दिनभर ऑफिस की कुर्सी पर बैठे रहने का खतरा, इस डेस्क वर्कआउट से आसानी से हो जाएगा कम

दिनभर ऑफिस की कुर्सी पर बैठे रहने का खतरा, इस डेस्क वर्कआउट से आसानी से हो जाएगा कम


आजकल नौकरी कर रहे लोगों की सबसे आम परेशानी होती है कि वे अपने काम के चक्कर में दिनभर कुर्सी पर ही बैठे रह जाते हैं. सुबह ऑफिस पहुंचने से लेकर शाम को घर जाने तक कई लोग 8 से 9 घंटे तक लगातार बैठे रह जाते हैं. लेकिन हर किसी को इसकी जानकारी नहीं होती कि उनके देर तक बैठे रहने से उनकी सेहत पर कितना असर पड़ रहा है.

कई रिसर्च में यह बात सामने आई है कि लंबे समय तक बैठे रहना शरीर के लिए उतना ही खतरनाक है, जितना धूम्रपान करना या मोटापा. यही वजह है कि अब डॉक्टर और फिटनेस एक्सपर्ट भी ऑफिस में काम करने वाले लोगों को बीच-बीच में उठकर हिलने-डुलने की सलाह देते हैं.

लंबे समय तक बैठने से बढ़ सकता है इन बीमारियों का खतरा

लंबे समय तक बैठे रहने से परेशानियों की बात करें तो लगातार बैठे रहने से शरीर में कई तरह की दिक्कतें शुरू हो जाती हैं. जैसे कमर और गर्दन में दर्द रहना, क्योंकि लंबे समय तक बैठे रहने से रीढ़ की हड्डी पर लगातार दबाव पड़ता रहता है. इसके अलावा कंधे झुकने लगते हैं और पीठ का पोस्चर भी खराब हो जाता है. एक रिसर्च में यह भी पाया गया है कि जो लोग दिन में 8 घंटे से ज्यादा बैठे रहते हैं, उनमें दिल की बीमारी होने का खतरा भी काफी बढ़ जाता है. इसके साथ ही मोटापा, शुगर और कोलेस्ट्रॉल बढ़ने की समस्या भी हो सकती है, क्योंकि माना जाता है कि लंबे समय से बैठे रहने से शरीर में कैलोरी बर्न करने की क्षमता बहुत कम पड़ जाती है.

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डेस्क वर्कआउट से ऐसे कम करें घंटों बैठने का नुकसान

इस पर कई लोगों के दिमाग में यह सवाल आता है कि आखिर ऐसी स्थिति में करें क्या. ऐसे में विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि सिर्फ अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे भी कुछ आसान एक्सरसाइज करके इसका असर काफी हद तक कम किया जा सकता है. जैसे हर आधे-एक घंटे में कुछ मिनट के लिए खड़े होकर टहलना चाहिए. साथ ही कुर्सी पर बैठे-बैठे गर्दन को धीरे-धीरे दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे घुमाना चाहिए, इससे गर्दन का अकड़ना कम होता है.

पैरों को सीधा करके ऊपर उठाना, एड़ियों को ऊपर-नीचे करना और कलाइयों को घुमाना जैसी छोटी एक्सरसाइज भी कुर्सी पर बैठे-बैठे आसानी से की जा सकती हैं. इसके अलावा बैठे-बैठे कमर को हल्के से दाएं-बाएं मोड़ना यानी चेयर ट्विस्ट करने से पीठ को आराम मिलता है और शरीर में हल्कापन महसूस होता है.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पैकेट बंद खाने में छिपे वो 3 सीक्रेट केमिकल, जो बिना वजन बढ़ाए अंदर ही अंदर सड़ा रहे आपका लिवर

पैकेट बंद खाने में छिपे वो 3 सीक्रेट केमिकल, जो बिना वजन बढ़ाए अंदर ही अंदर सड़ा रहे आपका लिवर


Hidden Chemicals In Packaged Foods: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पैकेट बंद और प्रोसेस्ड फूड का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. चिप्स, बिस्किट, रेडी-टू-ईट मील, डिब्बाबंद सूप, फास्ट फूड और पैक्ड स्नैक्स जैसी चीजें लोगों की रोजमर्रा की डाइट का हिस्सा बन चुकी हैं. लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि कई बार सिर्फ खाना ही नहीं, बल्कि उसकी पैकेजिंग भी सेहत के लिए चिंता का कारण बन सकती है.

रिसर्च के मुताबिक, कुछ पैकेजिंग मटेरियल में मौजूद रसायन धीरे-धीरे खाने में मिल सकते हैंय लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से शरीर के कई अंगों पर असर पड़ सकता है, जिनमें लिवर भी शामिल है, यूरोपियन यूनियन की संस्था interreg-baltic.eu के अनुसार, कुछ पैकेजिंग मटेरियल में मौजूद केमिकल समय के साथ खाने में मिल सकते हैं और लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से शरीर पर निगेटिव असर पड़ सकता है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं. 

फॉरएवर केमिकल्स

फॉरएवर केमिकल्स ऐसे केमिकल्स हैं जिनका इस्तेमाल तेल और पानी को रोकने वाली पैकेजिंग बनाने में किया जाता है. फास्ट फूड रैपर, पिज्जा बॉक्स और माइक्रोवेव पॉपकॉर्न बैग जैसी चीजों में इनका उपयोग किया जाता रहा है. इन्हें फॉरएवर केमिकल्स इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये शरीर और वातावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं. कुछ स्टडी में इनका संबंध लिवर, थायरॉयड और इम्यून सिस्टम पर पड़ने वाले प्रभावों से जोड़ा गया है.

बिस्फेनॉल-ए

बिस्फेनॉल-ए और इससे जुड़े अन्य बिसफेनॉल्स प्लास्टिक कंटेनर और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की अंदरूनी परत में इस्तेमाल किए जाते हैं. समय के साथ ये खाने में मिल सकते हैं. रिसर्च बताती है कि ये हार्मोन के सामान्य कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं और लंबे समय तक अधिक संपर्क स्वास्थ्य के लिए चिंता का कारण बन सकता है.

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फ्थैलेट्स

फ्थैलेट्स का इस्तेमाल प्लास्टिक को मुलायम और लचीला बनाने के लिए किया जाता है. ये फूड प्रोसेसिंग उपकरणों और कुछ प्लास्टिक पैकेजिंग के जरिए भोजन तक पहुंच सकते हैं. एक्सपर्ट के मुताबिक, ये हार्मोनल संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं और लंबे समय तक इनके संपर्क में रहना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जाता. 

क्या है इनका विकल्प

अगर इन केमिकल्स के संपर्क को कम करना चाहते हैं, तो प्लास्टिक की जगह कांच, स्टेनलेस स्टील या सिरेमिक के बर्तनों का इस्तेमाल करें. प्लास्टिक कंटेनर में खाना गर्म करने से बचें, क्योंकि गर्मी के कारण केमिकल्स तेजी से भोजन में मिल सकते हैं. इसके साथ ही, इस बात का ध्यान रखें कि जितना संभव हो ताजा और कम प्रोसेस्ड भोजन चुनें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दिनभर स्क्रीन देखने वालों के लिए 20-20-20 का वह नियम, जो चश्मे का नंबर बढ़ने से रोक देगा

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Screen Time Eye Care: आज के समय में मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर के बिना दिन की कल्पना करना मुश्किल है. ऑफिस का काम हो, ऑनलाइन पढ़ाई या फिर सोशल मीडिया, ज्यादातर लोगों की नजर घंटों तक स्क्रीन पर टिकी रहती है. इसका असर सबसे पहले आंखों पर पड़ता है. लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में जलन, सूखापन, धुंधला दिखाई देना, सिरदर्द और आंखों का थक जाना जैसी समस्याएं होने लगती हैं. ऐसे में आंखों को राहत देने के लिए विशेषज्ञ 20-20-20 नियम अपनाने की सलाह देते हैं. 

क्या है 20-20-20 नियम?

20-20-20 नियम बेहद आसान है. इसका मतलब है कि हर 20 मिनट तक स्क्रीन देखने के बाद 20 सेकंड का ब्रेक लें और लगभग 20 फीट दूर रखी किसी चीज को देखें. इसके लिए आपको दूरी बिल्कुल नापने की जरूरत नहीं है. आप खिड़की से बाहर किसी पेड़, इमारत या दूर मौजूद किसी भी वस्तु पर नजर टिकाकर अपनी आंखों को आराम दे सकते हैं. इससे आंखों की मांसपेशियों को लगातार एक ही दूरी पर फोकस करने से राहत मिलती है. कई लोग काम में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें ब्रेक लेने का ध्यान ही नहीं रहता. ऐसी स्थिति में मोबाइल या कंप्यूटर पर 20 मिनट का रिमाइंडर सेट किया जा सकता है. आज कई ऐसे ऐप भी उपलब्ध हैं जो समय-समय पर स्क्रीन से नजर हटाने की याद दिलाते हैं. 

क्या होती है दिक्कत?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट healthlineके अनुसार, लगातार स्क्रीन देखने पर हमारी पलकें सामान्य से काफी कम झपकती हैं. आमतौर पर एक व्यक्ति एक मिनट में करीब 15 बार पलकें झपकाता है, लेकिन स्क्रीन पर काम करते समय यह संख्या काफी कम हो सकती है. इसकी वजह से आंखों में सूखापन, जलन और थकान महसूस होने लगती है. इसी स्थिति को डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विजन सिंड्रोम भी कहा जाता है. 

क्या इससे फायदा होता है?

कुछ स्टडी में पाया गया है कि 20-20-20 नियम अपनाने से आंखों के सूखेपन और स्क्रीन की वजह से होने वाली असहजता में कमी आ सकती है. हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि इससे चश्मे का नंबर बढ़ना पूरी तरह रुक जाता है. एक्सपर्ट मानते हैं कि यह नियम आंखों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने और लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करने के दौरान आराम देने में मददगार हो सकता है.

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लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल किया जा सकता है

अगर आप रोजाना कई घंटे स्क्रीन पर काम करते हैं, तो कुछ और बातों का भी ध्यान रखें. कंप्यूटर स्क्रीन आंखों से लगभग एक हाथ की दूरी पर रखें और स्क्रीन का ऊपरी हिस्सा आंखों के स्तर से थोड़ा नीचे हो. बहुत तेज या बहुत कम रोशनी में काम करने से बचें और स्क्रीन की ब्राइटनेस आसपास की रोशनी के अनुसार रखें. समय-समय पर पलकें झपकाते रहें और जरूरत महसूस होने पर डॉक्टर की सलाह से लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल किया जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ब्रेन कैंसर के इलाज में नई उम्मीद, Vitamin B12 थैरेपी ने दिखाया कमाल

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Brain Cancer: वाशिंगटन डीसी से एक बड़ी खबर सामने आई है. ऑन्कोसाइंस नाम की एक साइंस पत्रिका में छपी नई स्टडी में ग्लियोब्लास्टोमा नाम के दिमाग के सबसे खतरनाक कैंसर के इलाज को लेकर एक नया तरीका खोजा गया है. यह कैंसर इतना जानलेवा है कि सर्जरी, रेडिएशन और कीमोथेरेपी के बावजूद मरीज आमतौर पर 1 महीने से ज्यादा जीवित नहीं रह पाते हैं. इसकी एक बड़ी वजह है ब्लड-ब्रेन बैरियर, यानी दिमाग के चारों तरफ मौजूद एक सुरक्षा दीवार, जो ज्यादातर दवाओं को दिमाग के अंदर ट्यूमर तक पहुंचने ही नहीं देती. इस रिसर्च की अगुवाई नाइट्रिक ऑक्साइड सर्विसेज कंपनी के जोसेफ ए. बावर और क्लीवलैंड क्लिनिक फाउंडेशन टॉसिग कैंसर सेंटर के वैज्ञानिकों ने मिलकर की है. 

विटामिन बी12 से बनी खास दवा

वैज्ञानिकों ने नाइट्रोसिलकोबालामिन नाम का एक कंपाउंड तैयार किया है, जिसे संक्षेप में एनओ-सीबीएल कहा जाता है. यह असल में विटामिन बी12 का ही एक बदला हुआ रूप है, जो शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड छोड़ता है. इस दवा को टेस्ट करने के लिए वैज्ञानिकों ने कई तरीके अपनाए, जैसे कैंसर सेल्स के एक बड़े पैनल पर इसका असर देखना, चूहों में ग्लियोब्लास्टोमा ट्यूमर पर इसकी जांच करना, और इंसानी कैंसर सेल्स पर इसे दूसरी दवाओं के साथ मिलाकर टेस्ट करना.  नतीजों में पाया गया कि यह दवा कई तरह के कैंसर पर असर दिखाती है, और दिमाग से जुड़े ट्यूमर पर भी इसका मध्यम असर देखा गया. सबसे बड़ी बात यह रही कि जानवरों पर हुए प्रयोग में यह दवा शरीर में देने के बाद सफलतापूर्वक ब्लड-ब्रेन बैरियर को पार करके सीधे ट्यूमर तक जा पहुंची. 

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ट्यूमर में टिककर करती है असर

रिसर्च में एक और खास बात सामने आई कि यह दवा ट्यूमर में जाकर लंबे समय तक टिकी रहती है. ट्यूमर के अंदर नाइट्रेट का स्तर इलाज के बाद कम से कम चौबीस घंटे तक ऊंचा बना रहा, जबकि शरीर के बाकी सामान्य हिस्सों में यह स्तर जल्दी घट गया. इससे पता चलता है कि यह दवा खासतौर पर ट्यूमर में ही रुककर सीधे वहीं नाइट्रिक ऑक्साइड छोड़ती है. इसके अलावा जब लैब में इस दवा को मौजूदा कैंसर इलाज जैसे ट्रेल और टेमोजोलोमाइड के साथ मिलाकर टेस्ट किया गया, तो कैंसर सेल्स की बढ़त पहले से कहीं ज्यादा रुक गई.

यानी यह दवा अकेले काम करने के साथ-साथ मौजूदा इलाज को भी ज्यादा असरदार बना सकती है, यहां तक कि उन ट्यूमर पर भी जो टेमोजोलोमाइड जैसी दवा के खिलाफ प्रतिरोधी हो चुके हैं. हालांकि यह नतीजे उम्मीद जगाने वाले जरूर हैं, लेकिन वैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि यह अभी एक शुरुआती पायलट स्टडी है और इसे असली इलाज में इस्तेमाल करने से पहले और गहरी रिसर्च की जरूरत होगी. 

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मलेरिया टेस्ट कब कराना चाहिए? एक्सपर्ट से जानिए सही समय और जांच के तरीके

मलेरिया टेस्ट कब कराना चाहिए? एक्सपर्ट से जानिए सही समय और जांच के तरीके


Malaria Test : बारिश का मौसम आते ही मच्छरों से होने वाली बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. इनमें मलेरिया सबसे गंभीर बीमारियों में से एक है. कई बार लोग तेज बुखार, ठंड लगना या शरीर दर्द जैसी शुरुआती परेशानियों को सामान्य वायरल बुखार समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. यही लापरवाही बीमारी को गंभीर बना सकती है. इसलिए समय रहते मलेरिया की जांच कराना और सही इलाज शुरू करना बेहद जरूरी होता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि मलेरिया टेस्ट कब कराना चाहिए. एक्सपर्ट के अनुसार सही समय और जांच के तरीके क्या है. 

मलेरिया टेस्ट कब कराना चाहिए?

एक्सपर्ट के अनुसार, मलेरिया के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य वायरल बुखार जैसे लगते हैं. यही वजह है कि कई लोग समय पर डॉक्टर के पास नहीं पहुंचते. आमतौर पर मरीजों को बुखार, ठंड लगना, सिर दर्द, शरीर में दर्द, बहुत ज्यादा थकान और कमजोरी महसूस होती है. कई लोग इन लक्षणों को सामान्य वायरल संक्रमण मान लेते हैं, जबकि यह मलेरिया भी हो सकता है.अगर किसी व्यक्ति में बुखार के साथ ठंड लगना या बहुत ज्यादा पसीना आना, बार-बार बुखार आना, ज्यादा थकान महसूस होना और मांसपेशियों में दर्द जैसे लक्षण दिखाई दें, तो उसे मलेरिया की जांच करानी चाहिए. इसके अलावा अगर कोई व्यक्ति ऐसे इलाके में रहता है या हाल ही में ऐसे स्थान की यात्रा करके आया है जहां मलेरिया के मामले ज्यादा आते हैं, तो उसे भी जांच कराने में देरी नहीं करनी चाहिए.

एक्सपर्ट के अनुसार सही समय क्या है?

अगर बुखार या अन्य लक्षण 24 से 48 घंटे के अंदर ठीक नहीं होते हैं, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए. मरीज को बुखार कम करने की दवा लेने के बाद भी अगर राहत नहीं मिल रही है तो मेडिकल जांच जरूरी हो जाती है. विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर लैब जांच कराने से मरीज का इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है. इससे मलेरिया की गंभीर जटिलताओं का खतरा कम होता है. साथ ही बिना जरूरत एंटीबायोटिक या मलेरिया की दवाएं लेने से भी बचा जा सकता है. 

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समय पर जांच क्यों है जरूरी?

विशेषज्ञ के अनुसार, प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम परजीवी से होने वाला मलेरिया काफी गंभीर हो सकता है. अगर इसकी पहचान और इलाज में देरी हो जाए, तो मरीज को कई गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. इनमें दिमाग पर असर पड़ना, किडनी को नुकसान, गंभीर एनीमिया, सांस लेने में दिक्कत और कई अंगों के एक साथ प्रभावित होने जैसी स्थितियां शामिल हैं.समय पर जांच होने से सही इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है, जिससे बीमारी के गंभीर रूप लेने का खतरा काफी कम हो जाता है.

एक्सपर्ट के अनुसार जांच के तरीके क्या है?

हर जगह माइक्रोस्कोपी की सुविधा उपलब्ध नहीं होती. ऐसे में डॉक्टर दूसरी जांचों की मदद लेते हैं. इनमें रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट (RDT) शामिल है. यह जांच कम समय में रिपोर्ट देने में मदद करती है. इसके अलावा क्वांटिटेटिव बफी कोट (QBC) टेस्ट कुछ विशेष मामलों में तेजी से जांच के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है. साथ ही पॉलीमरेज चेन रिएक्शन (PCR) टेस्ट जरूरत पड़ने पर ज्यादा सटीक और संवेदनशील जांच के लिए इस टेस्ट का यूज किया जाता है.

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सुबह सिर्फ 10 मिनट का ये योगा बदल देगा आपका दिन, एनर्जी, फोकस और फिटनेस तीनों में होगा फायदा 

सुबह सिर्फ 10 मिनट का ये योगा बदल देगा आपका दिन, एनर्जी, फोकस और फिटनेस तीनों में होगा फायदा 


Morning Yoga Routine: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में ज्यादातर लोगों के पास सुबह लंबा वर्कआउट करने का समय नहीं होता है. ऐसे में कई लोग बिना किसी फिजिकल एक्टिविटी के ही अपने दिन की शुरुआत कर देते हैं. लेकिन फिटनेस एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर आप रोजाना सिर्फ 10 मिनट योग के लिए निकल लें तो इससे शरीर को एक्टिव करने, दिमाग को शांत करने और पूरे दिन एनर्जी बनाए रखने में मदद मिल सकती है. यह छोटा सा मॉर्निंग योग रूटीन शरीर को धीरे-धीरे जगाता है और लंबे समय तक बैठे रहने की आदत से होने वाली जकड़न को भी कम करने में मदद करता है. 

सिर्फ 10 मिनट का योग होगा फायदेमंद 

भले ही10 मिनट का समय कम लगे, लेकिन इस दौरान किए गए योगासन शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाने, नर्वस सिस्टम को एक्टिव करने और मांसपेशियों की जकड़न दूर करने में मदद कर सकते हैं, खासकर वे लोग जो लंबे समय तक ऑफिस में बैठकर काम करते हैं. उनके लिए सुबह का यह छोटा योगा सेशन काफी उपयोगी हो सकता है. फिटनेस एक्सपर्ट्स का भी कहना है कि छोटे-छोटे वर्कआउट मांसपेशियों को एक्टिव रखने, शरीर की रोजाना कैलोरी खर्च करने की क्षमता बढ़ाने और इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार करने में मदद कर सकते हैं. हालांकि अगर किसी का टारगेट मसल्स बढ़ाना, शरीर की बनावट में बदलाव लाना है, तो इसके लिए लंबे सेशन और अलग तरह के ट्रेनिंग की जरूरत होती है. 

घर पर ऐसे करें 10 मिनट का योग फ्लो

  1. इस आसन योग रूटीन की शुरुआत डाउनवर्ड फेसिंग डॉग से आप कर सकते हैं. इसके लिए थ्री लेग्ड डॉग की मुद्रा में जाएं और फिर धीरे-धीरे रिवॉल्व्ड लो लंज में आए.
  2. इसके बाद दोनों पैरों की तरफ बारी-बारी से रिवॉल्व्ड को लंज विद पुश-पुल करें और हर तरफ करीब 30 सेकंड तक रुकें.
  3. फिर लो लंज या हाफ स्प्लिट करें और दोनों तरफ 30-30 सेकंड तक इसी मुद्रा में रहे.
  4. इसके बाद लिजर्ड पोज में जाएं और धीरे-धीरे अपने कूल्हों को दाएं बाएं मूव करें. इस मुद्रा को भी दोनों तरफ करीब 30 सेकंड तक करें.
  5. अब स्कंदासन करें और फिर ट्विस्टेड वाइड लेग्ड फॉरवर्ड फोल्ड की मुद्रा में जाएं. दोनों आसनों में हर तरफ लगभग 30 सेकंड तक रुकें.
  6. लास्ट में वाइड लेग्ड फॉरवर्ड फोल्ड, स्ट्रैडल और फॉलन ट्रायंगल की मुद्राओं से होते हुए, वापस डाउनवर्ड फेसिंग डॉग में आकर इस योग फ्लो को पूरा करें.
  7. योग करते समय जल्दबाजी न करें. हर आसान को धीरे-धीरे करें, गहरी और लंबी सांस लेते रहे और शरीर को उतना ही मोड़े या खींचे जितना आरामदायक महसूस हो. 

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रोजाना करने से मिल सकते हैं अच्छे रिजल्ट 

एक्सपर्ट के अनुसार इस योग में सबसे ज्यादा मायने इसका समय नहीं, बल्कि नियमितता रखती है. अगर कोई व्यक्ति रोज 10 मिनट भी योग करता है, तो लंबे समय तक कोई एक्सरसाइज न करने से कहीं बेहतर है. छोटी और आसान लाइफस्टाइल अपनाने से उसे नियमित बनाए रखने में भी आसान होता है.

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