एक दिन में कितने किलोमीटर चलना होता है ठीक, इससे ज्यादा चले तो कितना खतरा?

एक दिन में कितने किलोमीटर चलना होता है ठीक, इससे ज्यादा चले तो कितना खतरा?


How Many Kilometers Should You Walk In A Day: चलना सबसे आसान और असरदार एक्सरसाइज में से एक माना जाता है. यह न सिर्फ हार्ट को स्वस्थ रखने में मदद करता है, बल्कि वजन कंट्रोल करने, मूड बेहतर बनाने और शरीर को सक्रिय रखने में भी अहम भूमिका निभाता है. लेकिन अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर एक दिन में कितनी वॉक करना सही है और क्या जरूरत से ज्यादा चलना नुकसान भी पहुंचा सकता है?. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट goodrx के एक्सपर्ट के अनुसार हर व्यक्ति के लिए चलने की आदर्श दूरी अलग-अलग हो सकती है.  यह उसकी फिटनेस, उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और चलने की गति पर निर्भर करता है. जो व्यक्ति नियमित रूप से व्यायाम करता है, वह नए व्यक्ति की तुलना में अधिक दूरी आराम से तय कर सकता है.

कितना चलना माना जाता है सही?

एक्सपर्ट्स सप्ताह में कम से कम 150 मिनट की मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि करने की सलाह देते हैं. इसका मतलब है कि आप हफ्ते में छह दिन करीब 25 मिनट तेज चाल से चल सकते हैं. आमतौर पर यह दूरी 2 से 3 किलोमीटर के आसपास हो सकती है, हालांकि यह व्यक्ति की गति पर निर्भर करती है. 10,000 कदम प्रतिदिन चलने का लक्ष्य काफी लोकप्रिय है, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि यह कोई जादुई संख्या नहीं है. एक रिसर्च में पाया गया कि रोजाना लगभग 7,000 कदम चलने वाले लोगों में समय से पहले मृत्यु का जोखिम कम देखा गया. हालांकि 7,000 और 10,000 से अधिक कदम चलने वालों के बीच स्वास्थ्य लाभ में बहुत बड़ा अंतर नहीं पाया गया. अब 4000 स्टेप को लेकर भी क्लेम क्या जा रहा है.

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कब बढ़ सकता है खतरा?

ज्यादा चलना हर किसी के लिए फायदेमंद नहीं होता. यदि शरीर को पर्याप्त आराम न मिले और लगातार जरूरत से ज्यादा वॉक की जाए, तो ओवरट्रेनिंग जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. ऐसे में शरीर कुछ संकेत देने लगता है जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अगर वॉक के बाद लंबे समय तक मांसपेशियों में दर्द बना रहे, शरीर भारी महसूस हो, लगातार थकान रहे या पहले की तुलना में आपकी परफॉर्मेंस कम हो जाए, तो यह संकेत हो सकता है कि आप जरूरत से ज्यादा चल रहे हैं. इसके अलावा बार-बार मोच आना, चोट लगना, चलने की इच्छा कम होना, चिड़चिड़ापन बढ़ना, भूख कम लगना और बार-बार सर्दी-जुकाम होना भी ओवरएक्सर्शन के संकेत माने जाते हैं.

अपने शरीर की सुनें

एक्सपर्ट का मानना है कि किसी तय संख्या के पीछे भागने से ज्यादा जरूरी है कि आप अपनी क्षमता के अनुसार सक्रिय रहें. अगर आप वॉकिंग की शुरुआत कर रहे हैं, तो धीरे-धीरे दूरी और समय बढ़ाएं. वहीं फिट लोग अपनी क्षमता के अनुसार गति, दूरी या वॉक की फ्रीक्वेंसी बढ़ा सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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रोजाना 10 हजार कदम चलने का भ्रम खत्म, सिर्फ 4000 कदम चलकर भी पूरी तरह फिट रहेगा दिल

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Walking 4000 Steps A Day May Reduce Early Death Risk: स्वस्थ रहने के लिए रोजाना 10 हजार कदम चलने की सलाह अक्सर दी जाती है, लेकिन एक नए स्टडी ने इस धारणा पर सवाल खड़े किए हैं. रिसर्च के मुताबिक, उम्रदराज महिलाएं यदि प्रतिदिन 4,000 कदम चलती हैं, तो इससे समय से पहले मृत्यु और हार्ट रोगों का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है.  खास बात यह है कि इसके लिए हर दिन लंबी वॉक करना भी जरूरी नहीं है. 

कितना चलना सही रहता है?

स्टडी में सामने आया कि यदि महिलाएं सप्ताह में केवल एक या दो दिन भी 4,000 कदम चलने का लक्ष्य हासिल कर लेती हैं, तब भी उन्हें महत्वपूर्ण स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं. रिसर्चर का कहना है कि हेल्थ पर पॉजिटिव असर डालने में यह ज्यादा मायने रखता है कि कुल कितने कदम चले गए, न कि सप्ताह में कितने दिन गतिविधि की गई. यह निष्कर्ष लंबे समय से लोकप्रिय 10,000 कदम प्रतिदिन वाले मानक को चुनौती देता है. एक्सपर्ट का मानना है कि स्वास्थ्य लाभ पाने के लिए कोई एक निश्चित या सर्वश्रेष्ठ पैटर्न नहीं है. सबसे जरूरी बात शरीर को सक्रिय रखना है और लोग अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी तरीके से शारीरिक गतिविधि कर सकते हैं.

महिलाओं के लिए क्या है खास?

स्टडी में पाया गया कि अपेक्षाकृत कम सक्रिय महिलाओं की तुलना में वे महिलाएं, जिन्होंने सप्ताह में एक या दो दिन 4,000 कदम प्रतिदिन पूरे किए, उनमें किसी भी कारण से मृत्यु का जोखिम 26 प्रतिशत कम था. वहीं हार्ट रोग से जुड़ी मौत का खतरा 27 प्रतिशत तक घटा हुआ पाया गया. रिसर्च के अनुसार, यदि यही लक्ष्य सप्ताह में तीन दिन पूरा किया जाए तो फायदे और बढ़ सकते हैं. ऐसी महिलाओं में समय से पहले मृत्यु का जोखिम 40 प्रतिशत तक कम देखा गया. इसके अलावा हृदय रोग का खतरा भी 27 प्रतिशत तक कम पाया गया. 

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हालांकि 5,000 से 7,000 कदम प्रतिदिन चलने वाली महिलाओं को भी अतिरिक्त लाभ मिला, लेकिन इसमें बढ़ोतरी अपेक्षाकृत सीमित रही. इस समूह में मृत्यु का जोखिम 32 प्रतिशत कम था, जबकि हार्ट रोग से मृत्यु के खतरे में लगभग 16 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई. रिसर्चर का कहना है कि एक स्तर के बाद लाभ की गति धीमी पड़ने लगती है.

किन लोगों को रिसर्च में किया गया था शामिल?

अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी सहित कई संस्थानों के रिसर्चर की तरफ से किए गए इस स्टडी को ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में प्रकाशित किया गया है. स्टडी में 13,547 महिलाओं को शामिल किया गया, जिनकी औसत आयु करीब 72 वर्ष थी. स्टडी की शुरुआत में इनमें से किसी को भी हार्ट रोग या कैंसर नहीं था. रिसर्च के दौरान प्रतिभागियों को सात दिनों तक स्टेप काउंट मापने वाले उपकरण पहनाए गए और करीब 11 वर्षों तक उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर नजर रखी गई. इस अवधि में 1,765 महिलाओं की मृत्यु हुई, जबकि 781 महिलाओं में हार्ट रोग विकसित हुआ.

स्टडी के अंत में रिसर्चर ने निष्कर्ष निकाला कि रोजाना अधिक कदम चलना बेहतर स्वास्थ्य परिणामों से जुड़ा है. उनके अनुसार, उम्रदराज महिलाओं के लिए सप्ताह में एक या दो दिन भी 4,000 कदम चलना समय से पहले मृत्यु और हृदय रोग के खतरे को कम करने की दिशा में एक प्रभावी कदम साबित हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कैंसर मरीजों को लगा तगड़ा झटका, किल्लत की वजह से बढ़ाए जाएंगे इन दो दवाओं के दाम

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Government Approves Price Hike For Cisplatin And Carboplatin: ईरान और इजरायल- अमेरिका के बीच चल रहे तनाव का असर पूरी दुनिया में दिखाई दे रहा है. देश में खाने- पीने की चीजों से लेकर पेट्रोल- डीजल और गैस के दाम बढ़ रहे हैं और अब इसका असर दवाइयों पर भी देखने को मिल सकता है, जिससे कैंसर मरीजों को परेशानी हो सकती है. दरअसल, सरकार ने कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली दो अहम दवाओं सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की कीमतों में विशेष बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है. इन दवाओं की देशभर में लगातार कमी देखी जा रही थी, जिससे कैंसर मरीजों के इलाज पर असर पड़ने लगा था. 

देशभर में इसका असर

मामला इतना गंभीर हो गया था कि देश के प्रमुख कैंसर संस्थानों और अस्पतालों में भी इन दवाओं की उपलब्धता प्रभावित होने लगी. दिल्ली स्थित एम्स और मुंबई के टाटा मेमोरियल सेंटर जैसे संस्थानों ने भी इस कमी को लेकर चिंता जताई थी. डॉक्टरों का कहना है कि इन दवाओं का इस्तेमाल लंग्स, सिर और गर्दन, सर्वाइकल, ओवरी और टेस्टिकुलर कैंसर समेत कई प्रकार के कैंसर के इलाज में किया जाता है. खास बात यह है कि इनकी जगह इस्तेमाल करने के लिए कोई पूरी तरह समान विकल्प उपलब्ध नहीं है. 

क्यों हो रही है दवाओं की कमी?

जानकारों के मुताबिक, दवाओं की कमी का सबसे बड़ा कारण प्लेटिनम की बढ़ती कीमतें हैं. प्लेटिनम वह मुख्य कच्चा माल है जिससे इन दवाओं का निर्माण किया जाता है. पिछले कुछ वर्षों में प्लेटिनम की कीमतों में 225 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है, जबकि बीते छह महीनों में ही इसकी कीमत लगभग दोगुनी हो चुकी है. दक्षिण अफ्रीका में उत्पादन संबंधी चुनौतियां और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण सप्लाई चेन पर भी असर पड़ा है. 

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सरकार ने क्यों बढ़ाई कीमत?

दूसरी ओर, इन दवाओं की कीमतें लंबे समय से सरकारी नियंत्रण में थीं. ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर  के तहत निर्धारित मूल्य सीमा के कारण कंपनियां बढ़ती लागत के बावजूद दाम नहीं बढ़ा पा रही थीं. नतीजतन कई दवा कंपनियों ने उत्पादन कम कर दिया या कुछ मामलों में बंद भी कर दिया, जिससे बाजार में आपूर्ति प्रभावित हुई. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने डीपीसीओ 2013 के पैरा 19 का इस्तेमाल करने का फैसला किया है. यह एक विशेष प्रावधान है, जिसके तहत किसी आवश्यक दवा की उपलब्धता प्रभावित होने पर सरकार सामान्य मूल्य नियंत्रण नियमों से अलग फैसला ले सकती है. इसी प्रावधान के जरिए सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की कीमतों में संशोधन का रास्ता साफ हुआ है.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार,  एक समिति ने सिफारिश की है कि पिछली मूल्य निर्धारण तिथि के बाद हर साल 10 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी को आधार माना जा सकता है, जबकि कुल वृद्धि 50 प्रतिशत से अधिक न हो. हालांकि, कीमतों में अंतिम संशोधन का निर्णय दवा निर्माण लागत में हुई वास्तविक बढ़ोतरी के आंकड़ों को ध्यान में रखकर लिया जाएगा.

इलाज में देरी हो सकती थी

एक्सपर्ट का मानना है कि यदि इन दवाओं की कमी लंबे समय तक बनी रहती, तो मरीजों के इलाज में देरी हो सकती थी. इससे कैंसर दोबारा लौटने का खतरा बढ़ने के साथ-साथ मरीजों की रिकवरी और जीवित रहने की संभावना पर भी असर पड़ सकता था. सरकार को उम्मीद है कि कीमतों में संशोधन के बाद घरेलू कंपनियां दोबारा बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करेंगी. इससे सप्लाई में सुधार होगा और कैंसर मरीजों को समय पर जरूरी दवाएं उपलब्ध हो सकेंगी.

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दिल्ली में मोटापे के मामले घटे, लेकिन इन बीमारियों में इजाफा, NFHS-6 में खुलासा

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Delhi Obesity Cases Decline In NFHS-6: नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-6) 2023-24 की रिपोर्ट दिल्ली की हेल्थ स्थिति को लेकर चिंताजनक पेश किया है. रिपोर्ट के मुताबिक राजधानी में मोटापे के मामलों में कमी दर्ज की गई है, लेकिन इसके साथ ही डायबिटीज, कुपोषण और बच्चों के पोषण से जुड़े कई मामले में स्थिति खराब नजर आई है. चलिए आपको बताते हैं कि रिपोर्ट में क्या बताया गया है और देश की राजधानी में किस बीमारी का खतरा अब बढ़ रहा है. 

दिल्ली में कम हुआ मोटापा

सर्वे के अनुसार  दिल्ली के पुरुषों में मोटापा कम हुआ है. देश की राजधानी में में पुरुषों का मोटापा दर पिछले NFHS-5 के 38.0 प्रतिशक से घटकर अब NFHS-6 में 34.8 प्रतिशत रह गया है. अगर महिलाओं की बात करें तो,  5 राज्यों में जिनमें महिलाओं में मोटापे के मामले कम देखे गए हैं उनमें दिल्ली का नाम शामिल है.पहली नजर में यह पॉजिटिव बदलाव लगता है, लेकिन हेल्थ का कहना है कि तस्वीर का दूसरा पक्ष ज्यादा चिंता बढ़ाने वाला है. रिपोर्ट बताती है कि डायबिटीज की दवा लेने वाले लोगों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. महिलाओं में यह आंकड़ा 12 प्रतिशत से बढ़कर 19 प्रतिशत और पुरुषों में 14 प्रतिशत से बढ़कर 22 प्रतिशत हो गया है. यह स्थिति काफी चिंता करने वाली है. 

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कुपोषण के मामले भी बढ़े

राजधानी में कुपोषण के मामले भी बढ़े हैं. महिलाओं में कुपोषण की दर 10 प्रतिशत से बढ़कर 12 प्रतिशत हो गई, जबकि पुरुषों में यह 9 प्रतिशत से बढ़कर 14.9 प्रतिशत तक पहुंच गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि मोटापा कम होने का मतलब हमेशा बेहतर स्वास्थ्य नहीं होता. कई बार खराब खानपान, पोषण की कमी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भी वजन में गिरावट देखने को मिल सकती है. 

बच्चों के पोषण को लेकर भी चिंता

रिपोर्ट में बच्चों के पोषण को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई है. जन्म के एक घंटे के भीतर ब्रेस्टफीडिंग शुरू कराने वाली माताओं की संख्या 51.2 प्रतिशत से घटकर 45.1 प्रतिशत रह गई है. वहीं छह महीने तक केवल मां का दूध पीने वाले शिशुओं का प्रतिशत 64.3 से घटकर 48.3 रह गया. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन पहले छह महीने तक केवल स्तनपान की सिफारिश करता है, क्योंकि इससे बच्चों को आवश्यक पोषण और बीमारियों से सुरक्षा मिलती है.  बच्चों के पूरक आहार से जुड़े आंकड़े भी निराशाजनक हैं. छह से आठ महीने की उम्र के बच्चों को ब्रेस्टफीडिंग  के साथ पूरक भोजन देने की दर 62.9 प्रतिशत से घटकर 52.5 प्रतिशत हो गई. वहीं 6 से 23 महीने के केवल 11.2 प्रतिशत बच्चों को ही न्यूनतम पर्याप्त आहार मिल रहा है, जो पहले 16 प्रतिशत था.

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गाजियाबाद के सीवेज के सैंपल में मिला पोलियो वायरस, जानें यह कंडीशन कितनी खतरनाक?

गाजियाबाद के सीवेज के सैंपल में मिला पोलियो वायरस, जानें यह कंडीशन कितनी खतरनाक?


Polio Virus Detected In Ghaziabad Sewage Samples: गाजियाबाद में सीवेज के एक नमूने में वैक्सीन-डिराइव्ड पोलियोवायरस टाइप-1 मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग अलर्ट मोड पर आ गया है. हालांकि अभी तक किसी बच्चे में पोलियो इंफेक्शन की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सीवेज में वायरस की मौजूदगी ने अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है. इसके बाद प्रभावित इलाकों में विशेष निगरानी और घर-घर सर्वे शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं. 

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से हर महीने पानी के नमूने लेकर उनकी जांच कराता है. हाल ही में डुंडाहेड़ा एसटीपी से लिया गया नमूना जांच के लिए भेजा गया था, जिसकी रिपोर्ट में VDPV-1 स्ट्रेन की पुष्टि हुई. रिपोर्ट सामने आते ही स्वास्थ्य विभाग ने तत्काल एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए. 

12 इलाकों की जांच

अधिकारियों ने 12 शहरी क्षेत्रों में डोर-टू-डोर सर्वे शुरू करने का फैसला लिया है. इसके लिए 107 स्वास्थ्य टीमों को तैनात किया गया है. ये टीमें पांच साल तक के बच्चों की स्वास्थ्य स्थिति, टीकाकरण रिकॉर्ड और किसी संभावित बीमारी के लक्षणों की जानकारी जुटाएंगी. सर्वे राजनगर, शास्त्री नगर, बुलंदशहर रोड इंडस्ट्रियल एरिया, दौलतपुरा, न्यू पंचवटी कॉलोनी, घुकना, हिंडन विहार, कैला भट्टा, मिर्जापुर, विजय नगर-1, विजय नगर-2 और खैराती नगर जैसे इलाकों में किया जाएगा. स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना है कि नियमित टीकाकरण में कमी या कुछ बच्चों का वैक्सीन से छूट जाना इस वायरस के मिलने की एक बड़ी वजह हो सकती है. यही कारण है कि अब टीकाकरण कवरेज की भी समीक्षा की जा रही है. ताकि स्थिति का सही तरीके से पता लगाया जा सके और इसको फैलने से रोका जा सके. 

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यह कंडीशन कितनी खतरनाक?

हार्वर्ड हेल्थ पब्लिशिंग की रिपोर्ट के अनुसार, पोलियो एक गंभीर वायरल बीमारी है, जो व्यक्ति से व्यक्ति में फैल सकती है. यह बीमारी इम्यून सिस्टम पर हमला करती है और गंभीर मामलों में स्थायी लकवा या जानलेवा स्थिति पैदा कर सकती है. हालांकि सीवेज में वायरस का मिलना सीधे तौर पर किसी प्रकोप की पुष्टि नहीं करता, लेकिन यह संकेत जरूर देता है कि वायरस किसी स्तर पर समुदाय में मौजूद हो सकता है.

निगरानी का महत्वपूर्ण तरीका

दरअसल, सीवेज या वेस्टवॉटर की जांच सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी का एक महत्वपूर्ण तरीका माना जाता है. इससे वायरस की मौजूदगी का पता उस समय भी चल सकता है, जब किसी व्यक्ति में बीमारी के लक्षण सामने न आए हों. एक्सपर्ट के अनुसार यदि समय रहते निगरानी और टीकाकरण को मजबूत नहीं किया गया तो वायरस संवेदनशील आबादी तक पहुंच सकता है.

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मोटापा कम करने का नया कमाल, 52 नहीं अब सिर्फ 12 इंजेक्शन में चलेगा काम, जानें कैसे?

मोटापा कम करने का नया कमाल, 52 नहीं अब सिर्फ 12 इंजेक्शन में चलेगा काम, जानें कैसे?


Pfizer’s Berobenatide Weight Loss Drug: मोटापे और डायबिटीज के इलाज में एक बड़ा बदलाव आने की संभावना दिखाई दे रही है. दवा कंपनी फाइजर ने अपनी नई प्रायोगिक दवा बेरोबेनेटाइड के मिड-स्टेज ट्रायल के नतीजे जारी किए हैं.  खास बात यह है कि यदि यह दवा भविष्य में मंजूरी हासिल कर लेती है, तो यह दुनिया की पहली ऐसी जीएलपी-1 आधारित वेट लॉस थेरेपी हो सकती है जिसे हर हफ्ते नहीं, बल्कि महीने में सिर्फ एक बार इंजेक्शन के रूप में लेना होगा. 

इस तरह कैसे दी जाती है दवा?

मौजूदा समय में वेगोवी और जेडबाउंड जैसी लोकप्रिय वेट लॉस दवाएं साप्ताहिक इंजेक्शन के रूप में दी जाती हैं. इसके विपरीत ब्राबांटिया का उद्देश्य मरीजों के लिए इलाज को अधिक सुविधाजनक बनाना है. शुरुआती चरण में मरीजों को साप्ताहिक डोज दी जाएगी, जिसके बाद उन्हें महीने में केवल एक इंजेक्शन लेना होगा. इसका मतलब है कि सालभर में 52 इंजेक्शन की जगह केवल 12 इंजेक्शन की जरूरत पड़ेगी. 

वेस्पर-3 नामक क्लिनिकल ट्रायल में डायबिटीज से पीड़ित न होने वाले प्रतिभागियों का वजन 12.3 प्रतिशत तक कम हुआ.  दिलचस्प बात यह रही कि जो मरीज बाद में मासिक डोज पर गए, उनका वजन कम होना जारी रहा और वजन घटने की प्रक्रिया किसी ठहराव पर नहीं पहुंची. 

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क्या इनके असर दिखते हैं?

हालांकि वेगोवी और जेडबाउंड जैसी दवाओं ने बड़े और लंबे स्टडी में लगभग 15 प्रतिशत और 20 प्रतिशत से अधिक वजन घटाने के परिणाम दिखाए हैं,  लेकिनफोर्टिस सीडीओसी हॉस्पिटल फॉर डायबिटीज एंड एलाइड साइंसेज के चेयरमैन और एम्स दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर डॉ. अनूप मिश्रा का कहना है कि अलग-अलग ट्रायल्स के परिणामों की सीधी तुलना नहीं की जानी चाहिए.

क्या है इसकी खासियत?

डॉ. अनूप मिश्रा के अनुसार बेरोबेनेटाइड की सबसे बड़ी खासियत वजन घटाने का प्रतिशत नहीं, बल्कि इसकी मासिक डोजिंग है. उनका मानना है कि भारत जैसे देश में लंबे समय तक इलाज जारी रखना बड़ी चुनौती होता है. ऐसे में महीने में केवल एक बार इंजेक्शन लेने की सुविधा मरीजों की उपचार के प्रति प्रतिबद्धता बढ़ा सकती है और इलाज छोड़ने की संभावना कम कर सकती है. एक्सपर्ट के मुताबिक अब इस दवा के फेज-3 ट्रायल्स पर नजर रहेगी. इसमें लंबे समय तक वजन कम रहने की क्षमता, सुरक्षा, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल साइड इफेक्ट्स, हार्ट और किडनी पर प्रभाव जैसे पहलुओं का मूल्यांकन किया जाएगा. यह भी देखा जाएगा कि शरीर में पूरे महीने तक सक्रिय रहने वाली यह दवा किसी नए जोखिम को तो जन्म नहीं देती.

कब तक मार्केट में आ सकती है?

डॉ. मिश्रा का मानना है कि भविष्य में मोटापे के इलाज का फोकस केवल वजन घटाने तक सीमित नहीं रहेगा. हार्ट रोग, किडनी स्वास्थ्य, ब्लड शुगर कंट्रोल, दवा की कीमत और मरीज की व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति जैसे कारक भी इलाज तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे. उनके अनुसार आने वाले वर्षों में लंबे समय तक असर करने वाली दवाएं, कॉम्बिनेशन थेरेपी और पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट मोटापे के इलाज की दिशा तय करेंगे. यदि यह अपने अंतिम ट्रायल्स में सफल रहती है, तो इसके 2028 के अंत या 2029 के मध्य तक मरीजों के लिए उपलब्ध होने की संभावना है. एक्सपर्ट मानते हैं कि यह दवा मोटापे को एक लंबे समय तक चलने वाली बीमारी के रूप में प्रबंधित करने के तरीके को बदल सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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