देश में हर साल बढ़ रहे कैंसर के 15 लाख मामले, जानें जानलेवा बीमारी के 3 सबसे कॉमन लक्षण

देश में हर साल बढ़ रहे कैंसर के 15 लाख मामले, जानें जानलेवा बीमारी के 3 सबसे कॉमन लक्षण


Early Cancer Symptoms You Should Not Ignore: दुनियाभर में कैंसर के मामले तेजी से फैल रहे हैं. इसका कारण बताया जाता है कि लोग लापरवाह होते हैं और शुरुआती लक्षणों पर ध्यान नहीं देते हैं, हालांकि ऐसा नहीं है. असल वजह यह है कि कैंसर के शुरुआती संकेत अक्सर बहुत हल्के, अस्पष्ट और आसानी से नजरअंदाज किए जाने वाले होते हैं. खासतौर पर पेट और सीने से जुड़े कैंसर शुरुआत में बिना किसी साफ लक्षण के अंदर ही अंदर बढ़ते रहते हैं. हल्की सूजन, मामूली दर्द या थकान जैसी चीजें अक्सर एसिडिटी, तनाव या उम्र का असर मान ली जाती हैं. नतीजा यह होता है कि जब तक कोई यह सोचता है कि “अब जांच करा लेनी चाहिए”, तब तक बीमारी स्टेज 3 या 4 तक पहुंच चुकी होती है.

भारत में बढ़ता कैंसर का बोझ

भारत में कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. साल 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में हर साल 15 लाख से ज्यादा नए कैंसर केस सामने आ रहे हैं. कुल मामलों के लिहाज से भारत अब दुनिया के टॉप तीन देशों में शामिल है. चिंता की बात यह भी है कि बड़ी संख्या में मरीजों की पहचान बीमारी के एडवांस स्टेज में हो रही है और युवा उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. ऐसे में शुरुआती पहचान और जागरूकता पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गई है.

क्यों नजरअंदाज हो जाते हैं शुरुआती लक्षण?

मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, वैशाली के मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. गोपाल शर्मा ने TOI को बताया कि कैंसर आमतौर पर शुरुआत में कोई बड़ा या डराने वाला लक्षण नहीं दिखाता. उनके क्लीनिक में अक्सर ऐसे मरीज आते हैं, जो महीनों से कुछ लक्षण झेल रहे होते हैं, लेकिन उन्हें तनाव, उम्र या लाइफस्टाइल से जुड़ा मानकर टालते रहे. डॉक्टर कहते हैं कि इलाज में देरी अक्सर बीमारी से ज्यादा नुकसान पहुंचाती है।

नॉर्मल समझकर लोग टाल देते हैं ये लक्षण

लगातार थकान रहना, बिना वजह वजन कम होना या भूख में बदलाव, ये ऐसे संकेत हैं, जिन्हें लोग अक्सर उम्र या काम का दबाव मान लेते हैं. लंबे समय तक बदहजमी, पेट फूलना या बाउल हैबिट्स में बदलाव को भी गलत खानपान का असर समझ लिया जाता हैं. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अगर कोई लक्षण दो से तीन हफ्ते से ज्यादा बना रहे और उसकी कोई साफ वजह न हो, तो डॉक्टर को दिखाना जरूरी है.

ये तीन लक्षण कभी न करें नजरअंदाज

डॉक्टरों के मुताबिक, किसी भी उम्र में अगर बिना वजह वजन घटे, कोई गांठ या सूजन लंबे समय तक बनी रहे, या पेशाब, मल या मुंह से असामान्य खून आए, तो तुरंत जांच जरूरी है.

इसे भी पढ़ें- Hormonal Health In Women: हर महीने आ रहे पीरियड्स तो क्या सब ठीक है, डॉक्टर्स से समझें आपका शरीर क्या छिपा रहा?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हर महीने आ रहे पीरियड्स तो क्या सब ठीक है, डॉक्टर्स से समझें आपका शरीर क्या छिपा रहा?

हर महीने आ रहे पीरियड्स तो क्या सब ठीक है, डॉक्टर्स से समझें आपका शरीर क्या छिपा रहा?


Do Regular Periods Mean Hormones Are Balanced: अक्सर महिलाएं यह मान लेती हैं कि अगर उनके पीरियड्स हर महीने समय पर आ रहे हैं, तो उनके हार्मोन बिल्कुल ठीक होंगे. 28 से 30 दिन के अंतर पर नियमित ब्लीडिंग होना उन्हें राहत देता है और यही मान लिया जाता है कि शरीर के अंदर सब कुछ संतुलित है. लेकिन सच्चाई यह है कि नियमित पीरियड्स सिर्फ एक बाहरी संकेत हैं, पूरी तस्वीर नहीं. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं. 

हार्मोनल सिस्टम बेहद जटिल होता है. इसमें ब्रेन ओवरी, थायरॉइड, एड्रिनल ग्लैंड्स और मेटाबॉलिज्म, सभी एक-दूसरे से जुड़े होते हैं. कई बार यह सिस्टम अंदरूनी तनाव और असंतुलन के बावजूद पीरियड्स को नियमित बनाए रखता है. यही वजह है कि कुछ महिलाओं के पीरियड्स तो समय पर आते हैं, लेकिन उन्हें फर्टिलिटी से जुड़ी दिक्कतें, तेज दर्द, मूड स्विंग्स या प्रीमेंस्ट्रुअल समस्याएं झेलनी पड़ती हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

लूमा फर्टिलिटी की मेडिकल डायरेक्टर डॉ. राधिका शेठ ने TOI को बताया कि मेडिकल प्रैक्टिस में यह आम बात है कि नियमित पीरियड्स वाली महिलाओं में भी लंबे समय से हार्मोनल असंतुलन मौजूद रहता है. उनका कहना है कि पीरियड्स केवल एक नतीजा हैं, जबकि इसके पीछे चल रही हार्मोनल प्रक्रिया कहीं ज्यादा गहरी और संवेदनशील होती है. एक आम लेकिन नजरअंदाज की जाने वाली समस्या है प्रोजेस्टेरोन की कमी, जिसे ल्यूटियल फेज इंसफिशिएंसी कहा जाता है. ऐसी स्थिति में महिला समय पर ओवुलेट तो करती है और पीरियड्स भी नियमित रहते हैं, लेकिन प्रोजेस्टेरोन पर्याप्त न होने की वजह से प्रेग्नेंसी टिक नहीं पाती. अगर सही समय पर टेस्ट न किया जाए, तो यह समस्या सालों तक पकड़ में नहीं आती.

रेगुलर पीरियड्स में भी दिक्कत

इसी तरह PCOS को अक्सर अनियमित पीरियड्स से जोड़ा जाता है, लेकिन इसके हल्के या मेटाबॉलिक रूप में कई महिलाओं के पीरियड्स नियमित होते हैं. फिर भी उनमें इंसुलिन रेसिस्टेंस या हल्का हार्मोनल असंतुलन मौजूद हो सकता है, जो एग क्वालिटी और फर्टिलिटी को प्रभावित करता है. थायरॉइड या प्रोलैक्टिन में हल्की गड़बड़ी भी पीरियड्स को प्रभावित किए बिना ओवुलेशन और हार्मोन सपोर्ट को कमजोर कर सकती है. इसके अलावा लगातार तनाव, नींद की कमी और अनियमित खानपान शरीर में कोर्टिसोल बढ़ा देता है, जिससे हार्मोनल बैलेंस धीरे-धीरे बिगड़ता है.

किन चीजों को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज?

डॉक्टरों का कहना है कि तेज मूड स्विंग्स, दर्दनाक पीरियड्स, लगातार थकान, सूजन, लो लिबिडो या इमोशनल अस्थिरता जैसे लक्षणों को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ये संकेत बताते हैं कि भले ही पीरियड्स नियमित हों, लेकिन शरीर अंदर से संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है.

ये भी पढ़ें: शरीर के किन अंगों में सबसे पहले होता है कैंसर? होश उड़ा देगी यह रिपोर्ट

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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भारत में सटीक क्यों नहीं डायबिटीज का सबसे भरोसेमंद टेस्ट? लैंसेट की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

भारत में सटीक क्यों नहीं डायबिटीज का सबसे भरोसेमंद टेस्ट? लैंसेट की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता


Why HbA1c Test May Be Inaccurate In India: डायबिटीज की पहचान और निगरानी के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला HbA1c टेस्ट भारत में लाखों लोगों के लिए हमेशा सटीक नतीजे नहीं दे पा रहा है. यह बात प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल Lancet Regional Health- Southeast Asia में प्रकाशित एक नई रिसर्च में सामने आई है. स्टडी के मुताबिक, भारत जैसे देशों में जहां एनीमिया और खून से जुड़ी बीमारियां आम हैं, वहां HbA1c पर पूरी तरह भरोसा करना भ्रामक हो सकता है.

इन मामलों में सटीक जानकारी नहीं

HbA1c टेस्ट पिछले दो से तीन महीनों के औसत ब्लड शुगर लेवल को मापता है. आमतौर पर 5.7 प्रतिशत से कम स्तर को नॉर्मल, 5.7 प्रतिशत से 6.4 प्रतिशत को प्रीडायबिटीज और 6.5 प्रतिशत या उससे ज्यादा को डायबिटीज माना जाता है. लेकिन रिसर्च में बताया गया है कि जिन लोगों में एनीमिया, हीमोग्लोबिन से जुड़ी जेनेटिक गड़बड़ियां  या G6PD एंजाइम की कमी होती है, उनमें यह टेस्ट गलत नतीजे दे सकता है.

इस स्टडी का नेतृत्व कर रहे प्रोफेसर अनूप मिश्रा, जो फोर्टिस सी-डॉक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर डायबिटीज के चेयरमैन हैं, उनका कहना है कि HbA1c पूरी तरह हीमोग्लोबिन पर निर्भर करता है. ऐसे में अगर हीमोग्लोबिन की मात्रा, संरचना या उसकी उम्र प्रभावित हो, तो ब्लड शुगर का सही अंदाजा नहीं लग पाता. उन्होंने चेतावनी दी कि सिर्फ HbA1c पर निर्भर रहने से कुछ मरीजों में डायबिटीज की पहचान देर से हो सकती है, जबकि कुछ लोगों में गलत डायग्नोसिस भी हो सकता है.

देश के कई हिस्सों में 50 प्रतिशत आबादी को आयरन की कमी

स्टडी के को-राइटर डॉ. शशांक जोशी के मुताबिक, शहरी अस्पतालों में भी रेड ब्लड सेल्स से जुड़ी दिक्कतें HbA1c के नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं. वहीं ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में, जहां एनीमिया बहुत आम है, वहां यह समस्या और गंभीर हो जाती है. रिसर्च में यह भी बताया गया है कि भारत के कई हिस्सों में 50 प्रतिशत से ज्यादा आबादी आयरन की कमी से जूझ रही है, जिससे HbA1c रीडिंग्स बिगड़ सकती हैं। कुछ मामलों में G6PD की कमी वाले पुरुषों में डायबिटीज की पहचान चार साल तक देर से हो सकती है, जिससे जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है.

एक्सपर्ट क्या देते हैं सुझाव?

एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि भारत जैसे देशों में डायबिटीज की जांच के लिए HbA1c को अकेले नहीं, बल्कि अन्य टेस्ट्स के साथ मिलाकर इस्तेमाल करना चाहिए. इनमें ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट, ब्लड ग्लूकोज की नियमित मॉनिटरिंग, और बेसिक खून की जांच शामिल हैं. गंभीर मामलों में CGM और फ्रक्टोसामीन जैसे विकल्प भी उपयोगी हो सकते हैं. इस स्टडी में इस बात पर जोर दिया गया है कि एनीमिया-प्रभावित आबादी में HbA1c ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ नहीं रह जाता और डायबिटीज की सही पहचान के लिए परिस्थितियों के अनुसार जांच की तरीका अपनाना जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! मामूली जुएं भी ले सकती हैं जान, ओडिशा में 12 साल की बच्ची की मौत ने सबको चौंकाया

सावधान! मामूली जुएं भी ले सकती हैं जान, ओडिशा में 12 साल की बच्ची की मौत ने सबको चौंकाया


Can Head Lice Infection Cause Death: चलते-फिरते, ऑफिस में या किसी अन्य जगह आपको अक्सर ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो बार-बार अपना सिर खुजलाते रहते हैं. इसके पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं, लेकिन एक सबसे बड़ी वजह है,जुओं का इंफेक्शन. ज्यादातर लोगों को लगता है कि ‘अरे, कोई दिक्कत नहीं, बाल धो लेंगे तो सब ठीक हो जाएगा’ और वे इसे पूरी तरह इग्नोर कर देते हैं. लेकिन क्या आपको मालूम है कि आपकी यही अनदेखी आगे चलकर कितनी खतरनाक हो सकती है? यह समस्या इतनी गंभीर हो सकती है कि आपकी जान पर भी बन आए. दरअसल ओडिशा के पुरी जिले से एक बेहद चिंताजनक मामला सामने आया है, जहां लंबे समय तक सिर में जुओं के गंभीर इंफेक्शन से जूझ रही 12 वर्षीय बच्ची की इलाज के दौरान मौत हो गई. यह घटना बालंगा थाना क्षेत्र के चंपागड़ा साही इलाके की है, जिसने ग्रामीण इलाकों में बच्चों की सेहत और समय पर इलाज को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर पूरी घटना क्या है.

क्या है मामला?

रिपोर्ट्स के अनुसार, मृत बच्ची की पहचान लक्ष्मीप्रिया साहू के रूप में हुई है, जो स्थानीय स्कूल में कक्षा 6 की छात्रा थी. परिजनों के मुताबिक, वह पिछले कई महीनों से सिर में जुओं के अत्यधिक इंफेक्शन से परेशान थी. शुरुआत में इसे आम समस्या मानकर नजरअंदाज किया गया, लेकिन समय के साथ यह इंफेक्शन गंभीर रूप लेता चला गया. बताया जा रहा है कि बच्ची की मां ने संक्रमण से बचाव के लिए उसका सिर मुंडवाने की सलाह दी थी, लेकिन बच्ची इसके लिए तैयार नहीं हुई. इसी बीच जुओं का संक्रमण पूरे सिर में फैल गया. इंफेक्शन से जुड़ी बदबू और लगातार बढ़ती परेशानी के कारण बच्ची मेंटल रूप से भी प्रभावित होने लगी और उसने बाहर निकलना लगभग बंद कर दिया. बालों को हमेशा बांधकर रखने की वजह से परिवार के अन्य सदस्यों को संक्रमण की गंभीरता का अंदाजा नहीं हो सका.

खून की उल्टी से बिगड़ गए हालात

हालात तब और बिगड़ गए, जब तीन दिन पहले बच्ची को अचानक खून की उल्टी होने लगी इसके बाद परिजन उसे तुरंत पुरी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां उसका इलाज शुरू किया गया। हालांकि, तमाम प्रयासों के बावजूद शनिवार रात उसकी मौत हो गई.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

ज्यादातर एक्सपर्ट और हेल्थ रिसर्च बताते हैं कि जुओं का इंफेक्शन जानलेवा नहीं होता है. हालांकि,साइंटफिक हेल्थ के बारे में देने वाली बेवसाइ़ट sciencedirect में पब्लिश एक रिसर्च स्टडी के मुताबिक सिर में होने वाली जुएं ऐसे बाहरी पैरासाइट होते हैं, जो इंसान के खून पर निर्भर रहते हैं. यह समस्या सबसे ज्यादा छोटे बच्चों, उनके देखभाल करने वालों और एक ही घर में रहने वाले लोगों में देखी जाती है. आमतौर पर जुओं को गंभीर स्वास्थ्य खतरा नहीं माना जाता और यह किसी बीमारी को सीधे फैलाने के लिए जानी नहीं जातीं. इसी वजह से कई बार लोग इसे मामूली समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. हालांकि, लंबे समय तक और अत्यधिक इंफेक्शन की स्थिति में इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं.

12 साल की बच्ची की मौत ने बढ़ाई चिंता

स्टडी में बताया गया कि  26 अगस्त 2020 को अमेरिका के जॉर्जिया राज्य के एक ग्रामीण इलाके में रहने वाली 12 वर्षीय बच्ची की मौत ने मेडिकल जगत को झकझोर दिया. रिपोर्ट के अनुसार, बच्ची की मौत का प्राथमिक कारण कार्डियक अरेस्ट बताया गया, जबकि जांच में सामने आया कि उसे गंभीर आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया था. यह स्थिति लंबे समय तक चले सिर में जुओं के अत्यधिक इंफेक्शन की वजह से बनी थी. मेडिकल रिपोर्ट्स में बताया गया कि बच्ची के सिर में जुओं की संख्या असामान्य रूप से बहुत ज्यादा थी. लगातार खून चूसने की वजह से शरीर में खून की कमी होती चली गई, जो अंत में जानलेवा साबित हुई. इस मामले में बच्ची के माता-पिता पर लापरवाही और बाल उत्पीड़न के आरोप भी लगाए गए.

जुएं और खून की कमी का सीधा संबंध

स्टडीज के मुताबिक, जुएं खून चूसने वाले  पैरासाइट होती हैंय एक रिसर्च में पाया गया कि एक वयस्क मादा जूं एक बार में लगभग 0.00015 मिलीलीटर खून चूसती है. अगर किसी बच्चे के सिर में हजारों जुएं दिन में कई बार खून चूसें, तो रोजाना और महीने भर में खून की मात्रा क्लिनिकली खतरनाक स्तर तक पहुंच सकती है, खासकर पहले से कमजोर या कुपोषित बच्चों में. इसलिए इसको आपको हमेशा हल्के में नहीं लेना चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बच्चों को क्यों खींच रहा कोरियन कल्चर और कहां चूक रहे हम? गाजियाबाद की घटना से उठे सवाल

बच्चों को क्यों खींच रहा कोरियन कल्चर और कहां चूक रहे हम? गाजियाबाद की घटना से उठे सवाल


मोबाइल स्क्रीन में डूबे बच्चे, बाहरी दुनिया से कटता बचपन और कोरियन ड्रामा एवं म्यूज़िक की बढ़ती दीवानगी. गाज़ियाबाद की हालिया घटना के बाद एक बार फिर यह सवाल तेज हो गया है कि आखिर हमारे बच्चे किस दिशा में जा रहे हैं. क्या यह सिर्फ कोरियन कल्चर का असर है, या इसके पीछे हमारी सामाजिक और पारिवारिक चूक छिपी है. इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए एबीपी लाइव की टीम ने आर्टेमिस हॉस्पिटल के मशहुर वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. राहुल चंडोक से विस्तार से बातचीत की.

कोरियन कल्चर नहीं, खालीपन बच्चों को कर रहा है आकर्षित

डॉ. राहुल चंडोक साफ कहते हैं कि यह समस्या किसी एक देश या संस्कृति की नहीं है. असल समस्या यह है कि बच्चों के लिए हमारे पास अपना कंटेंट और अपना समय नहीं है. खेलने के मैदान कम हो गए हैं. खेल और मनोरंजन की जगह मोबाइल ने ले ली है. जब बच्चों के लिए भारतीय कहानियां, नाटक और फिल्में नहीं होंगी, तो वे बाहर का कंटेंट ही देखेंगे. कोरियन कंटेंट खासतौर पर टीनएजर्स को ध्यान में रखकर बनाया जाता है, इसलिए वह उन्हें ज़्यादा आकर्षित करता है.

मोबाइल बना परिवार का नया सदस्य

डॉ. चंडोक एक सटीक उदाहरण देते हैं. आज माता-पिता बच्चे को शांत रखने के लिए सबसे पहले मोबाइल थमा देते हैं. खाना हो, चुप कराना हो या किसी से बात करनी हो, हर स्थिति में फोन सामने होता है. बच्चा छोटी उम्र से ही मोबाइल को परिवार का हिस्सा मानने लगता है. ऐसे में बड़े होने पर उससे मोबाइल छीनना बेहद मुश्किल हो जाता है.

खेल का मैदान खत्म, स्क्रीन की दुनिया शुरू

बच्चों का असली काम खेलना है. लेकिन मैदान, पार्क और कोर्ट की कमी ने बच्चों को चारदीवारी में कैद कर दिया है. वे अपने ही उम्र के बच्चों से मिल नहीं पा रहे हैं. गाज़ियाबाद की घटना में सामने आया कि बच्चे सालों तक स्कूल नहीं गए, किसी से संपर्क नहीं था और अकेलेपन ने उनकी मानसिकता पर गहरा असर डाला. दीवारों पर लिखा मिला कि वे खुद को बेहद अकेला महसूस कर रहे थे.

डिस्ट्रैक्शन और खुशी में फर्क समझना जरूरी

डॉ. चंडोक कहते हैं कि मोबाइल बच्चों को डिस्ट्रैक्ट तो करता है, लेकिन खुश नहीं करता. कार्टून या वीडियो बच्चे को कुछ देर चुप करा सकता है, लेकिन यह भावनात्मक जुड़ाव नहीं दे सकता. अकेलापन जब बढ़ता है, तो बच्चा उसी काल्पनिक दुनिया को अपनी असली दुनिया मानने लगता है.

बच्चों को कोरियन कल्चर या मोबाइल से दूर रखना है, तो सबसे पहले माता-पिता को उन्हें समय देना होगा. बच्चे के पास बैठकर मोबाइल चलाना, क्वालिटी टाइम नहीं होता. बच्चे के दिनभर की बातें सुनना, उसकी दोस्ती, झगड़े और सपनों को समझना ज़रूरी है. आज घरों में बच्चे कम हैं, और उम्र का अंतर ज़्यादा है. ऐसे में बच्चे और ज़्यादा अकेले हो जाते हैं.

अपना कंटेंट नहीं होगा तो बच्चे कहीं और जाएंगे

डॉ. चंडोक मानते हैं कि भारतीय संस्कृति के अनुरूप आधुनिक नाटक और सीरियल बहुत कम बन रहे हैं. इंटरनेट के दौर में दुनिया भर का कंटेंट बच्चों के लिए उपलब्ध है. ट्रांसलेशन ने इसे और आसान बना दिया है. अगर हमारे देश में बच्चों और किशोरों के लिए आकर्षक कंटेंट नहीं बनेगा, तो वे विदेशी कंटेंट की ओर जाएंगे ही.

सोशल मीडिया बैन नहीं, सही माहौल की जरूरत

16 साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल से दूर रखने की सलाह पर डॉ. चंडोक संतुलित राय रखते हैं. वे कहते हैं कि मोबाइल और इंटरनेट आज की ज़िंदगी का हिस्सा हैं. ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों में सोशल मीडिया पर रोक की बातें हो रही हैं, लेकिन भारत जैसे देश में समाधान बैन नहीं है. समाधान यह है कि बच्चों के लिए सही कंटेंट बनाया जाए और घर में ऐसा माहौल हो जहां बच्चे माता-पिता के साथ समय बिता सकें.

डॉ. राहुल चंडोक का मानना है कि अगर बच्चों को यह भरोसा मिल जाए कि माता-पिता उनके लिए समय निकालेंगे, तो वे खुद मोबाइल से दूरी बना लेंगे. वे पढ़ाई पूरी कर आपके पास बैठेंगे. अगर यह भरोसा नहीं होगा, तो वे रातों में जागकर मोबाइल और काल्पनिक दुनिया में जीने लगेंगे.

बच्चों को समझा तो वे अपने आप लौट आएंगे

कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि कोरियन कल्चर बच्चों की समस्या नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की कमी का आईना है. बच्चों को सही दिशा देने के लिए हमें उन्हें समय देना होगा, उनके लिए अपनी संस्कृति के अनुरूप कंटेंट बनाना होगा और मोबाइल को विकल्प बनाना होगा, सहारा नहीं. तभी बच्चे फिर से अपने माता-पिता और अपनी दुनिया की ओर लौटेंगे.

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दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में इलाज का नया दौर, जीबी पंत में वर्ल्ड क्लास हेल्थ फैसिलिटी शुरू

दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में इलाज का नया दौर, जीबी पंत में वर्ल्ड क्लास हेल्थ फैसिलिटी शुरू


दिल्ली सरकार ने राजधानी की स्वास्थ्य व्यवस्था को नई ऊंचाई देने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है. गोविंद बल्लभ पंत (जीबी पंत) अस्पताल में अत्याधुनिक तकनीक से लैस नई चिकित्सा सुविधाओं की शुरुआत की गई है, जिससे न सिर्फ दिल्ली बल्कि दूसरे राज्यों से आने वाले मरीजों को भी बड़ा फायदा मिलने वाला है.

अस्पताल परिसर में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज कुमार सिंह ने 256 स्लाइस सीटी स्कैन, वाइड कैथ लैब और नए आईसीयू का उद्घाटन किया. इस मौके पर अस्पताल प्रशासन और चिकित्सा जगत से जुड़े कई विशेषज्ञ भी मौजूद रहे.

अब सरकारी अस्पतालों में भी मिलेगा प्राइवेट जैसा इलाज

उद्घाटन के दौरान मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि दिल्ली सरकार का लक्ष्य सरकारी अस्पतालों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं से लैस करना है. उन्होंने स्पष्ट किया कि इलाज में अमीर और गरीब का अंतर खत्म करना सरकार की प्राथमिकता है, ताकि हर नागरिक को समान और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें.

नॉर्थ इंडिया का पहला 256 स्लाइस सीटी स्कैन

मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि जीबी पंत अस्पताल में लगाया गया 256 स्लाइस सीटी स्कैन अपनी श्रेणी में चुनिंदा मशीनों में से एक है और नॉर्थ इंडिया में पहली बार किसी सरकारी अस्पताल में इसे स्थापित किया गया है. यह मशीन कैंसर, हृदय रोग और अन्य गंभीर बीमारियों की तेज और सटीक जांच में बेहद कारगर साबित होगी. उन्होंने कहा, अस्पताल में नई न्यूरो कैथ लैब की शुरुआत के साथ न्यूरो विज्ञान से जुड़े इलाज को नई मजबूती मिलेगी. वर्ष 1964 से चिकित्सा सेवा और शिक्षा में अग्रणी रहे इस अस्पताल को लगभग 38 करोड़ रुपये की लागत से ये आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं.

पुरानी तकनीक हटाकर किया गया आधुनिक अपग्रेड

वहीं, स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज कुमार सिंह ने बताया कि जीबी पंत अस्पताल में न्यूरो आईटी सिस्टम को पूरी तरह अपग्रेड किया गया है. पुरानी मशीनों को हटाकर नई तकनीक लगाई गई है, जिससे आम मरीजों को सीधे तौर पर बेहतर और तेज इलाज का लाभ मिलेगा.

स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिल्ली की जनता को दिए गए भरोसे को आगे बढ़ाते हुए सरकार स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार कर रही है. आने वाले समय में दिल्ली के अन्य अस्पतालों में भी एमआरआई, सीटी स्कैन और आधुनिक जांच सुविधाएं शुरू की जाएंगी.

दिल्ली सरकार का मानना है कि जीबी पंत अस्पताल में शुरू हुई ये नई सुविधाएं राजधानी की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत आधार देंगी और सरकारी अस्पतालों के प्रति लोगों के विश्वास को और गहरा करेंगी.

ये भी पढ़ें: क्या सुबह उठकर खाली पेट पानी पीना सही, इस वक्त ठंडा या गरम कौन-सा पानी पीना ज्यादा अच्छा?

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