कड़ाके की सर्दी के बाद अचानक हो गई गर्मी, यह किन लोगों के लिए खतरनाक?

कड़ाके की सर्दी के बाद अचानक हो गई गर्मी, यह किन लोगों के लिए खतरनाक?


 How Weather Change Affects Health: उत्तर भारत में इस समय मौसम ने करवट बदली है. राजधानी दिल्ली समेत कई राज्यों में कड़ाके की ठंड के बाद अब दिन में धूप निकलने के साथ मौसम में गर्माहट का अनुभव होने लगा है. दोपहर में गर्मी और शाम होते ही ठंडक बढ़ने से तापमान में बार-बार बदलाव देखने को मिल रहा है. दिल्ली में 6 साल बाद 21 जनवरी को जनवरी महीने का सबसे गर्म दिन दर्ज किया गया है. डॉक्टरों का कहना है कि मौसम का यह उतार-चढ़ाव लोगों की सेहत पर असर डाल सकता है.

शरीर पर पड़ेगा असर

मौसम में बदलाव के साथ शरीर को खुद को एडजस्ट करना पड़ता है. इस दौरान कई लोगों का शरीर इस तरह के बदलाव को पूरी तरह झेल नहीं पाता है. इसके चलते उन्हें तरह-तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. अगर पहले से ही सावधानी बरती जाए, तो इस दौरान होने वाली परेशानियों जैसे वायरल इंफेक्शन, बैक्टीरियल इंफेक्शन, एलर्जी और डिहाइड्रेशन समेत कई अन्य समस्याओं से बचा जा सकता है.

किन बीमारियों का रहता है खतरा

संजीवनी हॉस्पिटल, दरभंगा के निदेशक डॉक्टर संतोष कुमार बताते हैं कि “मौसम में बदलाव के साथ ही कई तरह की दिक्कतें सामने आने लगती हैं, जैसे वायरल फीवर और फ्लू के मामलों में अचानक बढ़ोतरी. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मौसम बदलने के दौरान हमारी इम्युनिटी प्रभावित होती है और कमजोर हो जाती है. इससे वायरस का हमला तेज हो जाता है. इस दौरान कुछ लोगों को सिरदर्द, थकान, बदन दर्द, बुखार और गले में परेशानी का सामना करना पड़ता है. इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित बच्चे और बुजुर्ग होते हैं. इस सीजन में बैक्टीरिया का खतरा भी ज्यादा रहता है, जिसके चलते कई तरह के इंफेक्शन के मामले बढ़ जाते हैं.”

तापमान बढ़ने के साथ बढ़ने लगती है दिक्कत

तापमान में बढ़ोतरी के साथ एलर्जी और सांस से जुड़ी दिक्कतों का खतरा बढ़ने लगता है. ऐसा इसलिए क्योंकि सिर्फ मौसम में बदलाव ही नहीं होता, बल्कि इसके साथ धूल, धुआं और प्रदूषण बढ़ाने वाले तत्व भी हवा में सक्रिय हो जाते हैं, जो इन समस्याओं को ट्रिगर करते हैं. इस दौरान लोगों में सांस लेने में दिक्कत, नाक बहना, लगातार छींक आना, एलर्जिक राइनाइटिस और अस्थमा जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं.

बदलते मौसम में कैसे रखें सेहत का ध्यान

डॉक्टर बताते हैं कि लाइफस्टाइल में कुछ बदलाव करके इस मौसम में खुद को सुरक्षित रखा जा सकता है. इसके लिए-

  • पर्याप्त पानी पिएं और गले में परेशानी हो तो गुनगुने तरल लें
  • ताजा और पौष्टिक भोजन करें
  • कपड़ों की लेयरिंग करें ताकि तापमान के अनुसार खुद को ढाल सकें
  • पसीना आने के बाद ठंडी हवा के सीधे संपर्क से बचें
  • बुखार या खांसी कुछ दिनों में ठीक न हो तो डॉक्टर से सलाह लें

डॉक्टरों का कहना है कि इन छोटी-छोटी सावधानियों से बदलते मौसम में बीमारियों से बचा जा सकता है और इम्युनिटी मजबूत रखी जा सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आप भी खा रहे केमिकल वाला शकरकंद? तुरंत छोड़ दें, वरना हो जाएगा कैंसर!

क्या आप भी खा रहे केमिकल वाला शकरकंद? तुरंत छोड़ दें, वरना हो जाएगा कैंसर!


Are Chemical-Treated Sweet Potatoes Harmful: शकरकंद एक ऐसा कंद है, जिसे नाश्ते से लेकर डिनर तक किसी भी वक्त खाया जा सकता है. बीते कुछ सालों में यह न्यूट्रिशनिस्ट और डाइटीशियन के बीच काफी लोकप्रिय हुआ है और आम आलू के मुकाबले इसे ज्यादा हेल्दी विकल्प माना जाने लगा है. यही वजह है कि बाजार में शकरकंद की मांग तेजी से बढ़ी है. हालांकि, बढ़ती डिमांड के साथ इसकी मिलावट भी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आई है.

फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया के मुताबिक, बाजार में बिकने वाले कई शकरकंदों में रोडामाइन बी नामक केमिकल डाई की मिलावट पाई जाती है. यह एक सिंथेटिक रंग है, जिसका इस्तेमाल कपड़ा, कागज, स्याही और लैब से जुड़े कामों में किया जाता है. यह केमिकल खाने योग्य नहीं है और इंसानी सेहत के लिए खतरनाक माना जाता है. एफएसएसएआई  के अनुसार,  रोडामाइन बी का उपयोग खाने की चीजों के प्रोसेसिंग, स्टोरेज या वितरण में पूरी तरह प्रतिबंधित है, क्योंकि यह कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों और अंगों को नुकसान पहुंचाने का कारण बन सकता है.

घर पर ऐसे करें शकरकंद की शुद्धता की जांच

एफएसएसएआई  ने शकरकंद की मिलावट पहचानने के लिए एक आसान घरेलू तरीका बताया है. इसके लिए चार आसान स्टेप्स फॉलो किए जा सकते हैं. इसमें सबसे पहले आप एक कॉटन बॉल लें और उसे पानी या किसी वेजिटेबल ऑयल में भिगो लें. उसके बाद शकरकंद लें और उसकी बाहरी सतह को कॉटन बॉल से रगड़ें. अगर शकरकंद शुद्ध है, तो कॉटन बॉल का रंग नहीं बदलेगा. लेकिन अगर कॉटन बॉल का रंग लाल या बैंगनी हो जाए, तो समझ लें कि शकरकंद में मिलावट है.

शकरकंद खाने के फायदे

पोषण के लिहाज से शकरकंद को बेहद फायदेमंद माना जाता है. इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन A पाया जाता है. कई स्टडीज के मुताबिक, शकरकंद में एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे एंथोसाइनिन और कैरोटेनॉयड्स होते हैं, जो शरीर में फ्री रेडिकल्स को खत्म करने में मदद करते हैं. इससे ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कम होता है और कैंसर, दिल की बीमारियों और डायबिटीज जैसी क्रॉनिक बीमारियों का खतरा घट सकता है. खासकर बैंगनी रंग के शकरकंद ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में मददगार माने जाते हैं. उबालकर खाने पर इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम रहता है, जिससे यह ब्लड शुगर कंट्रोल के लिए बेहतर कार्बोहाइड्रेट विकल्प बन जाते हैं.

इसके अलावा, शकरकंद डायटरी फाइबर से भरपूर होते हैं, जो पाचन को दुरुस्त रखते हैं और आंतों में अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ावा देते हैं. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इसमें मौजूद कुछ फाइबर प्रीबायोटिक की तरह काम करते हैं, जिससे कब्ज की समस्या कम होती है और लंबे समय तक गट हेल्थ बेहतर बनी रहती है.

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कहीं आपके दिल की धड़कन भी धीमी तो नहीं? बॉडी में चुपके-चुपके घर बनाती है यह बीमारी

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Can Slow Heart Rate Affect Health: दिल की धड़कन की रफ्तार और उसका पैटर्न हमारी दिल की सेहत के बारे में कई अहम संकेत देता है. दिल की धड़कन में होने वाले बदलाव न सिर्फ शरीर की स्थिति बताते हैं, बल्कि कई बार गंभीर बीमारियों की चेतावनी भी दे सकते हैं. जरूरत से ज्यादा धीमी धड़कन भी हमेशा सामान्य नहीं होती. यह ब्रैडीकार्डिया की गंभीर स्थिति का संकेत हो सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि यह आपके लिए कितना खतरनाक है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल, नई दिल्ली के हृदय रोग विशेषज्ञ और डिवाइस स्पेशलिस्ट डॉ. प्रमोद कुमार बताते हैं कि “यह वह स्थिति है, जब दिल की धड़कन लगातार 60 बीट प्रति मिनट (BPM) से कम रहती है. यह स्थिति इसलिए चिंता का विषय बन सकती है, क्योंकि ऐसी हालत में दिल शरीर तक पर्याप्त ऑक्सीजन युक्त खून नहीं पहुंचा पाता, जिससे ऊर्जा स्तर और ओवरऑल हेल्थ पर असर पड़ता है. एक मिनट में सामान्य इंसान की धड़कन 60 से 100 बार धड़कता है.”

किन लोगों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत?

धीमी दिल की धड़कन किसी को भी हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों में इसका जोखिम ज्यादा रहता है. डॉ. प्रमोद बताते हैं कि बुजुर्ग, पहले से दिल की बीमारी से जूझ रहे लोग, डायबिटीज या किडनी की समस्या वाले मरीज और कुछ खास दवाएं लेने वाले लोगों को खासतौर पर सतर्क रहना चाहिए. ऐसे लोगों के लिए नियमित रूप से हार्ट रेट की जांच और डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है, ताकि चक्कर आना, थकान या बेहोशी जैसी दिक्कतों से बचा जा सके.

जब दिल की इलेक्ट्रिकल सिस्टम, जो उसकी धड़कन को कंट्रोल करती है, सही तरीके से काम नहीं करती, तो दिल की रफ्तार धीमी हो सकती है. हालांकि एथलीट्स में धीमी धड़कन सामान्य मानी जाती है, लेकिन आम लोगों के लिए यह किसी अंदरूनी समस्या का संकेत हो सकता है.

किन लक्षणों को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज?

 एक्सपर्ट बताते हैं कि अगर लगातार थकान और कमजोरी महसूस हो, चक्कर आए या हल्कापन लगे, अचानक बेहोशी जैसा एहसास हो, हल्की गतिविधि में भी सांस फूलने लगे या सीने में दर्द और बेचैनी महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ये सभी लक्षण धीमी दिल की धड़कन का संकेत हो सकते हैं और समय रहते जांच और इलाज के लिए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है. हालांकि, एक्सपर्ट बताते हैं कि ब्रैडीकार्डिया के सभी कारणों को रोका नहीं जा सकता, लेकिन सही लाइफस्टाइल अपनाकर इसके जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है. नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, तनाव से दूरी और समय-समय पर हेल्थ चेकअप दिल की सेहत को बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या सच में हमारे इमोशंस हमें कर सकते हैं बीमार, जानें क्या कहते हैं डॉक्टर?

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How Thoughts Affect Physical Health: क्या हमारे विचार और भावनाएं हमारी सेहत को प्रभावित कर सकती हैं? इस सवाल पर मेडिकल और साइकोलॉजी की दुनिया में लंबे समय से चर्चा होती रही है. इसी सवाल को एबीपी के यूथ कॉनक्लेव में डॉ. अमोद सचान निदेशक, हिंद कैंसर संस्थान से भी पूछा गया.

उन्होंने कहा कि मैं पिछले चालीस वर्षों से मरीजों का इलाज कर रहा हूं. इसके अलावा हमने डॉक्टरों को पढ़ाया भी है. जब इस पूरे अनुभव को विस्तार से देखा गया तो यह सामने आया कि जो इलाज हम कर रहे हैं, वह कई मामलों में अधूरा है और यह स्थिति पूरी दुनिया में देखी जा रही है. अब लोग धीरे-धीरे जागरूक हो रहे हैं और सवाल उठा रहे हैं कि बीमारी पैदा कैसे होती है. इसके पीछे एक बड़ा कारण हमारे विचार और इमोशन माने जा रहे हैं. जब हमारे विचार और भावनाएं लंबे समय तक नहीं बदलतीं, तो हम उसी मानसिक ट्रैप में फंसे रहते हैं.

कैसे काम करते हैं हमारे विचार और इमोशन, इन्हें कैसे बदला जाए?

डॉ. अमोद सचान बताते हैं कि हमारा मन दो हिस्सों में काम करता है. पहला है चेतन मन ( जो कुल मिलाकर लगभग 5 प्रतिशत होता है. दूसरा है अवचेतन मन जो करीब 95 प्रतिशत तक सक्रिय रहता है. इसकी खासियत यह है कि हमारे पूरे जीवनकाल की यादें इसमें स्टोर रहती हैं. इसे एक तरह का डेटा सेंटर समझा जा सकता है, जहां हमारे विचारों और अनुभवों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग जमा रहती है.

कई बार ऐसे सपने भी आते हैं, जिनका हमारे वर्तमान जीवन से सीधा संबंध नहीं होता. ये अवचेतन मन में मौजूद पुरानी रिकॉर्डिंग का ही प्रभाव हो सकता है, जो दोबारा रिप्ले होती है. यही रिकॉर्डिंग आगे चलकर हमारे चेतन मन में नए विचार भी पैदा करती है. इसी वजह से इंसान चाहकर भी खुद को आसानी से बदल नहीं पाता.

पॉजिटिव और निगेटिव विचारों का प्रभाव

डॉ. अमोद बताते हैं कि हमारे विचार दो तरह के होते हैं पॉजिटिव और निगेटिव. पॉजिटिव विचारों में प्रेम, करुणा, दया और सद्भावना जैसे भाव आते हैं, जिनसे सुख, शांति और आनंद की अनुभूति होती है. वहीं निगेटिव विचारों में ईर्ष्या, गुस्सा, अहंकार और वासना जैसे भाव शामिल हैं, जो लगातार सक्रिय रहते हैं. पॉजिटिव विचार शरीर के अंदर हीलिंग प्रक्रिया को सपोर्ट करते हैं और ऐसे हार्मोन के बनने में मदद करते हैं, जो बीमारी को कम करते हैं. वहीं लंबे समय तक बने रहने वाले निगेटिव विचार शरीर में तनाव बढ़ा सकते हैं.  डॉ. अमोद  के अनुसार, निगेटिव सोच की जड़ अक्सर अत्यधिक लालसा या असंतोष होता है. काम करना गलत नहीं है, लेकिन जब काम केवल लालच के भाव से किया जाता है, तो मानसिक तनाव बढ़ता है. बेहतर यह है कि काम को कर्तव्य मानकर किया जाए.

विचार बदलना क्यों है मुश्किल?

डॉ. अमोद कहते हैं कि जब हम यह तय कर लेते हैं कि मन में निगेटिव विचार नहीं आने चाहिए, तब भी काम करते समय वही विचार उभर आते हैं. इसकी वजह हमारे न्यूरॉन्स के बीच होने वाला तेज संदेश संचार है. यह संदेश एक मिलीसेकेंड से भी कम समय में एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुंच जाता है. इसके अलावा हमारा दिमाग लोअर ब्रेन  से भी संचालित होता है, जो भावनात्मक प्रतिक्रिया के लिए जिम्मेदार होता है. वहीं हमारे शरीर का मुख्य प्रोसेसर प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स  है, जो सोच-समझकर निर्णय लेने में मदद करता है. चूंकि लोअर ब्रेन पहले एक्टिव हो जाता है, इसलिए हम अक्सर तुरंत रिएक्ट कर देते हैं, जबकि सही रिस्पॉन्स देने में 1 से 2 सेकेंड का समय लगता है. बाद में हमें एहसास होता है कि हमने ऐसा क्यों कर दिया.

समाधान क्या है?

डॉ. अमोद के मुताबिक, जिन विचारों के साथ हम पैदा होते हैं, वे अपने आप नहीं बदलते. इन्हें बदलने के लिए एक्टिव प्रोसेस जरूरी है. इसके लिए ध्यान यानी मेडिटेशन को एक प्रभावी तरीका माना जाता है. ध्यान के दौरान हम अपने विचारों को बहने देने के बजाय उन्हें देखना सीखते हैं. जब हम बार-बार ध्यान करते हैं या अपने नए विचार लिखते हैं, तो धीरे-धीरे अवचेतन मन के पुराने पैटर्न बदलने लगते हैं. डॉक्टर बताते हैं कि हमारा दिमाग वास्तविक अनुभव और कल्पना में फर्क नहीं कर पाता. यानी जो हम बार-बार सोचते हैं, दिमाग उसे सच मानने लगता है. इसी वजह से सकारात्मक सोच और कल्पना का असर हमारे व्यवहार और भावनाओं पर पड़ता है.

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हर आठ मिनट में सर्वाइकल कैंसर ले रहा एक महिला की जान, जानें क्या है कारण और इसका इलाज?

हर आठ मिनट में सर्वाइकल कैंसर ले रहा एक महिला की जान, जानें क्या है कारण और इसका इलाज?


भारत में महिलाओं की सेहत से जुड़ी एक गंभीर और चिंताजनक सच्चाई सामने आ रही है. एक ऐसी बीमारी, जिसके बारे में आज भी बहुत सी महिलाएं खुलकर बात नहीं कर पाती हैं, हर साल हजारों जिंदगियों को निगल रही है. यह बीमारी सर्वाइकल कैंसर है, जिसे हिंदी में गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर कहा जाता है. 

आंकड़े बताते हैं कि देश में हर आठ मिनट में एक महिला की मौत सिर्फ इसी बीमारी के कारण हो रही है. यह स्थिति इसलिए और भी दुखद है क्योंकि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते जांच और टीकाकरण हो जाए, तो इस कैंसर को काफी हद तक रोका जा सकता है.  

कितनी गंभीर है स्थिति?

एम्स और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल करीब 1.23 लाख महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर के नए मामले सामने आते हैं, जिनमें से लगभग 77 हजार महिलाओं की जान चली जाती है. यह कैंसर महिलाओं में कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में से एक बन चुका है. खासतौर पर इसका असर ग्रामीण इलाकों और गरीब परिवारों की महिलाओं पर ज्यादा देखा जा रहा है, जहां जागरूकता और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है. 

सर्वाइकल कैंसर क्या है और क्यों होता है?

सर्वाइकल कैंसर मुख्य रूप से ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV) नामक वायरस के संक्रमण के कारण होता है. यह वायरस लंबे समय तक शरीर में रहने पर आर्ट्स की सर्विस के सेल्स को नुकसान पहुंचाता है, जिससे कैंसर विकसित हो सकता है. ज्यादातर मामलों में शुरुआती दौर में इसके लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए महिलाएं समय पर डॉक्टर तक नहीं पहुंच पाती हैं. 

इसके लक्षण जिन पर ध्यान देना जरूरी

सर्वाइकल कैंसर के लक्षण में असामान्य योनि से इंटरनल ब्लीडिंग, पीरियड्स के बीच या संबंध के बाद खून आना, पेट या कमर में लगातार दर्द, खराब स्मैल डिस्चार्ज, थकान और कमजोरी शामिल हैं. अगर इनमें से कोई भी लक्षण लंबे समय तक बना रहे, तो तुरंत जांच कराना जरूरी है. 

इसका इलाज क्या है?

विशेषज्ञों का कहना है कि सर्वाइकल कैंसर को टीकाकरण और नियमित जांच से रोका जा सकता है. HPV टीकाकरण में 9 से 14 साल की लड़कियों को दो डोज, 15 साल से अधिक उम्र में तीन डोज. यह टीका HPV वायरस से बचाव करता है. भारत में विकसित स्वदेशी वैक्सीन सर्वाविक कुछ राज्यों में सरकार से मुफ्त या 200–400 रुपये प्रति डोज की दर से उपलब्ध कराई जा रही है, जबकि निजी अस्पतालों में इसकी कीमत ज्यादा होती है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत अब तक 10 करोड़ से ज्यादा महिलाओं की जांच की जा चुकी है. 

अब पारंपरिक जांच की जगह HPV डीएनए टेस्ट को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि दूर-दराज की महिलाएं भी लाभ उठा सकें. स्क्रीनिंग के बाद इलाज तक महिला को पहुंचाना एक बड़ी चुनौती रही है. इसे दूर करने के लिए सरकार ने मानक संचालन प्रक्रिया (SOP), हब और स्पोक मॉडल, इलाज और फॉलोअप की मजबूत व्यवस्था लागू की है, ताकि जांच में पॉजिटिव पाई गई कोई भी महिला इलाज से वंचित न रह जाए. 

सामाजिक मुद्दा भी है यह बीमारी

विशेषज्ञों का मानना है कि सर्वाइकल कैंसर सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का मुद्दा भी है. क्योंकि इसका सबसे ज्यादा असर उन महिलाओं पर पड़ता है, जो आर्थिक, सामाजिक या भौगोलिक कारणों से अस्पताल नहीं पहुंच पाती है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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इस शख्स ने एक-दो बार नहीं 5 बार दी कैंसर को मात… ब्रेस्ट कैंसर ने भी नहीं बख्शा, ऐसे जीती जंग

इस शख्स ने एक-दो बार नहीं 5 बार दी कैंसर को मात… ब्रेस्ट कैंसर ने भी नहीं बख्शा, ऐसे जीती जंग


Battle Beyond Cancer: अमेरिका के नॉर्थ कैरोलाइना राज्य में रहने वाले एक शख्स ने जानलेवा बीमारी कैंसर का 5 बार सामना किया है और अब अपने अनुभव के जरिए लोगों को समय रहते जांच कराने के लिए जागरूक कर रहे हैं. जॉनस्टन काउंटी के डेविड और पैट पेनी की शादी को 51 साल से ज्यादा हो चुके हैं.

डेविड पहले सेना में थे और फिर बाद में फायरफाइटर के रूप में कार्यरत थे. वह अब तक पांच बार कैंसर से जूझ चुके हैं. इनमें नॉन-हॉजकिन्स लिंफोमा, सारकोमा और हाल ही में पुरुषों में होने वाला ब्रेस्ट कैंसर शामिल है. जो पुरूषों में बहुत ही ज्यादा गंभीर होते हैं और इसके मामले लगभग 1% ही होते हैं, जैसा कि People.com की रिपोर्ट में बताया गया है. 

30 साल की उम्र में बचा पाना था मुश्किल

पैट का कहना है कि उनके पति को 30 साल की उम्र में ही बचा पाना मुश्किल था, लेकिन वह अविश्वसनीय साहस और दृढ़ता का एक प्रतीक हैं. पैट हमेशा उन्हें “एवर-रेडी बनी” कहती हैं, क्योंकि वह हमेशा सक्रिय और ऊर्जा से भरे रहते हैं.

डेविड को अपने कैंसर का पता 2025 की वसंत ऋतु में चला, जब वह खुद की जांच कर रहे थे, तब उन्होंने अपने सीने में एक छोटी-सी गांठ महसूस की. उन्हें यह असामान्य लगा. अगले ही हफ्ते उनकी लम्पेक्टॉमी (गांठ निकालने की सर्जरी) हुई और अब उनकी सभी जांच रिपोर्ट साफ हैं.

जागरूकता से कैंसर पर मिली समय रहते जीत

पैट को 2009 में 56 वर्ष की आयु में एक नियमित मैमोग्राम के दौरान ब्रेस्ट कैंसर का पता चला था. उन्होंने बताया कि समय पर अपॉइंटमेंट मिलने से उनकी जान बच गई, क्योंकि कैंसर शरीर के गहरे हिस्सों में फैल चुका था और अगर उन्होंने खुद इसे देखा होता, तो शायद बहुत देर हो चुकी होती.

आज डेविड और पैट दोनों अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के लिए वॉलंटियर के रूप में काम कर रहे हैं. वे अपनी कहानी सोशल मीडिया पर साझा करते हैं ताकि दूसरों को अपने शरीर के प्रति जागरूक होने और नियमित रूप से स्वास्थ्य जांच कराने के लिए उजागर कर सकें. डेविड का कहना है कि आपके शरीर को आपसे बेहतर कोई नहीं जानता. अगर आपको कुछ गड़बड़ लगे, तो उसे एक-दो हफ्ते के लिए टालें नहीं.

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