प्यास लगने का इंतजार करना पड़ सकता है भारी! शरीर दे रहा है ये ‘खामोश’ संकेत

प्यास लगने का इंतजार करना पड़ सकता है भारी! शरीर दे रहा है ये ‘खामोश’ संकेत


What Are The Early Signs Of Dehydration: पानी कितना पीना है, कितनी बार पीना है और कब नहीं पानी है, इसको लेकर उतनी चर्चा नहीं होती, लेकिन यही शरीर की हर सेल्स को जीवित रखता है. एक एडल्ट शरीर का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा पानी से बना होता है. थोड़ी-सी भी पानी की कमी मूड, याददाश्त, स्किन और डाइजेशन पर असर डाल सकती है. मुश्किल यह है कि प्यास हमेशा शुरुआती चेतावनी नहीं होती. जब तक मुंह सूखने लगे, तब तक शरीर पहले ही पानी की कमी झेल रहा होता है. चलिए आपको बताते हैं कि कब आपको पानी पीना चाहिए.

क्यों पानी पीना हमारे लिए जरूरी?

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, पर्याप्त पानी शरीर के तापमान, ब्लड फ्लो और अंगों के सही कामकाज के लिए जरूरी है. खासकर गर्म मौसम, बीमारी या अधिक फिजिकल एक्टिविटी के दौरान डिहाइड्रेशन तेजी से हो सकता है. यह हमेशा गंभीर लक्षणों के साथ नहीं आता, बल्कि रोजमर्रा की छोटी असुविधाओं के रूप में सामने आता है.

क्या होते हैं पानी की कमी के संकेत?

लगातार थकान, जो पूरी नींद के बाद भी दूर न हो, पानी की कमी का संकेत हो सकती है। शरीर में तरल कम होने पर रक्त की मात्रा घटती है, जिससे दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। इससे एकाग्रता भी प्रभावित हो सकती है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की रिपोर्ट के अनुसार, धीरे-धीरे बढ़ने वाला हल्का सिरदर्द भी डिहाइड्रेशन का शुरुआती संकेत है. पानी की कमी से ब्रेन के टिश्यू में अस्थायी सिकुड़न आ सकती है, जिससे दबाव बदलता है और दर्द महसूस होता है. त्वचा का बेजान और कसा हुआ महसूस होना भी संकेत हो सकता है. चेहरा धोने के बाद त्वचा में खिंचाव या महीन रेखाएं ज्यादा दिखना इस ओर इशारा करता है. हाथ की त्वचा को हल्के से खींचकर देखें, अगर वह सामान्य स्थिति में लौटने में समय लेती है, तो शरीर में पानी की कमी हो सकती है.

यूरिन से भी मिलता है संकेत

यूरिन का रंग भी बहुत कुछ बताता है. यूएस की हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, हल्का पीला रंग सामान्य माना जाता है, लेकिन गहरा पीला या तेज गंध वाला यूरिन तरल की कमी का संकेत है. इसी तरह कब्ज या पाचन धीमा पड़ना भी पर्याप्त पानी न मिलने से जुड़ा हो सकता है, क्योंकि आंतें मल से पानी ऑब्जर्वेशन करती हैं. अचानक मीठा खाने की इच्छा भी कभी-कभी डिहाइड्रेशन से जुड़ी होती है. शरीर एनर्जी के लिए ग्लूकोज छोड़ने में पानी का उपयोग करता है, और कमी होने पर थकान बढ़ सकती है. मांसपेशियों में ऐंठन या अचानक चक्कर आना भी इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन का संकेत हो सकता है.

ज्यादातर एक्सपर्ट वयस्कों के लिए दिन में 2 से 3 लीटर तरल लेने की सलाह देते हैं, हालांकि जरूरत उम्र, मौसम और एक्टिविटी पर निर्भर करती है कि आपको कितना पानी पीना चाहिए. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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30 के बाद गायब हो रही हैं आपकी मांसपेशियां, जानें क्या है ‘सारकोपेनिया’ और कैसे इसे रोकें?

30 के बाद गायब हो रही हैं आपकी मांसपेशियां, जानें क्या है ‘सारकोपेनिया’ और कैसे इसे रोकें?


How To Build Muscle Naturally After 35: उम्र बढ़ने के साथ लोगों को होने वाली मांसपेशियों की कमी के बारे में पता है.  गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ सेठी ने भी हाल ही में सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर चर्चा की. उन्होंने 2023 में लैंसेट पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि 30 की उम्र के बाद हर साल लगभग 1 प्रतिशत मांसपेशियां चुपचाप कम होने लगती हैं. इस स्थिति को सारकोपेनिया कहा जाता है, जिसमें उम्र के साथ स्केलेटल मसल की ताकत, आकार और काम करने की क्षमता धीरे-धीरे घटती जाती है. 

कब शुरू होती है यह स्थिति?

स्टडी के अनुसार, सारकोपेनिया की शुरुआत आमतौर पर 30 वर्ष के आसपास होती है और 60 के बाद यह तेजी से बढ़ सकती है. इसका असर केवल शरीर की बनावट पर नहीं, बल्कि रोजमर्रा के काम करने की क्षमता, संतुलन और हड्डियों की मजबूती पर भी पड़ता है. गिरने और फ्रैक्चर का खतरा भी बढ़ सकता है. लोगों को तमाम तरह के दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. 

डॉ. सेठी के मुताबिक, मांसपेशियों का कम होना कई हेल्थ समस्याओं से जुड़ा है. इसमें मेटाबॉलिज्म का धीमा होना, शरीर में अधिक चर्बी जमा होना, इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ना, फैटी लिवर का खतरा और हड्डियों व पोश्चर का कमजोर होना शामिल है. वे बताते हैं कि मांसपेशियां शरीर की सबसे बड़ी ग्लूकोज स्पंज की तरह काम करती हैं, जो खून से शुगर सोखकर उसे संतुलित रखने में मदद करती हैं. इसलिए मसल लॉस का मतलब ब्लड शुगर असंतुलन से भी हो सकता है.

 

 

महिलाओं में क्या होती है दिक्कत?

उन्होंने 2009 के The Lancet में प्रकाशित Tabák AG और दोस्तों के रिसर्च का जिक्र करते हुए बताया कि महिलाओं में 35 से 40 की उम्र के बीच मांसपेशियों की कमी तेज हो सकती है. एस्ट्रोजन के स्तर में गिरावट के साथ मसल ब्रेकडाउन बढ़ता है, यही वजह है कि पेरिमेनोपॉज के दौरान कई महिलाओं को बिना वजन बदले भी कमजोरी महसूस होती है. सारकोपेनिया के शुरुआती संकेत अक्सर हल्के होते हैं कि सीढ़ियां चढ़ते समय जल्दी थक जाना, वजन समान रहने के बावजूद मसल टोन कम होना या सामान्य से ज्यादा थकान महसूस होना. ये बदलाव धीरे-धीरे आते हैं, इसलिए लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं.

कैसे इससे निपटा जा सकता है?

अगर इससे निपटने की बात करें, तो की बात करें तो शोध बताते हैं कि रेजिस्टेंस ट्रेनिंग मांसपेशियों की ताकत और इंसुलिन सेंसिटिविटी दोनों को बेहतर कर सकती है, यहां तक कि 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में भी. इसके अलावा रोजाना 1.2 से 1.6 ग्राम प्रति किलोग्राम प्रोटीन का सेवन, रेगुलर या तेज चाल से चलना, पर्याप्त नींद और पर्याप्त विटामिन D लेवल बनाए रखना मसल हेल्थ के लिए जरूरी है.

इसे भी पढ़ें- Late Night Snack For Diabetics: रात की भूख और ब्लड शुगर का बैलेंस, केफिर क्यों है डायबिटीज मरीजों के लिए बेस्ट स्नैक?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कितने दिन में बदल देना चाहिए अपना तौलिया, क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

कितने दिन में बदल देना चाहिए अपना तौलिया, क्या कहते हैं एक्सपर्ट?


How Often Should You Change Your Bath Towel: हममें से ज्यादातर लोग घर के लिनेन जैसे चादर, तकिए के कवर या तौलिये उतनी बार नहीं धोते जितनी बार एक्सपर्ट सलाह देते हैं. अक्सर हम सोच लेते हैं, अभी तो साफ ही है, एक-दो दिन और चल जाएगा. लेकिन खासकर तौलिये के मामले में यह आदत स्वच्छता के लिहाज से सही नहीं है. रिसर्च बताती है कि तौलिये को हमारी सोच से कहीं ज्यादा नियमित रूप से धोना चाहिए. चलिए आपको बताते हैं कि कितने दिनों में तौलिये को बदल  लेना चाहिए. 

क्या होती है इससे दिक्कत?

Towelsupercenter की रिपोर्ट के अनुसार, कई लोग मानते हैं कि नहाने या हाथ धोने के बाद शरीर तो साफ होता है, इसलिए तौलिया भी साफ ही रहता होगा. हकीकत थोड़ी अलग है. जब आप भीगे शरीर या हाथ तौलिये से पोंछते हैं, तो नमी, मृत त्वचा सेल्स, तेल और गंदगी उसके रेशों में चली जाती हैं. तौलिया पानी सोख तो लेता है, लेकिन सूखने में घंटों लग जाते हैं. यह गीला माहौल बैक्टीरिया, फंगस और यीस्ट जैसे सूक्ष्म जीवों के पनपने के लिए बिल्कुल अनुकूल होता है. ये आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन समय के साथ इनकी संख्या बढ़ सकती है और त्वचा इंफेक्शन, मुंहासे या एथलीट फुट जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ा सकती है.

कब धो लेना चाहिए तौलिया?

अच्छी बात यह है कि हर इस्तेमाल के बाद तौलिया धोना जरूरी नहीं होता. एक्सपर्ट के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में नहाने वाला तौलिया लगभग 3 से 4 बार इस्तेमाल के बाद धो देना चाहिए. हैंड टॉवल को इससे ज्यादा बार धोना चाहिए, क्योंकि दिनभर में हाथ कई बार पोंछे जाते हैं. लेकिन कुछ स्थितियों में तौलिया एक बार इस्तेमाल के बाद ही धो देना बेहतर है जैसे घर में कोई बीमार हो, जिम में इस्तेमाल किया गया तौलिया हो, तौलिये पर शरीर के तरल पदार्थ लगे हों, या व्यक्ति की त्वचा बहुत संवेदनशील हो.

तौलिया जिस जगह रखा जाता है, वह भी अहम है. अगर बाथरूम नम और हवादार नहीं है और तौलिया ठीक से सूख नहीं पाता, तो उसे जल्दी धोना चाहिए सामग्री भी फर्क डालती है. माइक्रोफाइबर जल्दी सूख जाता है, जबकि कॉटन तौलिया ज्यादा नमी रोकता है और उसे नियमित धुलाई की जरूरत होती है. बांस से बने तौलिये एंटीबैक्टीरियल माने जाते हैं, लेकिन इन्हें भी समय-समय पर धोना जरूरी है.

कितने दिनों में बदल लेना चाहिए?

एक्सपर्ट Jenniferadams के अनुसार, आम तौर पर सलाह दी जाती है कि बाथ टॉवल को हर दो से तीन साल में बदल देना चाहिए. अधिकतम पांच साल तक ही इन्हें इस्तेमाल करना ठीक माना जाता है. लगातार धुलाई और सामान्य इस्तेमाल के कारण तौलिये की पानी सोखने की क्षमता कम होने लगती है. साथ ही वे पहले जैसे मुलायम भी नहीं रहते. अगर आप चाहते हैं कि आपके तौलिये लंबे समय तक अच्छे बने रहें, तो फैब्रिक सॉफ्टनर का इस्तेमाल कम करें. सॉफ्टनर की परत कपड़े पर जम जाती है, जिससे उसकी एब्जॉर्बेंसी घट सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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रात की भूख और ब्लड शुगर का बैलेंस, केफिर क्यों है डायबिटीज मरीजों के लिए बेस्ट स्नैक?

रात की भूख और ब्लड शुगर का बैलेंस, केफिर क्यों है डायबिटीज मरीजों के लिए बेस्ट स्नैक?


Best Late Night Snacks For Blood Sugar Control: रात को बिस्तर पर लेटे-लेटे अचानक भूख लग जाए, तो मन में सवाल उठता है कि क्या इस वक्त कुछ खाना ठीक रहेगा, खासकर अगर आप डायबिटीज की दिक्कत से जूझ रहे हो. देर रात स्नैकिंग थोड़ा पेचीदा हो सकता है. कई आम विकल्प रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट या ज्यादा सोडियम से भरपूर होते हैं, जो ब्लड शुगर बढ़ा सकते हैं या उस समय मेटाबॉलिक संतुलन बिगाड़ सकते हैं जब शरीर आराम करने की कोशिश कर रहा होता है. चलिए आपको बताते हैं कि आपके पास क्या विकल्प हैं. 

आपको क्या करना चाहिए?

डायटीशियन मानते हैं कि रात में पूरी तरह भूखे रहना समाधान नहीं है. असली मकसद है ऐसा विकल्प चुनना जो पेट भरे, न्यूट्रिशन दे और ग्लूकोज लेवल अचानक न बढ़ाए. न्यूट्रिशन एक्सपर्ट के अनुसार, केफिर इस भूमिका को अच्छी तरह निभा सकता है. केफिर फर्मेंटेड डेयरी ड्रिंक है, जिसका स्वाद हल्का खट्टा और बनावट स्मूद, मिल्कशेक जैसी होती है.

डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए इसकी खासियत इसका पोषण प्रोफाइल है. इसमें प्रोबायोटिक्स, प्रोटीन, मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे न्यूट्रिशन तत्व होते हैं, जो ब्लड शुगर कंट्रोल, हार्ट हेल्थ और मेटाबॉलिक संतुलन में सहायक माने जाते हैं. प्लेन केफिर में अतिरिक्त चीनी कम होती है और सोडियम भी अपेक्षाकृत कम रहता है, इसलिए यह देर रात के स्नैक के रूप में  सुरक्षित विकल्प बन सकता है.

केफिर का सबसे बड़ा फायदा इसमें मौजूद प्रोबायोटिक्स हैं. ये आंतों के माइक्रोबायोम को संतुलित रखने में मदद करते हैं. Tandfonline जर्नल में पब्लिश एक स्टडी के अनुसार यह हेल्दी गट हेल्थ बेहतर इंसुलिन सेंसिटिविटी और ब्लड शुगर कंट्रोल से जुड़ी हो सकती है. कुछ स्टडीज के अनुसार, केफिर में मौजूद खास प्रोबायोटिक स्ट्रेन्स कोलेस्ट्रॉल मेटाबॉलिज्म पर सकारात्मक असर डाल सकते हैं और सूजन घटाने में मदद कर सकते हैं. डायबिटीज से पीड़ित लोगों में हृदय रोग का खतरा ज्यादा होता है, इसलिए यह पहलू अहम है.

रेगुलर सेवन करने से क्या पड़ता है फर्क?

मेटाबॉलिक सिंड्रोम से जुड़े Sciencedirect जर्नल में पब्लिश एक स्टडी में पाया गया कि नियमित केफिर सेवन से फास्टिंग ब्लड शुगर और एलडीएल में कमी आई, जबकि एचडीएल  बढ़ा. केफिर में मौजूद पोटैशियम रक्त वाहिकाओं को रिलैक्स करने और हृदय को सपोर्ट करने में मदद करता है, वहीं मैग्नीशियम इंसुलिन क्रिया और मांसपेशियों के आराम में सहायक होता है. इसका प्रोटीन पाचन को धीमा करता है, जिससे रातभर ब्लड शुगर में अचानक गिरावट या उछाल की संभावना कम हो सकती है.

खरीदते समय प्लेन और बिना शक्कर वाला केफिर चुनना बेहतर है, क्योंकि फ्लेवर्ड विकल्पों में अतिरिक्त चीनी हो सकती है। चाहें तो इसमें थोड़े से बेरीज, दालचीनी या एक चम्मच नट बटर मिलाकर स्वाद और न्यूट्रिशन बढ़ाया जा सकता है. सही चुनाव के साथ, केफिर देर रात की भूख को संतुलित तरीके से शांत करने में मददगार हो सकता है.

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क्या घर का माहौल बिगाड़ रहा है बच्चे का रिपोर्ट कार्ड? रिसर्च में सामने आया बड़ा कनेक्शन

क्या घर का माहौल बिगाड़ रहा है बच्चे का रिपोर्ट कार्ड? रिसर्च में सामने आया बड़ा कनेक्शन


Does Poor Housing Affect A Child’s School Performance: अक्सर हम बच्चों की रिपोर्ट कार्ड को उनकी मेहनत, ध्यान और बुद्धिमत्ता से जोड़कर देखते हैं. लेकिन हालिया रिसर्च बताते हैं कि बच्चों की शैक्षणिक सफलता सिर्फ कक्षा में उनके प्रदर्शन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उनके घर का माहौल भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है। रहने की खराब परिस्थितियां, जैसे घर में भीड़भाड़, सीलन या ठीक से हीटिंग की व्यवस्था न होना बच्चों की सेहत के साथ-साथ उनकी पढ़ाई पर भी असर डालती हैं.

क्या कहती है रिसर्च?

जर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी एंड कम्युनिटी हेल्थ में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, खराब गुणवत्ता वाले घरों में रहने वाले बच्चे स्कूल से ज्यादा अनुपस्थित रहते हैं और अंग्रेजी व गणित जैसे अहम विषयों में कम अंक हासिल करते हैं. रिसर्चर ने पाया कि इंग्लैंड में जो बच्चे खराब क्वालिटी वाले घरों में रहते हैं, वे औसतन 15 दिन ज्यादा स्कूल मिस करते हैं. इतना ही नहीं, ऐसे बच्चों के टेस्ट स्कोर भी बेहतर घरों में रहने वाले साथियों की तुलना में कम पाए गए. 

किन बच्चों को किया गया था शामिल?

इस स्टडी के लिए 2000 से 2002 के बीच जन्मे 8,992 बच्चों के आंकड़ों का एनालिसिस किया गया. सात साल की उम्र में उनके घर की क्वालिटी को छह मानकों पर परखा गया, इसमें घर का प्रकार, मंजिल, बगीचे की उपलब्धता, सीलन की मौजूदगी, पर्याप्त हीटिंग और भीड़भाड़. आंकड़ों से पता चला कि करीब 16 प्रतिशत बच्चे ऐसे घरों में रहते थे जो इन छह में से कम से कम दो मानकों पर खरे नहीं उतरते थे. इन बच्चों ने अनिवार्य स्कूली शिक्षा कक्षा 1 से 11 के दौरान हर साल औसतन 1.5 दिन ज्यादा अनुपस्थिति दर्ज की. सीलन, भीड़भाड़ और फ्लैट में रहने की स्थिति अनुपस्थिति से सबसे ज्यादा जुड़ी पाई गई. ग्रेड के स्तर पर भी फर्क दिखा कि खराब घरों में रहने वाले बच्चों के अंग्रेजी और गणित के अंक 2 से 5 प्रतिशत तक कम थे.

रिसर्चर का क्या कहना है?

शोधकर्ताओं का कहना है कि भीड़भाड़ वाले घरों में शोर, पढ़ाई के लिए जगह की कमी, नींद में बाधा और अतिरिक्त जिम्मेदारियां जैसे छोटे भाई-बहनों की देखभाल बच्चों की कंसंट्रेशन पर असर डालती हैं. वहीं, सीलन और ठंडे घर स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ाते हैं, जिससे स्कूल छूटता है.  रिपोर्ट यह भी बताती है कि अगर घरों की क्वाविटी सुधारी जाए, तो सीलन कम की जाए, भीड़भाड़ घटाई जाए और हीटिंग व ऊर्जा बेहतर की जाए तो बच्चों की सेहत और पढ़ाई दोनों में सुधार संभव है. इतना ही नहीं, बेहतर आवास व्यवस्था से स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला खर्च भी कम हो सकता है. साफ है कि बच्चों की सफलता सिर्फ उनकी क्षमता पर नहीं, बल्कि उनके घर के माहौल पर भी निर्भर करती है.

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कमर दर्द, बार-बार यूरिन या चेहरे पर सूजन… शरीर के इन संकेतों को न लें हल्के में

कमर दर्द, बार-बार यूरिन या चेहरे पर सूजन… शरीर के इन संकेतों को न लें हल्के में


What Are The First Signs Of Kidney Failure: किडनी हमारे शरीर का बेहद अहम अंग है.  यह खून को साफ करती है, शरीर से विषैले तत्व बाहर निकालती है और पानी व इलेक्ट्रोलाइट का संतुलन बनाए रखती है. जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो शरीर कई तरह के संकेत देने लगता है. इन लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि समय पर इलाज न मिलने पर स्थिति किडनी फेलियर तक पहुंच सकती है.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट Newspoint की रिपोर्ट के अनुसार, किडनी से जुड़ी समस्या में अक्सर कमर के निचले हिस्से या पसलियों के नीचे दर्द महसूस होता है. यह दर्द कभी-कभी पेट के किनारों या कमर के आसपास तक फैल सकता है. शुरुआत में हल्का दर्द होता है, लेकिन धीरे-धीरे यह रीढ़, जांघों और पेट तक भी पहुंच सकता है. अगर लगातार कमर दर्द के साथ अन्य लक्षण भी दिखें, तो इसे हल्के में न लें.

किडनी खराब होने के शुरुआती संकेतों में बार-बार यूरिन आना शामिल है. यह सिर्फ ज्यादा पानी पीने की वजह से नहीं होता, बल्कि किडनी की कार्यक्षमता में गड़बड़ी के कारण भी हो सकता है. पेशाब करते समय जलन या दर्द महसूस होना भी गंभीर संकेत है, जो किडनी या यूरिनरी ट्रैक्ट में समस्या की ओर इशारा करता है. सामान्य तौर पर पेशाब का रंग हल्का पीला होता है, लेकिन अगर पर्याप्त पानी पीने के बावजूद रंग गहरा या धुंधला बना रहे, तो जांच करानी चाहिए. यूरिन में खून दिखना तो बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

चेहरे या आंखों से भी नजर आते हैं लक्षण?

सुबह उठते समय चेहरे या आंखों के नीचे सू जन दिखना भी किडनी की गड़बड़ी का संकेत हो सकता है. यह शरीर में पानी जमा होने की वजह से होता है. बिना ज्यादा मेहनत के लगातार थकान महसूस होना, भूख कम लगना, बार-बार उल्टी या मतली आना भी किडनी फेलियर के लक्षण हो सकते हैं. शरीर में विषैले तत्व जमा होने से एनर्जी की कमी और कमजोरी महसूस होती है. त्वचा में लगातार खुजली होना या सांस लेने में दिक्कत आना भी गंभीर संकेत हैं. शरीर में तरल पदार्थ जमा होने से सांस फूल सकती है, यहां तक कि सामान्य बातचीत या थोड़ी-सी चाल में भी.

कब मिलना चाहिए डॉक्टर से?

अगर इनमें से पांच या उससे अधिक लक्षण नजर आएं, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. शुरुआती चरण में पहचान और इलाज से किडनी को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है. पर्याप्त पानी पिएं, लेकिन सोने से ठीक पहले ज्यादा तरल पदार्थ लेने से बचें. नमक का सेवन नियंत्रित रखें, नियमित स्वास्थ्य जांच कराएं और ब्लड प्रेशर व वजन पर नजर रखें. समय पर सतर्कता ही किडनी की सुरक्षा की सबसे बड़ी कुंजी है.

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