबिटीज कहा जाए. कई लोग इसे सिर्फ एक चेतावनी या शुरुआती संकेत मानते हैं, लेकिन डॉक्टर इसे काफी गंभीरता से लेते हैं. दरअसल, यह शरीर का वह चरण है जब मेटाबॉलिज्म में गड़बड़ी शुरू हो चुकी होती है और अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो आगे चलकर यह डायबिटीज में बदल सकती है.

दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहे हैं मामले

दुनियाभर में प्रीडायबिटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। कई रिपोर्टों के अनुसार बड़ी संख्या में लोग इस स्थिति से जूझ रहे हैं, लेकिन उन्हें इसका पता तक नहीं होता. लंबे समय तक ब्लड शुगर सामान्य से ऊपर रहने पर शरीर के अंदर धीरे-धीरे नुकसान शुरू हो सकता है. इससे ब्लड वेसल्स, दिल और मेटाबॉलिक सिस्टम पर असर पड़ता है. यही वजह है कि डॉक्टर इसे एक शुरुआती चेतावनी मानते हैं, ताकि समय रहते स्थिति को संभाला जा सके.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. शिवानी चौहान ने  TOI को बताया कि प्रीडायबिटीज उन लोगों में पाई जाती है जिनका ग्लूकोज या HbA1c स्तर डायबिटीज की सीमा तक नहीं पहुंचता, लेकिन कार्बोहाइड्रेट मेटाबॉलिज्म सामान्य नहीं रहता. ऐसे लोगों में फास्टिंग ब्लड शुगर बढ़ा हुआ हो सकता है या फिर ग्लूकोज टॉलरेंस कम हो सकता है. आमतौर पर HbA1c का स्तर 5.7 से 6.4 प्रतिशत के बीच होने पर इसे प्रीडायबिटीज की कैटेगरी में रखा जाता है. 

क्यों बढ़ रही है चिंता?

डॉक्टरों की चिंता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह स्थिति अक्सर चुपचाप आगे बढ़ती रहती है. कई बार शरीर में छोटे-छोटे बदलाव शुरू हो जाते हैं, जैसे ब्लड वेसल्स और नसों को नुकसान, जो लंबे समय बाद गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं. अगर इस चरण में ध्यान न दिया जाए तो आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज, हार्ट डिजीज, स्ट्रोक और अन्य मेटाबॉलिक समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है.

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आज की लाइफस्टाइल भी इसके पीछे एक बड़ा कारण बन रही है. ज्यादा प्रोसेस्ड फूड, मीठे पेय पदार्थ, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, लंबे समय तक बैठकर काम करना और बढ़ता मोटापा इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देते हैं. इसके अलावा उम्र बढ़ने के साथ मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ जाता है और शारीरिक गतिविधियां कम होने लगती हैं, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है.

क्या इसको कंट्रोल किया जा सकता है?

अच्छी बात यह है कि प्रीडायबिटीज को सही समय पर पहचाना जाए तो इसे कंट्रोल किया जा सकता है. डॉक्टर सबसे पहले लाइफस्टाइल में बदलाव की सलाह देते हैं. संतुलित आहार लेना, नियमित एक्सरसाइज करना और वजन को कंट्रोल रखना काफी मददगार साबित होता है. एक्सपर्ट के अनुसार सप्ताह में कम से कम 150 मिनट की मध्यम स्तर की शारीरिक गतिविधि ब्लड शुगर को संतुलित रखने में मदद कर सकती है. कई लोगों में सिर्फ इन बदलावों से ही ब्लड शुगर सामान्य स्तर पर वापस आ जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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घर में नया पेंट करवाने के बाद क्यों होने लगती है खांसी और घुटन? जानें कारण और बचाव के टिप्स

घर में नया पेंट करवाने के बाद क्यों होने लगती है खांसी और घुटन? जानें कारण और बचाव के टिप्स


Can Fresh Paint Cause Breathing Problems: नया पेंट हुआ कमरा अक्सर ताजगी का एहसास देता है, चमकती दीवारें, साफ माहौल और बदलाव की संतुष्टि. लेकिन जो तेज, केमिकल जैसी गंध कुछ दिनों तक बनी रहती है, वह सिर्फ नएपन की निशानी नहीं है, इसके साथ ही यह वोलेटाइल कार्बनिक यौगिकों यानी वीओसी के हवा में घुलने का संकेत है, जो सांस के जरिए शरीर में जा सकते हैं. पेंट, वार्निश, थिनर और चिपकाने वाले पदार्थों में फॉर्मल्डिहाइड, बेंजीन और टोल्यून जैसे वीओसी पाए जाते हैं. यूनाइटेड स्टेट एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन एजेंसी के अनुसार, पेंटिंग जैसी गतिविधियों के दौरान घर के अंदर बीओसी लेवल बाहर की हवा से कई गुना अधिक हो सकता है. ये केमिकल सांस डक्ट्स कोएक्साइटेड करते हैं, जिससे खांसी, गले में खराश और सीने में जकड़न महसूस हो सकती है.

क्या होती हैं दिक्कतें?

डॉ. आकाश शाह, वाइस प्रेसिडेंट टेक्निकल,न्यूबर्ग डायग्नोस्टिक्स बताते हैं कि वीओसी सांस के रास्ते ब्रॉन्कियल ट्यूब्स में सूजन पैदा कर सकते हैं और म्यूकस बढ़ा सकते हैं. इससे सांस की डक्ट्स संकरी हो जाती हैं. अगर इसके लक्षणों की बात करें, तो इसमें लगातार सूखी खांसी, घरघराहट और हल्की सांस फूलना शामिल हो सकता है. हेल्दी एडल्ट में ये लक्षण आमतौर पर एक्सपोजर बंद होने पर कम हो जाते हैं. लेकिन बार-बार संपर्क में आने से एयरवे अधिक संवेदनशील हो सकते हैं. बच्चों, बुजुर्गों, स्मोकिंग करने वालों और अस्थमा मरीजों में जोखिम अधिक होता है. लंबे समय में लगातार सूजन क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस जैसी समस्या की ओर बढ़ सकती है.

कब जांच करवानी चाहिए?

अगर पेंटिंग के बाद 3 से 4 हफ्ते तक खांसी बनी रहे, तो लंग्स की जांच जरूरी हो सकती है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन भी बताता है कि लंग फंक्शन टेस्ट शुरुआती सीओपीडी पैटर्न पहचानने में मददगार होते हैं.डॉ. हर्षा जैन ने TOI को बताया कि खराब वेंटिलेशन स्थिति को और गंभीर बना सकता है. बंद खिड़कियां, सिर्फ एसी पर निर्भर रहना और नमी भरे मौसम में पेंटिंग बीओसी को घर के अंदर फंसा देता है. क्रॉस-वेंटिलेशन यानी एक से ज्यादा खिड़कियां खोलना केमिकल को तेजी से बाहर निकालने में मदद करता है.

कैसे कर सकते हैं बचाव?

बचाव के लिए लो-वीओसी या नो वीओसी पेंटचुनना बेहतर है. पेंटिंग के दौरान मास्क पहनें और कम से कम 48 से 72 घंटे तक कमरे को खुला रखें. जहां संभव हो, छोटे बच्चों और बुजुर्गों को कुछ दिन दूसरे कमरे या स्थान पर रखें. इसके अलावा पेंट करते समय मास्क पहनना भी फायदेमंद है और इससे आप इस दिक्कत से बच सकते हैं. घर की सुंदरता जरूरी है, लेकिन सेहत उससे भी ज्यादा जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! अक्सर ‘साइलेंट’ होती है किडनी की बीमारी, इन संकेतों को न करें नजरअंदाज

सावधान! अक्सर ‘साइलेंट’ होती है किडनी की बीमारी, इन संकेतों को न करें नजरअंदाज


Early Warning Signs Of Kidney Problems: किडनी हमारे शरीर के सबसे अहम अंगों में से एक है. ये खून से गंदगी और टॉक्सिन्स को फिल्टर करती हैं, शरीर में फ्लुइड का संतुलन बनाए रखती हैं और कई जरूरी एक्टिविटी को सपोर्ट करती हैं. लेकिन अगर इनकी सही देखभाल न की जाए तो कई तरह की बीमारियां जन्म ले सकती हैं. सबसे चिंताजनक बात यह है कि किडनी की बीमारी अक्सर चुपचाप बढ़ती है और लक्षण तब सामने आते हैं, जब स्थिति काफी गंभीर हो चुकी होती है. इसलिए समय-समय पर जांच और जोखिम कारकों की जानकारी बेहद जरूरी है.

क्यों किडनी को दिक्कत होती है?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्थान मायो क्लिनिक के अनुसार, किडनी के काम करने की क्षमता में किसी भी तरह की रुकावट को किडनी रोग कहा जाता है. इनमें किडनी इंफेक्शन, क्रॉनिक किडनी डिजीज, पथरी, ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिसऔर पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज समस्या) शामिल हैं. कुछ स्थितियां किडनी रोग का खतरा बढ़ा देती हैं, जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, धूम्रपान और परिवार में किडनी फेलियर का पुराना केस होना. इसके साथ ही 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में भी खतरा ज्यादा रहता है.

क्यों जरूरी है किडनी का सेहतमंद रहना?

किडनी सिर्फ शरीर से गंदगी निकालने का काम नहीं करती. ये ऐसे हार्मोन बनाती हैं जो ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करते हैं और रेड ब्लड सेल्स के निर्माण में मदद करते हैं. इसके साथ ही इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखना और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालना भी इनकी जिम्मेदारी है. अगर किडनी ठीक से काम न करे तो इन सभी प्रक्रियाओं पर असर पड़ता है. दुनियाभर में किडनी रोग के मामले बढ़ रहे हैं और इनका सीधा संबंध हार्ट रोगों से भी जुड़ा है, किडनी की खराबी से हार्ट की बीमारी से मौत का खतरा बढ़ जाता है और डायबिटीज व हाइपरटेंशन की दिक्कतें भी बढ़ सकती हैं. इलाज न मिलने पर यह स्थिति किडनी फेलियर तक पहुंच सकती है, जहां डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है.

इसे भी पढ़ें- Motherhood Age In India: भारत में किस उम्र की महिलाएं ज्यादा बन रहीं मां, किस ऐज ग्रुप की महिलाएं कब ले रहीं यह फैसला?

क्या होते हैं इसके लक्षण?

अगर लक्षण की बात करें, तो किडनी की बीमारी शुरुआत में अक्सर बिना लक्षण के रहती है. लेकिन जैसे-जैसे स्थिति बिगड़ती है, कुछ संकेत दिखाई दे सकते हैं, बार-बार यूरिन आना, टखनों और पैरों में सूजन, भूख कम लगना और वजन घटना, यूरिन में खून या झाग आना, त्वचा का सूखना और खुजली, सांस लेने में तकलीफ, आंखों के आसपास लगातार सूजन, मांसपेशियों में ऐंठन और नींद न आने की दिक्कत हो सकती है. इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

कौन-कौन से टेस्ट जरूरी हैं?

अगर लक्षण दिखें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. रेगुलर जांच से समस्या का शुरुआती स्टेप में पता लगाया जा सकता है. आमतौर पर ये टेस्ट कराए जाते हैं, उसमें सीरम क्रिएटिनिन, सिस्टेटिन C, अनुमानित ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट , ब्लड यूरिया नाइट्रोजन , यूरिन जांच और यूरिन एल्ब्यूमिन-क्रिएटिनिन रेशियो शामिल है.

यह भी पढ़ें: क्या खाली पेट काम करता है दिमाग ज्यादा बेहतर? जानिए फास्टिंग का मेंटल हेल्थ पर असर और फायदे

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! अक्सर ‘साइलेंट’ होती है किडनी की बीमारी, इन संकेतों को न करें नजरअंदाज

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Early Warning Signs Of Kidney Problems: किडनी हमारे शरीर के सबसे अहम अंगों में से एक है. ये खून से गंदगी और टॉक्सिन्स को फिल्टर करती हैं, शरीर में फ्लुइड का संतुलन बनाए रखती हैं और कई जरूरी एक्टिविटी को सपोर्ट करती हैं. लेकिन अगर इनकी सही देखभाल न की जाए तो कई तरह की बीमारियां जन्म ले सकती हैं. सबसे चिंताजनक बात यह है कि किडनी की बीमारी अक्सर चुपचाप बढ़ती है और लक्षण तब सामने आते हैं, जब स्थिति काफी गंभीर हो चुकी होती है. इसलिए समय-समय पर जांच और जोखिम कारकों की जानकारी बेहद जरूरी है.

क्यों किडनी को दिक्कत होती है?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्थान मायो क्लिनिक के अनुसार, किडनी के काम करने की क्षमता में किसी भी तरह की रुकावट को किडनी रोग कहा जाता है. इनमें किडनी इंफेक्शन, क्रॉनिक किडनी डिजीज, पथरी, ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिसऔर पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज समस्या) शामिल हैं. कुछ स्थितियां किडनी रोग का खतरा बढ़ा देती हैं, जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, धूम्रपान और परिवार में किडनी फेलियर का पुराना केस होना. इसके साथ ही 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में भी खतरा ज्यादा रहता है.

क्यों जरूरी है किडनी का सेहतमंद रहना?

किडनी सिर्फ शरीर से गंदगी निकालने का काम नहीं करती. ये ऐसे हार्मोन बनाती हैं जो ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करते हैं और रेड ब्लड सेल्स के निर्माण में मदद करते हैं. इसके साथ ही इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखना और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालना भी इनकी जिम्मेदारी है. अगर किडनी ठीक से काम न करे तो इन सभी प्रक्रियाओं पर असर पड़ता है. दुनियाभर में किडनी रोग के मामले बढ़ रहे हैं और इनका सीधा संबंध हार्ट रोगों से भी जुड़ा है, किडनी की खराबी से हार्ट की बीमारी से मौत का खतरा बढ़ जाता है और डायबिटीज व हाइपरटेंशन की दिक्कतें भी बढ़ सकती हैं. इलाज न मिलने पर यह स्थिति किडनी फेलियर तक पहुंच सकती है, जहां डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है.

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क्या होते हैं इसके लक्षण?

अगर लक्षण की बात करें, तो किडनी की बीमारी शुरुआत में अक्सर बिना लक्षण के रहती है. लेकिन जैसे-जैसे स्थिति बिगड़ती है, कुछ संकेत दिखाई दे सकते हैं, बार-बार यूरिन आना, टखनों और पैरों में सूजन, भूख कम लगना और वजन घटना, यूरिन में खून या झाग आना, त्वचा का सूखना और खुजली, सांस लेने में तकलीफ, आंखों के आसपास लगातार सूजन, मांसपेशियों में ऐंठन और नींद न आने की दिक्कत हो सकती है. इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

कौन-कौन से टेस्ट जरूरी हैं?

अगर लक्षण दिखें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. रेगुलर जांच से समस्या का शुरुआती स्टेप में पता लगाया जा सकता है. आमतौर पर ये टेस्ट कराए जाते हैं, उसमें सीरम क्रिएटिनिन, सिस्टेटिन C, अनुमानित ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट , ब्लड यूरिया नाइट्रोजन , यूरिन जांच और यूरिन एल्ब्यूमिन-क्रिएटिनिन रेशियो शामिल है.

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क्या रोज रोटी खाना आपकी सेहत के लिए ठीक है, जानें एक्सपर्ट का क्या है कहना?

क्या रोज रोटी खाना आपकी सेहत के लिए ठीक है, जानें एक्सपर्ट का क्या है कहना?


रोटी लंबे समय से भारतीय खानपान का अहम हिस्सा रही है खासतौर पर उत्तर भारत में लोग इसको एक टाइम के भोजन में जरूर शामिल करते हैं. इसे हल्का, संतुलित और पचने में आसान माना जाता है. सादगी और परंपरा से जुड़ी यह डिश लोगों के लिए फेवरेट भी है. लेकिन क्या रोटी वाकई उतनी ही बेफिक्र होकर खाने लायक है, जितना हम मानते आए हैं?. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर इसको लेकर एक्सपर्ट की क्या राय है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

गुरुग्राम, हरियाणा के ऑर्थोपेडिक और आर्थ्रोस्कोपी एक्सपर्च डॉ. मनु बोरा ने अपने साझा किए गए एक सोशल मीडिया पोस्ट में इस पर अलग नजरिया रखा. उनका कहना है कि गेहूं का नियमित और अधिक मात्रा में सेवन, खासकर उन लोगों के लिए जो वजन और मेटाबॉलिक हेल्थ को लेकर सतर्क हैं, छिपे हुए जोखिम पैदा कर सकता है. डॉ. बोरा के अनुसार “डाइट में सबसे खराब चीज अगर कोई है, तो वह गेहूं हो सकता है. ज्यादातर लोग मिठाइयां रोज नहीं खाते, कुछ तो बिल्कुल भी नहीं खाते. यहां तक कि चीनी का सेवन भी हर किसी के लिए समान रूप से समस्या नहीं बनता. लेकिन जो लोग रोजमर्रा के भोजन में लगातार गेहूं लेते हैं, उनके लिए यह नुकसानदायक हो सकता है. पुराने समय में इंसान प्राकृतिक रूप से गेहूं का सेवन नहीं करते थे.”

क्यों सेहत के लिए फायदेमंद नही है?

उनका तर्क यह है कि जिस चीज को हम सामान्य और सुरक्षित मानते हैं, वह भी अगर जरूरत से ज्यादा ली जाए तो शरीर पर असर डाल सकती है. खासकर आज के समय में जब गेहूं अक्सर प्रोसेस्ड या रिफाइंड रूप में इस्तेमाल होता है, तो उसके प्रभाव और भी बढ़ सकते हैं. डॉ. बोरा बताते हैं कि ज्यादा प्रोसेस्ड गेहूं से बने उत्पाद शरीर में सूजन, वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक गड़बड़ी जैसी समस्याओं को बढ़ावा दे सकते हैं. जब इन्हें बड़ी मात्रा में और नियमित रूप से खाया जाता है, तो यह धीरे-धीरे स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं. यही वजह है कि वे संतुलन और संयम पर जोर देते हैं.

 

 

क्या रोटी नहीं खानी चाहिए?

इसका मतलब यह नहीं कि रोटी पूरी तरह छोड़ देनी चाहिए, बल्कि यह समझना जरूरी है कि मात्रा और गुणवत्ता दोनों मायने रखती हैं. साबुत अनाज का चयन, सीमित मात्रा में सेवन और संतुलित डाइट अपनाना ज्यादा समझदारी भरा कदम हो सकता है. उनके अनुसार, रोजमर्रा की थाली में शामिल खाद्य पदार्थ भी बिना सोचे-समझे खाने के बजाय समझदारी से चुने जाने चाहिए. हेल्दी डाइट सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आप क्या खा रहे हैं, बल्कि इस पर भी कि कितना और किस रूप में खा रहे हैं.

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