क्या ब्लड टेस्ट से पता लग सकता है कैंसर, ट्यूमर बनने से पहले कैसे पता लगेगी दिक्कत?

क्या ब्लड टेस्ट से पता लग सकता है कैंसर, ट्यूमर बनने से पहले कैसे पता लगेगी दिक्कत?


Can A Blood Test Detect Cancer Early: दुनियाभर में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, इसके पीछे जो सबसे बड़ा रीजन है वह है कि इसके लक्षण जल्दी दिखाई नहीं देते हैं. तमाम तरह के जांच कराने के बाद इसका पता चलता है. हालांकि, अब एक साधारण ब्लड टेस्ट भविष्य में कैंसर का पता उस समय लगा सकता है. दरअसल साइंटिस्ट ने एक बेहद सेंसिटिव लाइट-आधारित सेंसर डिवेलप्ड किया है, जो खून में मौजूद कैंसर बायोमार्कर की अत्यंत सूक्ष्म मात्रा सब-एटोमोलर लेवल तक पहचान सकता है. यानी जांच के लिए सिर्फ कुछ मॉलिक्यूल की मौजूदगी ही काफी हो सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर क्या खोज हुई है और यह तकनीक कैसे काम करती है. 

कैसे काम करता है यह?

Optica जर्नल में पब्लिश स्टडी के अनुसार, शेनजेन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हान झांग की अगुवाई में शोधकर्ताओं ने डीएनए नैनोस्ट्रक्चर, क्वांटम डॉट्स, क्रिसपर जीन-एडिटिंग तकनीक और सेकंड हार्मोनिक जनरेशन नामक एक ऑप्टिकल तकनीक को मिलाकर यह सिस्टम तैयार किया. यह तकनीक मरीज के खून में कैंसर से जुड़े माइक्रोआरएनए को पारंपरिक RT-qPCR से अधिक सेंसिटिविटी के साथ पहचानने में सक्षम रही.

अभी किस तरह होती हैं जांच?

अभी ज्यादातर शुरुआती जांच या तो इमेजिंग पर आधारित होती है, जिसमें ट्यूमर तब दिखता है जब वह एक निश्चित आकार ले चुका हो, या फिर पीसीआर जैसी तकनीकों पर, जो जेनेटिक सामग्री को कई गुना बढ़ाकर मापती हैं. नई तकनीक इन दोनों से अलग है. इसमें किसी केमिकल एम्प्लीफिकेशन की जरूरत नहीं पड़ती. जैसे ही कैंसर बायोमार्कर मौजूद होता है, लाइट सिग्नल में सीधा बदलाव आता है और वही जांच का आधार बनता है.

मॉलिक्यूल जीन को कंट्रोल करते हैं छोटे आरएनए

यह सेंसर खास तौर पर माइक्रोआरएनए पर ध्यान देता है.ये छोटे आरएनए मॉलिक्यूल जीन को नियंत्रित करते हैं. miR-21, miR-155 और miR-10b जैसे माइक्रोआरएनए लंग्स के कैंसर के शुरुआती चरण से जुड़े पाए गए हैं. शुरुआती अवस्था में इनकी मात्रा बेहद कम होती है, इसलिए इन्हें पकड़ने के लिए असाधारण संवेदनशीलता चाहिए. लैब में यह डिवाइस miR-21 को 168 जेप्टोमोलर तक की बेहद कम कंसंट्रेटेड पर भी पहचान सका, जो सामान्य सैंपल में महज कुछ दर्जन अणुओं के मॉलिक्यूल होती है. इसमें मोलिब्डेनम डिसल्फाइड की एक पतली परत का इस्तेमाल किया गया, जो SHG सिग्नल के लिए जानी जाती है.

एक्सपर्ट का मानना है कि यदि माइक्रोआरएनए को ट्यूमर बनने से पहले ही पकड़ा जा सके तो कैंसर स्क्रीनिंग का तरीका बदल सकता है. भविष्य में यह अन्य कैंसर, वायरल संक्रमण, बैक्टीरियल रोग और यहां तक कि अल्जाइमर जैसे न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों की पहचान में भी उपयोगी हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बुढ़ापा आपसे कोसों दूर रहेगा! बस अपनी रोजमर्रा की आदतों में शामिल करें ये 5 आसान बदलाव

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Why Some Seniors Stay Energetic in Their 70s: क्या आपने गौर किया है कि कुछ लोग 60 से 70 की उम्र में भी इतनी फुर्तीले और ऊर्जा से भरे रहते हैं, मानो उम्र ने उन पर असर ही न डाला हो? वे जिम में घंटों पसीना बहाने वाले या मैराथन दौड़ने वाले लोग नहीं होते. वे बस अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को थोड़ा अलग ढंग से जीते हैं. लोगों को लगता है कि ऐसे लोग शायद बेहतर जीन के साथ पैदा हुए हैं. हालांकि,  साइकोलॉजिस्ट रिसर्च को समझने के बाद पता चलेगा कि राज कुछ और ही है. ये लोग किसी खास डाइट या कठिन एक्सरसाइज पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि दिनभर हलचल को अपनी जिंदगी में इस तरह शामिल कर लेते हैं कि शरीर लगातार सक्रिय बना रहता है.

असल फर्क सोच का है. जब चलना-फिरना “वर्कआउट” न लगकर रोजमर्रा का हिस्सा बन जाए, तो दिमाग उसे बोझ नहीं समझता. इसलिए ये आदतें लंबे समय तक बनी रहती हैं. चलिए आपको विस्तार से बताते हैं. 

सीढ़ियां इनके लिए बाधा नहीं, अवसर हैं

एशिया के कई शहरों में मैंने देखा कि जो बुजुर्ग लोग बिना लिफ्ट वाले घरों में रहते हैं, वे अक्सर ज्यादा चुस्त दिखते हैं. वे सीढ़ियां चढ़ते वक्त “एक्सरसाइज” नहीं कर रहे होते, वे बस घर जा रहे होते हैं. यही साइकोलॉजिस्ट काम करता है, जब गतिविधि का मकसद फिटनेस से अलग हो, तो हम उसे टालते नहीं. 

छोटे कामों को भी सक्रिय बनाना

आजकल हम किराने से लेकर फर्नीचर तक सब कुछ ऑनलाइन मंगवा लेते हैं. लेकिन जो बुजुर्ग ज्यादा फिट रहते हैं, वे अभी भी पैदल बाजार जाते हैं, साइकिल से सब्जी लाते हैं और अपना सामान खुद उठाते हैं. AARP Research भी कहती है, “Walking is good for you, and older Americans generally know it.” यानी पैदल चलना स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है, और लोग इसे समझते भी हैं. फर्क बस इतना है कि कुछ लोग इसे जीवन का हिस्सा बना लेते हैं.

बागवानी को साधना की तरह करना

बागवानी करते बुजुर्गों को देखें, तो वे झुकते हैं, उठते हैं, मिट्टी खोदते हैं, गमले उठाते हैं। यह अपने आप में एक पूरा वर्कआउट है, लेकिन उन्हें ऐसा नहीं लगताय. Mayo Clinic की रिसर्च बताती है कि“The sports most associated with increased longevity were tennis, badminton, soccer and cycling.” यानी जो गतिविधियां मजेदार और सामाजिक हों, वे लंबी उम्र से जुड़ी पाई गई हैं।

शौक चुनते हैं, जिम नहीं

फिट रहने वाले सीनियर नागरिक अक्सर डांस क्लास, बैडमिंटन, वॉकिंग ग्रुप या टेबल टेनिस जैसे शौक अपनाते हैं. ये एक्टिविटी एक्सरसाइज कम और मनोरंजन ज्यादा लगती हैं, इसलिए नियमित बनी रहती हैं.

छोटी-छोटी हरकतें भी मायने रखती हैं

साइंटिस्ट इसे NEAT- Non-Exercise Activity Thermogenesis कहते हैं, यानी बिना औपचारिक व्यायाम के दिनभर की छोटी-छोटी एक्टिविटी. जैसे बात करते समय टहलना, टीवी देखते हुए खड़े होना या फोन पर बात करते वक्त इधर-उधर चलना. इसका मतलब साफ है कि लंबी उम्र और बेहतर एनर्जी का रहस्य कठिन एक्सरसाइज नहीं, बल्कि लगातार हल्की-फुल्की सक्रियता है. जब चलना-फिरना जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन जाता है, तब फिटनेस अलग से हासिल करने की जरूरत ही नहीं पड़ती.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या खाली पेट काम करता है दिमाग ज्यादा बेहतर? जानिए फास्टिंग का मेंटल हेल्थ पर असर और फायदे

क्या खाली पेट काम करता है दिमाग ज्यादा बेहतर? जानिए फास्टिंग का मेंटल हेल्थ पर असर और फायदे


आजकल फास्टिंग सिर्फ धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रह गया है. बहुत से लोग वजन कम करने, शुगर कंट्रोल करने और फिट रहने के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग या समय-टाइम रेस्ट्रिक्टेड ईटिंग अपना रहे हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि खाली पेट रहने का असर हमारे दिमाग पर भी पड़ता है. हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों और न्यूरोलॉजिस्ट्स ने पाया है कि सही तरीके से और सीमित समय के लिए किया गया  फास्टिंग दिमाग के लिए भी फायदेमंद हो सकता है. यह सिर्फ शरीर की चर्बी कम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि दिमाग की कार्यक्षमता, याददाश्त और मानसिक स्पष्टता को भी प्रभावित कर सकता है. हालांकि, यह समझना जरूरी है कि फास्टिंग हर किसी के लिए सुरक्षित नहीं होती और इसे सोच-समझकर ही अपनाना चाहिए. तो आइए जानते हैं कि क्या सच में खाली पेट दिमाग ज्यादा बेहतर काम करता है. फास्टिंग का मानसिक असर और फायदे क्या हैं.

क्या सच में खाली पेट दिमाग ज्यादा बेहतर काम करता है?

जब हम लगभग 12 से 16 घंटे तक कुछ नहीं खाते तो शरीर में जमा ग्लाइकोजन खत्म होने लगता है. इसके बाद शरीर एनर्जी के लिए फैट जलाना शुरू करता है. इस प्रक्रिया में कीटोन बॉडीज बनती है. इनमें से एक प्रमुख कीटोन, बीटा-हाइड्रोक्सीब्यूटाइरेट, दिमाग के लिए एक अच्छा ईंधन माना जाता है. यह सिर्फ एनर्जी  ही नहीं देता, बल्कि दिमाग की कोशिकाओं को सक्रिय और मजबूत बनाए रखने में भी मदद करता है. इस बदलाव को मेटाबोलिक स्विच कहा जाता है. जब दिमाग ग्लूकोज की जगह कीटोन से एनर्जी लेने लगता है, तो कई लोगों को मानसिक स्पष्टता, बेहतर फोकस और कम थकान महसूस होती है.

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फास्टिंग का मानसिक असर और फायदे क्या हैं

1. दिमाग की ग्रोथ का सहायक: फास्टिंग का एक बड़ा फायदा यह बताया जाता है कि इससे बीडीएनएफ नामक प्रोटीन का स्तर बढ़ सकता है. बीडीएनएफ नई मस्तिष्क कोशिकाओं के बनने में मदद करता है, पुरानी कोशिकाओं को सुरक्षित रखता है, सीखने और याददाश्त को बेहतर बनाता है, दिमाग को तनाव से निपटने में मदद करता है. बीडीएनएफ दिमाग के लिए खाद की तरह काम करता है, जो उसकी ग्रोथ और मजबूती में मदद करता है.

2. दिमाग की सफाई प्रक्रिया: फास्टिंग के दौरान शरीर में एक खास प्रक्रिया सक्रिय होती है, जिसे ऑटोफैगी कहते हैं. इसका मतलब खुद की सफाई है. इस दौरान कोशिकाएं अपने अंदर जमा खराब और क्षतिग्रस्त प्रोटीन को हटाने लगती हैं. यह प्रक्रिया दिमाग की सेहत के लिए खासतौर पर जरूरी मानी जाती है, क्योंकि कुछ न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों (जैसे अल्जाइमर और पार्किंसंस) में असामान्य प्रोटीन का जमाव देखा जाता है. हालांकि अभी इंसानों पर और बड़े अध्ययन की जरूरत है, लेकिन शुरुआती शोध बताते हैं कि ऑटोफैगी लंबे समय में दिमाग की सुरक्षा में मदद कर सकती है.

3. साफ और स्थिर एनर्जी: जब दिमाग कीटोन से एनर्जी लेता है, तो वह कम ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा करता है. ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस वह स्थिति है, जो उम्र बढ़ने और मानसिक कमजोरी से जुड़ी होती है. कीटोन से मिलने वाली एनर्जी ज्यादा स्थिर होती है और अचानक थकान कम कर सकती है. ब्रेन फॉग यानी दिमागी धुंध को कम करने में मदद कर सकती है. इसी कारण कुछ लोग फास्टिंग के दौरान ज्यादा फोकस और स्पष्ट सोच महसूस करते हैं.

4. मेटाबोलिक सेहत और दिमाग: समय-सीमित खाने से जुड़े कई अध्ययनों में पाया गया है कि इससे इंसुलिन संवेदनशीलता बेहतर होती है, शरीर में सूजन कम हो सकती है, मेटाबोलिक लचीलापन बढ़ता है. शुगर और मेटाबोलिक गड़बड़ी का संबंध दिमागी गिरावट से भी जोड़ा जाता है, इसलिए ये बदलाव अप्रत्यक्ष रूप से मस्तिष्क की सेहत को फायदा पहुंचा सकते हैं.

इन बातों का रखें ध्यान

फास्टिंग हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं होती, खासकर डायबिटीज के मरीज, खाने के विकार से जूझ रहे लोग प्रेग्नेंसी और ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली महिलाएं, बुजुर्ग और कमजोर लोग, जो लोग शुगर कम करने वाली दवाएं लेते हैं.ऐसे लोगों को फास्टिंग शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए. इसके अलावा, लंबे समय तक दिमाग पर पड़ने वाले प्रभावों की पुष्टि के लिए अभी और बड़े वैज्ञानिक अध्ययनों की जरूरत है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हरा धनिया के पत्ते खाने के ये 5 फायदे नहीं जानते होंगे आप, इन बीमारियों में करते हैं मदद

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How To Use Coriander Leaves For Health: भारतीय रसोई में हरा धनिया सिर्फ सजावट के लिए ही नहीं, बल्कि स्वाद और खुशबू बढ़ाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है. दाल हो, सब्जी हो या फिर चावल ऊपर से थोड़ा सा कटा धनिया डालते ही पकवान का स्वाद दोगुना हो जाता है. लेकिन अगर आप सोचते हैं कि हरा धनिया सिर्फ गार्निशिंग तक सीमित है, तो अब अपनी जानकारी अपडेट कर लीजिए. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट Healthline की रिपोर्ट के अनुसार, रोजाना इसके सेवन से इम्यूनिटी मजबूत होती है, पाचन बेहतर होता है और शरीर को कई अन्य फायदे भी मिलते हैं. चलिए आपको इसके 5 फायदे बताते हैं. 

हरे धनिए के फायदे

डायबिटीज मरीजों के लिए फायदेमंद

हरा धनिया ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है. इसमें मौजूद कुछ एंजाइम्स शुगर लेवल को कम करने में सहायक माने जाते हैं. साथ ही इसमें फाइबर की मात्रा अच्छी होती है और इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिससे यह डायबिटीज मरीजों के लिए बेहतर विकल्प बन जाता है. आप चाहें तो धनिया पानी बनाकर भी इसका सेवन कर सकते हैं. बस कुछ पत्तियां पानी में डालकर दिनभर पीते रहें.

इम्यूनिटी को करता है मजबूत

हरे धनिए में एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर को इंफेक्शन और बीमारियों से बचाने में मदद करते हैं. इसके एंटीबैक्टीरियल गुण भी शरीर की इम्यून सिस्टम की क्षमता को बढ़ाते हैं. नियमित सेवन से बार-बार बीमार पड़ने की समस्या कम हो सकती है. कमजोर इम्यून के लोगों के लिए यह काफी फायदेमंद साबित हो सकता है. 

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त्वचा के लिए फायदेमंद

हर कोई साफ और दमकती त्वचा चाहता है. शरीर में अधिक एसिडिटी के कारण त्वचा पर लालिमा, दाने और पिंपल्स जैसी समस्याएं हो सकती हैं. हरा धनिया एसिडिटी को कम करने में मदद करता है, जिससे स्किन से जुड़ी समस्याओं में राहत मिल सकती है.

डाइजेशन को रखता है दुरुस्त

हरे धनिए में मौजूद फाइबर पाचन को बेहतर बनाता है. यह गैस, अपच और ब्लोटिंग जैसी दिक्कतों को कम करने में सहायक हो सकता है. अगर आप अपने डाइजेशन को स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो रोजाना भोजन में धनिया शामिल करना फायदेमंद रहेगा.

हार्ट की सेहत के लिए अच्छा

हरा धनिया एक नेचुरल डाययूरेटिक की तरह काम करता है, जो शरीर से अतिरिक्त सोडियम बाहर निकालने में मदद करता है. इससे कोलेस्ट्रॉल और हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में सहायता मिल सकती है. कई रिसर्च बताते हैं कि इसका नियमित सेवन हार्ट रोग के खतरे को कम कर सकता है. यह आपके लिए एक बेहतर विकल्प है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या पेशाब के साथ आ रहा है खून, हो सकता है इस खतरनाक बीमारी का संकेत

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हेमाट्यूरिया का मतलब पेशाब में रेड ब्लड सेल्स की मौजूदगी होता है. इसके दो प्रकार होते हैं. जिसमें पहला ग्रास हेमाट्यूरिया होता है. इसमें जब खून आंखों से साफ दिखाई देता है और पेशाब गुलाबी या लाल हो जाता है. वहीं दूसरा माइक्रोस्कोपिक हेमाट्यूरिया होता है. इसमें खून दिखाई नहीं देता है लेकिन माइक्रोस्कोप या यूरिन टेस्ट में पता चलता है.

इन कंडीशन में पेशाब का रंग गुलाबी, लाल या कोला जैसा हो सकता है. इसके अलावा इसमें बहुत कम मात्रा में खून भी रंग बदलने के लिए काफी होता है. कई बार इन कंडीशन में खून के थक्के भी निकल सकते हैं जो दर्द का कारण बनते हैं.

इन कंडीशन में पेशाब का रंग गुलाबी, लाल या कोला जैसा हो सकता है. इसके अलावा इसमें बहुत कम मात्रा में खून भी रंग बदलने के लिए काफी होता है. कई बार इन कंडीशन में खून के थक्के भी निकल सकते हैं जो दर्द का कारण बनते हैं.

Published at : 03 Mar 2026 04:27 PM (IST)

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भारत में तेजी से बढ़ रही थॉयराइड की बीमारी, नजरअंदाज करने की न करें गलती

भारत में तेजी से बढ़ रही थॉयराइड की बीमारी, नजरअंदाज करने की न करें गलती


Early Signs Of Thyroid In Women: आपकी ब्लड रिपोर्ट के नंबर बहुत कुछ बताते हैं. रूटीन हेल्थ चेकअप के बाद अक्सर एक लाइन नजर आती है, TSH थोड़ा बढ़ा हुआ, लेकिन T3 और T4 सामान्य. डॉक्टर इसे बॉर्डरलाइन कहते हैं, मरीज को खास परेशानी महसूस नहीं होती और रिपोर्ट फाइल में दब जाती है. लेकिन भारत में थायरॉयड की समस्या आम होती जा रही है. साल 2014 में इंडियन जर्नल ऑफ एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म में पब्लिश एक मल्टी-सिटी स्टडी के अनुसार, देश में लगभग हर 10 में से 1 वयस्क हाइपोथायरॉयडिज्म से प्रभावित है, जबकि 8 से 9 प्रतिशत लोगों में सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉयडिज्म पाया गया. यह आंकड़ा मामूली नहीं है. चलिए आपको विस्तार से बताते हैं. 

क्या होता है बॉर्डर लाइन का मतलब?

बॉर्डरलाइन थायरॉयड का मतलब होता है कि TSH थोड़ा ज्यादा या कम है, लेकिन T3 और T4 नॉर्मल सीमा में हैं. यह बीमारी की तरह शोर नहीं मचाता, बल्कि परेशानी का संकेत देता है. एक्सपर्ट डॉ. वंदना बूभना ने TOI को बताया कि भारत में सबक्लिनिकल थायरॉयड काफी आम है और लक्षण हल्के होने की वजह से लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं. असली खतरा एक रिपोर्ट में नहीं, बल्कि समय के साथ बदलते ट्रेंड में छिपा होता है.

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भारत में थायरॉयड की समस्या ज्यादा क्यों है?

पहले देश आयोडीन की कमी वाला क्षेत्र माना जाता था। नमक में आयोडीन मिलाने की नीति से स्थिति सुधरी, लेकिन आयोडीन के स्तर में बदलाव ऑटोइम्यून बीमारियों को प्रभावित कर सकते हैं.इसके अलावा हाशिमोटो थायरॉयडाइटिस जैसे ऑटोइम्यून कारण, बढ़ती उम्र, प्रदूषण, मोटापा और तनाव भी अहम भूमिका निभाते हैं. महिलाएं पुरुषों की तुलना में ज्यादा प्रभावित होती हैं. प्रेग्नेंसी की योजना, प्रेग्नेंसी, डिलीवरी के बाद के बदलाव और पेरिमेनोपॉज, इन सभी स्टेप में हार्मोनल उतार-चढ़ाव होता है, जिससे थायरॉयड हार्मोन की जरूरत बढ़ जाती है. गर्भावस्था में अनकंट्रोल थायरॉयड मां और शिशु दोनों के लिए जोखिम भरा हो सकता है.

नहीं दिखते हैं लक्षण

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि कई बार कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते। हल्की थकान, वजन बढ़ना, बाल झड़ना या मूड में बदलाव को लोग सामान्य समझ लेते हैं.लेकिन सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉयडिज्म समय के साथ बीमारी में बदल सकता है, खासकर अगर थायरॉयड एंटीबॉडी पॉजिटिव हों. अब सवाल आता है कि ऐसे में क्या करें? अगर डॉक्टर सलाह दें तो 6 से 12 हफ्ते बाद दोबारा जांच कराएं. जरूरत पड़े तो थायरॉयड एंटीबॉडी टेस्ट करवाएं. आयोडीन संतुलित मात्रा में लें, वजन और मासिक चक्र पर नजर रखें. हर बॉर्डरलाइन केस में दवा जरूरी नहीं होती, फैसला उम्र, लक्षण और प्रेग्नेंसी स्थिति के आधार पर लिया जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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