बच्चों को क्यों खींच रहा कोरियन कल्चर और कहां चूक रहे हम? गाजियाबाद की घटना से उठे सवाल

बच्चों को क्यों खींच रहा कोरियन कल्चर और कहां चूक रहे हम? गाजियाबाद की घटना से उठे सवाल


मोबाइल स्क्रीन में डूबे बच्चे, बाहरी दुनिया से कटता बचपन और कोरियन ड्रामा एवं म्यूज़िक की बढ़ती दीवानगी. गाज़ियाबाद की हालिया घटना के बाद एक बार फिर यह सवाल तेज हो गया है कि आखिर हमारे बच्चे किस दिशा में जा रहे हैं. क्या यह सिर्फ कोरियन कल्चर का असर है, या इसके पीछे हमारी सामाजिक और पारिवारिक चूक छिपी है. इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए एबीपी लाइव की टीम ने आर्टेमिस हॉस्पिटल के मशहुर वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. राहुल चंडोक से विस्तार से बातचीत की.

कोरियन कल्चर नहीं, खालीपन बच्चों को कर रहा है आकर्षित

डॉ. राहुल चंडोक साफ कहते हैं कि यह समस्या किसी एक देश या संस्कृति की नहीं है. असल समस्या यह है कि बच्चों के लिए हमारे पास अपना कंटेंट और अपना समय नहीं है. खेलने के मैदान कम हो गए हैं. खेल और मनोरंजन की जगह मोबाइल ने ले ली है. जब बच्चों के लिए भारतीय कहानियां, नाटक और फिल्में नहीं होंगी, तो वे बाहर का कंटेंट ही देखेंगे. कोरियन कंटेंट खासतौर पर टीनएजर्स को ध्यान में रखकर बनाया जाता है, इसलिए वह उन्हें ज़्यादा आकर्षित करता है.

मोबाइल बना परिवार का नया सदस्य

डॉ. चंडोक एक सटीक उदाहरण देते हैं. आज माता-पिता बच्चे को शांत रखने के लिए सबसे पहले मोबाइल थमा देते हैं. खाना हो, चुप कराना हो या किसी से बात करनी हो, हर स्थिति में फोन सामने होता है. बच्चा छोटी उम्र से ही मोबाइल को परिवार का हिस्सा मानने लगता है. ऐसे में बड़े होने पर उससे मोबाइल छीनना बेहद मुश्किल हो जाता है.

खेल का मैदान खत्म, स्क्रीन की दुनिया शुरू

बच्चों का असली काम खेलना है. लेकिन मैदान, पार्क और कोर्ट की कमी ने बच्चों को चारदीवारी में कैद कर दिया है. वे अपने ही उम्र के बच्चों से मिल नहीं पा रहे हैं. गाज़ियाबाद की घटना में सामने आया कि बच्चे सालों तक स्कूल नहीं गए, किसी से संपर्क नहीं था और अकेलेपन ने उनकी मानसिकता पर गहरा असर डाला. दीवारों पर लिखा मिला कि वे खुद को बेहद अकेला महसूस कर रहे थे.

डिस्ट्रैक्शन और खुशी में फर्क समझना जरूरी

डॉ. चंडोक कहते हैं कि मोबाइल बच्चों को डिस्ट्रैक्ट तो करता है, लेकिन खुश नहीं करता. कार्टून या वीडियो बच्चे को कुछ देर चुप करा सकता है, लेकिन यह भावनात्मक जुड़ाव नहीं दे सकता. अकेलापन जब बढ़ता है, तो बच्चा उसी काल्पनिक दुनिया को अपनी असली दुनिया मानने लगता है.

बच्चों को कोरियन कल्चर या मोबाइल से दूर रखना है, तो सबसे पहले माता-पिता को उन्हें समय देना होगा. बच्चे के पास बैठकर मोबाइल चलाना, क्वालिटी टाइम नहीं होता. बच्चे के दिनभर की बातें सुनना, उसकी दोस्ती, झगड़े और सपनों को समझना ज़रूरी है. आज घरों में बच्चे कम हैं, और उम्र का अंतर ज़्यादा है. ऐसे में बच्चे और ज़्यादा अकेले हो जाते हैं.

अपना कंटेंट नहीं होगा तो बच्चे कहीं और जाएंगे

डॉ. चंडोक मानते हैं कि भारतीय संस्कृति के अनुरूप आधुनिक नाटक और सीरियल बहुत कम बन रहे हैं. इंटरनेट के दौर में दुनिया भर का कंटेंट बच्चों के लिए उपलब्ध है. ट्रांसलेशन ने इसे और आसान बना दिया है. अगर हमारे देश में बच्चों और किशोरों के लिए आकर्षक कंटेंट नहीं बनेगा, तो वे विदेशी कंटेंट की ओर जाएंगे ही.

सोशल मीडिया बैन नहीं, सही माहौल की जरूरत

16 साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल से दूर रखने की सलाह पर डॉ. चंडोक संतुलित राय रखते हैं. वे कहते हैं कि मोबाइल और इंटरनेट आज की ज़िंदगी का हिस्सा हैं. ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों में सोशल मीडिया पर रोक की बातें हो रही हैं, लेकिन भारत जैसे देश में समाधान बैन नहीं है. समाधान यह है कि बच्चों के लिए सही कंटेंट बनाया जाए और घर में ऐसा माहौल हो जहां बच्चे माता-पिता के साथ समय बिता सकें.

डॉ. राहुल चंडोक का मानना है कि अगर बच्चों को यह भरोसा मिल जाए कि माता-पिता उनके लिए समय निकालेंगे, तो वे खुद मोबाइल से दूरी बना लेंगे. वे पढ़ाई पूरी कर आपके पास बैठेंगे. अगर यह भरोसा नहीं होगा, तो वे रातों में जागकर मोबाइल और काल्पनिक दुनिया में जीने लगेंगे.

बच्चों को समझा तो वे अपने आप लौट आएंगे

कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि कोरियन कल्चर बच्चों की समस्या नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की कमी का आईना है. बच्चों को सही दिशा देने के लिए हमें उन्हें समय देना होगा, उनके लिए अपनी संस्कृति के अनुरूप कंटेंट बनाना होगा और मोबाइल को विकल्प बनाना होगा, सहारा नहीं. तभी बच्चे फिर से अपने माता-पिता और अपनी दुनिया की ओर लौटेंगे.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में इलाज का नया दौर, जीबी पंत में वर्ल्ड क्लास हेल्थ फैसिलिटी शुरू

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दिल्ली सरकार ने राजधानी की स्वास्थ्य व्यवस्था को नई ऊंचाई देने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है. गोविंद बल्लभ पंत (जीबी पंत) अस्पताल में अत्याधुनिक तकनीक से लैस नई चिकित्सा सुविधाओं की शुरुआत की गई है, जिससे न सिर्फ दिल्ली बल्कि दूसरे राज्यों से आने वाले मरीजों को भी बड़ा फायदा मिलने वाला है.

अस्पताल परिसर में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज कुमार सिंह ने 256 स्लाइस सीटी स्कैन, वाइड कैथ लैब और नए आईसीयू का उद्घाटन किया. इस मौके पर अस्पताल प्रशासन और चिकित्सा जगत से जुड़े कई विशेषज्ञ भी मौजूद रहे.

अब सरकारी अस्पतालों में भी मिलेगा प्राइवेट जैसा इलाज

उद्घाटन के दौरान मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि दिल्ली सरकार का लक्ष्य सरकारी अस्पतालों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं से लैस करना है. उन्होंने स्पष्ट किया कि इलाज में अमीर और गरीब का अंतर खत्म करना सरकार की प्राथमिकता है, ताकि हर नागरिक को समान और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें.

नॉर्थ इंडिया का पहला 256 स्लाइस सीटी स्कैन

मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि जीबी पंत अस्पताल में लगाया गया 256 स्लाइस सीटी स्कैन अपनी श्रेणी में चुनिंदा मशीनों में से एक है और नॉर्थ इंडिया में पहली बार किसी सरकारी अस्पताल में इसे स्थापित किया गया है. यह मशीन कैंसर, हृदय रोग और अन्य गंभीर बीमारियों की तेज और सटीक जांच में बेहद कारगर साबित होगी. उन्होंने कहा, अस्पताल में नई न्यूरो कैथ लैब की शुरुआत के साथ न्यूरो विज्ञान से जुड़े इलाज को नई मजबूती मिलेगी. वर्ष 1964 से चिकित्सा सेवा और शिक्षा में अग्रणी रहे इस अस्पताल को लगभग 38 करोड़ रुपये की लागत से ये आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं.

पुरानी तकनीक हटाकर किया गया आधुनिक अपग्रेड

वहीं, स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज कुमार सिंह ने बताया कि जीबी पंत अस्पताल में न्यूरो आईटी सिस्टम को पूरी तरह अपग्रेड किया गया है. पुरानी मशीनों को हटाकर नई तकनीक लगाई गई है, जिससे आम मरीजों को सीधे तौर पर बेहतर और तेज इलाज का लाभ मिलेगा.

स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिल्ली की जनता को दिए गए भरोसे को आगे बढ़ाते हुए सरकार स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार कर रही है. आने वाले समय में दिल्ली के अन्य अस्पतालों में भी एमआरआई, सीटी स्कैन और आधुनिक जांच सुविधाएं शुरू की जाएंगी.

दिल्ली सरकार का मानना है कि जीबी पंत अस्पताल में शुरू हुई ये नई सुविधाएं राजधानी की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत आधार देंगी और सरकारी अस्पतालों के प्रति लोगों के विश्वास को और गहरा करेंगी.

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क्या सुबह उठकर खाली पेट पानी पीना सही, इस वक्त ठंडा या गरम कौन-सा पानी पीना ज्यादा अच्छा?

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Water In Morning: अपने दिन की शुरुआत एक गिलास पानी से करना शायद आसान लग सकता है. लेकिन यह छोटी सी आदत आपकी पूरी हेल्थ पर काफी ज्यादा असर डाल सकती है. 6 से 8 घंटे की नींद के बाद शरीर थोड़ा डिहाइड्रेटेड हो जाता है. खाली पेट पानी पीने से अंदरूनी सिस्टम फिर से शुरू हो जाते हैं. 

सुबह पानी पीना क्यों फायदेमंद 

सुबह उठते ही पानी पीने से डाइजेशन एक्टिव हो जाता है. नेचुरल डिटॉक्स प्रक्रिया में मदद मिलती है और शरीर दिन के लिए तैयार होता है. यह डाइजेस्टिव सिस्टम को धीरे-धीरे जगाता है, रेगुलर बॉवेल मूवमेंट में मदद करता है और पूरे दिन एनर्जी लेवल बनाए रखने में मदद करता है.

गुनगुना पानी 

खाली पेट गुनगुना पानी सबसे सही ऑप्शन माना जाता है. यह डाइजेस्टिव सिस्टम के लिए काफी हल्का होता है और शरीर इसे आसानी से सोख लेता है. सुबह इसे पीने से आंतों की मांसपेशियां रिलैक्स होती हैं. इससे डाइजेशन आसान होता है और कब्ज कम होता है. यह शरीर को रात भर जमा हुए टॉक्सिन को बाहर निकलने में भी मदद करता है. शरीर का तापमान थोड़ा बढ़ाकर गुनगुना पानी मेटाबॉलिज्म को बढ़ा सकता है. साथ ही यह वेट मैनेजमेंट में भी मदद कर सकता है. इसके अलावा यह ब्लड वेसल्स को नेचुरली फैलाने में मदद करके ब्लड सर्कुलेशन को भी बेहतर बनाता है. 

ठंडा पानी 

ठंडे पानी के अपने फायदे हैं लेकिन यह उठने के तुरंत बाद सबसे अच्छा ऑप्शन नहीं हो सकता. काफी ठंडा पानी डाइजेस्टिव सिस्टम को शॉक दे सकता है. इससे डाइजेशन धीमा हो सकता है या फिर गले में जलन हो सकती है. हालांकि यह थोड़ी मात्रा में कैलोरी बर्न करने में मदद करता है. क्योंकि शरीर इसे गर्म करने के लिए एनर्जी का इस्तेमाल करता है. सुबह वर्कआउट के बाद ठंडा पानी खासतौर पर काफी फायदेमंद होता है. ऐसा इसलिए क्योंकि यह शरीर को ठंडा करने और जल्दी से रिहाइड्रेट करने में मदद करता है.

पानी का तापमान डाइजेशन को कैसे प्रभावित करता है 

पानी का तापमान इस बात में एक बड़ी भूमिका निभाता है कि डाइजेस्टिव सिस्टम कैसे रिस्पॉन्ड करता है. गुनगुना पानी एंजाइम एक्टिविटी और आसान डाइजेशन में मदद करता है. वहीं ठंडा पानी कुछ समय के लिए ब्लड वेसल्स को सिकोड़ सकता है. इससे डाइजेस्टिव प्रोसेस धीमा हो जाता है. यही वजह है कि खाली पेट आमतौर पर गर्म या फिर गुनगुना पानी पसंद किया जाता है.

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