बार-बार आ रही है खांसी तो हो जाएं सावधान, हो सकता है खाने की नली में कैंसर

बार-बार आ रही है खांसी तो हो जाएं सावधान, हो सकता है खाने की नली में कैंसर


Esophageal Cancer : आजकल की बिजी लाइफस्टाइल में हम अक्सर छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं. जैसे बार-बार खांसी, सीने में जलन या निगलने में हल्की परेशानी, कई बार ये सामान्य लगने वाले लक्षण गंभीर बीमारी की शुरुआत भी हो सकते हैं. ऐसी ही एक गंभीर बीमारी खाने की नली का कैंसर है. 

खाने की नली का कैंसर (Esophageal Cancer) एक तेजी से बढ़ने वाला कैंसर है. अगर इसे शुरुआती अवस्था में पहचान लिया जाए, तो इलाज के अच्छे परिणाम मिल सकते हैं, लेकिन समस्या यह है कि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर हल्के होते हैं और लोग इन्हें अनदेखा कर देते हैं. तो आइए जानते हैं कि खाने की नली का कैंसर क्या होता है, इसके शुरुआती संकेत क्या हैं और किन लोगों को ज्यादा खतरा है. 

खाने की नली का कैंसर क्या होता है

खाने की नली एक लंबी नली होती है जो हमारे गले को पेट से जोड़ती है. जब हम खाना खाते हैं, तो यही नली खाने को पेट तक पहुंचाती है. जब इस नली की अंदरूनी परत की कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं और कंट्रोल से बाहर हो जाती हैं, तो कैंसर बनता है. यह कैंसर धीरे-धीरे आसपास के पार्टस में भी फैल सकता है. 

किन लोगों को ज्यादा खतरा होता है?

कुछ आदतें और स्थितियां इस कैंसर का खतरा बढ़ा देती हैं. जिसमें बढ़ती उम्र में इसका खतरा ज्यादा होता है, इसके अलावा पुरुषों में ज्यादा देखा जाता है. वहीं धूम्रपान और शराब का सेवन करने वाले लोगों में ज्यादा खतरा होता है. साथ ही लगातार एसिडिटी या GERD, मोटापा, फल और सब्जियां कम खाना, बहुत ज्यादा गर्म ड्रिंक्स पीने वाले लोगों  को भी ज्यादा खतरा होता है. 

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शुरुआती संकेत जिन्हें नजरअंदाज न करें

1. निगलने में दिक्कत (डिस्फेजिया) – शुरुआत में ठोस चीजें निगलने में परेशानी होती है, बाद में पानी पीने में भी दिक्कत हो सकती है. 

2. बिना कारण वजन घटना – अगर बिना डाइटिंग या एक्सरसाइज के वजन तेजी से कम हो रहा है, तो खाने की नली में कैंसर हो सकता है. 

3. सीने में दर्द या जलन – सीने में जलन, दबाव या दर्द महसूस होना, जिसे लोग अक्सर गैस समझ लेते हैं. ये भी खाने की नली में कैंसर का संकेत हो सकता है

4. बार-बार खांसी या आवाज बैठना – अगर खांसी लंबे समय तक ठीक नहीं हो रही या आवाज भारी हो गई है, तो सावधान हो जाएं. ये खाने की नली में कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है. 

5. खाना खाते समय बार-बार रुकावट – खाना गले में अटकना या बार-बार खांसी आना भी  खाने की नली में कैंसर का संकेत हो सकता है. 

कैसे करें बचाव?

खाने की नली के कैंसर से पूरी तरह बचाव करना संभव नहीं है, लेकिन कुछ आदतें अपनाकर इसका खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है. जिसमें  धूम्रपान और शराब का सेवन न करें. अपनी डाइट में ताजे फल और हरी सब्जियों को शामिल करें. साथ ही अपने वजन का बैलेंस बनाए रखना और रोजाना एक्सरसाइज करना भी जरूरी है. अगर आपको बार-बार खांसी, एसिडिटी या जलन की समस्या होती है, तो उसे नजरअंदाज न करें और समय पर डॉक्टर से सलाह लें. 

यह भी पढ़ें –  ग्रेड-1 फैटी लिवर में फायदेमंद हो सकता है मेथी का पानी, जानिए इसके चौंकाने वाले फायदे

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सारी मेडिकल रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना रहता है सिरदर्द, जानें कहां है दिक्कत?

सारी मेडिकल रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना रहता है सिरदर्द, जानें कहां है दिक्कत?


Headaches Causes : आजकल बहुत से लोग एक अजीब समस्या से गुजर रहे हैं. इस समस्या में लोग बार-बार सिरदर्द से परेशान रहते हैं, लेकिन जब डॉक्टर के पास जाते हैं तो उनकी MRI, ब्लड टेस्ट और बाकी जांचें बिल्कुल सामान्य आती हैं. ऐसे में मन में सवाल उठता है कि जब सब कुछ ठीक है, तो दर्द क्यों हो रहा है. यह समस्या न सिर्फ शारीरिक रूप से परेशान करती है, बल्कि मानसिक रूप से भी कंफ्यूजन पैदा करती है. व्यक्ति सोचने लगता है कि शायद समस्या गंभीर नहीं है, लेकिन बार-बार होने वाला सिरदर्द रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह दर्द शरीर का एक संकेत होता है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. तो आइए जानते हैं कि सारी मेडिकल रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना सिरदर्द रहता है तो कहां दिक्कत है. 

रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना सिरदर्द रहता है तो कहां दिक्कत है

डॉक्टरों के अनुसार, ऐसे सिरदर्द का कारण कोई बड़ी बीमारी नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की आदतें होती हैं. इसे फंक्शनल समस्या कहा जाता है, इसका मतलब शरीर के काम करने के तरीके में गड़बड़ी है, न कि किसी स्ट्रक्चरल बीमारी में, इस समस्या का कारण दिमाग में कोई चोट या ट्यूमर नहीं है, बल्कि हमारी लाइफस्टाइल धीरे-धीरे शरीर पर असर डाल रही है.

सिरदर्द के छिपे कारण क्या है

1. तनाव – आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव बहुत आम हो गया है. जब हम लगातार तनाव में रहते हैं, तो सिर और गर्दन की मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं. ससे हल्का लेकिन लगातार रहने वाला सिरदर्द होता है, जिसे टेंशन हेडेक कहा जाता है. 

2. गलत बैठने का तरीका  – लंबे समय तक मोबाइल या लैपटॉप पर झुककर बैठना गर्दन और कंधों पर दबाव डालता है. यह दबाव धीरे-धीरे सिर तक पहुंचता है और दर्द का कारण बनता है. 

3. ज्यादा स्क्रीन देखना – घंटों स्क्रीन देखने से आंखों पर जोर पड़ता है. कम पलक झपकाना और लगातार फोकस करने से आंखों में थकान होती है, जो सिरदर्द में बदल जाती है. 

4. समय पर खाना न खाना – अगर आप अक्सर खाना छोड़ देते हैं या देर से खाते हैं, तो ब्लड शुगर कम हो जाती है. इससे कमजोरी, चिड़चिड़ापन और सिरदर्द शुरू हो सकता है. 

5. नींद की कमी या ज्यादा नींद – नींद का सीधा संबंध हमारे दिमाग से होता है. कम सोना, बार-बार नींद टूटना या बहुत ज्यादा सोना,ये सभी सिरदर्द को बढ़ा सकते हैं. 

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रिपोर्ट नॉर्मल होने का मतलब क्या है

ज्यादातर मेडिकल टेस्ट सिर्फ बड़ी बीमारियों का पता लगाने के लिए होते हैं, जैसे ट्यूमर, इंफेक्शन, न्यूरोलॉजिकल बीमारी. लेकिन ये टेस्ट यह नहीं बता सकते कि आप कितनी देर तक एक ही जगह बैठे रहते हैं, कितना पानी पीते हैं, कितना तनाव लेते हैं, आपकी नींद और खाने का पैटर्न कैसा है. यही वजह है कि रिपोर्ट नॉर्मल आने के बाद भी समस्या बनी रहती है.

सिरदर्द कम करने के लिए क्या करें 

ऐसे सिरदर्द को बिना भारी दवाइयों के भी काफी हद तक ठीक किया जा सकता है. इसके लिए ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं, हल्की डिहाइड्रेशन भी सिरदर्द का कारण बन सकती है. इसके अलावा सही पोस्चर रखें. सीधे बैठें, स्क्रीन आंखों के स्तर पर रखें और हर 30 से 40 मिनट में ब्रेक लें. दिन में 3 से 4 बार बैलेंस डाइट लें, खाना स्किप न करें. हर दिन एक ही समय पर सोने और उठने की आदत डालें. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ग्रेड-1 फैटी लिवर में फायदेमंद हो सकता है मेथी का पानी, जानिए इसके चौंकाने वाले फायदे

ग्रेड-1 फैटी लिवर में फायदेमंद हो सकता है मेथी का पानी, जानिए इसके चौंकाने वाले फायदे


Fenugreek Water Benefits : आजकल फैटी लिवर की समस्या तेजी से बढ़ रही है. खासकर ग्रेड-1 फैटी लिवर, जिसे शुरुआती अवस्था माना जाता है, यह बहुत से लोगों में बिना किसी साफ लक्षण के पाया जाता है. यह स्थिति धीरे-धीरे गलत खानपान, मोटापा, तनाव और कम फिजिकल एक्टिविटी के कारण विकसित हो सकती है. ऐसे में लोग नेचुरल और घरेलू उपायों की ओर भी ध्यान दे रहे हैं. इन्हीं में से एक उपाय  मेथी के दानों का पानी (Methi Water) है, जिसे रात भर भिगोकर सुबह खाली पेट पिया जाता है. कुछ शोध और विशेषज्ञों के अनुसार यह लिवर की सेहत को सपोर्ट करने में मदद कर सकता है, लेकिन इसे अकेला इलाज नहीं माना जाता है. तो आइए जानते हैं कि मेथी का पानी ग्रेड-1 फैटी लिवर में कैसे फायदेमंद हो सकता है. 

ग्रेड-1 फैटी लिवर क्या होता है?

ग्रेड-1 फैटी लिवर फैटी लिवर की शुरुआती अवस्था होती है. इसमें लिवर में थोड़ी मात्रा में चर्बी जमा होने लगती है. इस स्टेज में आमतौर पर कोई गंभीर लक्षण नहीं दिखते, इसलिए कई लोग इसे पहचान नहीं पाते हैं. इसके मुख्य कारण इंसुलिन रेजिस्टेंस, मोटापा, एक्सरसाइज की कमी और गलत खानपान जैसे ज्यादा तला-भुना और कार्बोहाइड्रेट वाली डाइट हो सकते हैं. वहीं अगर शुरुआती चरण में ध्यान दिया जाए तो इसे ठीक किया जा सकता है. 

मेथी का पानी फैटी लिवर में कैसे फायदेमंद हो सकता है

मेथी शरीर में इंसुलिन की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है, जिससे ब्लड शुगर लेवल संतुलित रहने में मदद मिलती है. कुछ रिसर्च के अनुसार यह शरीर में फैट और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित करने में सहायक हो सकती है. यह पाचन और शरीर की एनर्जी प्रक्रिया को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है, जिससे फैट जमा होने की प्रक्रिया पर अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है. लेकिन अभी तक ऐसा कोई मजबूत प्रमाण नहीं है जो यह साबित करे कि सिर्फ मेथी का पानी फैटी लिवर को पूरी तरह ठीक कर देता है. 

मेथी का पानी कैसे बनाएं

मेथी का पानी बनाने के लिए मेथी दानों को रातभर पानी में भिगोकर रखा जाता है. सुबह उस पानी को छानकर खाली पेट पिया जाता है. मेथी के बीजों में कुछ ऐसे प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं जो पाचन को बेहतर बना सकते हैं, शुगर कंट्रोल में मदद कर सकते हैं और मेटाबॉलिज्म को सपोर्ट कर सकते हैं. 

मेथी का पानी कैसे पीना चाहिए?

अगर आप इसे अपने रूटीन में शामिल करना चाहते हैं, तो ध्यान रखें 1 से 2 चम्मच मेथी दाने रातभर पानी में भिगोएं. सुबह खाली पेट उस पानी को पी लें. लेकिन जरूरत से ज्यादा सेवन न करें. साथ ही प्रेग्नेंट महिलाओं को डॉक्टर की सलाह के बिना इसका सेवन नहीं करना चाहिए. डायबिटीज की दवा लेने वाले लोग पहले डॉक्टर से सलाह लें. ज्यादा मात्रा में लेने से गैस या पेट में परेशानी हो सकती है. 

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क्या मेथी का पानी फैटी लिवर को पूरी तरह ठीक कर सकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार मेथी का पानी सहायक उपाय हो सकता है, लेकिन यह अकेले इलाज नहीं है. फैटी लिवर को सुधारने के लिए सबसे जरूरी वजन कम करना, बैलेंस डाइट लेना, नियमित एक्सरसाइज करना और लाइफस्टाइल में सुधार करना है. डॉक्टरों के अनुसार अगर कोई व्यक्ति अपने शरीर का लगभग 5 प्रतिशत से 10 प्रतिशत वजन धीरे-धीरे कम करता है, तो शुरुआती फैटी लिवर में सुधार देखा जा सकता है. 

 फैटी लिवर को ठीक करने के लिए जरूरी टिप्स 

अगर आप ग्रेड-1 फैटी लिवर से जूझ रहे हैं, तो कम तेल और कम तला-भुना खाना, रिफाइंड शुगर और मैदा कम करना, ज्यादा सब्जियां और फाइबर लेना, कम से कम 30 से 40 मिनट तेज चलना या हल्की कसरत, हफ्ते में 5 दिन नियमित एक्सरसाइज और शरीर के अनुसार सही BMI बनाए रखना बहुत जरूरी है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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वजन कम करने के लिए सुबह-सुबह आप भी पीते हैं गर्म पानी, क्या सच में काम करता है यह हैक?

वजन कम करने के लिए सुबह-सुबह आप भी पीते हैं गर्म पानी, क्या सच में काम करता है यह हैक?


Does Drinking Hot Water Help With Weight Loss: आजकल सोशल मीडिया पर एक नया वेलनेस ट्रेंड तेजी से वायरल हो रहा है. लोग दावा कर रहे हैं कि रोज सुबह सिर्फ एक कप गर्म पानी पीने से वजन कम होता है, स्किन साफ होती है और यहां तक कि पीरियड्स के दर्द व गले की खराश में भी राहत मिलती है. सुनने में यह तरीका काफी आसान और नेचुरल लगता है, इसलिए लोग इसे जल्दी अपनाने लगते हैं.

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सच में गर्म पानी पीने से इतने फायदे मिलते हैं, या फिर यह सिर्फ एक और वायरल ट्रेंड है? सच थोड़ा अलग है. गर्म पानी पीना सुरक्षित तो है और कई लोगों को इससे अच्छा महसूस भी होता है, लेकिन इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण साफ तौर पर साबित नहीं हुए हैं. 

क्या इससे होता है फायदा

दरअसल, इसके फायदे पानी के तापमान से ज्यादा उस आदत से जुड़े हो सकते हैं कि आप नियमित रूप से पानी पी रहे हैं. कई बार गर्माहट से मिलने वाला आराम और रिलैक्सेशन ही शरीर को बेहतर महसूस कराता है. यानी असली फायदा पानी पीने का है, न कि उसका गर्म होना. पानी हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी है, चाहे वह ठंडा हो, सामान्य हो या गर्म. पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से पाचन, ब्लड सर्कुलेशन, किडनी फंक्शन और ब्लड प्रेशर जैसी कई जरूरी प्रक्रियाएं सही रहती हैं. हाल की एक स्टडी में यह भी सामने आया है कि कम पानी पीने से रोजमर्रा के तनाव को संभालना भी मुश्किल हो सकता है. 

क्या इससे वजन कम होता है

अब बात करते हैं सबसे आम दावे की कि क्या गर्म पानी वजन घटाने में मदद करता है? obesity जर्नल  में पब्लिस रिसर्च के अनुसार, अभी तक ऐसा कोई ठोस साइंटफिक प्रमाण नहीं है जो यह दिखाए कि सिर्फ गर्म पानी पीने से वजन कम होता है. हां, अगर आप मीठे या हाई-कैलोरी ड्रिंक्स की जगह पानी पीने लगते हैं, तो इससे वजन कंट्रोल में मदद मिल सकती है. कुछ रिसर्च में यह जरूर बताया गया है कि गर्म पानी आंतों की हलचल को थोड़ा बढ़ा सकता है, जिससे पाचन बेहतर होता है. लेकिन यह असर बहुत मामूली होता है और इसका सीधा संबंध फैट कम होने से नहीं है.

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गले की खराश में फायदेमंद

अब आते हैं गले की खराश पर. यहां गर्म पानी थोड़ा ज्यादा असरदार साबित होता है. गर्म तरल पदार्थ गले को आराम देते हैं, म्यूकस को ढीला करते हैं और सांस की नलियों में जलन को कम करते हैं. यही वजह है कि सर्दी-खांसी में गर्म चाय या काढ़ा पीने की सलाह दी जाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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अप्रैल में कभी धूप-कभी बारिश, बदलते मौसम में ऐसे रखें अपने बच्चों का ख्याल

अप्रैल में कभी धूप-कभी बारिश, बदलते मौसम में ऐसे रखें अपने बच्चों का ख्याल


Child Safety: अप्रैल का मौसम जितना हमारे लिए सुहाना और सुंदर होता है, बच्चों के लिए यह उतना ही खतरनाक साबित हो सकता है. बदलते मौसम में कभी खिली धूप और कभी झमाझम बारिश इसका सबसे बड़ा कारण है. इस तरह के मौसम में बच्चों का शरीर जल्दी एडजस्ट नहीं कर पाता, दिन में गर्मी और रात में ठंड जैसा माहौल बच्चों में सर्दी-जुकाम, गले में खराश और वायरल इंफेक्शन जैसी समस्या का खतरा बढ़ा देता है. हवा में नमी और धूल बढ़ने के कारण एलर्जी और स्किन प्रॉब्लम्स भी देखने को मिलते हैं. ऐसे में आइए जानें कैसे रखें इस बदलते मौसम में अपने बच्चे का ख्याल.

सही कपड़ों का चयन है जरूरी

इस मौसम में यही कोशिश रहनी चाहिए कि बच्चों को ना तो बहुत भारी या ना हल्के कपड़े पहनाएं. उन्हें हमेशा एक से अधिक कपड़े पहनाकर रखें ताकि जरूरत के हिसाब से कपड़ो को कम या ज्यादा किया जा सकें. बाहर जाते समय संग में शॉल या जैकेट रखना फायदेमंद हो सकता है, खासकर शाम में जब ठंड ज्यादा रहती है.

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खानपान का रखें खास ध्यान

बदलते मौसम में बच्चों का खान-पान भी बहुत मायने रखता है. उन्हें विटामिन से भरी ताजे फल-सब्जियां देना चाहिए, साथ ही उन्हें ठंडी चीजें जैसे आइसक्रीम और कोल्ड ड्रिंक्स देने से बचें. यह भी सुनिश्चित करें कि वे पर्याप्त मात्रा में पानी पी रहे हैं या नहीं, ताकि शरीर हाइड्रेटेड रहे और इम्युनिटी मजबूत बनी रहे.

डॉक्टर की सलाह और सतर्कता

इस मौसम में इंफेक्शन का खतरा बहुत ज्यादा होता है, इसलिए बच्चों में साफ-सफाई की आदत डलवाना एक कारगर उपाय साबित हो सकता है, जैसे कि बाहर से आते ही हाथ-पैर धोना, टाइम से नहाना और साफ कपड़े पहनना. साथ ही जल्दी सोने की आदत डालवाने से उनकी नींद भी पूरी होती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है. परहेजों के बावजूद अगर बच्चे को समस्या आ रही है तो इसे नजरअंदाज न करें और तुरंत डॉक्टर से जाकर मिलें, ताकि समस्या बढ़ने से पहले उसका समाधान हो सके.

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क्या मोटापा ले सकता है जान? 160 किलो की महिला का सांस लेना हुआ मुश्किल, डॉक्टरों ने ऐसे बचाया

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Obesity Related Breathing Disorder: कभी- कभी कुछ मामले ऐसे आते हैं अस्पतालों में,  जिनमें अगर मरीज जिंदा बच जाए, तो वह किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता है. ऐसा ही कुछ गुरुग्राम के सीके बिड़ला अस्पताल में हुआ, जहां डॉक्टरों की टीम ने एक बेहद मुश्किल और जोखिम भरे केस में 75 वर्षीय महिला की जान बचाकर उसे सुरक्षित डिस्चार्ज कर दिया. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर मामला क्या है. 

किस बीमारी से जूझ रही थी महिला?

 160 किलो वजन की उस महिला कोओबेसिटी हाइपोवेंटिलेशन सिंड्रोम नाम की गंभीर बीमारी थी, जिसमें शरीर पर्याप्त रूप से सांस नहीं ले पाता और खून में ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगता है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ जाती है. महिला को कई अन्य बीमारियां भी थीं, जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, एंग्जायटी और लंबे समय तक बिस्तर पर रहने की वजह से बेडसोर की समस्या थी.  वह अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में गंभीर हालत में लाई गई थीं, जहां उन्हें दोनों फेफड़ों में निमोनिया और हार्ट की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा था. हालत इतनी नाजुक थी कि तुरंत वेंटिलेटर सपोर्ट देना पड़ा. 

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धीरे- धीरे हुआ सुधार

ICU में पहले 24 घंटों के इलाज के दौरान उनकी स्थिति में कुछ सुधार दिखा. बुखार और इंफेक्शन कम होने लगे, छाती के एक्स-रे में भी सुधार नजर आया और दिल से जुड़े संकेतक भी बेहतर होने लगे.  इन पॉजिटिव संकेतों के आधार पर डॉक्टरों ने करीब 36 घंटे बाद वेंटिलेटर हटाने का फैसला लिया. लेकिन जैसे ही वेंटिलेटर हटाया गया, मरीज की हालत अचानक बिगड़ गई. उनके शरीर में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरा और उन्हें फिर से तुरंत वेंटिलेटर पर रखना पड़ा.

डॉक्टरों ने क्या कहा?

इस पूरे मामले में अस्पताल में पल्मोनोलॉजी और क्रिटिकल केयर के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. कुलदीप कुमार ग्रोवर ने बताया कि यह समस्या मोटापे से जुड़ी सांस लेने की गंभीर बाधा की वजह से हुई. उन्होंने कहा कि ऐसे मरीजों में लंग्स की क्षमता कम हो जाती है और शरीर खुद से पर्याप्त सांस नहीं ले पाता. डॉ. ग्रोवर ने आगे बताया कि इस केस में मरीज के इंफेक्शन और दिल से जुड़े पैरामीटर तो सुधर रहे थे, लेकिन मोटापे के कारण उनकी सांस लेने की क्षमता बहुत कमजोर थी. यही वजह रही कि पहली बार वेंटिलेटर हटाने की कोशिश असफल रही.

ऐसे बची जान

इसके बाद डॉक्टरों की टीम ने अपनी रणनीति बदली. मरीज को लंबे समय तक धीरे-धीरे खुद सांस लेने की ट्रेनिंग दी गई, प्रेशर सपोर्ट को धीरे-धीरे कम किया गया और ब्रोंकोस्कोपी की मदद से एयरवे को पूरी तरह तैयार किया गया. इस सावधानी और प्लानिंग के बाद दूसरी बार वेंटिलेटर हटाने की प्रक्रिया सफल रही. भारत में मोटापे के बढ़ते मामलों के साथ OHS जैसी बीमारियां भी तेजी से सामने आ रही हैं. कई स्टडीज के मुताबिक, स्लीप से जुड़ी सांस की समस्याओं वाले मरीजों में इसका प्रतिशत 5 से 16 फीसदी तक पाया गया है, लेकिन अक्सर यह बीमारी तब तक पहचान में नहीं आती जब तक स्थिति गंभीर न हो जाए. डॉक्टरों का कहना है कि समय रहते जांच, वजन नियंत्रित रखना और नियमित मेडिकल चेकअप ही ऐसी गंभीर स्थितियों से बचने का सबसे अच्छा तरीका है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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