मां बनने में आ रही है दिक्कत तो आज ही अपने खाने में शामिल कर लें ये चीजें, जल्द गूंजेगी किलकारी

मां बनने में आ रही है दिक्कत तो आज ही अपने खाने में शामिल कर लें ये चीजें, जल्द गूंजेगी किलकारी


Fertility Diet: गर्भधारण की कोशिश कर रहे हैं कई कपल्स के मन में अक्सर यह सवाल आता है कि क्या खानपान का असर भी प्रजनन क्षमता पर पड़ता है. एक्सपर्ट्स के अनुसार सिर्फ भोजन के भरोसे गर्भधारण की संभावना तय नहीं की जा सकती, लेकिन सही और संतुलित डाइट शरीर को गर्भधारण के लिए बेहतर तरीके से तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाती है. पौष्टिक आहार, हार्मोन संतुलन बनाए रखना, ओव्यूलेशन को सपोर्ट करने, स्पर्म की क्वालिटी बेहतर करने और शुरुआती गर्भावस्था के लिए शरीर को तैयार करने में मदद कर सकता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि अगर आपको भी मां बनने में दिक्कत आ रही है तो आप अपने खाने में कौन सी चीज शामिल कर सकते हैं. 

हरी पत्तेदार सब्जियां शामिल करें 

पालक, मेथी, केल और चोली जैसी हरी पत्तेदार सब्जियां फर्टिलिटी डाइट का अहम हिस्सा मानी जाती है. इनमें फोलेट भरपूर मात्रा में होता है, जो हेल्दी एग्स के विकास और गर्भधारण के शुरुआती चरण के लिए जरूरी माना जाता है. इसके अलावा इनमें आयरन, कैल्शियम और एंटीऑक्सीडेंट भी पाए जाते हैं, जो शरीर की कोशिकाओं को नुकसान से बचाने और हार्मोन संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं. 

साबुत अनाज 

ब्राउन राइस, ओट्स, क्विनोआ और मिलेट्स जैसे साबुत अनाज शरीर में ब्लड शुगर को संतुलित रखने में मदद करते हैं. ब्लड शुगर का संतुलन इंसुलिन और प्रजनन हार्मोन पर भी पॉजिटिव असर डालता है.  खासकर पीसीओएस या अनियमित पीरियड से जूझ रही महिलाओं के लिए रिफाइंड अनाज की जगह साबुत अनाज अच्छा ऑप्शन माना जाता है. 

बेरीज और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर फल 

स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी, संतरा, कीवी और अनार जैसे फल विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं. यह एग्स और स्पर्म को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में मदद कर सकते हैं. अनार को गर्भाशय में ब्लड सर्कुलेशन बेहतर बनाने के लिए भी उपयोगी माना जाता है, जिससे एंब्रियो के इंप्लांटेशन में मदद मिलती है. 

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फैटी फिश 

सैल्मन और सार्डिन जैसी मछलियां ओमेगा 3 फैटी एसिड का अच्छा सोर्स है. ओमेगा 3 फैटी एसिड शरीर में सूजन कम करने, हार्मोन बनाने की प्रक्रिया को सहयोग देने और प्रजनन अंगों तक बेहतर ब्लड सर्कुलेशन बनाए रखने में मदद करता है. पुरुषों में यह स्पर्म की क्वालिटी को बेहतर बनाने में सहायता करता है. जबकि महिलाओं में पीरियड और गर्भधारण की प्रक्रिया को सपोर्ट कर सकता है. 

नट्स और बीज 

अखरोट, बादाम, अलसी, कद्दू के बीज और सूरजमुखी के बीज जैसे खाद्य पदार्थ विटामिन ए, जिंक, सेलेनियम और हेल्दी फैट से भरपूर होते हैं. यह पोषक तत्व महिलाओं में एग्स के स्वास्थ्य और पुरुषों में स्पर्म की क्वालिटी बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. एक रिसर्च में यह भी पाया गया कि नियमित मात्रा में अखरोट खाने से स्पर्म की क्वालिटी और में सुधार देखा गया है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या सच में सुअर की चर्बी से बनते हैं दवा वाले कैप्सूल? वेज वालों के काम की है खबर

क्या सच में सुअर की चर्बी से बनते हैं दवा वाले कैप्सूल? वेज वालों के काम की है खबर


अक्सर कई बीमारियों में डॉक्टर उस बीमारी को ठीक करने के लिए कैप्सूल देते हैं, लेकिन बहुत से लोगों को यह सुनकर हैरानी होगी की उन्हें दी गई कैप्सूल शाकाहारी नहीं, बल्कि मांसाहारी भी हो सकती है. 

दरअसल, कैप्सूल का ऊपर वाला खोल यानी उसका कवर एक चीज से बनता है जिसे जिलेटिन कहते हैं. जिलेटिन एक प्राकृतिक पदार्थ है जो कोलेजन से बनता है, और यह कोलेजन जानवरों की हड्डियों, त्वचा और मांसपेशियों में पाया जाता है. यानी सीधे शब्दों में कहें तो जिलेटिन जानवरों के शरीर के हिस्सों से ही तैयार होता है, चर्बी या तेल से नहीं. कई लोग सोचते हैं कि यह सिर्फ चर्बी से बनता है, लेकिन असल में इसे बनाने में जानवरों की हड्डी और खाल का इस्तेमाल ज्यादा होता है.

जिलेटिन क्या है और कैसे बनता है?

अब सवाल यह है कि यह जिलेटिन आता कहां से है. आपको जानकर हैरानी होगी कि कैप्सूल बनाने में सबसे ज्यादा सुअर की खाल, गाय की खाल, जानवरों की हड्डियां और मछली की खाल का इस्तेमाल होता है. यानी दवा कंपनी के हिसाब से यह सुअर से भी बन सकता है और गाय या मछली से भी. दुनियाभर में सालों से यही तरीका इस्तेमाल हो रहा है क्योंकि जिलेटिन के कैप्सूल पिछले सौ साल से इस्तेमाल हो रहे हैं.

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शाकाहारी कैप्सूल भी हैं बाजार में

अच्छी खबर यह है कि अब बाजार में शाकाहारी कैप्सूल भी मौजूद हैं. इन्हें पौधों से मिलने वाले पदार्थों से बनाया जाता है, जिसे एचपीएमसी (HPMC) कहते हैं. यह पूरी तरह पौधों से बना होता है और इसे जिलेटिन कैप्सूल का शाकाहारी विकल्प माना जाता है. लेकिन दिक्कत यह है कि यह विकल्प महंगा होता है, इसलिए ज्यादातर कंपनियां आज भी सस्ते जिलेटिन कैप्सूल का ही इस्तेमाल करती हैं. 

इस जानकारी के बाद शाकाहारी लोगों के दिमाग में यह सवाल आता है कि इसको कैसे पहचानें, क्या अनजाने में वे अपना धर्म भ्रष्ट कर रहे हैं? ऐसे में आप क्या कर सकते हैं? बता दें कि भारत में शाकाहारी चीजों पर हरा गोल निशान और मांसाहारी चीजों पर भूरा या लाल गोल निशान बना होता है, यह नियम दवाओं पर भी लागू होता है. इसके अलावा पैकेट या दवा की जानकारी में “Vegetarian Capsule” या “HPMC Capsule” लिखा हो तो समझ लीजिए कि यह शाकाहारी है. 

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स्वीमिंग, रनिंग या रस्सी कूद… 1 घंटे में किसमें खर्च होती है सबसे ज्यादा कैलोरी, क्या बेहतर?

स्वीमिंग, रनिंग या रस्सी कूद… 1 घंटे में किसमें खर्च होती है सबसे ज्यादा कैलोरी, क्या बेहतर?


Which Exercise Burns Most Calories: अगर आपका लक्ष्य वजन कम करना या ज्यादा कैलोरी बर्न करना है, तो अक्सर मन में सवाल आता है कि आखिर स्वीमिंग, रनिंग और रस्सी कूद में सबसे ज्यादा कैलोरी किस एक्सरसाइज से खर्च होती है. तीनों ही बेहतरीन कार्डियो वर्कआउट हैं, लेकिन कैलोरी बर्न करने की क्षमता इनकी तीव्रता, आपकी स्पीड और शरीर के वजन पर भी निर्भर करती है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं. 

किसमें सबसे ज्यादा कैलोरी बर्न होती है?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट healthline के अनुसार रनिंग एक घंटे में सबसे ज्यादा कैलोरी बर्न करने वाली एक्सरसाइज में शामिल है. करीब 70 किलोग्राम वजन वाला व्यक्ति एक घंटे की तेज दौड़ में लगभग 800 कैलोरी तक खर्च कर सकता है.  अगर दौड़ने की रफ्तार ज्यादा हो, तो यह आंकड़ा और बढ़ सकता है. यही वजह है कि वजन घटाने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए रनिंग को सबसे असरदार कार्डियो एक्सरसाइज माना जाता है. 

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रस्सी कूद कितना फायदेमंद?

वहीं रस्सी कूद भी कैलोरी बर्न करने का बेहद प्रभावी तरीका है। एक घंटे तक लगातार मध्यम गति से रस्सी कूदने पर करीब 550 से 700 कैलोरी तक बर्न हो सकती हैं. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके लिए किसी जिम या बड़े उपकरण की जरूरत नहीं होती. घर की थोड़ी-सी जगह में भी यह एक्सरसाइज आसानी से की जा सकती है. इसके साथ ही, इससे पैरों की ताकत, स्टैमिना और हार्ट हेल्थ को भी फायदा मिलता है. 

स्वीमिंग हेल्थ के लिए कितना कारगर

अगर बात स्वीमिंग की करें, तो यह पूरे शरीर की एक्सरसाइज मानी जाती है. सामान्य गति से एक घंटे तक तैरने पर लगभग 500 कैलोरी तक खर्च हो सकती हैं. हालांकि अलग-अलग स्टाइल और स्पीड में स्वीमिंग करने पर कैलोरी बर्न का आंकड़ा बढ़ भी सकता है. खास बात यह है कि स्वीमिंग में शरीर के लगभग सभी प्रमुख मसल्स एक साथ काम करते हैं और जोड़ों पर दबाव भी कम पड़ता है.  इसलिए जिन लोगों को घुटनों या जोड़ों में दर्द रहता है, उनके लिए यह बेहतर विकल्प माना जाता है.

कैलोरी बर्न ही फिटनेस का पैमाना नहीं 

अगर केवल सबसे ज्यादा कैलोरी बर्न करने की बात करें, तो रनिंग पहले स्थान पर रहती है. इसके बाद रस्सी कूद और फिर सामान्य गति से की जाने वाली स्वीमिंग आती है. हालांकि सिर्फ कैलोरी बर्न ही फिटनेस का पैमाना नहीं है. अगर आपको जोड़ों की समस्या है, तो स्वीमिंग ज्यादा सुरक्षित हो सकती है. वहीं कम समय में असरदार वर्कआउट चाहिए, तो रस्सी कूद एक अच्छा विकल्प है.  फिटनेस एक्सपर्ट्स का मानना है कि किसी भी एक्सरसाइज से बेहतर परिणाम पाने के लिए उसे नियमित रूप से करना जरूरी है., शुरुआत हमेशा अपनी क्षमता के अनुसार करें, वर्कआउट से पहले वार्म-अप करें और बाद में कूल-डाउन करना न भूलें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दाल-सब्जी के मुकाबले एक अंडे से कितना मिलता है प्रोटीन, बच्चों के पोषण पर कितना पड़ेगा असर?

दाल-सब्जी के मुकाबले एक अंडे से कितना मिलता है प्रोटीन, बच्चों के पोषण पर कितना पड़ेगा असर?


Kolkata Mid Day Meal Egg Removed: कोलकाता के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील से अंडे हटाकर उनकी जगह शाकाहारी विकल्प देने के फैसले के बाद बच्चों के पोषण को लेकर बहस तेज हो गई है. सवाल यह उठ रहा है कि क्या दाल और सब्जी अंडे जितना प्रोटीन दे सकती हैं और इसका बच्चों की सेहत पर क्या असर पड़ सकता है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं कि आखिर इसका क्या असर होगा. 

अंडे क्यों होते हैं बेहतर विकल्प?

अंडे को लंबे समय से उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन का सस्ता और आसान सोर्स माना जाता है. एक सामान्य अंडे में करीब 6 से 7 ग्राम प्रोटीन होता है. इसमें शरीर के लिए जरूरी सभी आवश्यक अमीनो एसिड पाए जाते हैं, इसलिए इसे कम्प्लीट प्रोटीन भी कहा जाता है. यही वजह है कि बढ़ते बच्चों के खानपान में अंडे को अहम माना जाता है. 

दाल और सब्जी का विकल्प?

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि दाल प्रोटीन का अच्छा स्रोत नहीं है. जानी-मानी पोषण सलाहकार और ‘गोल्ज-पोषण एवं आहार समाधान’ की संस्थापक डॉ. सुषमा अप्पैया के अनुसार, लगभग 50 ग्राम कच्ची दाल पकने के बाद करीब 12 ग्राम प्रोटीन देती है. यानी एक कटोरी दाल से दो अंडों के बराबर के आसपास प्रोटीन मिल सकता है.  इसके अलावा दाल में फाइबर, आयरन और कई जरूरी पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं, जो शरीर के लिए फायदेमंद हैं. 

क्या है दोनों में अंतर?

अंडे और दाल में एक बड़ा अंतर है. अंडे का प्रोटीन शरीर आसानी से अवशोषित कर लेता है, जबकि दाल में मौजूद प्रोटीन के साथ कार्बोहाइड्रेट भी अधिक मात्रा में होता है. इसलिए न्यूट्रिशन एक्सपर्ट अक्सर संतुलित आहार में दोनों को शामिल करने की सलाह देते हैं. अगर किसी कारण से अंडा नहीं दिया जा रहा है, तो दाल के साथ दूध, दही, पनीर, सोया या दूसरी प्रोटीन युक्त चीजें शामिल करना जरूरी माना जाता है, ताकि बच्चों की दैनिक प्रोटीन जरूरत पूरी हो सके.  भारत के अलग-अलग राज्यों में मिड-डे मील का मेन्यू अलग है. कई राज्यों में बच्चों को सप्ताह में कुछ दिन अंडा दिया जाता है, जबकि कुछ राज्यों में दाल, चना, पनीर, दूध और दूसरी शाकाहारी चीजों के जरिए पोषण देने की व्यवस्था की जाती है. 

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बच्चों के लिए क्या जरूरी?

एक्सपर्ट का कहना है कि बच्चों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि उन्हें रोजाना पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स मिलें. अगर अंडे की जगह ऐसा शाकाहारी विकल्प दिया जाता है जो समान पोषण उपलब्ध कराए, तो बच्चों के विकास पर असर कम पड़ सकता है. लेकिन केवल अंडा हटाकर पोषण की भरपाई न की जाए, तो इससे बढ़ते बच्चों की सेहत और शारीरिक विकास प्रभावित होने का खतरा बढ़ सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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गटागट पानी पीने की आदत कहीं कर न दे बीमार? डॉक्टर से जानें पानी पीने का सही नियम

गटागट पानी पीने की आदत कहीं कर न दे बीमार? डॉक्टर से जानें पानी पीने का सही नियम


Why You Should Drink Water Slowly: पानी पीना एक साधारण आदत है, लेकिन इसे कैसे पिया जाता है, इसका असर शरीर पर गहरा पड़ता है.  धीरे-धीरे पानी पीने से पाचन बेहतर होता है और पेट पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता.  वहीं जल्दबाजी में एक साथ पानी पी लेने से शरीर को उसे संभालने में समय लगता है. असल में डाइजेशन की प्रक्रिया मुंह से ही शुरू हो जाती है. जब हम पानी को घूंट-घूंट करके पीते हैं, तो वह लार के साथ मिलकर धीरे-धीरे नीचे जाता है. इससे पेट पहले से तैयार रहता है और खाना आसानी से पचने लगता है. 

एकबार में ज्यादा पानी पीने से क्या होती है दिक्कत?

जब पानी एक ही बार में ज्यादा मात्रा में पिया जाता है, तो शरीर को अचानक उसे संभालना पड़ता है. इससे पाचन की लय थोड़ी बिगड़ सकती है. ऑफ हेल्थ की रिपोर्ट भी बताती है कि शरीर पानी को धीरे-धीरे लेने पर बेहतर तरीके से उपयोग कर पाता है.  डॉक्टर विनीत कुमार गुप्ता के अनुसार, धीरे-धीरे पानी पीने से यह शरीर में अच्छी तरह घुलता है और पाचन में मदद करता है. वहीं बहुत तेजी से पानी पीने पर कुछ समय के लिए पेट में भारीपन या असहजता महसूस हो सकती है. 

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धीरे- धीरे पानी पीने के फायदे

धीरे-धीरे पानी पीने का एक फायदा यह भी है कि शरीर का संतुलन बना रहता है. पेट को एकदम से ज्यादा मात्रा नहीं मिलती, जिससे पाचन रस ठीक तरह से काम करते रहते हैं.  इससे कब्ज जैसी समस्याओं से भी राहत मिलती है और शरीर में पानी की कमी नहीं होती.  हालांकि कुछ स्थितियों में जल्दी पानी पीना जरूरी हो सकता है, जैसे तेज गर्मी या ज्यादा मेहनत के बाद.  लेकिन रोजमर्रा की आदत के रूप में यह तरीका सही नहीं माना जाता.  खासकर खाना खाते समय ज्यादा पानी पीने से पाचन धीमा हो सकता है. 

पानी पीने की टाइमिंग भी है जरूरी

एक बात यह भी है कि पानी पीने का सही समय भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका तरीका. बेहतर है कि दिनभर थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहें, खाने के बीच में घूंट लें और एक बार में ज्यादा मात्रा लेने से बचें.  शरीर की जरूरत को समझकर ही पानी पीना सबसे सही तरीका है, जिससे पाचन और सेहत दोनों बेहतर रहते हैं. पानी पीने का तरीका छोटा बदलाव जरूर है, लेकिन इसका असर बड़ा होता है. धीरे-धीरे पानी पीने की आदत न सिर्फ पाचन को बेहतर बनाती है, बल्कि पूरे दिन शरीर को हल्का और संतुलित महसूस कराती है.

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मच्छर या कीड़ा काटे तो खुजली करने से पहले 2 बार सोचें, रिसर्च में हुआ बेहद चौंकाने वाला खुलासा

मच्छर या कीड़ा काटे तो खुजली करने से पहले 2 बार सोचें, रिसर्च में हुआ बेहद चौंकाने वाला खुलासा


Why Scratching Mosquito Bites Makes It Worse: मच्छर, मक्खी या किसी दूसरे कीड़े के काटने के बाद खुजली होना आम बात है. ऐसे में ज्यादातर लोग बिना सोचे-समझे उस जगह को खुजलाने लगते हैं, क्योंकि इससे कुछ देर के लिए राहत मिलती है. लेकिन एक नई रिसर्च बताती है कि यह राहत सिर्फ थोड़ी देर की होती है. बार-बार खुजलाने से सूजन, जलन और खुजली पहले से ज्यादा बढ़ सकती है. 

खुजलाना क्यों नहीं चाहिए?

रिसर्चर के मुताबिक, डॉक्टर लंबे समय से लोगों को सलाह देते रहे हैं कि कीड़े के काटने या एलर्जी वाली जगह को ज्यादा न खुजलाएं. अब साइंटिस्ट ने यह भी समझ लिया है कि ऐसा करने से शरीर के अंदर आखिर क्या होता है. इस रिसर्च के लिए साइंटिस्ट ने चूहों पर स्टडी किया और पाया कि खुजलाने से शरीर की इम्यून सिस्टम ज्यादा सक्रिय हो जाती है, जिससे प्रभावित हिस्से में सूजन और खुजली बढ़ जाती है. 

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किसपर किया गया था रिसर्च?

अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग  के स्किन रोग एक्सपर्ट डॉ. डैनियल कैपलन  और उनकी टीम ने इस स्टडी में चूहों की त्वचा पर एलर्जी पैदा करने वाला पदार्थ लगाया। जिन चूहों ने खुजलाया, उनके शरीर में सूजन बढ़ाने वाली इम्यून सिस्टम तेजी से उस जगह पहुंच गईं. वहीं जिन चूहों को खुजलाने से रोका गया, उनमें सूजन काफी कम रही. इससे साफ हुआ कि खुजलाना खुद समस्या को और बढ़ा देता है.  डॉ. कैपलन का कहना है कि अगर मच्छर काटने के बाद उसे बिल्कुल न खुजलाया जाए, तो ज्यादातर लोगों में खुजली 5 से 10 मिनट के भीतर कम होने लगती है. लेकिन अगर उसी जगह को बार-बार खुजलाया जाए, तो वही छोटा-सा दाना कई दिनों तक परेशान कर सकता है.

खुजलाने से क्या होती है दिक्कत?

रिसर्च में यह भी सामने आया कि खुजलाने पर शरीर की दर्द महसूस करने वाली नसें सक्रिय हो जाती हैं. इसके बाद सब्सटेंस पी नाम का एक केमिकल मैसेंजरनिकलता है, जो त्वचा में मौजूद मास्ट सेल्स को सक्रिय कर देता है. ये सेल्स हिस्टामिन जैसे रसायन छोड़ती हैं, जिससे खुजली और सूजन दोनों बढ़ जाती हैं. यही वजह है कि खुजलाने के बाद कुछ देर राहत जरूर मिलती है, लेकिन बाद में परेशानी और बढ़ जाती है.

क्या खुजलाने से कोई फायदा भी होता है?

हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि हल्का-सा खुजलाने से शरीर को एक छोटा फायदा भी मिल सकता है. स्टडी में देखा गया कि खुजलाने वाले चूहों की त्वचा पर कुछ बैक्टीरिया की मात्रा कम थी. माना जा रहा है कि सूजन की वजह से शरीर कुछ हानिकारक जीवाणुओं से लड़ने में मदद करता है. लेकिन एक्सपर्ट स्पष्ट कहते हैं कि यह फायदा इतना बड़ा नहीं है कि खुजलाने की आदत को सही माना जाए. 

खुजली होने पर क्या करना चाहिए?

अगर मच्छर, मक्खी या किसी कीड़े के काटने के बाद तेज खुजली हो रही है, तो उसे नाखूनों से खुजलाने की बजाय हाइड्रोकार्टिसोन क्रीम, कैलामाइन लोशन या मेंथॉल युक्त एंटी-इच क्रीम का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे खुजली शांत होती है और त्वचा को नुकसान पहुंचने का खतरा भी कम रहता है. एक्सपर्ट के अनुसार, खुजली को सहन करना भले ही आसान न हो, लेकिन बार-बार खुजलाने से बचना ही त्वचा को जल्दी ठीक होने का सबसे बेहतर तरीका है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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