पुरुषों का ‘साइलेंट किलर’ है बिना आहट आने वाला यह कैंसर, 50 की उम्र के बाद सबसे ज्यादा खतरा

पुरुषों का ‘साइलेंट किलर’ है बिना आहट आने वाला यह कैंसर, 50 की उम्र के बाद सबसे ज्यादा खतरा


Early Signs Of Prostate Cancer: प्रोस्टेट कैंसर पुरुषों में होने वाला एक ऐसा कैंसर है, जो प्रोस्टेट ग्रंथि में शुरू होता है. प्रोस्टेट एक छोटी-सी ग्रंथि होती है, जो स्पर्म बनाने में मदद करती है. इस बीमारी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआती दौर में इसके लक्षण अक्सर नजर नहीं आते. कई पुरुषों को शुरुआत में कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती, क्योंकि शुरुआती प्रोस्टेट कैंसर चुपचाप बढ़ता रहता है. कई बार यह बीमारी सालों तक धीरे-धीरे बढ़ती रहती है और तब जाकर सामने आती है, जब यह काफी आगे बढ़ चुकी होती है. यही वजह है कि यह कैंसर लोगों को बिना चेतावनी दिए पकड़ लेता है.

भारत में गंभीर समस्या

भारत में प्रोस्टेट कैंसर पुरुषों में होने वाले कैंसरों में तीसरे स्थान पर है. इससे पहले लंग्स और मुंह का कैंसर आता है. दुनियाभर में हर साल करीब 15 लाख नए मामले सामने आते हैं और बढ़ती उम्र के साथ इसके मामलों में लगातार इजाफा होने की आशंका है. इंडियन जर्नल ऑफ यूरोलॉजी में 2024 में आई एक स्टडी के मुताबिक, प्रोस्टेट कैंसर के मामले 50 साल की उम्र के बाद तेजी से बढ़ने लगते हैं और 64 साल के बाद इनमें और तेजी देखी जाती है. चिंता की बात यह है कि करीब 43 प्रतिशत मामलों में कैंसर का पता तब चलता है, जब वह शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल चुका होता है.

भारत में अवेयरनेस की कमी

इतनी आम बीमारी होने के बावजूद भारत में प्रोस्टेट कैंसर को लेकर जागरूकता काफी कम है. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि शुरुआती लक्षण बहुत सामान्य लगते हैं. रात में बार-बार यूरिन आना या यूरिन की धार कमजोर होना जैसी समस्याओं को ज्यादातर पुरुष बढ़ती उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं या इसे प्रोस्टेट बढ़ने की आम समस्या समझ लेते हैं. लक्षण इतने हल्के होते हैं कि लोग यह सोचते ही नहीं कि डॉक्टर को दिखाने की जरूरत है.

शुरुआत में नहीं दिखते हैं लक्षण

मायो क्लिनिक के मुताबिक, प्रोस्टेट कैंसर के शुरुआती चरण में अक्सर कोई लक्षण नहीं होते. हालांकि, कुछ संकेत ऐसे हो सकते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इनमें यूरिन में खून आना, जिससे यूरिन का रंग गुलाबी या लाल दिख सकता है, स्पर्म में खून आना, बार-बार यूरिन लगना, यूरिन शुरू करने में दिक्कत और रात में बार-बार यूरिन के लिए उठना शामिल है. अगर कैंसर आगे बढ़ जाए, तो यूरिन का रिसाव, पीठ या हड्डियों में दर्द, इरेक्शन में दिक्कत, अत्यधिक थकान, बिना वजह वजन कम होना और हाथ-पैरों में कमजोरी जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं.

कैसे होते हैं इसके लक्षण?

सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. अरुण कुमार गोयल ने TOI को बताया कि उम्र बढ़ने के साथ कई पुरुषों में बेनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया की समस्या हो जाती है. इसके लक्षणों में यूरिन की धार कमजोर होना, ब्लैडर पूरी तरह खाली न होना और रात में दो बार से ज्यादा यूरिन के लिए उठना शामिल है. बीपीएच के लक्षण आमतौर पर धीरे-धीरे बढ़ते हैं, जबकि प्रोस्टेट कैंसर में लक्षण तेजी से बढ़ सकते हैं और इसके साथ यूरिन या स्पर्म में खून, लगातार हड्डियों या पीठ में दर्द और अचानक वजन कम होना जैसे संकेत दिखाई दे सकते हैं.

डॉक्टरों के मुताबिक, आमतौर पर 50 साल की उम्र के बाद प्रोस्टेट कैंसर की नियमित जांच शुरू की जाती है. जिन पुरुषों के परिवार में पहले किसी को प्रोस्टेट कैंसर रहा हो, उन्हें 40 से 45 साल की उम्र से ही पीएसए टेस्ट और डिजिटल रेक्टल एग्जामिनेशन कराना चाहिए. समय पर जांच और लक्षणों को गंभीरता से लेने से प्रोस्टेट कैंसर को शुरुआती स्टेज में पकड़ा जा सकता है, जहां इलाज के सफल होने की संभावना काफी ज्यादा होती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दिनभर में कितना पसीना बहाना बेहद जरूरी, जानें किन बीमारियों से मिलती है राहत?

दिनभर में कितना पसीना बहाना बेहद जरूरी, जानें किन बीमारियों से मिलती है राहत?


Is Sweating Good For Health: पसीना आना शरीर की एक बेहद जरूरी प्रक्रिया है, जो शरीर के तापमान को नियंत्रित करने और सेहत बनाए रखने में मदद करती है. अक्सर ज्यादा पसीना आने पर लोग चिंता करने लगते हैं, लेकिन यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि सामान्य पसीना कितना होता है और कब यह सेहत का संकेत देता है. पसीना ग्लैंड्स से निकलने वाला नमक-युक्त तरल होता है, जो त्वचा से वाष्पित होकर शरीर को ठंडा करता है. कितना पसीना आएगा, यह कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे फिजिकल एक्टिविटी, मौसम, तनाव का स्तर और व्यक्ति की शारीरिक बनावट.  चलिए आपको बताते हैं कि इससे किन बीमारियों से राहत मिलती है. 

पसीना क्यों आता है?

पसीना आना, जिसे परसीपरेशन भी कहा जाता है, शरीर का तापमान संतुलित रखने का तरीका है. जब शरीर के अंदर या बाहर का तापमान बढ़ता है, तो ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम पसीना ग्लैंड्स  को सक्रिय करता है. ये ग्लैंड्स  त्वचा के जरिए तरल छोड़ती हैं और जब यह तरल सूखता है, तो शरीर ठंडा होने लगता है. नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश एक रिसर्च के अनुसार, पसीना आने की मात्रा हर व्यक्ति में अलग होती है और एक ही व्यक्ति में भी अलग-अलग दिनों में यह बदल सकती है. खासकर एंड्योरेंस ट्रेनिंग करने वाले एथलीट्स में एक्सरसाइज की तीव्रता, मौसम और शारीरिक स्थितियों के कारण दिनभर में निकलने वाले पसीने की मात्रा में काफी फर्क देखा गया है. इसी वजह से हाइड्रेशन और तरल पदार्थों की सही पूर्ति बेहद जरूरी मानी जाती है.

पसीने में ज्यादातर पानी होता है, जबकि करीब एक प्रतिशत हिस्सा नमक और फैट का होता है. गर्म मौसम या शारीरिक मेहनत के दौरान शरीर को ठंडा रखने के लिए यह प्रक्रिया बेहद जरूरी होती है. इसके अलावा चिंता, तनाव या घबराहट जैसी भावनाएं भी पसीना बढ़ा सकती हैं.

कितना पसीना सामान्य माना जाता है?

पसीने की सामान्य मात्रा हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकती है.आमतौर पर एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों में दिनभर में लगभग 0.5 से 2 लीटर तक पसीना निकाल सकता है. पसीना इन स्थितियों में ज्यादा आता है गर्मी या ज्यादा नमी वाले मौसम में, शारीरिक मेहनत या एक्सरसाइज के दौरान, मानसिक तनाव या घबराहट में, मसालेदार खाना, कैफीन या शराब लेने पर, और हार्मोनल बदलाव जैसे मेनोपॉज के समय. इसके अलावा मेटाबॉलिज्म, फिटनेस लेवल और जेनेटिक कारणों से भी पसीने की मात्रा प्रभावित होती है.

कब पसीना जरूरत से ज्यादा हो जाता है?

जरूरत से ज्यादा पसीना आना हाइपरहाइड्रोसिस कहलाता है. इसमें पसीना शरीर को ठंडा रखने की जरूरत से ज्यादा निकलता है. इसके लक्षणों में बिना मेहनत या गर्मी के पसीना आना, सिर्फ हथेलियों, पैरों या बगल जैसे हिस्सों में ज्यादा पसीना आना, रोजमर्रा के कामों में परेशानी और पसीने वाले हिस्सों में बार-बार स्किन इंफेक्शन शामिल हैं. हाइपरहाइड्रोसिस दो तरह का हो सकता है. प्राइमरी हाइपरहाइड्रोसिस में पसीना ग्रंथियां ज्यादा सक्रिय हो जाती हैं, जबकि सेकेंडरी हाइपरहाइड्रोसिस डायबिटीज, थायरॉइड, इंफेक्शन, मेनोपॉज या कुछ दवाओं के कारण हो सकता है.

कम पसीना आना भी हो सकता है खतरनाक?

पसीना कम आना या बिल्कुल न आना, जिसे हाइपोहाइड्रोसिस कहा जाता है, भी जोखिम भरा हो सकता है. जब शरीर पर्याप्त पसीना नहीं निकाल पाता, तो वह ठीक से ठंडा नहीं हो पाता, जिससे हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ जाता है. अगर गर्मी या एक्सरसाइज के बावजूद पसीना न आए, चक्कर, बेहोशी या गर्मी सहन न होने जैसी दिक्कतें हों, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ठंड के मौसम में कितनी कप चाय सेहतमंद, जानें कब होने लगता है सेहत को नुकसान?

ठंड के मौसम में कितनी कप चाय सेहतमंद, जानें कब होने लगता है सेहत को नुकसान?


How Many Cups Of Tea Are Healthy Per Day: सर्दियों के मौसम में गर्मागर्म चाय का एक कप शरीर और मन दोनों को सुकून देता है. चाय की गर्माहट जहां हाथों को राहत देती है, वहीं उससे उठती भाप पूरे माहौल को आरामदायक बना देती है. यही वजह है कि ठंड के दिनों में ज्यादातर लोग दिनभर में कई कप चाय पी लेते हैं और यह उनकी रोजमर्रा की आदत बन जाती है. सीमित मात्रा में चाय पीना आमतौर पर सेहत के लिए ठीक माना जाता है, लेकिन जरूरत से ज्यादा चाय पीने पर कुछ नुकसान भी हो सकते हैं. ज्यादा चाय पीने से बेचैनी, नींद न आना और सिरदर्द जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं, जिनका संबंध चाय में मौजूद कैफीन और टैनिन से होता है. ऐसे में सवाल आता है कि ठंड के मौसम आता है कि ठंड के मौसम में कितना चाय पीना चाहिए. 

चाय के फायदे और नुकसान दोनों

सही मात्रा में चाय पी जाए तो इसके कई फायदे भी होते हैं. कुछ रिसर्च बताते हैं कि रेगुलर चाय पीने से हार्ट की बीमारी, स्ट्रोक और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कम हो सकता है, हालांकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह की चाय और कितनी मात्रा में पी रहे हैं. चाय में मौजूद फ्लेवोनॉयड्स और कैटेचिन्स जैसे एंटीऑक्सीडेंट शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में मदद करते हैं और कुछ तरह के कैंसर के खतरे को घटाने में भी मददगार माने जाते हैं. चाय में मौजूद कैफीन और एल-थिएनिन का कम्बिनेशन दिमाग को शांत रखते हुए फोकस बढ़ाने में मदद करता है, जिससे कॉफी जैसी घबराहट महसूस नहीं होती. वहीं, अदरक या पुदीना जैसी हर्बल चाय पाचन को बेहतर करने और शरीर की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद कर सकती है. सर्दी और फ्लू के मौसम में चाय इम्युनिटी को सपोर्ट करने का भी काम करती है.

हालांकि, जरूरत से ज्यादा चाय पीने के कुछ नुकसान भी हैं. खासतौर पर कैफीन वाली चाय अधिक मात्रा में लेने से सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है. चाय में मौजूद टैनिन आयरन के एब्जॉर्ब में बाधा डाल सकते हैं, जिससे एनीमिया से जूझ रहे लोगों या शाकाहारी डाइट लेने वालों को दिक्कत हो सकती है. अगर दिनभर में कैफीन की मात्रा 400 मिलीग्राम से ज्यादा हो जाए, तो नींद से जुड़ी समस्याएं, बेचैनी और दिल की धड़कन तेज होने जैसी शिकायतें हो सकती हैं. खाली पेट तेज चाय पीने से मतली, एसिडिटी या चक्कर आने की समस्या भी हो सकती है. इसके अलावा, लंबे समय तक ज्यादा चाय पीने से दांतों पर दाग पड़ सकते हैं और कैफीन की आदत भी लग सकती है.

एक दिन में कितनी चाय पीनी सही?

अब सवाल यह है कि कितनी चाय ज्यादा मानी जाती है. आमतौर पर दिन में 3 से 4 कप चाय पीना ज्यादातर लोगों के लिए सुरक्षित माना जाता है. हालांकि, जो लोग कैफीन के प्रति ज्यादा सेंसिटिव हैं या किसी खास स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं, उन्हें चाय की मात्रा कम करनी चाहिए. प्रेग्नेंट महिलाओं को भी खास ध्यान रखने की जरूरत होती है और उन्हें दिन में 2 कप से ज्यादा चाय नहीं पीनी चाहिए, ताकि कैफीन की मात्रा सुरक्षित सीमा में रहे.

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बाजार में मौजूद इन 167 दवाओं की क्वालिटी एकदम घटिया, ये 7 नकली दवाएं भी बेच रहे केमिस्ट

बाजार में मौजूद इन 167 दवाओं की क्वालिटी एकदम घटिया, ये 7 नकली दवाएं भी बेच रहे केमिस्ट


बीमारी ठीक करने के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाओं को लेकर एक अहम रिपोर्ट सामने आई है. यह खुलासा देश में दवाओं की क्वालिटी चेक करने वाली संस्था केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन यानी CDSCO की दिसंबर 2025 की रिपोर्ट में हुआ है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, बाजार में 167 दवाओं की क्वालिटी एकदम घटिया मिली, जबकि 7 दवाएं तो नकली मिलीं. आइए जानते हैं पूरा मामला.

यह है पूरा मामला

सीडीएससीओ के मुताबिक, जांच में कुल 167 दवाओं के सैंपल ‘नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी’ (NSQ) पाए गए. इनमें 74 सैंपल केंद्रीय दवा प्रयोगशालाओं में फेल हुए, जबकि 93 सैंपल राज्य स्तरीय लैब में जांच के दौरान मानकों पर खरे नहीं उतरे. इसका मतलब यह है कि ये दवाएं तय गुणवत्ता पर खरी नहीं उतरीं और शुद्धता या तय मानकों में कमी पाई गई. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि दिसंबर महीने में अलग-अलग राज्यों से 7 दवाइयों के सैंपल ‘स्प्यूरियस’ यानी नकली पाए गए.

किन राज्यों में मिलीं फर्जी दवाएं?

ये फर्जी दवाएं नॉर्थ जोन (गाजियाबाद) ,FDA अहमदाबाद, बिहार  और महाराष्ट्र से मिली हैं. जांच में सामने आया कि इन्हें बिना अनुमति वाली कंपनियों ने किसी और कंपनी के नाम पर तैयार किया था. इस पूरे मामले की जांच जारी है और कानून के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी.

अब इन दवाओं का क्या होगा?

सरकार ने साफ किया है कि जो दवाएं फेल हुई हैं, वे सिर्फ उसी बैच तक सीमित हैं. पूरे ब्रांड या बाजार की सभी दवाओं पर इसका असर नहीं है. इसके बावजूद मरीजों की सुरक्षा के लिए इन दवाओं को बाजार से हटाया जा रहा है. CDSCO और राज्य सरकारें मिलकर हर महीने दवाओं की गुणवत्ता की जांच कर रही है, जिससे घटिया, नकली और मिलावटी दवाएं बाजार से बाहर की जा सकें. साथ ही, आम जनता को सुरक्षित इलाज मिल सके.

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कड़ाके की सर्दी के बाद अचानक हो गई गर्मी, यह किन लोगों के लिए खतरनाक?

कड़ाके की सर्दी के बाद अचानक हो गई गर्मी, यह किन लोगों के लिए खतरनाक?


 How Weather Change Affects Health: उत्तर भारत में इस समय मौसम ने करवट बदली है. राजधानी दिल्ली समेत कई राज्यों में कड़ाके की ठंड के बाद अब दिन में धूप निकलने के साथ मौसम में गर्माहट का अनुभव होने लगा है. दोपहर में गर्मी और शाम होते ही ठंडक बढ़ने से तापमान में बार-बार बदलाव देखने को मिल रहा है. दिल्ली में 6 साल बाद 21 जनवरी को जनवरी महीने का सबसे गर्म दिन दर्ज किया गया है. डॉक्टरों का कहना है कि मौसम का यह उतार-चढ़ाव लोगों की सेहत पर असर डाल सकता है.

शरीर पर पड़ेगा असर

मौसम में बदलाव के साथ शरीर को खुद को एडजस्ट करना पड़ता है. इस दौरान कई लोगों का शरीर इस तरह के बदलाव को पूरी तरह झेल नहीं पाता है. इसके चलते उन्हें तरह-तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. अगर पहले से ही सावधानी बरती जाए, तो इस दौरान होने वाली परेशानियों जैसे वायरल इंफेक्शन, बैक्टीरियल इंफेक्शन, एलर्जी और डिहाइड्रेशन समेत कई अन्य समस्याओं से बचा जा सकता है.

किन बीमारियों का रहता है खतरा

संजीवनी हॉस्पिटल, दरभंगा के निदेशक डॉक्टर संतोष कुमार बताते हैं कि “मौसम में बदलाव के साथ ही कई तरह की दिक्कतें सामने आने लगती हैं, जैसे वायरल फीवर और फ्लू के मामलों में अचानक बढ़ोतरी. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मौसम बदलने के दौरान हमारी इम्युनिटी प्रभावित होती है और कमजोर हो जाती है. इससे वायरस का हमला तेज हो जाता है. इस दौरान कुछ लोगों को सिरदर्द, थकान, बदन दर्द, बुखार और गले में परेशानी का सामना करना पड़ता है. इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित बच्चे और बुजुर्ग होते हैं. इस सीजन में बैक्टीरिया का खतरा भी ज्यादा रहता है, जिसके चलते कई तरह के इंफेक्शन के मामले बढ़ जाते हैं.”

तापमान बढ़ने के साथ बढ़ने लगती है दिक्कत

तापमान में बढ़ोतरी के साथ एलर्जी और सांस से जुड़ी दिक्कतों का खतरा बढ़ने लगता है. ऐसा इसलिए क्योंकि सिर्फ मौसम में बदलाव ही नहीं होता, बल्कि इसके साथ धूल, धुआं और प्रदूषण बढ़ाने वाले तत्व भी हवा में सक्रिय हो जाते हैं, जो इन समस्याओं को ट्रिगर करते हैं. इस दौरान लोगों में सांस लेने में दिक्कत, नाक बहना, लगातार छींक आना, एलर्जिक राइनाइटिस और अस्थमा जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं.

बदलते मौसम में कैसे रखें सेहत का ध्यान

डॉक्टर बताते हैं कि लाइफस्टाइल में कुछ बदलाव करके इस मौसम में खुद को सुरक्षित रखा जा सकता है. इसके लिए-

  • पर्याप्त पानी पिएं और गले में परेशानी हो तो गुनगुने तरल लें
  • ताजा और पौष्टिक भोजन करें
  • कपड़ों की लेयरिंग करें ताकि तापमान के अनुसार खुद को ढाल सकें
  • पसीना आने के बाद ठंडी हवा के सीधे संपर्क से बचें
  • बुखार या खांसी कुछ दिनों में ठीक न हो तो डॉक्टर से सलाह लें

डॉक्टरों का कहना है कि इन छोटी-छोटी सावधानियों से बदलते मौसम में बीमारियों से बचा जा सकता है और इम्युनिटी मजबूत रखी जा सकती है.

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क्या आप भी खा रहे केमिकल वाला शकरकंद? तुरंत छोड़ दें, वरना हो जाएगा कैंसर!

क्या आप भी खा रहे केमिकल वाला शकरकंद? तुरंत छोड़ दें, वरना हो जाएगा कैंसर!


Are Chemical-Treated Sweet Potatoes Harmful: शकरकंद एक ऐसा कंद है, जिसे नाश्ते से लेकर डिनर तक किसी भी वक्त खाया जा सकता है. बीते कुछ सालों में यह न्यूट्रिशनिस्ट और डाइटीशियन के बीच काफी लोकप्रिय हुआ है और आम आलू के मुकाबले इसे ज्यादा हेल्दी विकल्प माना जाने लगा है. यही वजह है कि बाजार में शकरकंद की मांग तेजी से बढ़ी है. हालांकि, बढ़ती डिमांड के साथ इसकी मिलावट भी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आई है.

फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया के मुताबिक, बाजार में बिकने वाले कई शकरकंदों में रोडामाइन बी नामक केमिकल डाई की मिलावट पाई जाती है. यह एक सिंथेटिक रंग है, जिसका इस्तेमाल कपड़ा, कागज, स्याही और लैब से जुड़े कामों में किया जाता है. यह केमिकल खाने योग्य नहीं है और इंसानी सेहत के लिए खतरनाक माना जाता है. एफएसएसएआई  के अनुसार,  रोडामाइन बी का उपयोग खाने की चीजों के प्रोसेसिंग, स्टोरेज या वितरण में पूरी तरह प्रतिबंधित है, क्योंकि यह कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों और अंगों को नुकसान पहुंचाने का कारण बन सकता है.

घर पर ऐसे करें शकरकंद की शुद्धता की जांच

एफएसएसएआई  ने शकरकंद की मिलावट पहचानने के लिए एक आसान घरेलू तरीका बताया है. इसके लिए चार आसान स्टेप्स फॉलो किए जा सकते हैं. इसमें सबसे पहले आप एक कॉटन बॉल लें और उसे पानी या किसी वेजिटेबल ऑयल में भिगो लें. उसके बाद शकरकंद लें और उसकी बाहरी सतह को कॉटन बॉल से रगड़ें. अगर शकरकंद शुद्ध है, तो कॉटन बॉल का रंग नहीं बदलेगा. लेकिन अगर कॉटन बॉल का रंग लाल या बैंगनी हो जाए, तो समझ लें कि शकरकंद में मिलावट है.

शकरकंद खाने के फायदे

पोषण के लिहाज से शकरकंद को बेहद फायदेमंद माना जाता है. इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन A पाया जाता है. कई स्टडीज के मुताबिक, शकरकंद में एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे एंथोसाइनिन और कैरोटेनॉयड्स होते हैं, जो शरीर में फ्री रेडिकल्स को खत्म करने में मदद करते हैं. इससे ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कम होता है और कैंसर, दिल की बीमारियों और डायबिटीज जैसी क्रॉनिक बीमारियों का खतरा घट सकता है. खासकर बैंगनी रंग के शकरकंद ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में मददगार माने जाते हैं. उबालकर खाने पर इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम रहता है, जिससे यह ब्लड शुगर कंट्रोल के लिए बेहतर कार्बोहाइड्रेट विकल्प बन जाते हैं.

इसके अलावा, शकरकंद डायटरी फाइबर से भरपूर होते हैं, जो पाचन को दुरुस्त रखते हैं और आंतों में अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ावा देते हैं. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इसमें मौजूद कुछ फाइबर प्रीबायोटिक की तरह काम करते हैं, जिससे कब्ज की समस्या कम होती है और लंबे समय तक गट हेल्थ बेहतर बनी रहती है.

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